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एमएमडीआर संशोधन अधिनियम, 2026
प्रविष्टि तिथि:
18 AUG 2026 20:24 PM
खनन-आधारित विकास के लिए तीव्र प्रयास
खनिज विनियमों के विभिन्न पक्ष
आज विश्व में खनिजों तक पहुंच के लिए उतनी ही प्रतिस्पर्धा हो रही है जितनी पूंजी या प्रौद्योगिकी के लिए। इस्पात, सीमेंट, बिजली, इलेक्ट्रॉनिक्स, परिवहन और रक्षा सभी की शुरूआत भूमि से ली गई वस्तुओं से होती है। इसलिए इन संसाधनों की नियमित और निष्पक्ष रूप से वितरित आपूर्ति राष्ट्रीय सुरक्षा और रोजमर्रा की आजीविका दोनों को आकार देती है।
भारत में खनन को खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के अंतर्गत विनियमित किया जाता है। खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 के माध्यम से इस क्षेत्र के लिए समान और संतुलित वित्तीय ढांचा स्थापित करने के उद्देश्य से इस अधिनियम में संशोधन किया गया है। संशोधन अधिनियम 2026 के अनुसार, राज्य सरकारें केंद्र सरकार की ओर से निर्धारित शर्तों को छोड़कर, खनिज अधिकारों और खनिज युक्त भूमि पर नया कर नहीं लगा सकती हैं।
सुधार की आवश्यकता: प्रमुख मुद्दों पर ध्यान
भारत की खनिज संपदा कुछ राज्यों में निहित है, लेकिन संपूर्ण राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में सहयोग करती है, जिसके कारण इसका कराधान राष्ट्रीय महत्व का प्रश्न बन गया है। अनियमित और अलग-अलग राज्य शुल्क खनन की व्यवहार्यता को लगातार कम कर रहे हैं जिससे उद्योग और घरों में समान रूप से लागत बढ़ रही है। एमएमडीआर संशोधन अधिनियम, 2026 खनिजों के कराधान में अपेक्षित रूप से, एकरूपता और तर्कसंगतता लाकर इन चिंताओं को दूर करने का प्रयास करता है।
- खनन व्यवहार्यता ऊर्जा सुरक्षा के केंद्र में है
बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता ने सामर्थ्यवान घरेलू खनन क्षेत्र को आवश्यक बना दिया है। सरकार ने आपूर्ति को बाहरी झटकों से बचाने के लिए महत्वपूर्ण खनिजों पर विशेष बल दिया है। आयात निर्भरता को कम करने के लिए कोयला क्षेत्र को एक साथ अधिक प्रतिस्पर्धी और तकनीकी रूप से उन्नत बनाया जा रहा है। ऐसे में व्यवहार्य और अपेक्षित कर व्यवस्था दोनों के लिए एक पूर्व शर्त है।
- एक ही गतिविधि पर शुल्क की बहुलता
राज्य वर्तमान में खनन पर लगभग 14 प्रकार के कर, प्रभार और शुल्क लगाते हैं। इनमें रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, डेड रेंट, डीएमएफ भुगतान, जीएसटी और ट्रांजिट शुल्क शामिल हैं। कुछ राज्यों ने खनिज वाली भूमि पर भी कर लगाना शुरू कर दिया है, जिसमें कुछ मामलों में 20 प्रतिशत तक की दरों पर शुल्क लगाया जा रहा है। यह संशोधन अधिनियम इस क्षेत्र पर समय के साथ लगातार जुड़कर बढ़ते और ऐसे बोझ की समस्या को हल करने का प्रयास है जिसका कोई निश्चित अंत या सीमा नहीं है।
- रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण खनिजों पर शुल्क
ग्रेफाइट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों और यूरेनियम जैसे परमाणु खनिजों तक भी कर का विस्तार हो चुका है। उच्च शुल्क इन रणनीतिक खनिजों के निष्कर्षण को अलाभकारी बनाते हैं। राज्यों में अलग-अलग दरें भी इस क्षेत्र के भीतर असमानता पैदा करती हैं। रणनीतिक खनिज परियोजनाओं को व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक बनाए रखने के लिए युतक्तिसंगत बनाना आवश्यक है।
