श्रम और रोजगार मंत्रालय

ऐतिहासिक एवं निर्णायक श्रम कानूनों के अधिनियमन का मार्ग प्रशस्त करने के लिए संसद ने तीनों श्रम संहिताओं को पारित किया

ये श्रम संहिताएं कामगारों और उद्योग जगत की आवश्यकताओं में सामंजस्य स्थापित करती हैं तथा कामगारों के कल्याण के लिए मील का पत्थर साबित होंगी : श्री गंगवार

नई श्रम संहिताओं के माध्यम से देश में सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास को प्रोत्साहन मिलेगा  : श्री गंगवार

श्री गंगवार ने इस बात पर बल दिया कि इन श्रम संहिताओं  में श्रम कल्याण उपबंधों से संबंधित कई ‘महत्वपूर्ण परिवर्तन’ किए गए हैं

नई श्रम संहिताओं में 50 करोड़ से अधिक संगठित, असंगठित तथा स्व-नियोजित कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा आदि का प्रावधान किया गया है।

महिला कामगारों को पुरुष कामगारों की तुलना में वेतन की समानता सुनिश्चित होगी

गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों सहित असंगठित क्षेत्र के 40 करोड़ कामगारों के लिए ‘सामाजिक सुरक्षा कोष’ की स्थापना से सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा दायरे के विस्तार में सहायता मिलेगी

श्रमजीवी पत्रकारों की परिभाषा में डिजिटल और इलैक्ट्रानिक मीडिया को शामिल किया जाएगा।

गिग तथा प्लेटफॉर्म कामगारों के साथ-साथ बागान कामगारों को भी ईएसआईसी के लाभ प्राप्त होंगे

प्रवासी कामगारों की शिकायतों का समाधान करने के लिए हेल्प लाइन की शुरूआत ।

इन श्रम संहिताओं से सभी संहिताओं के लिए एक पंजीकरण, एक लाइसेंस और एक विवरणी के प्रावधान से एक पारद‎र्शी, जवाबदेह और सरल कार्यतंत्र की स्थापना होगी।

Posted On: 23 SEP 2020 4:28PM by PIB Delhi

श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री संतोष कुमार गंगवार ने श्रम संहिताओं पर आज राज्य सभा में चर्चा के दौरान कहा कि द्वितीय राष्ट्रीय श्रम आयोग की सिफारिशों के अनुसार हमारी सरकार ने सभी श्रम कानूनों को 4 श्रम संहिताओं में समाहित करने का कार्य वर्ष 2014 में प्रारम्भ कर दिया था। कुल 44 श्रम कानूनों में से 12 श्रम कानून पहले ही निरस्त किए जा चुके हैं। वेतन संबंधी संहिता अगस्त, 2019 में पहले ही संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित की जा चुकी है । उन्होंने कहा कि इस संहिता के माध्यम से हमारी सरकार ने 50 करोड़ श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी तथा समय पर वेतन मिलने का कानूनी अधिकार दिया था । इसी क्रम में अब माननीय सदन के सामने 3 अन्य श्रम संहिताएं लाई जा रही हैं। व्यवसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संहिता विधेयक, 2020 में 13 श्रम कानून, औद्योगिक संबंध संहिता विधेयक, 2020 में 3 श्रम कानून तथा सामाजिक सुरक्षा संहिता विधेयक, 2020 में 9 श्रम कानून समाहित किए गए हैं।

2.   श्रम संहिताओं पर बोलते हुए श्रम एवं रोजगार मंत्री ने कहा कि इन संहिताओं को पहले 2019 में लोक सभा में पेश किया गया था । श्रम संबंधी संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों तथा अन्य सभी हितधारकों के सुझावों के अनुसार इन संहिताओं को महत्वपूर्ण बदलावों के साथ वर्तमान सत्र में लोक सभा में पुन: रखा किया गया और ये तीनों संहिताएं लोक सभा से पारित होने के पश्चात आपके समक्ष विचारार्थ लाई गई हैं। उन्होंने आगे कहा कि श्रम संबंधी संसदीय स्थायी समिति  की 233 सिफारिशों में से 74 प्रतिशत सिफारिशों को स्वीकार करते हुए इन संहिताओं को अंतिम रूप दिया गया है।

