कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के 10 वर्ष पूरे हुए
आईबीसी समाधान प्रक्रिया ने लेनदारों के लिए 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक की वसूली को सुगम बनाया है
प्रविष्टि तिथि:
28 MAY 2026 6:35PM by PIB Delhi
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी), जो 2016 में लागू हुई थी, के आज 10 वर्ष पूरे हुए। लागू होने के एक दशक बाद, यह संहिता न केवल एक विधायी सुधार के रूप में उभरी है, बल्कि एक ऐसे संस्थागत बदलाव के रूप में भी सामने आई है जिसका दूरगामी प्रभाव ऋण बाजारों, कंपनियों के व्यवहार, निवेशकों के विश्वास और आर्थिक दक्षता पर पड़ा है।
एक ऐतिहासिक सुधार के रूप में सराहे गए, इस संहिता को देश के बिखरे दिवाला ढांचे को समेकित और आधुनिक बनाने के उद्देश्य से लागू किया गया था। इसके कार्यान्वयन से वसूली तंत्र में सुधार हुआ है, उधार लेने एवं देने की जिम्मेदार कार्यपद्धतियों को प्रोत्साहन मिला है और भारत की वित्तीय एवं कानूनी प्रणालियों में विश्वास मजबूत हुआ है।
इसका प्रमाण इस तथ्य से मिलता है कि मार्च 2026 तक 1,419 मामलों में समाधान योजनाएं तैयार की जा चुकी थीं। समाधान प्रक्रिया के जरिए लेनदारों को 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक की वसूली संभव हुई है। लेनदारों को प्राप्त यह वसूली क्रमशः उनके उचित मूल्य के 95 प्रतिशत और परिसमापन मूल्य के 167 प्रतिशत के बराबर है।
आज, इस संहिता के इर्द-गिर्द विकसित हो रहे न्यायशास्त्र ने एक ऐसे मजबूत एवं गतिशील दिवाला इकोसिस्टम के विकास में योगदान दिया है, जो उभरती आर्थिक वास्तविकताओं और हितधारकों की अपेक्षाओं के अनुरूप ढलता रहता है।
मार्च 2026 तक, कुल 8,987 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 7,102 मामलों का निपटारा हो चुका है। इन निपटाए गए मामलों में से, लगभग 58 प्रतिशत यानी 4,099 कंपनियों को सफलतापूर्वक बचाया गया, जबकि 3,003 मामलों का परिसमापन कर दिया गया।
जिन प्रतिष्ठानों को बचाया गया, उनमें से 1,388 मामले अपील, समीक्षा या समझौते के कारण बंद कर दिए गए; 1,292 मामले वापस ले लिए गए।
ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि जिन मामलों का समाधान योजनाओं के साथ समापन हुआ, उनमें से लगभग 42 प्रतिशत मामले पहले औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड के पास थे या निष्क्रिय हो चुके थे। यह वित्तीय रूप से संकटग्रस्त उद्यमों के पुनरुद्धार को सुविधाजनक बनाने में इस संहिता की भूमिका को रेखांकित करता है।
इस संहिता ने उधारकर्ताओं के बीच ऋण संबंधी अनुशासन को बढ़ावा देने और पुनर्भुगतान की संस्कृति को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
इस संहिता का निवारक प्रभाव इस तथ्य से स्पष्ट है कि राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण के समक्ष दायर 30,000 से अधिक मामले, जिनमें लगभग 14 लाख करोड़ रुपये की राशि शामिल थी, स्वीकार किए जाने से पहले ही निपटान के जरिए सुलझा लिए गए। ये समझौते दर्शाते हैं कि इस संहिता ने औपचारिक दिवाला कार्यवाही के बाहर वित्तीय संकट के समय पर समाधान को प्रोत्साहित करके देनदार और लेनदार के बीच के संबंधों को किस हद तक बदल दिया है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे निपटान और निकासी के अभाव में, बैंकिंग क्षेत्र का सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात सितंबर 2025 तक रिपोर्ट किए गए 2.1 प्रतिशत के स्तर से काफी अधिक रहने की संभावना थी, जबकि 2017 में यह लगभग 11.8 प्रतिशत था, जैसा कि भारतीय रिजर्व बैंक की भारत में बैंकिंग के रुझान और प्रगति संबंधी रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है।
भारत की दिवाला प्रणाली में भी सुधार हुआ है, जिससे वसूली के बेहतर परिणाम, समाधान की त्वरित समयसीमा और लेनदारों को अधिक सशक्त बनाने में मदद मिली है। एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने घरेलू समाधान और वसूली प्रणाली की कार्यकुशलता में सुधार को देखते हुए भारत के दिवाला ढांचे को ‘ग्रुप सी’ से ‘ग्रुप बी’ में अपग्रेड किया है।
आईबीसी से पहले की अवधि में औसत वसूली दर लगभग 15-20 प्रतिशत थी, जो आईबीसी के बाद बढ़कर लगभग 30 प्रतिशत हो गई है। जबकि, समाधान की समयसीमा लगभग 6-8 वर्ष से घटकर इस संहिता के तहत लगभग 2 वर्ष हो गई है।
