पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय
पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में अपने उत्तर में अल नीनो और मानसून पर इसके प्रभाव के बारे में विस्तार से बताया।
डॉ. जितेंद्र सिंह का कहना है कि एआई-आधारित पूर्वानुमान प्रणाली से संकेत मिलता है कि अल नीनो फरवरी 2027 तक बना रह सकता है। मानसून का प्रभाव कई जलवायु कारकों पर निर्भर करता है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया “आईएनसीओआईएस ने पूर्वानुमानों और अनिश्चितता अनुमानों के साथ स्वदेशी एआई/एमएल-आधारित एनएसओ पूर्वानुमान प्रणाली विकसित की है।"
"हिंद महासागर द्विध्रुव, मैडेन-जूलियन दोलन और क्षेत्रीय महासागर-वायुमंडल अंतःक्रियाएं भी भारतीय मानसून को प्रभावित करती हैं।"
डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि सरकार उन्नत प्रौद्योगिकियों के माध्यम से महासागरीय स्थिति पूर्वानुमान, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और तटीय तैयारियों को मजबूत कर रही है।
प्रविष्टि तिथि:
05 AUG 2026 4:31PM by PIB Delhi
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी एवं पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज कहा कि भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (आईएनसीओआईएस) के नवीनतम आकलन से संकेत मिलता है कि मई 2026 में विकसित हुई अल नीनो की स्थिति जून 2026 से फरवरी 2027 तक बनी रहने की संभावना है। इसकी पूर्वानुमानित संभावना 70 से 90 प्रतिशत के बीच है। यह आकलन आईएनसीओआईएस की स्वदेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग (एआई/एमएल) आधारित अल नीनो दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) पूर्वानुमान प्रणाली और वैश्विक महासागर डेटा प्रणाली पर आधारित है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि हालांकि अल नीनो का इतिहास देखते हुए इसे देश के कुछ हिस्सों में भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून की कम वर्षा से जोड़ा गया है लेकिन यह मानसून का एकमात्र निर्धारक नहीं है। भारतीय मानसून कई परस्पर क्रिया करने वाले जलवायु कारकों से प्रभावित होता है। इसमें हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी), मैडेन-जूलियन दोलन (एमजेओ) और क्षेत्रीय महासागर-वायुमंडल अंतःक्रियाएं शामिल हैं।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि हालांकि वर्तमान पूर्वानुमान अल नीनो के बने रहने की ओर इशारा करते हैं लेकिन भारतीय मानसून पर इसका अंतिम प्रभाव मानसून के मौसम के दौरान संबंधित महासागर-वायुमंडलीय स्थितियों, जिनमें हिंद महासागर द्विध्रुव और प्रचलित पवन पैटर्न शामिल हैं, के विकास पर निर्भर करेगा। इसलिए, उन्नत पूर्वानुमान प्रणालियों के माध्यम से स्थिति पर लगातार नज़र रखी जा रही है।
श्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि विकसित हो रहे अल नीनो का अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के ऊपर वायुमंडलीय परिसंचरण पर प्रभाव पड़ सकता है और इन क्षेत्रों में लगातार बढ़ते तापमान के कारण समुद्री लू की संभावना बढ़ सकती है। इन परिवर्तनों से महासागरीय मिश्रण, पोषक तत्वों की उपलब्धता और जैविक उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। इसका मछली वितरण और तटीय समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ेगा। लहरों और ज्वार की स्थितियों में बदलाव से नौवहन, अपतटीय संचालन और तटीय गतिविधियों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
सरकार की तैयारियों पर प्रकाश डालते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि आईएनसीओआईएस (इनकॉइस) ने तूफान, ऊंची लहरों, समुद्री जलप्रपात और तेज धाराओं के लिए उच्च-विभेदन पूर्वानुमान मॉडल के माध्यम से महासागरीय स्थिति पूर्वानुमान और समुद्री बहु-खतरा प्रारंभिक चेतावनी सेवाओं को लगातार मजबूत किया है। उन्नत डेटा एसिमिलेशन सिस्टम के साथ एकीकृत महासागरीय ग्लाइडर, लंगरयुक्त तैरते हुए चिन्ह, आर्गो फ्लोट, ज्वार गेज और उपग्रह प्रेक्षणों से युक्त विस्तारित महासागरीय प्रेक्षण नेटवर्क के माध्यम से पूर्वानुमान क्षमता को बढ़ाया गया है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार ने तटीय समुदायों के बीच तैयारी और लचीलेपन में सुधार लाने के लिए हितधारक प्रशिक्षण कार्यक्रम, मॉक अभ्यास और जागरूकता अभियान आयोजित करते हुए चौबीसों घंटे परिचालन निगरानी, सलाहों का बहु-प्लेटफ़ॉर्म प्रसार और प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान को भी मजबूत किया है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने आगे बताया कि दीप महासागर मिशन के तहत चालू वित्त वर्ष में समुद्री संसाधनों के मानचित्रण के लिए ₹145.06 करोड़ आवंटित किए गए हैं। भारतीय अनन्य आर्थिक क्षेत्र में स्थित समुद्री पर्वतों के जैव विविधता सर्वेक्षणों का विस्तार किया जा रहा है, जबकि जलतापीय उद्गम स्थलों, खनिज समृद्ध क्षेत्रों और समुद्री संसाधनों की खोज के लिए उन्नत स्वायत्त जलमार्ग वाहन (ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल्स) और रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल्स (रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल्स) तैनात किए जा रहे हैं।
श्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि तमिलनाडु सहित तटीय राज्यों के लिए, आईएनसीओआईएस (इनकोयस)दस दिन पहले तक लहरों, हवाओं, ज्वार-भाटे, समुद्री धाराओं और समुद्र की सतह के तापमान के पूर्वानुमान सहित महासागरीय राज्य पूर्वानुमान सेवाएं प्रदान करता है। आपदा की तैयारी और समुद्री सुरक्षा में सहयोग के लिए राज्य अधिकारियों को नियमित रूप से उच्च-लहर, ज्वार-भाटे और उच्च-धारा संबंधी सलाह जारी की जाती हैं। केंद्र ने तटीय लचीलेपन और सामुदायिक तैयारियों को मजबूत करने के लिए राज्य सरकारों के सहयोग से ज्वार-भाटे मापने वाले स्टेशन, तटीय लहर चालक बुआ और सुनामी तैयारी कार्यक्रम भी स्थापित किए हैं।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने दोहराया कि सरकार जलवायु और महासागर संबंधी पूर्वानुमानों की सटीकता में सुधार लाने के लिए स्वदेशी पूर्वानुमान प्रौद्योगिकियों, उन्नत महासागरीय अवलोकनों और वैज्ञानिक निर्णय-सहायता प्रणालियों में निवेश करना जारी रखे हुए है जिससे सरकारों, तटीय समुदायों, मछुआरों और अन्य हितधारकों के लिए समय पर सलाह जारी करना संभव हो सके और साथ ही जलवायु परिवर्तनशीलता में हो रहे बदलावों के खिलाफ भारत की लचीलता को मजबूत किया जा सके।




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पीके/केसी/एनकेएस/
(रिलीज़ आईडी: 2294992)
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