3.   श्री गंगवार ने कहा कि हमारे यशस्वी प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का मंत्र रहा है- रिफॉर्म, परफॉर्म, ट्रांसफॉर्म। माननीय प्रधानमंत्री जी के इसी मंत्र पर अमल करते हुए हमारी सरकार ने 2014 से लेकर अब तक श्रमिकों के कल्याण हेतु अनेक कदम उठाए हैं तथा इन श्रम संहिताओं के माध्यम से समग्र श्रम सुधार का सपना साकार हो रहा है।

4.   श्रम मंत्री ने आगे बताया कि ओएसएच संहिता में श्रमिकों को कार्य के लिए एक सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने तथा श्रमिक कल्याण सुनिश्चित करने हेतु प्रावधान शामिल किए गए हैं। इसी प्रकार आईआर संहिता के माध्यम से श्रमिकों के लिए एक प्रभावी विवाद निस्तारण व्यवस्था सुनिश्चित की जा रही है। इस संहिता का उद्देश्य है कि प्रत्येक औद्योगिक संस्थान में, चाहे वहां एक ही श्रमिक कार्य कर रहा हो, एक प्रभावी एवं समयबद्ध विवाद निस्तारण प्रणाली उपलब्ध हो। सामाजिक सुरक्षा संहिता, संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को व्यापक सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने का कार्य करेगी । इसमें भवन निर्माण कामगारों के लिए ईपीएफओ, ईएसआईसी, मातृत्व लाभ, ग्रेच्युटी तथा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा फंड  से संबंधित उपबंध शामिल हैं। इस संहिता के माध्यम से हम माननीय प्रधानमंत्री जी के सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा के संकल्प को पूरा करने की ओर अग्रसर हैं।

5.   श्री गंगवार ने इस बात पर बल दिया कि इन तीनों श्रम संहिताओं के माध्यम से श्रमिकों, उद्योग जगत तथा अन्य संबंधित पक्षों के अधिकारों एवं आवश्यकताओं में एक सामांजस्य स्थापित किया है तथा आशा है कि ये श्रम संहिताएं श्रमिकों के कल्याण हेतु महत्वपूर्ण साबित होंगी। हमारी सरकार सदैव से श्रमेव जयते के सिद्धांत को मानती है तथा एक श्रमिक के जीवन को बेहतर बनाने के लिए संकल्पित है। इसी उद्देश्य से हम अपने श्रमिकों को वेतन सुरक्षा, काम करने के वातावरण की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा तथा त्वरित विवाद निस्तारण प्रणाली देने के लिए सदैव प्रयासरत रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपने कार्यकाल के आरम्भ में ही यह स्वीकार किया है कि जितना महत्व सत्यमेव जयते का है, उतना ही महत्व राष्ट्र के विकास के लिए श्रमेव जयते का है। इसलिए सरकार का यह प्रयास रहा है कि अपने श्रमिक को ‘श्रम योगी’ बनाते हुए उनके जीवन को सहज बनाने की कोशिश की जाए। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पिछले 6 वर्षों में लगातार प्रयास किए, जैसे:- असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों और छोटे व्यापारियों को पेंशन देना, महिलाओं के मातृत्व अवकाश को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह करना, ईपीएफ तथा ईएसआईसी का दायरा बढ़ाना, विभिन्न कल्याणकारी सुविधाओं की पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करने का प्रयास करना, न्यूनतम मजदूरी को बढ़ाना इत्यादि। इसी क्रम में श्रम सुधारों की प्रक्रिया भी 2014 में आरम्भ की गई थी, जिसका उद्देश्य यह था कि अनेक श्रम कानूनों को समाहित कर उसे सरलीकृत रूप में 4 श्रम संहिताओं में परिवर्तित किया जाए। श्रम सुधारों का उद्देश्य यह है कि अपने श्रम कानूनों को, बदलती परिस्थितियों के अनुरूप किया जाए तथा श्रमिकों और उद्योगों की आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाते हुए एक प्रभावी और पारदर्शी व्यवस्था दी जाए। 29 श्रम कानूनों के 4 श्रम संहिताओं में एकीकरण पर श्री गंगवार ने कहा कि श्रम संहिताओं को अंतिम रूप देने से पहले सरकार से व्यापक परामर्श किया। इनमें नौ त्रिपक्षीय बैठक, 4 उप समितियों, 10 अंतर मंत्रालयी परामर्श, ट्रेड यूनियंस, नियोक्ता संगठनों, राज्य सरकारों, विशेषज्ञों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों के बीच विचार विमर्श शामिल हैं। साथ ही इन्हें सार्वजनिक करते हुए जनता से सुझाव/टिप्पणियां मांगी गई थीं।