भारतीय रिजर्व बैंक की भारत में बैंकिंग के रुझान और प्रगति संबंधी रिपोर्ट 2024-25 में भी इस संहिता की निरंतर प्रभावशीलता को दर्शाया गया है। इस रिपोर्ट में इसे संकटग्रस्त परिसंपत्तियों की वसूली के लिए सबसे प्रभावी तंत्र के रूप में पहचाना गया है। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा विभिन्न माध्यमों से की गई कुल 1.04 लाख करोड़ रुपये की वसूली में से लगभग 0.54 लाख करोड़ रुपये यानी लगभग 52.4 प्रतिशत की वसूली, आईबीसी प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त की गई।
इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आईबीसी के तहत वसूली दर पिछले वर्ष के 28.3 प्रतिशत से बढ़कर 2024-25 में 36.6 प्रतिशत हो गई है, जो तनावग्रस्त परिसंपत्तियों से निपटने और सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों में कमी लाने में दिवाला ढांचे की बढ़ती प्रभावशीलता को उजागर करती है।
आईआईएम बैंगलोर द्वारा किए गए एक अध्ययन में, आईबीसी के लागू होने के बाद ऋण संबंधी व्यवहार में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है। विशेष रूप से, 2018 और 2024 के बीच ‘ओवरड्यू’ श्रेणी से निकलकर ‘नॉर्मल’ श्रेणी में आने वाले ऋण खातों का अनुपात लगातार बढ़ा है। यह उधारकर्ताओं के बेहतर अनुशासन को दर्शाता है।
व्यवहार में आए इस बदलाव का असर खातों के ओवरड्यू रहने के औसत दिनों की संख्या में आई भारी कमी में भी दिखा, जो 248-344 दिनों से घटकर 30-87 दिन हो गई।
आईबीसी के तहत समाधान किए गए फर्मों पर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद (2025) द्वारा किए गए एक अध्ययन में दिवाला समाप्त होने के बाद व्यवसायों के महत्वपूर्ण पुनरुद्धार पर प्रकाश डाला गया है। इसमें समाधान होने के बाद पांच वर्ष की अवधि के दौरान प्रमुख संचालन और वित्तीय संकेतकों में पर्याप्त सुधार हुआ है।
समाधान किए गए कंपनियों की औसत बिक्री में लगभग 89 प्रतिशत की वृद्धि हुई और परिसंपत्ति हस्तांतरण अनुपात में लगभग 131 प्रतिशत का सुधार हुआ। यह संचालन संबंधी दक्षता में वृद्धि और व्यवसाय में सुधार का संकेत देता है। इसके बाद पांच वर्षों में औसत पूंजीगत व्यय में लगभग 106 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो नए निवेश और आर्थिक व्यवहार्यता को दर्शाती है।
इस अध्ययन में आगे यह भी बताया गया है कि समाधान किए गए सूचीबद्ध प्रतिष्ठानों के कुल बाजार मूल्यांकन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो पांच वर्षों में लगभग 2.8 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 9 लाख करोड़ रुपये हो गया है। यह सफल समाधान के बाद निवेशकों के मजबूत विश्वास और बेहतर दीर्घकालिक विकास संभावनाओं का संकेत देता है।
जब 2016 में आईबीसी की शुरुआत हुई, तो इसने उद्यम मूल्य के महत्वपूर्ण क्षरण से चिह्नित एक युग से आगे बढ़ने का वादा किया, जहां कई वर्षों तक चलने वाली लंबी देरी के परिणामस्वरूप परिसंपत्तियों को टुकड़ों में बेचा जाता था और चालू व्यवसाय स्थापित करने में किए गए निवेश को बहुत कम या कोई मूल्य नहीं दिया जाता था, जिससे अक्सर लेनदारों को रुपये पर केवल कुछ पैसे ही वसूल करने को मिलते थे।
इसके विपरीत, इस संहिता ने वित्तीय संकट और दिवाला के समाधान के लिए एक ऐसा सुसंगत, लेनदार-केंद्रित और समयबद्ध तंत्र स्थापित करने का प्रयास किया, जिसमें दक्षता, कॉरपोरेट पुनरुद्धार और मूल्य अधिकतमकरण पर जोर दिया गया। ऐसा करके, इसने भारतीय अर्थव्यवस्था में ऋण, उद्यम और जवाबदेही के बीच के संबंधों को मौलिक रूप से पुनर्परिभाषित किया।
आईबीसी की दसवीं वर्षगांठ चिंतन, मूल्यांकन और नई कल्पनाशीलता के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है। यह भारत के वित्तीय और संस्थागत परिदृश्य पर दिवाला ढांचे के परिवर्तनकारी प्रभाव पर गहन विचार करने के लिए प्रेरित करती है। साथ ही, यह परिपक्व होते दिवाला व्यवस्था में आने वाली चुनौतियों के साथ रचनात्मक जुड़ाव को भी प्रोत्साहित करती है।
अब जबकि भारत 2047 के ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, एक कुशल एवं सुदृढ़ दिवाला प्रणाली का निरंतर विकास उद्यमशीलता को बनाए रखने, उत्पादक पूंजी को संरक्षित करने, वित्तीय स्थिरता को गहरा करने और जिम्मेदार आर्थिक विकास को बढ़ावा देने की दृष्टि से अपरिहार्य रहेगा।
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पीके/केसी/आर/एसएस
(रिलीज़ आईडी: 2266429)
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