उप राष्ट्रपति सचिवालय

उपराष्ट्रपति ने सभी भारतीय भाषाओं को बराबरी का सम्मान देने का आह्वान किया

हमें अपनी समृद्ध भाषाई विविधता पर गर्व होना चाहिए- उपराष्ट्रपति

उन्होंने कहा कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को एक दूसरे के पूरक के रूप में देखना चाहिए

किसी भी भाषा को थोपा नहीं जाना चाहिए और न ही किसी भाषा का विरोध किया जाना चाहिए- उपराष्ट्रपति

उन्होंने स्कूली शिक्षा को मातृभाषा में प्रदान करने का आह्वान किया

प्रकाशकों और शिक्षाविदों को हमारी विभिन्न भाषाओं के बीच आदान-प्रदान को बढ़ावा देना चाहिए

हिन्दी दिवस-2020 पर एक वेबिनार को संबोधित किया

Posted On: 14 SEP 2020 1:59PM by PIB Delhi

उपराष्ट्रपति श्री एम.वेंकैया नायडू ने आज सभी भाषाओं को बराबरी का सम्मान देने का आह्वान किया और इस बात पर जोर दिया कि किसी भी भाषा को थोपा नहीं जाना चाहिए और न ही किसी भाषा का विरोध किया जाना चाहिए।

मधुबन एजुकेशनल बुक्स द्वारा हिंदी दिवस-2020 के अवसर पर आयोजित एक ऑनलाइन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि हमारी सभी भाषाओं का समृद्ध इतिहास है और हमें अपनी भाषाई विविधता और सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना चाहिए।

महात्मा गांधी द्वारा 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना किये जाने का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को एक दूसरे के पूरक के रूप में देखा जाना चाहिए।

नागिरकों के बीच सद्भाव, प्रेम और स्नेह बढ़ाने के लिए, श्री नायडू ने सुझाव दिया कि गैर-हिंदी भाषी राज्यों के छात्रों को हिंदी सीखनी चाहिए और हिंदी भाषी राज्यों के छात्रों को एक और भारतीय भाषा जैसे तमिल, तेलुगू, कन्नड़ आदि सीखनी चाहिए।

नई शिक्षा नीति-2020 में मातृभाषा को दिए गए महत्व पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उपराष्ट्रपति ने समावेशी शिक्षा के लिए मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इससे बच्चों को विषय को बेहतर ढंग से सीखने और समझने में मदद मिलती है और वे खुद को बेहतर ढंग से व्यक्त करने में सक्षम होते हैं।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि मातृभाषा में शिक्षा के लिए हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अच्छी पुस्तकें उपलब्ध करानी होंगी, उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रकाशकों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

सभी भारतीय भाषाओं को एक साथ विकसित करने की आवश्यकता व्यक्त करते हुए श्री नायडू ने प्रकाशकों और शिक्षाविदों से हमारी भाषाओं के बीच आदान-प्रदान को बढ़ावा देने का आह्वान किया।

इस अवसर पर मधुबन एजुकेशनल बुक्स के सीईओ श्री नवीन राजलानी, एनसीईआरटी की प्रो. उषा शर्मा, इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय की प्रो. सरोज शर्मा और एनसीईआरटी के प्रो. पवन सुधीर उपस्थित थे।

उपराष्ट्रपति के भाषण का मूलपाठ पढ़ें

हिन्दी दिवस के अवसर पर भारत के भविष्य के मेधावी नागरिकों से बात करने का सुयोग मिला है। बहुत हर्ष का अनुभव कर रहा हूँ। इस अवसर को आयोजित करने के लिये मधुबन एजुकेशनल बुक्स की सराहना करता हूँ।