6.   श्री गंगवार ने कहा कि स्वतंत्रता के 73 वर्षों की इस यात्रा में आज के नए भारत का वातावरण, तकनीकी दौर, काम करने का तरीका, तथा काम के स्वरुप में भी अत्यधिक परिवर्तन हो गया है। इस परिवर्तन के साथ यदि भारत अपने श्रम कानूनों में अपेक्षित परिवर्तन नहीं करता है तो हम श्रमिकों के कल्याण तथा उद्योगों के विकास दोनों ही उद्देश्यों में पीछे रह जायेंगे। आत्मनिर्भर श्रमिक के कल्याण और अधिकारों की संरचना, चार स्तंभों पर आधारित है। सर्वप्रथम आत्मनिर्भर श्रमिक का पहला स्तंभ यानी वेतन-सुरक्षा की बात करें, तो स्वतंत्रता के 73 वर्षों के बाद भी, और 44 श्रम कानून होने के बावजूद भारत के 50 करोड़ श्रमिकों में से लगभग 30 प्रतिशत श्रमिकों को ही न्यूनतम मजदूरी का कानूनी अधिकार था तथा सभी श्रमिकों को समय पर वेतन भी नहीं दिया जाता था। इस विसंगति को पहली बार हमारी सरकार ने दूर करने का कार्य किया है तथा सभी 50 करोड़ संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी और समय पर वेतन मिलने का कानूनी अधिकार दिया है।

7.   श्रम मंत्री ने आगे कहा कि श्रमिक सुरक्षा दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है, उसे काम करने के लिए एक सुरक्षित वातावरण देना, जिससे उसके स्वास्थ्य की सुरक्षा हो सके और वह एक खुशहाल जीवन जी सके। इसके लिए ओएसएच संहिता में पहली बार, एक निश्चित आयु से ऊपर के श्रमिकों के लिए, वार्षिक स्वास्थ्य जांच का प्रावधान किया गया है। इसके अतिरिक्त सुरक्षा से संबंधित मानदंडों को प्रभावी और गतिशील रखने के लिए उन्हें नेशनल ऑक्यूपेशनल सेफ्टी एंड हैल्थ बोर्ड के द्वारा बदलती हुई तकनीकी के साथ बदला जा सकेगा। यह बोर्ड एक त्रिपक्षीय संस्था होगी, जिसमें केन्द्र एवं राज्य सरकार, श्रमिक संगठन, नियोक्ता संगठन के प्रतिनिधि होंगे। इनके अतिरिक्त इस क्षेत्र के विशेषज्ञ भी इसमें शामिल होंगे। इस प्रक्रिया से अब हमारे सुरक्षा मानदंड प्रभावी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के होंगे। सुरक्षित वातावरण देने के लिए श्रमिक और नियोक्ता साथ मिलकर निर्णय लें, इसके लिए सभी संस्थानों में सुरक्षा समिति का प्रावधान किया गया है। वर्तमान श्रम कानूनों में कैंटीन, क्रैच, फर्स्ट ऐड, तथा अन्य कल्याणकारी सुविधाओं के लिए अलग-अलग थ्रेसहोल्ड दिए गए हैं। अब ओएसएच संहिता में हमने इन सभी के लिए एकसमान थ्रेसहोल्ड देने का कार्य किया है, जिससे ज्यादा से ज्यादा श्रमिक, कल्याणकारी प्रावधानों का लाभ उठा सकें।