- विदेशी मुद्रा पर दोहरा बोझ
जब भारतीय खनिजों की कीमत आयातित खनिजों की तुलना में अधिक होती है तो इस्पात जैसे उपयोगकर्ता उद्योग विदेशों को कच्चे माल का स्रोत बनाते हैं। भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में 10,12,529 करोड़ रुपये के खनिजों का आयात किया। साथ ही, घरेलू खनिज महंगे होने के कारण निर्यात बाजार में अपनी पकड़ या हिस्सा खो रहे हैं, जहां अकेले लौह अयस्क से वित्त वर्ष 2025-26 में 15,136 करोड़ रुपये की कमाई हुई। खनिज क्षेत्र में आत्मनिर्भर लक्ष्य के लिए लागत में इस वृद्धि को रोकना आवश्यक है।
- राष्ट्रीय खनिज बाजार का बिखरा होना
व्यापक रूप से अलग-अलग राज्य शुल्क के कारण खनिजों की लागत अलग-अलग क्षेत्रों में तेजी से भिन्न होती है। इस तरह की भिन्नता आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित करती है और परिवहन और उसे आपूर्तिकर्ता से ग्राहक तक पहुंचाने की लागत में वृद्धि करती है। एकीकृत राष्ट्रीय खनिज बाजार खंडित कर दरों के अंतर्गत काम नहीं कर सकता है। इसलिए, अधिनियम में अधिक एकरूपता सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है।
- लागत अंततः घरों तक पहुंचती है
खनन चरण में लगाया जाने वाला शुल्क सीधे खनिज की कीमत में जोड़ा जाता है। इसके बाद यह इस्पात, सीमेंट, बिजली और निर्माण से होकर गुजरता है। आम घरेलू परिवार अंततः आवास, बिजली और आवश्यक वस्तुओं के लिए अधिक भुगतान करते हैं। इसलिए तर्कसंगत खनन कराधान रोजमर्रा की सामर्थ्य का मामला है।
- जनजातीय क्षेत्रों सहित रोजगार के लिए खतरा
कोयला क्षेत्र प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 5 लाख से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है, जबकि गैर-कोयला क्षेत्र 1 करोड़ से अधिक श्रमिकों की सहायता करता है। उच्च शुल्क ने पहले ही कुछ खदानों को बंद करने के लिए मजबूर कर दिया है और अन्य परियोजनाओं को खोला नहीं जा सका है। छोटे और मझोले ऑपरेटर कम लाभ पर काम करते हैं और पहले बंद हो जाते हैं तथा अपने साथ स्थानीय नौकरियां भी ले जाते हैं।
- दीर्घकालिक निवेश के लिए निवारण
निवेशक केवल वहीं खनन के लिए पूंजी निवेश की प्रतिबद्धता दिखाते हैं जहां कर संरचना स्थिर और दूरदर्शिता योग्य हो। अचानक परिवर्तन इस तरह की प्रतिबद्धता को हतोत्साहित करते हैं और तकनीकी तथा बुनियादी ढांचे के विस्तार को धीमा कर देते हैं। विनिर्माण, रक्षा, जहाजरानी, निर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा सभी इस खनिज आधार पर निर्भर करते हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत स्थिर व्यवस्था का उद्देश्य उस विश्वास को सुरक्षित करना है।
अधिनियम के प्रमुख प्रावधान
इस अधिनियम में एमएमडीआर अधिनियम, 1957 में संकेन्द्रित संशोधन किए गए हैं। इसके प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं:
