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सीएसआईआर-सीआरआरआई, नई दिल्ली, ओएसईपीएल और ओम्स इंडिया ने एनएच-716 पर 60% आरएपी प्रौद्योगिकी का अभूतपूर्व प्रदर्शन किया


भारत में टिकाऊ, चक्रीय और संसाधन-कुशल राजमार्ग निर्माण की दिशा में क्षेत्र-स्तरीय प्रदर्शन एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है

प्रविष्टि तिथि: 02 SEP 2026 8:21PM by PIB Delhi

भारत में टिकाऊ और चक्रीय सड़क निर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (सीएसआईआर)-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई), ओरिएंटल स्ट्रक्चरल इंजीनियर्स प्राइवेट लिमिटेड (ओएसईपीएल) और ओम्स पॉलिमर मॉडिफाइड बिटुमेन प्राइवेट लिमिटेड (ओम्स इंडिया) ने राष्ट्रीय राजमार्ग-716, चेन्नई–तिरुपति पैकेज-I पर डेंस बिटुमिनस मैकेडम (डीबीएम) परत में 60 प्रतिशत रीक्‍लेम्‍ड अस्‍फाल्‍ट पेवमेंट (आरएपी) के उपयोग का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया।

वास्तविक राजमार्ग निर्माण परिस्थितियों में उच्च-आरएपी पुनर्चक्रण प्रौद्योगिकी को आगे बढ़ाने की दिशा में क्षेत्र-स्तरीय प्रदर्शन एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस कार्यक्रम में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) और तमिलनाडु सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ-साथ राजमार्ग अवसंरचना कंपनियों के प्रतिनिधियों, तकनीकी विशेषज्ञों और उद्योग से जुड़े हितधारकों ने भाग लिया।

प्रदर्शन में उच्च-आरएपी पुनर्चक्रण की पूरी प्रक्रिया को प्रदर्शित किया गया, जिसमें आरएपी की पुनर्प्राप्ति और प्रसंस्करण, सामग्री का अभिलक्षणीकरण, पुनर्सक्रियण, मिश्रण डिजाइन, हॉट-मिक्स संयंत्र में उत्पादन, बिछाने और क्षेत्रीय संघनन शामिल थे। प्रतिभागियों ने उत्पादन प्रक्रिया को समझने के लिए हॉट-मिक्स संयंत्र का दौरा भी किया और एक अनुभव केंद्र का अवलोकन किया, जहाँ रीक्‍लेम्‍ड अस्‍फाल्‍ट की पुनर्प्राप्ति और प्रसंस्करण से लेकर नई पेवमेंट के निर्माण में उसके पुनः उपयोग तक की पूरी प्रक्रिया को प्रदर्शित किया गया।

60 प्रतिशत आरएपी: मौजूदा सड़कों को संसाधन भंडार में बदलना

रीक्‍लेम्‍ड अस्फाल्ट पेवमेंट में मूल्यवान एग्रीगेट और पुराना बिटुमेन मौजूद होता है, जिन्हें वैज्ञानिक तरीके से पुनर्प्राप्त, अभिलक्षणित, पुनर्सक्रिय और पुनः उपयोग किया जा सकता है। आरएपी के अधिक उपयोग से नए एग्रीगेट और बिटुमेन की आवश्यकता कम की जा सकती है तथा मौजूदा सड़क नेटवर्क में पहले से उपलब्ध सामग्रियों का सार्थक उपयोग किया जा सकता है।

60 प्रतिशत आरएपी के उपयोग से नए अस्फाल्ट मिश्रण के लिए आवश्यक सामग्री का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मौजूदा पेवमेंट से ही प्राप्त होता है। इस दृष्टिकोण में प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करने, नई और आयातित कच्ची सामग्रियों पर निर्भरता कम करने, निर्माण अपशिष्ट को न्यूनतम करने तथा राजमार्ग निर्माण के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने की क्षमता है।

इस प्रकार, यह प्रदर्शन मौजूदा राजमार्गों को भविष्य के सड़क निर्माण के लिए एक “संसाधन भंडार” के रूप में देखने तथा अवसंरचना विकास के लिए अधिक चक्रीय और संसाधन-कुशल मॉडल को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मार्ग प्रस्तुत करता है।

