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भारतीय रेशम का जादू
रेशम उत्पादन से बेजोड़ उत्पाद तक का सफर
Posted On:
11 APR 2025 1:10PM
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रेशम भारत के इतिहास, उसकी परंपराओं और कलाओं को आपस में जोड़ता है, जो कांचीपुरम और बनारसी जैसी विश्व प्रसिद्ध रेशम की साड़ियों में साफ तौर पर दिखाई देता है।
रेशम, रेशम के कीड़ों से बनता है, जो शहतूत के पत्ते खाते हैं। रेशम के कीड़े कोकून बनाते हैं, जिन्हें फिर रेशम के धागे में तब्दील कर दिया जाता है और फिर उन्हें कपड़े का रुप और आकार दिया जाता है।
वैश्विक स्तर पर, भारत रेशम का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है।
भारत में कच्चे रेशम का उत्पादन 2017-18 में 31,906 मीट्रिक टन से बढ़कर 2023-24 में 38,913 मीट्रिक टन हो गया।
शहतूत के बागानों का क्षेत्रफल 2017-18 में 223,926 हेक्टेयर से बढ़कर 2023-24 में 263,352 हेक्टेयर हो गया।

रेशम और रेशम से बनी वस्तुओं का निर्यात 2017-18 में 1,649.48 करोड़ रुपए से बढ़कर 2023-24 में 2,027.56 करोड़ रुपए हो गया।
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परिचय
रेशम एक ऐसा धागा है, जो भारत के इतिहास, उसकी परंपराओं और कलाओं को पिरोते हुए आपस में जोड़ता है। कांचीपुरम साड़ियों के जीवन से भरे और चमकीले रंगों से लेकर भागलपुर टसर में झलकती मिट्टी की महक तक, हर रेशम की साड़ी एक कहानी बयां करती है। ये शुद्ध शहतूत के रेशम से बने होते हैं, जिन्हें कारीगर बेहद बारीकी और कौशल के साथ बुनते हैं। शिल्प की ये कला पीढ़ियों से चली आ रही है। जैसे ही करघे पर कारीगरों के हाथों की पकड़ रमती है, रेशम के धागे, खूबसूरत साड़ी के रुप में जी उठते हैं, ना सिर्फ महज़ एक कपड़े के रूप में, बल्कि रेशम की कला में पिरोई गई भारत की विविधतापूर्ण और जीवंत आत्मा के प्रतीक के रूप में भी।
भारत की रेशम उत्पादन की यात्रा
मॉथ का जीवन चक्र

रेशम उत्पादन, रेशम के कीड़ों को पालने की प्रक्रिया है, जिसके तहत रेशम बनाया जाता है। रेशम के कीड़ों को शहतूत, ओक, अरंडी और अर्जुन के पत्तों पर पाला जाता है। करीब एक महीने के बाद, वे कोकून बनाते हैं। इन कोकूनों को इकट्ठा करके उबाला जाता है, ताकि रेशम नरम हो जाए। फिर रेशम के धागों को बाहर निकाला जाता है, उन्हें मोड़कर सूत बनाया जाता है और कपड़े में बुना जाता है। बेहद नाज़ुक तरीके से की गई इस पूरी प्रक्रिया से छोटे रेशम के कीड़े, चमकदार रेशम में बदल जाते हैं।
विकासशील भारत में रेशम की आर्थिक भूमिका
भारत रेशम का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है और दुनिया में रेशम का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है। भारत में, शहतूत रेशम का उत्पादन मुख्य रूप से कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, जम्मू और कश्मीर और पश्चिम बंगाल राज्यों में होता है, जबकि गैर-शहतूत रेशम का उत्पादन झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और उत्तर-पूर्वी राज्यों में होता है।
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शहतूत रेशम, रेशम के कीड़ों से बनता है, जो केवल शहतूत के पत्ते खाते हैं। यह मुलायम, चिकना और चमकदार होता है, जो इसे कीमती साड़ियों और उच्च गुणवत्ता वाले कपड़ों के लिए एकदम बेजोड़ बनाता है। देश के कुल कच्चे रेशम उत्पादन का 92% शहतूत से आता है।