· नई धारा 9 डी - राज्य शुल्कों पर सीमा: खनिज अधिकारों या खनिज युक्त भूमि पर राज्य सरकार की ओर से कोई कर, उपकर या अन्य प्रभार, चाहे वह किसी भी नाम से पुकारा जाए, नहीं लगाया जाएगा। इसमें खनिज मात्रा, खनिज मूल्य, रॉयल्टी या किसी अन्य आधार के आधार पर प्रभार शामिल हैं। इस तरह के शुल्क केवल केंद्र सरकार की ओर से निर्धारित शर्तों या प्रतिबंधों के अनुसार लगाए जा सकते हैं।
· पिछले शुल्कों का निपटारा: संशोधन लागू होने से पहले राज्य द्वारा भुगतान या एकत्र नहीं किए गए किसी भी प्रभार को अमान्य माना जाएगा। हालांकि, इस प्रकार की शुरुआत होने से पहले पहले ही जमा की गई या वसूल की गई राशि वापस नहीं की जाएगी।
- धारा 13 के अंतर्गत नियम बनाने की शक्ति: एमएमडीआर अधिनियम की धारा 13 में संशोधन किया गया है ताकि केंद्र सरकार को नियम बनाने का अधिकार दिया जा सके। ये नियम राज्य सरकारों द्वारा इस तरह के शुल्कों को लागू करने के लिए शर्तों या प्रतिबंधों को निर्धारित करेंगे।
राज्य का राजस्व और हित पूरी तरह से सुरक्षित रहेंगे
पारदर्शी, नीलामी-आधारित व्यवस्था के अंतर्गत 2014 से राज्यों को होने वाले खनिज राजस्व में तेजी से वृद्धि हुई है। एमएमडीआर संशोधन अधिनियम, 2026 इस स्थिति में परिवर्तन नहीं करता है, और राज्यों को खनन राजस्व का भारी हिस्सा प्राप्त होता रहेगा।
- राजस्व में वृद्धि का एक दशक, जिसमें बड़ा हिस्सा राज्यों के पास
2014 से पूर्व इस क्षेत्र को विवेकाधीन और गैर-पारदर्शी अनुदान और रियायतों के नवीनीकरण द्वारा चिह्नित किया गया था। अक्सर मुकदमेबाजी होती थी, उत्पादन कम होता था और राज्य का राजस्व मामूली रहता था। तब से, खनिज उत्पादन से राज्यों को राजस्व में 354 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और राज्यों को कोयला सहित खनिजों के लिए 7 लाख करोड़ रुपये से अधिक प्राप्त हुए हैं।
खनन क्षेत्र के राजस्व का लगभग 90 प्रतिशत अब राज्यों को प्राप्त होता है। कुल खनिज राजस्व, कोयला और गैर-कोयले में उनकी हिस्सेदारी एक दशक में लगभग 28 प्रतिशत अंक बढ़कर 2025-26 में लगभग 1,14,549.28 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। कोयला क्षेत्र इस परिवर्तन को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। राज्यों को 2014-15 में 11,947.97 करोड़ रुपये या कुल का 55.6 प्रतिशत प्राप्त हुआ, जो 2025-26 में बढ़कर 32,183.09 करोड़ रुपये या 89.5 प्रतिशत हो गया। इसी अवधि में केंद्र का हिस्सा 9,534.24 करोड़ रुपये से घटकर 3,771.82 करोड़ रुपये रह गया जो 22.97 प्रतिशत से 10.5 प्रतिशत है।
वित्त वर्ष 2013-14 में खनिज उत्पादक प्रमुख राज्यों को 13,586.16 करोड़ रुपये प्राप्त हुए जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 82,366.19 करोड़ रुपये हो गए। यह बारह वर्षों में 16.20 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर है। वित्त वर्ष 2015-16 और वित्त वर्ष 2025-26 के बीच इन राज्यों को 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई जबकि केंद्र को केवल 82,000 करोड़ रुपये की राशि मिली। अधिनियम में इस स्थिति को अपरिवर्तित रखा गया है।
- अतिरिक्त प्रवाह के रूप में नीलामी प्रीमियम और लेनदेन स्तर पर इसका हिस्सा
