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करगिल विजय दिवस 2026


शौर्य, बलिदान और भारत की अटूट भावना को श्रद्धांजलि

प्रविष्टि तिथि: 24 JUL 2026 3:50PM by PIB Delhi

करगिल विजय दिवस 'ऑपरेशन विजय' में भाग लेने वाले वीर सैनिकों के अदम्य साहस, सर्वोच्च बलिदान और अटूट संकल्प को श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर है। यह दिवस करगिल युद्ध में भारत की ऐतिहासिक विजय की स्मृति को जीवंत रखता है और उस अद्वितीय वीरता एवं राष्ट्रभक्ति का सम्मान करता है, जिसने देश की संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा सुनिश्चित की। यह अवसर करगिल के अमर शौर्य की विरासत को भी रेखांकित करता है। साथ ही, यह भारत की सैन्य तैयारियों के प्रति विश्वास को सुदृढ़ करता है, नई पीढ़ी को राष्ट्रसेवा एवं बलिदान के लिए प्रेरित करता है तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति देश की अटूट प्रतिबद्धता को और मजबूत बनाता है।

जब साहस ने दुर्गम चोटियों को फतह किया

करगिल युद्ध भारत के सैन्य इतिहास के सबसे गौरवशाली अध्यायों में से एक है। यह भारतीय सैनिकों की अदम्य वीरता, अद्वितीय साहस और अटूट संकल्प का प्रतीक है तथा राष्ट्रीय गौरव एवं प्रेरणा का एक स्थायी स्रोत बना हुआ है।

इस वर्ष देश कृतज्ञता और सम्मान के साथ 27वां कारगिल विजय दिवस मना रहा है। यह अवसर 1999 में कारगिल युद्ध में भारत की ऐतिहासिक विजय की स्मृति को पुनर्जीवित करता है, जब भारतीय सैनिकों ने अद्वितीय शौर्य और अटूट दृढ़ता का परिचय देते हुए करगिल की बर्फ से आच्छादित चोटियों को दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराया था। 26 जुलाई 1999 को लद्दाख की दुर्गम पर्वत श्रृंखलाओं पर तिरंगा एक बार फिर गर्व के साथ लहराया, जो वीरता, सर्वोच्च बलिदान और भारत की अदम्य राष्ट्रीय भावना का अमर प्रतीक बन गया।

करगिल संघर्ष मई 1999 में शुरू हुआ, जब घुसपैठियों ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार कर कारगिल क्षेत्र की सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ऊंची चोटियों पर स्थित भारतीय चौकियों पर अवैध कब्जा कर लिया। उनका उद्देश्य कश्मीर और लद्दाख के बीच संपर्क को बाधित करना तथा भारत पर कश्मीर मुद्दे पर बातचीत का दबाव बनाना था। किंतु उन्होंने भारत के दृढ़ संकल्प और सशस्त्र बलों की क्षमता का गलत आकलन किया।

भारत ने इस चुनौती का दृढ़ता से सामना करते हुए ऑपरेशन विजय शुरू किया। इस अभियान में भारतीय सैनिकों ने उत्कृष्ट सैन्य रणनीति, अटूट संकल्प और अदम्य साहस का परिचय दिया। दो महीने से अधिक समय तक चले भीषण संघर्ष के बाद सभी घुसपैठियों को खदेड़ दिया गया और दुश्मन के कब्जे वाली प्रत्येक चौकी पर पुनः भारतीय तिरंगा लहराया गया।

करगिल विजय दिवस उन सभी वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनके अद्वितीय त्याग ने राष्ट्र की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के प्रति भारत के अटूट संकल्प को और सुदृढ़ किया। इस संघर्ष ने देश की सैन्य तैयारियों, रणनीतिक सोच और रक्षा दृष्टिकोण को नई दिशा प्रदान की। करगिल से मिली सीख आज भी भारत की सशक्त, आत्मनिर्भर व सुरक्षित भविष्य की यात्रा का मार्गदर्शन करती है और प्रत्येक भारतीय को यह संदेश देती है कि साहस, बलिदान, एकता एवं राष्ट्र की संप्रभुता ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति हैं।

ऑपरेशन विजय की ओर बढ़ते कदम

करगिल युद्ध 1999 की गर्मियों में लाहौर घोषणा के तुरंत बाद शुरू हुआ। जब देश का अधिकांश भाग भीषण गर्मी का सामना कर रहा था, उसी समय करगिल की बर्फ से ढकी दुर्गम पर्वत चोटियों पर भीषण संघर्ष जारी था। पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की और सर्दियों के दौरान अस्थायी रूप से खाली की गई सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्वतीय चौकियों पर अवैध कब्जा कर लिया। इस संघर्ष ने दुनिया के सबसे कठिन युद्धक्षेत्रों में भारतीय सैनिकों के साहस, धैर्य, सहनशक्ति और सर्वोच्च बलिदान की कठिन परीक्षा ली। करगिल युद्ध का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इसे परमाणु हथियार संपन्न दो देशों के बीच लड़ा गया एकमात्र पारंपरिक युद्ध माना जाता है।