गैर-शहतूत रेशम (जिसे वान्या रेशम भी कहा जाता है) जंगली रेशम के कीड़ों से आता है, जो ओक, अरंडी और अर्जुन जैसे पेड़ों की पत्तियों पर निर्भर रहते हैं। इस रेशम में कम चमक होती है, लेकिन प्रकृति और मिट्टी जैसा एहसास होता है, जो इसे मजबूत, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाता है।
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रेशम एक उच्च मूल्य, लेकिन कम मात्रा वाला उत्पाद है, जो दुनिया के कुल कपड़ा उत्पादन का केवल 0.2% हिस्सा है। रेशम उत्पादन को आर्थिक विकास के लिए एक अहम कारक माना जाता है। विकासशील देश, रोजगार सृजन के लिए इस पर निर्भर हैं, खासकर ग्रामीण क्षेत्र में और विदेशी मुद्रा कमाने के साधन के रूप में भी।
भारत का रेशम बाजार अवलोकन
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भारत के कच्चे रेशम उत्पादन में लगातार वृद्धि देखी गई है, जो 2017-18 में 31,906 मीट्रिक टन से बढ़कर 2023-24 में 38,913 मीट्रिक टन हो गया है।
इस बढ़ोत्तरी को शहतूत के बागानों के विस्तार से भी समर्थन मिला है, जो 2017-18 में 223,926 हेक्टेयर से बढ़कर 2023-24 में 263,352 हेक्टेयर हो गया है,और यही वजह है कि शहतूत रेशम उत्पादन 2017-18 में 22,066 मीट्रिक टन से बढ़कर 2023-24 में 29,892 मीट्रिक टन हो गया है।
कुल कच्चे रेशम का उत्पादन 2017-18 में 31,906 मीट्रिक टन से बढ़कर 2023-24 में 38,913 मीट्रिक टन हो गया।
रेशम और रेशम वस्तुओं का निर्यात 2017-18 में 1,649.48 करोड़ रुपए से बढ़कर 2023-24 में 2,027.56 करोड़ रुपए हो गया।
वाणिज्यिक खुफिया और सांख्यिकी महानिदेशालय (डीजीसीआईआएस) की रिपोर्ट के अनुसार, देश ने 2023-24 में 3348 मीट्रिक टन रेशम अपशिष्ट का निर्यात किया।

रेशम अपशिष्ट में उत्पादन प्रक्रिया से बचा हुआ या अपूर्ण रेशम शामिल होता है, जैसे कि टूटे हुए रेशे या कुकून के टुकड़े। हालाँकि इसे अपशिष्ट माना जाता है, फिर भी इसे रेशम के धागे या कपड़े जैसे कम गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाने के लिए दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है, या यहाँ तक कि नए रेशम के सामान में भी इसे रीसाइकिल किया जा सकता है।
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रेशम विकास में सरकारी योजनाएँ
भारत में रेशम उद्योग के विकास में सरकारी योजनाएँ अहम भूमिका निभाती हैं। ये पहल रेशम उत्पादन से जुड़ी तमाम गतिविधियों के लिए वित्तीय सहायता और संसाधन प्रदान करती हैं:
सिल्क समग्र योजना, भारत भर में रेशम उत्पादन उद्योग को बेहतर बनाने के लिए सरकार द्वारा शुरू की गई एक अहम पहल है। इसका मकसद गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार करके उत्पादन को बढ़ाना और देश में रेशम उत्पादन की विभिन्न गतिविधियों के ज़रिए गरीब और पिछड़े परिवारों को सशक्त बनाना है।
इस योजना में चार (4) प्रमुख घटक शामिल हैं:
- अनुसंधान एवं विकास, प्रशिक्षण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और आई.टी. पहल,
- बीज संगठन,
- समन्वय और बाजार विकास
- गुणवत्ता प्रमाणन प्रणाली (क्यूसीएस) / निर्यात ब्रांड प्रमोशन और प्रौद्योगिकी उन्नयन।