2015 में शुरू की गई नीलामी व्यवस्था ने राज्यों को नीलामी प्रीमियम के रूप में आय का पूरी तरह से नया स्रोत दिया। 2015 के बाद से राज्यों ने 1,200 चालू खदानों से रॉयल्टी के रूप में 2.32 लाख करोड़ रुपये एकत्र किए हैं। केवल नीलाम की गई 100 खदानों में से उन्होंने नीलामी प्रीमियम के रूप में 96,000 करोड़ रुपये एकत्र किए हैं। ओडिशा ने अपने 79 नीलाम किए गए ब्लॉकों में से 35 का संचालन करने के बाद 2020-21 और 2025-26 के बीच प्रीमियम के रूप में लगभग 87,000 करोड़ रुपये कमाए।
वितरण का परिणाम एक ही खेप में दिखाई देता है। लौह अयस्क के प्रति टन 3,000 रुपये के औसत बिक्री मूल्य पर खनन कंपनी 3,150 रुपये का भुगतान करती है जिसमें से 3,016 रुपये राज्य को मिलते हैं। अधिनियम के अंतर्गत भी यह व्यवस्था जारी रहेगी।
- लघु खनिज पूरी तरह से राज्य के नियंत्रण में रहते हैं
लगभग 50 लघु खनिजों को पूरी तरह से राज्य सरकारों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। इस अधिनियम का रेत, बजरी, मिट्टी, सिलिका, ग्रेनाइट, संगमरमर, जिप्सम और लैटेराइट सहित इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस श्रेणी पर राज्य का अधिकार पहले की तरह ही जारी है।
2014 के बाद से खनिज क्षेत्र में सुधार: प्रमुख मील के पत्थर
नियामक, राजकोषीय और संस्थागत सुधारों के एक दशक के बाद राज्य के राजस्व में वृद्धि हुई है। इन उपायों ने खनिज क्षेत्र को पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और भविष्य की मांग के लिए बेहतर तरीके से तैयार किया है।
· प्रतिस्पर्धी ई-नीलामी और खदान खुलने का रिकॉर्ड वर्ष
खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम में 2015 के संशोधन ने रियायतों के विवेकाधीन आवंटन को समाप्त कर दिया। तब से 17 राज्यों में 723 प्रमुख खनिज ब्लॉकों की नीलामी की गई है जिसमें राजस्थान के साथ 140, मध्य प्रदेश के पास 127 और ओडिशा के साथ 76 शामिल हैं। वित्त वर्ष 2025-26 अब तक का सबसे अच्छा वर्ष था जिसमें रिकॉर्ड 212 ब्लॉकों की नीलामी की गई और 36 चालू किए गए। 141 कोयले के खदानों की नीलामी की गई है और 23 चालू हो गए हैं।
· उत्पादन और वैश्विक स्थिति में वृद्धि
वित्त वर्ष 2025-26 में प्रमुख खनिज उत्पादन के मूल्य में 26.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। लौह अयस्क का उत्पादन रिकॉर्ड 313 मिलियन टन और चूना पत्थर 484 मिलियन टन तक पहुंच गया। पिछले दो वर्षों में प्रत्येक में कोयले का उत्पादन एक अरब टन को पार कर गया है और गैर-कोयला उत्पादन 2014 के बाद से लगभग तीन गुना हो गया है। भारत अब चूना पत्थर में विश्व स्तर पर दूसरे, जस्ता में तीसरे, लौह अयस्क में चौथे और बॉक्साइट के उत्पादन में पांचवें स्थान पर है।
· राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन और विदेशों से खरीग
राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (एनसीएमएम) को 29 जनवरी 2025 को 16,300 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ अनुमोदित किया गया था जिसमें वित्त वर्ष 2030-31 तक 2,600 करोड़ रुपये की बजटीय सहायता शामिल थी। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) और राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण और विकास ट्रस्ट (एनएमईडीटी) 1,200 महत्वपूर्ण खनिज परियोजनाओं की दिशा में काम कर रहे हैं। एनएमईडीटी की ओर से स्वीकृत 3,828.52 करोड़ रुपये की 777 परियोजनाओं में से 255 महत्वपूर्ण खनिजों से संबंधित हैं। 2025 का संशोधन अब एनएमईडीटी को विदेशों में अन्वेषण में सहायता करने की अनुमति देता है और खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (केएबीआईएल) ने अर्जेंटीना में विशेष लिथियम अन्वेषण के अधिकार हासिल कर लिए हैं।