8.   श्रम एवं रोजगार मंत्री ने उल्लेख किया कि श्रमिकों की यह समस्या रही है कि वे कई परिस्थितियों में यह सिद्ध नहीं कर पाते हैं कि वे किस संस्थान के श्रमिक हैं। इस समस्या के निदान के लिए नियुक्ति-पत्र का कानूनी अधिकार, हर श्रमिक को इस कोड के माध्यम से दिया गया है। वर्तमान में किसी श्रमिक को एक वर्ष में न्यूनतम 240 दिन का काम करने के बाद ही, हर 20 दिन पर एक दिन की छुट्टी पाने का अधिकार मिलता था। अब ओएसएच संहिता में हमने, छुट्टी की पात्रता के लिए, 240 दिन  की न्यूनतम शर्तों को घटाकर 180 दिन कर दिया है। कार्य स्थल पर चोट लगने या मृत्यु होने पर नियोक्ता के ऊपर लगाए गए जुर्माने का कम से कम 50 प्रतिशत, अन्य लाभों के अतिरिक्त पीड़ित श्रमिक को देने का प्रावधान कानून में पहली बार किया गया है। इन सभी प्रावधानों के द्वारा श्रमिकों को कार्य करने के लिए एक सुरक्षित वातावरण देने का प्रयास किया गया है। इसी प्रकार, महिलाओं को पुरुषों के समान ही कार्य करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए तब ही हम नवीन भारत का निर्माण कर पाएंगे। इसलिए पहली बार हमने यह प्रावधान किया है कि महिलाएं किसी भी प्रकार के संस्थान में अपनी स्वेच्छानुसार रात में भी काम कर सकेंगी। परन्तु, नियोक्ता को इसके लिए, उपयुक्त सरकार द्वारा निर्धारित, सभी आवश्यक सुरक्षा प्रबंध करने पड़ेंगे।

9.   श्री गंगवार ने बल दिया कि श्रमिकों के लिए तीसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है, व्यापक सामाजिक सुरक्षा। हमारी सरकार का संकल्प है कि हम एक सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा की प्रणाली की व्यवस्था अपने श्रमिकों के लिए करें। इसी संकल्प के अनुरूप सामाजिक सुरक्षा संहिता में ईएसआईसी और ईपीएफओ के दायरे को बढ़ाया जा रहा है।  ईएसआईसी के दायरे को बढ़ाने के लिए यह प्रावधान किया गया है कि अब इसकी कवरेज देश के सभी 740 जिलों में होगी। इसके अतिरिक्त ईएसआईसी का विकल्प, बागान श्रमिकों, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों, गिग तथा प्लेटफॉर्म वर्कर्स तथा 10 श्रमिकों से कम श्रमिक वाले संस्थानों के लिए भी होगा। यदि किसी संस्थान में जोखिम वाला कार्य होता है, तो उस संस्थान को एक श्रमिक होने पर भी अनिवार्य रुप से ईएसआईसी के दायरे में लाया जाएगा। इसी प्रकार ईपीएफओ के दायरे को बढ़ाने के लिए वर्तमान कानून में संस्थानों के शिड्यूल को हटा दिया गया है और अब वे सभी संस्थान जिनमें 20 या उससे अधिक श्रमिक हैं, वे ईपीएफ के दायरे में आएंगे। इसके अतिरिक्त 20 से कम श्रमिकों वाले संस्थान तथा स्व-रोजगार वाले श्रमिकों के लिए भी ईपीएफओ का विकल्प, सामाजिक सुरक्षा संहिता में दिया जा रहा है।