सिल्क समग्र-2 इसी प्रयास का विस्तार है, जिसका बजट 2021-22 से 2025-26 की अवधि के लिए 4,679.85 करोड़ रुपये है। इन कदमों से रेशम के कीड़ों को पालने से लेकर, गुणवत्ता वाले रेशमी कपड़े बनाने तक, संपूर्ण रेशम उत्पादन प्रक्रिया को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।
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अब तक केंद्रीय सहायता के रूप में 1,075.58 करोड़ रुपये प्रदान किए गए हैं, जिससे 78,000 से अधिक लोग लाभान्वित हुए हैं।
सिल्क समग्र-2 के घटकों की मदद के लिए पिछले तीन वर्षों से आंध्र प्रदेश (72.50 करोड़ रुपये) और तेलंगाना (40.66 करोड़ रुपये) को वित्तीय सहायता दी गई है।
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सिल्क समग्र-2 के अलावा, रेशम और हथकरघा क्षेत्र को सहायता देने वाली अन्य योजनाएँ भी हैं:
- कच्चा माल आपूर्ति योजना (आरएमएसएस): यार्न आपूर्ति योजना (वाईएसएस) को कुछ बदलाव के साथ, जिसमें उसका नाम बदलकर कच्चा माल आपूर्ति योजना (आरएमएसएस) कर दिया गया है, जिसे 2021-22 से 2025-26 की अवधि के दौरान कार्यान्वयन के लिए मंजूरी दे दी गई है। पात्र हथकरघा बुनकरों को रियायती दरों पर गुणवत्ता वाले यार्न और उनके मिश्रण उपलब्ध कराया जाता है। योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2023-2024 के दौरान कुल 340 लाख किलोग्राम यार्न की आपूर्ति की गई है।
- राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (एनएचडीपी): 2021-22 से 2025-26 तक चलने वाले राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (एनएचडीपी) का मकसद रेशमी कपड़ा उत्पादकों सहित हथकरघा क्षेत्र के बुनकरों को समर्थन देना है। यह योजना हथकरघा के एकीकृत विकास को बढ़ावा देने और हथकरघा बुनकरों के कल्याण के लिए आवश्यकता-आधारित नज़रिया अपनाती है। यह प्रदर्शनियों के ज़रिए कच्चे माल, डिजाइन, प्रौद्योगिकी उन्नयन और विपणन के लिए सहायता प्रदान करता है। इसके अलावा, यह शहरी हाट और विपणन परिसरों जैसे स्थायी बुनियादी ढाँचे को बनाने में मदद करता है, जिससे सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों दोनों में बुनकरों को लाभ मिलता है।
- वस्त्र क्षेत्र में क्षमता निर्माण योजना (समर्थ): वस्त्र मंत्रालय द्वारा शुरू की गई यह मांग-संचालित और प्लेसमेंट-आधारित कार्यक्रम है। यह 3 लाख लोगों को प्रशिक्षित करने के लिए 495 करोड़ रुपये के बजट के साथ 2 साल (वित्त वर्ष 2024-25 और 2025-26) के लिए विस्तारित कार्यक्रम है। यह योजना प्रवेश स्तर के प्रशिक्षण के साथ-साथ वस्त्र और परिधान, हथकरघा, हस्तशिल्प, रेशम और जूट में कौशल विकास और पुनर्कौशल पर केंद्रित है।
इन योजनाओं ने उत्पादित कच्चे रेशम की मात्रा और गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मदद की है, जिससे भारत में रेशम उद्योग के विकास में भी योगदान मिला है।
निष्कर्ष
सिल्क समग्र और सिल्क समग्र-2 जैसी योजनाओं की मदद से भारत का रेशम उद्योग अच्छी तरह से विकसित हुआ है। इनसे किसानों, बुनकरों और ग्रामीण परिवारों को मदद मिली है। प्रशिक्षण, नए विचारों और बेहतर बाजारों पर अधिक ध्यान देने से भारत रेशम के क्षेत्र में वैश्विक नेता बन सकता है। इससे हमारी रेशम परंपराओं को जीवित रखने में भी मदद मिलेगी।
संदर्भ
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एमजी/आरपीएम/केसी/एनएस
(Explainer ID: 154809)
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