रीजुबिट: स्वदेशी आरएपी पुनर्सक्रियण प्रौद्योगिकी

प्रदर्शन का एक प्रमुख घटक रीजुबिट (REJUBIT) था, जो सीएसआईआर-सीआरआरआई और ओम्स इंडिया द्वारा संयुक्त रूप से विकसित स्वदेशी आरएपी पुनर्सक्रियण प्रौद्योगिकी है। यह प्रौद्योगिकी पुनर्प्राप्त अस्फाल्ट में मौजूद पुराने बिटुमेन के प्रमुख गुणों को बहाल करने के लिए विकसित की गई है, जिससे मौजूदा पेवमेंट सामग्री के अधिक अनुपात को नए अस्फाल्ट मिश्रणों में शामिल करना संभव हो सके।

एनएच-716 पर किए गए प्रदर्शन में रीजुबिट का सफल उपयोग भारतीय अनुसंधान-आधारित प्रौद्योगिकी के प्रयोगशाला में विकास से क्षेत्र-स्तरीय कार्यान्वयन की दिशा में आगे बढ़ने को दर्शाता है।

सतत् सड़क निर्माण को आगे बढ़ाने में सीएसआईआर-सीआरआरआई की भूमिका

इस अवसर पर सीएसआईआर-सीआरआरआई के निदेशक डॉ. चालुमुरी रवि शेखर ने कहा:

“यह क्षेत्र-स्तरीय प्रदर्शन भारत में सतत् और चक्रीय सड़क निर्माण को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आरएपी को केवल अपशिष्ट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए; यह एक इंजीनियरिंग संसाधन है, जिसमें मूल्यवान एग्रीगेट और बिटुमेन मौजूद होते हैं, जिन्हें वैज्ञानिक तरीके से पुनर्प्राप्त, पुनर्सक्रिय और पुनः उपयोग किया जा सकता है।”

उन्होंने आगे कहा कि इस प्रदर्शन में आरएपी की पुनर्प्राप्ति और अभिलक्षणीकरण से लेकर वैज्ञानिक मिश्रण डिजाइन, पुनर्सक्रियण, हॉट-मिक्स उत्पादन, बिछाने और वास्तविक क्षेत्रीय परिस्थितियों में संघनन तक की संपूर्ण पुनर्चक्रण श्रृंखला को एक साथ प्रदर्शित किया गया है। उन्होंने जोर दिया कि ऐसे प्रदर्शन क्षेत्रीय ज्ञान उत्पन्न करने, विश्वास बढ़ाने और भारतीय सड़क निर्माण में पुनर्प्राप्त सामग्रियों के अधिक उपयोग के लिए एक वैज्ञानिक मार्ग स्थापित करने में महत्वपूर्ण हैं।

 

सीएसआईआर-सीआरआरआई की वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक और 60 प्रतिशत आरएपी क्षेत्र-स्तरीय प्रदर्शन की परियोजना प्रमुख डॉ. अंबिका बहल (एफ.आई.ई.) ने आरएपी को “सड़क क्षेत्र के लिए काला सोना” बताते हुए कहा कि इसमें दो मूल्यवान गैर-नवीकरणीय संसाधन—एग्रीगेट और बिटुमेन—मौजूदा सड़क नेटवर्क में पहले से मौजूद हैं।

उन्होंने जोर दिया कि इस प्रदर्शन का महत्व यह दर्शाने में है कि आरएपी के अभिलक्षणीकरण, पुराने बाइंडर के मूल्यांकन, वैज्ञानिक मिश्रण डिजाइन, उपयुक्त पुनर्सक्रियण और कठोर गुणवत्ता नियंत्रण के माध्यम से पुनर्चक्रण के उच्च स्तर को किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। रीजुबिट का उपयोग मौजूदा सड़क सामग्रियों के अधिक पुनः उपयोग और नई संसाधनों की खपत को कम करने की दिशा में एक व्यावहारिक मार्ग प्रदर्शित करता है।

व्यापक स्तर पर अपनाए जाने की दिशा में सहयोगात्मक प्रयास

क्षेत्र-स्तरीय परीक्षण ओएसईपीएल, सीएसआईआर-सीआरआरआई और ओम्स इंडिया के संयुक्त तकनीकी प्रयासों के माध्यम से किया गया, जिसमें राजमार्ग निर्माण विशेषज्ञता, वैज्ञानिक अनुसंधान और विशिष्ट पुनर्सक्रियण प्रौद्योगिकी का समन्वय किया गया।