10.  श्रम मंत्री ने आगे कहा कि 40 करोड़ असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए विशेष रूप से सामाजिक सुरक्षा कोष का प्रावधान किया गया है। इस फंड के द्वारा असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे श्रमिक और गिग व प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा की योजनाएं बनायी जायेंगी। इससे, इन 40 करोड़ श्रमिक भाई-बहनों को सामाजिक सुरक्षा से संबंधित सभी प्रकार के लाभ जैसे : मृत्यु बीमा, दुर्घटना बीमा, मातृत्व लाभ और पेंशन इत्यादि प्रदान करने के लिए योजनाएं बनायी जायेंगी। इन प्रयासों के द्वारा हमने एक सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा कवरेज के अपने संकल्प को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। औद्योगिक विकास के लिए यह आवश्यक है कि हम विवाद निस्तारण की एक प्रभावी प्रणाली अपने श्रमिकों को उपलब्ध करवायें, जिससे औद्योगिक शांति सुनिश्चित हो सके। इस चौथे स्तंभ को देने के लिए आईआर संहिता में एक व्यवस्थित विवाद निस्तारण प्रणाली की व्यवस्था की गयी है, जिसके अंतर्गत हमने औद्योगिक न्यायाधिकरणों की व्यवस्था को मजबूत किया है। उन्होंने कहा कि ‘आईआर संहिता’ में भी परिभाषाओं को वर्तमान की तुलना में और ज्यादा सुदृढ़ किया गया है। उदाहरण के लिए, कामगार की परिभाषा में शामिल, सुपरवाइजर की वेतन सीमा को 10 हजार रुपए से बढ़ाकर अब 18 हजार रुपए कर दिया गया है। इस बदलाव से आज के मुकाबले कहीं ज्यादा सुपरवाइजर, आईआर संहिता की परिधि में आएंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि अन्य श्रेणी के श्रमिकों के लिए कोई वेतन सीमा नहीं है।

11.  श्री गंगवार ने निश्चित अवधि (फिक्स्ड टर्म) वाले रोजगार को आईआर संहिता में लाने पर कहा कि निश्चित अवधि वाले कर्मचारियों की सेवा शर्तें, वेतन, छुट्टी एवं सामाजिक सुरक्षा भी, एक नियमित कर्मचारी के समान ही होंगी। इसके अतिरिक्त निश्चित अवधि वाले कर्मचारियों को प्रो राटा ग्रेच्युटी का अधिकार भी दिया गया है। आईआर संहिता में हड़ताल के प्रावधानों पर भी मैं बताना चाहूंगा कि किसी भी श्रमिक का स्ट्राईक पर जाने का अधिकार सरकार ने वापिस नहीं लिया है। हड़ताल पर जाने से पहले, 14 दिन के नोटिस पीरियड की बाध्यता हर संस्थान पर इसलिए लागू की गयी है, जिससे इस अवधि में आपसी बातचीत के माध्यम से विवाद को समाप्त करने का प्रयास किया जा सके। श्रमिकों के हड़ताल पर जाने से, न तो श्रमिकों का, और ना ही इंडस्ट्री का कोई लाभ होता है। जहां तक आईआर संहिता में छंटनी, क्लोजर या जबरन छंटनी में थ्रेसहोल्ड को 100 श्रमिक से बढ़ाकर 300 श्रमिक करने की बात है, तो इस पर श्रम मंत्री ने कहा कि श्रम एक समवर्ती सूची का विषय है और संबंधित राज्य सरकारों को भी अपनी परिस्थितियों के अनुरूप श्रम कानूनों में परिवर्तन करने का अधिकार है। इसी अधिकार का उपयोग करते हुए 16 राज्य, पहले ही अपने यहां यह सीमा बढ़ा चुके हैं। संसदीय स्थायी समिति ने भी यह अनुशंसा की थी कि इस सीमा को बढ़ा कर 300 कर दिया जाय। इसके अतिरिक्त इस प्रावधान का एक पक्ष यह भी होता है कि ज्यादातर संस्थान, 100 से अधिक श्रमिकों को अपने संस्थान में नहीं रखना चाहते हैं, जिससे अनौपचारिक रोजगार को बढ़ावा मिलता है।