· प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण और अनुसंधान क्षमता
महत्वपूर्ण खनिज पुनर्चक्रण के लिए 2 अक्टूबर 2025 को 1,500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना शुरू की गई थी। इसने 270 के लक्ष्य के मुकाबले 850 हजार टन प्रति वर्ष क्षमता के साथ 58 संस्थाओं को आकर्षित किया है। आंध्र प्रदेश, गुजरात, ओडिशा और महाराष्ट्र में क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग पार्क (सीएमपीपी) को 500 करोड़ रुपये की सहायता दी जा रही है। लगातार तीन बजटों में महत्वपूर्ण खनिजों, लिथियम-आयन बैटरी स्क्रैप और पूंजीगत वस्तुओं के प्रसंस्करण पर मूल सीमा शुल्क हटा दिया गया है। महा मिशन के तहत 210 करोड़ रुपये के साथ नौ संस्थानों को उत्कृष्टता केंद्र (सीओई) घोषित किया गया है।
· व्यापक और बेहतर वित्त पोषित अन्वेषण पारिस्थितिकी तंत्र
2014 के बाद से अन्वेषण गतिविधि लगभग 200 गुना बढ़ गई है। 51 निजी एजेंसियों को अब काम के लिए अधिसूचित किया गया है। एनएमईडीटी के योगदान को बढ़ाकर 3 प्रतिशत कर दिया गया है और प्रत्यक्ष अन्वेषण लागत के आधे की प्रतिपूर्ति की जाती है। अन्वेषण लाइसेंस धारकों के लिए यह सीमा 20 करोड़ रुपये और समग्र लाइसेंस धारकों के लिए 8 करोड़ रुपये है। जीएसआई ने फील्ड सीजन 2025-26 में 457 परियोजनाओं को पूरा किया जिसमें महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों पर 230 परियोजनाएं शामिल हैं जबकि एनएमईडीटी ने 2024-25 में 62 और 2025-26 में 84 परियोजनाओं को वित्त पोषित किया।
· सरल संचालन और डिजिटल निगरानी
खनन पट्टों में अब 10 प्रतिशत तक का एकमुश्त क्षेत्र विस्तार और 30 प्रतिशत तक समग्र लाइसेंस हो सकता है। कैप्टिव खदानों से खनिज बिक्री की सीमा को हटा दिया गया है। साथ ही पट्टे में महत्वपूर्ण, रणनीतिक या गहराई में मौजूद खनिजों को जोड़ने के लिए अतिरिक्त भुगतान भी किया गया है। राज्यों के साथ बनाया गया एकीकृत खनन पोर्टल (यूएमपी) नीलामी से लेकर परिचालन तक पूरे ब्लॉक जीवनचक्र की निगरानी करता है। कोयला और खनिज एक्सचेंजों से बाज़ार में इन चीज़ों की सही और पारदर्शी कीमत तय होने में मदद मिलती है।
· खनन प्रभावित समुदायों के लिए प्रत्यक्ष लाभ
प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (पीएमकेकेकेवाई) और 656 जिला खनिज फाउंडेशन (डीएमएफ) स्थानीय कल्याण के लिए स्थापित किए गए थे जिनमें से 106 आकांक्षी जिलों में थे। डीएमएफ की पूरी राशि स्थानीय परियोजनाओं में जाती है और जिला प्रशासन तय करता है कि किसको वित्तपोषित करना है। यह सड़कों, अस्पतालों, स्कूलों, पीने के पानी और रहने की बेहतर स्थिति में सहायता करता है। नए अधिनियम के बाद ये संग्रह अपरिवर्तित रहेंगे।
अधिनियम का प्रभाव
एमएमडीआर संशोधन अधिनियम, 2026 खनिज क्षेत्र की राजकोषीय व्यवस्था में निश्चितता, स्थिरता और अपेक्षित स्थिति प्रदान करने का प्रयास करता है। इससे राष्ट्रीय आर्थिक विकास को गति मिलने की उम्मीद है।