ओएसईपीएल के वरिष्ठ सीपीएम (परियोजना प्रमुख) श्री नागराज ने कहा कि किसी नवोन्मेषी पेवमेंट प्रौद्योगिकी की वास्तविक परीक्षा इस बात से होती है कि वह प्रयोगशाला में तैयार डिजाइन से संयंत्र में उत्पादन और अंततः वास्तविक राजमार्ग परिस्थितियों में कार्यान्वयन तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच पाती है। उन्होंने कहा कि 60 प्रतिशत आरएपी परीक्षण आवश्यक गुणवत्ता-नियंत्रण व्यवस्था बनाए रखते हुए क्षेत्रीय स्तर पर उच्च-आरएपी निर्माण का मूल्यांकन करने का अवसर प्रदान करता है।

ओम्स इंडिया के निदेशक श्री पलाश कथल ने कहा कि आरएपी के अधिक उपयोग से मौजूदा पेवमेंट में पहले से मौजूद एग्रीगेट और बिटुमेन को अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है तथा नई सामग्रियों पर निर्भरता कम की जा सकती है। उन्होंने कहा कि 60 प्रतिशत आरएपी मिश्रण को प्रयोगशाला मूल्यांकन से संयंत्र उत्पादन और फिर वास्तविक राजमार्ग पर बिछाने तक ले जाना एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि है।

तमिलनाडु राजमार्ग अनुसंधान केंद्र द्वारा मान्‍यता

मुख्य अतिथि, चेन्नई स्थित राजमार्ग अनुसंधान केंद्र के निदेशक, इंजीनियर श्री ए. वेंकटाचलम ने 60 प्रतिशत आरएपी के सफल क्षेत्र-स्तरीय प्रदर्शन के लिए इसमें भाग लेने वाले संगठनों को बधाई दी और इसे अधिक टिकाऊ तथा संसाधन-कुशल सड़क निर्माण की दिशा में तमिलनाडु के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।

उन्होंने कहा कि तमिलनाडु का विस्तृत सड़क नेटवर्क मौजूदा पेवमेंट से सामग्री के पुनर्चक्रण की व्यापक संभावनाएं प्रदान करता है, जिससे नए एग्रीगेट और बिटुमेन की मांग के साथ-साथ निर्माण अपशिष्ट को भी कम किया जा सकता है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह प्रदर्शन बहुमूल्य क्षेत्रीय अनुभव प्रदान करेगा और तमिलनाडु में उपयुक्त सड़क परियोजनाओं में उच्च-आरएपी पुनर्चक्रण को व्यापक रूप से अपनाने में सहायक होगा।

परीक्षण के बारे में

एनएच-716 पर 60 प्रतिशत आरएपी वाले परीक्षण खंड का निर्माण सीएसआईआर-सीआरआरआई के तकनीकी मार्गदर्शन में किया गया। सीएसआईआर-सीआरआरआई की वैज्ञानिक एफ. डॉ. अंबिका बहल ने इस परियोजना का नेतृत्व किया, जबकि सीएसआईआर-सीआरआरआई के वैज्ञानिक ई1 डॉ. राजीव कुमार ने ओम्स इंडिया और ओएसईपीएल की टीमों के साथ परीक्षण खंड के डिजाइन और निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लिया।

इस पहल का उद्देश्य अधिक मात्रा में आरएपी के उपयोग के संबंध में तकनीकी और क्षेत्रीय अनुभव अर्जित करना तथा भारतीय राजमार्ग निर्माण में इसके जिम्मेदार और व्यापक उपयोग के लिए आवश्यक प्रमाण-आधार को मजबूत करने में योगदान देना है।

हरित और चक्रीय राजमार्गों की दिशा में

एनएच-716 पर 60 प्रतिशत आरएपी के सफल क्षेत्र-स्तरीय प्रदर्शन से पेवमेंट निर्माण सामग्री को अपशिष्ट से मूल्यवान इंजीनियरी संसाधनों में बदलने वाली विज्ञान-आधारित पुनर्चक्रण प्रौद्योगिकियों की क्षमता को बल मिलता है। यह पहल दर्शाती है कि अनुसंधान संस्थानों, राजमार्ग ठेकेदारों और प्रौद्योगिकी प्रदाताओं के बीच सहयोग भारत में अधिक हरित, संसाधन-कुशल और चक्रीय राजमार्ग निर्माण की ओर बदलाव में तेज़ी ला सकता है।

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पीके/केसी/पीके


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