12.  श्रम मंत्री ने उल्लेख किया कि आर्थिक समीक्षा 2019 के अनुसार राजस्थान राज्य में इस सीमा को 100 से 300 करने के बाद, बड़ी फैक्ट्रियों की संख्या के साथ-साथ, श्रमिकों के रोजगार सृजन में भी बढ़ोत्तरी हुई है तथा छंटनी के मामलों में अभूतपूर्व कमी आयी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस एक प्रावधान को बदलने से देश में बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों को स्थापित करने के लिए निवेशक प्रेरित होंगे और ज्यादा संख्या में बड़ी फैक्ट्रियों के स्थापित होने से, रोजगार के कहीं ज्यादा अवसर, हमारे देश के श्रमिकों के लिए उत्पन्न होंगे।

13.  श्री गंगवार ने आगे कहा कि श्रमिकों को संस्थानों में उनके अधिकार दिलवाने में ट्रेड यूनियंस की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करते हुए कानून में पहली बार ट्रेड यूनियंस को संस्थान के स्तर पर, राज्य के स्तर पर तथा केन्द्र के स्तर पर मान्यता दी जा रही है। किसी भी श्रमिक की यदि नौकरी छूट जाती है तो दोबारा उसके रोजगार की संभावना बढ़ाने के उद्देश्य से आईआर संहिता में पहली बार पुनः कौशल (रि स्किलिंग) फंड का प्रावधान किया गया है। इन श्रमिकों को इसके लिए 15 दिन का वेतन दिया जाएगा।

14.  श्री गंगवार ने आगे कहा कि कोविड-19 के परिदृश्य में प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों को सुदृढ़ करने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। प्रवासी श्रमिकों की परिभाषा को व्यापक बनाया गया है। अब सभी मजदूर, जो एक राज्य से दूसरे राज्य में आते हैं और उनका वेतन 18 हजार रुपए से कम है तो वे प्रवासी श्रमिक की परिभाषा के दायरे में आएंगे और उन्हें सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल पाएगा। इसके अतिरिक्त प्रवासी श्रमिकों के लिए एक डाटा बेस बनाने का प्रावधान, उनकी कल्याणकारी योजनाओं की पोर्टेबिलिटी, एक अलग हेल्पलाइन की व्यवस्था तथा उन्हें साल में एक बार अपने मूल स्थान पर जाने के लिए नियोक्ता द्वारा यात्रा-भत्ता दिए जाने का प्रावधान किया गया है। क्योंकि श्रमिक और उद्योग, दोनों एक  दूसरे के पूरक हैं, इसलिए बदलते परिवेश में हमारे श्रमिकों और उद्योगों की आवश्यकताओं में भी संतुलन होना चाहिए ।

 15. श्रम मंत्री ने कहा कि इन श्रम संहिताओं में जहां एक तरफ श्रमिकों के अधिकारों को सुदृढ़ करने का प्रयास किया गया है, वहीं उद्योगों को सरलता से चलाने के लिए एक सरल अनुपालन की व्यवस्था भी की गई है। अब उद्योग लगाने के लिए विभिन्न श्रम कानूनों के अंतर्गत, अलग-अलग कई रजिस्ट्रेशन या कई लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं होगी। जहां तक संभव है, अब हम रजिस्ट्रेशन, लाइसेंस इत्यादि को समयबद्ध सीमा में और ऑनलाइन प्रक्रिया के अंतर्गत प्रदान करने की व्यवस्था करने जा रहे हैं।

16.  श्री गंगवार ने विशेष बल देते हुए कहा कि इस प्रकार इन 4 श्रम संहिताओं के माध्यम से हम एक तरफ श्रमिकों का कल्याण सुनिश्चित कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यह प्रयास है कि एक सरल अनुपालन व्यवस्था के माध्यम से नये उद्योगों का विकास हो, जिससे हमारे कार्यबल के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और हमारा देश हमारे यशस्वी प्रधान मंत्री के नेतृत्व में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल हो जाएगा जिससे सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास सुनिश्चित होगा।  

 

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