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पहले
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बाद में
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हर राज्य में खनन पर अलग-अलग कर लगाया जाता था।
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नई धारा 9डी के तहत केंद्र द्वारा निर्देशित कर ढांचा लागू होगा।
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खनन कार्य शुरू होने के बाद भी नए शुल्क लगाए जा सकते हैं।
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केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों को छोड़कर राज्य नए शुल्क नहीं लगा सकते हैं।
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पूर्वव्यापी कर की मांग किसी भी समय उठाई जा सकती है।
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सभी लंबित पूर्वव्यापी बकाया अब अमान्य घोषित कर दिए गए हैं।
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सबसे ज्यादा बोझ छोटे और मझोले खनिकों पर पड़ा।
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प्रत्येक खनिक अब निष्पक्ष और समान ढांचे से लाभान्वित होता है।
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अधिनियम के मुख्य लाभ
एमएमडीआर संशोधन अधिनियम, 2026 खनन क्षेत्र को सुदृढ़ करता है और समावेशी राष्ट्रीय विकास का समर्थन करता है।
· आम आदमी को लाभ: कोयले की प्रतिस्पर्धी कीमतें बिजली की लागत को कम करने और घरों को उनके दैनिक जीवन में लाभान्वित करने में सहायता करती हैं। कम खनिज लागत उद्योगों, बुनियादी ढांचे, आर्थिक विकास और रोजगार को मजबूत करती है।
· विनिर्माण, बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था को मजबूती: कोयला ऊर्जा प्रदान करता है, जबकि लौह अयस्क, चूना पत्थर और बॉक्साइट स्टील, सीमेंट और एल्यूमीनियम उत्पादन का समर्थन करते हैं। कॉपर आधुनिक उद्योग, बिजली और रक्षा का भी समर्थन करता है। इसलिए अधिनियम से बिजली, विनिर्माण, रेलवे, सड़क, आवास, परिवहन और विकास कार्यक्रमों को लाभ होगा।
· विकसित भारत का अधिनियम: यह अधिनियम एक अधिक प्रतिस्पर्धी, पारदर्शी, अपेक्षित और निवेशक-अनुकूल खनन क्षेत्र का निर्माण करता है। यह निवेश, उत्पादन, रोजगार, ऊर्जा सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की स्थिति को मजबूत करता है।
भविष्य की राह
खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 भारत के खनिज शासन के आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य स्थिर और समान राजकोषीय व्यवस्था सुनिश्चित करके खनिज अन्वेषण, महत्वपूर्ण खनिज सुरक्षा और सतत संसाधन विकास को सुदृढ़ करना है। ये प्रयास विकसित भारत की दिशा में भारत की यात्रा को आगे बढ़ाने में सहायक होंगे।
संदर्भ:
भारत की संसद:
https://sansad.in/ls/legislation/bills
केंद्रीय कोयला और खान मंत्री का कार्यालय:
https://x.com/KishanReddyOfc/status/2086816534840905747/photo/1
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(तथ्य सामग्री आईडी: 150955)
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