मित्रों,

आज ही के दिन 1949 में हमारी संविधान सभा ने हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। उसी वर्ष 26 नवंबर को संविधान सभा में अपने समापन भाषण में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इस की महत्ता बताते हुये कहा था कि पूरे देश ने पहली बार अपने लिये एक राजभाषा को स्वीकार किया है। जिनकी भाषा हिंदी नहीं भी है उन्होंने भी स्वेच्छा से राष्ट्र निर्माण के लिये उसे राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि हर क्षेत्र न सिर्फ अपनी भाषा का प्रयोग करने के लिये आजाद होगा बल्कि उसे अपनी परंपराओं और संस्कारों की भाषा को विकसित करने के लिये बढ़ावा भी दिया जायेगा। इससे पहले 1946 में हरिजन में अपने एक लेख में गांधीजी ने लिखा था कि क्षेत्रीय भाषाओं की नींव पर ही राष्ट्रभाषा की भव्य इमारत खड़ी होगी। राष्ट्रभाषा और क्षेत्रीय भाषाएं एक दूसरे की पूरक है विरोधी नहीं। हमें याद रखना चाहिये कि गांधी जी ने 1918 में ही तत्कालीन मद्रास में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना की थी और उनके पुत्र देवदास गांधी पहले हिंदी प्रचारक बने।

मित्रों, महात्मा गांधी और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा सुझाया मार्ग ही हमारी भाषाई एकता को सुदृढ़ कर सकता है। हमें अपनी भाषाई विविधता पर गर्व होना चाहिए। हमारी सभी भाषाओं का समृद्ध साहित्यिक इतिहास रहा है। हमारी भाषाएं हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं।

मेरा मानना रहा है कि न कोई भाषा थोपी जानी चाहिए न किसी भाषा का विरोध होना चाहिए। हर भाषा वंदनीय है। कोई भी भाषा हमारे संस्कारों की तरह शुद्ध और हमारी आस्थाओं की तरह पवित्र होती है।

समावेशी और स्थायी विकास के लिए शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी ही चाहिए इससे बच्चों को स्वयं अभिव्यक्त करने में और विषय को समझने में आसानी होती है। पढ़ने में रुचि पैदा होती है।

मुझे खुशी है कि नई शिक्षा नीति 2020 में भारतीय भाषाओं और संस्कृति के महत्व को स्वीकार किया गया है। इसके लिए हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अच्छी पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध करानी होंगी। इस दिशा में आप जैसे प्रकाशन संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। मैंने सदैव माना है कि सभी भारतीय भाषाओं का विकास साथ ही हो सकता है। उनके बीच संवाद स्थापित करने में प्रकाशकों और शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। हम अन्य भारतीय भाषाओं के कुछ न कुछ मुहावरे, शब्द या गिनती जरूर सीखें। मेरा आग्रह होगा कि हिन्दी में भी छात्रों को अन्य भारतीय भाषाओं के प्रख्यात साहित्यकारों की जीवनी, उनकी कृतियों से परिचित कराया जाये तथा हिंदी के साहित्यकारों, उनकी कृतियों से अन्य भाषाई क्षेत्रों को परिचित कराया जाये। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को सीखना आसान होगा क्योंकि राष्ट्र के संस्कार, विचार तो समान ही हैं। ऑनलाइन भारतीय भाषाएं सीखने के लिए आधुनिक तकनीक की सहायता ली जा सकती है।

मुझे यह जानकर खुशी है कि Madhuban Educational Books विद्यालयों के लिए पाठ्यपुस्तकों का प्रकाशन करता रहा है। इस काम में आपको बुद्धिजीवी लेखकों का मार्गदर्शन भी मिलता रहा है। आप हिंदी दिवस के अवसर पर देश भर में हिंदी शिक्षण में योगदान देने वाले शिक्षकों और मेधावी छात्रों को सम्मानित करते हैं। शिक्षा विशेषकर हिंदी शिक्षा के क्षेत्र में आपके प्रयास अभिनंदनीय हैं। इस अवसर पर सम्मानित शिक्षकों, मेधावी छात्रों को उनके प्रयासों के लिए शुभकामनाएं देता हूं।

मित्रों,

हिंदी दिवस के अवसर पर आप सभी मेधावी छात्र छात्राओं से मेरा अनुरोध होगा कि वे अपनी मातृभाषा का सम्मान करें, रोजमर्रा के कामों में उसका प्रयोग करें। हिन्दी और देश की भाषाओं का साहित्य पढ़े, उसमें लिखे। तभी हमारी भाषाओं का विकास होगा, वे समृद्ध होंगी।

हिंदी दिवस पर आप सभी का एक बार पुन: अभिनंदन करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ।

जय हिन्द।"

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