घुसपैठ

यह घुसपैठ पाकिस्तान द्वारा संचालित 'ऑपरेशन बद्र' का हिस्सा थी। इस अभियान के तहत पाकिस्तानी सैनिकों ने कश्मीरी आतंकवादियों के वेश में नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार कर भारतीय क्षेत्र में प्रवेश किया और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भारतीय चौकियों पर अवैध कब्जा कर लिया। उनका उद्देश्य कश्मीर और लद्दाख के बीच संपर्क को बाधित करना, सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात भारतीय सैनिकों को अलग-थलग करना तथा भारत पर कश्मीर मुद्दे पर बातचीत का दबाव बनाना था।

स्थानीय निवासियों ने 3 मई 1999 को सबसे पहले करगिल सेक्टर में संदिग्ध गतिविधियों की सूचना दी। इसके बाद स्थिति की पुष्टि के लिए तत्काल टोही गश्ती दल भेजे गए। व्यापक जमीनी गश्त व हवाई निगरानी के माध्यम से जल्द ही घुसपैठ के वास्तविक स्वरूप और उसके दायरे का पता चल गया। घुसपैठियों ने श्रीनगर–लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर निगरानी रखने वाली सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ऊंची चोटियों पर अपनी मजबूत स्थिति बना ली थी। इनमें से अनेक चौकियां 5,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित थीं, जिससे सैन्य अभियान अत्यंत चुनौतीपूर्ण हो गया।

ऑपरेशन विजय का आगाज

भारत ने इस चुनौती का सामना संयम, दृढ़ संकल्प और अटूट साहस के साथ किया। सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए कि नियंत्रण रेखा (एलओसी) को पार नहीं किया जाएगा। अभियान का उद्देश्य स्पष्ट था—दुश्मन के कब्जे वाली प्रत्येक भारतीय चौकी को पुनः अपने नियंत्रण में लेना।

इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया। भारतीय वायु सेना 26 मई 1999 को ऑपरेशन सफेद सागर के माध्यम से इस अभियान में शामिल हुई, जबकि भारतीय नौसेना ने भी पूर्ण तत्परता के साथ अपनी तैनाती सुनिश्चित की। इस प्रकार तीनों सेनाओं ने समन्वित और प्रभावी अभियान चलाकर भारत के अटूट संकल्प का परिचय दिया।

ऑपरेशन विजय के दौरान 'रोकना, खदेड़ना और दोबारा कब्जा न करने देना' की रणनीति अपनाई गई। श्रीनगर–लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर निगरानी रखने वाली सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ऊंचाइयों को पुनः अपने नियंत्रण में लेना सर्वोच्च प्राथमिकता थी। इसके लिए अतिरिक्त सैनिकों, तोपखाने, इंजीनियरिंग इकाइयों, विशेष उपकरणों और रसद संसाधनों की तीव्र गति से तैनाती की गई। भारतीय सैनिकों ने दुश्मन की लगातार गोलाबारी के बीच लगभग सीधी खड़ी चट्टानों पर चढ़ाई की तथा जमा देने वाली ठंड, ऑक्सीजन की कमी और अत्यंत कठिन भौगोलिक परिस्थितियों का साहसपूर्वक सामना किया।

युद्ध की दिशा बदलने वाली निर्णायक लड़ाइयां

टोलोलिंग की लड़ाई इस अभियान की पहली प्रमुख सफलताओं में से एक थी। भारतीय सैनिकों ने मई 1999 के अंतिम सप्ताह में इस क्षेत्र में अभियान शुरू किया। कठिन संघर्ष के बाद 13 जून 1999 को पॉइंट 4590 और टोलोलिंग पर पुनः भारतीय नियंत्रण स्थापित कर लिया गया। इस विजय ने आगे के सैन्य अभियानों का मार्ग प्रशस्त किया और भारतीय सेना को महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त दिलाई।

टाइगर हिल की लड़ाई कारगिल युद्ध के सबसे निर्णायक अध्यायों में से एक रही। द्रास सेक्टर की सबसे महत्वपूर्ण और सामरिक दृष्टि से अत्यंत अहम चोटियों में शामिल टाइगर हिल भारतीय सेना के प्रमुख लक्ष्यों में से एक थी। अद्वितीय साहस और कठिन परिस्थितियों में चलाए गए अभियान के बाद 4 जुलाई 1999 को भारतीय सैनिकों ने इस चोटी पर पुनः कब्जा कर लिया। इस विजय ने युद्ध की दिशा निर्णायक रूप से भारत के पक्ष में मोड़ दी और अंतिम सफलता का मार्ग प्रशस्त किया।

पॉइंट 4875, बटालिक, मुश्कोह घाटी और कक्सर क्षेत्रों में भी भीषण संघर्ष हुए। भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प का परिचय देते हुए दुश्मन के कब्जे वाली प्रत्येक सामरिक चोटी को पुनः अपने नियंत्रण में लेने के लिए कठिन परिस्थितियों में एक-एक मोर्चे पर निर्णायक लड़ाई लड़ी।

लगभग तीन महीने तक चले सतत सैन्य अभियानों के बाद भारत ने अपने सभी कब्जे वाले क्षेत्र और चौकियां पुनः हासिल कर लीं। उल्लेखनीय है कि यह पूरी कार्रवाई भारत ने नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किए बिना पूरी की। इस संयमित, पेशेवर एवं दृढ़ सैन्य अभियान ने भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सम्मान दिलाया तथा उसकी सैन्य क्षमता और जिम्मेदार आचरण को स्थापित किया।

एक ऐसी जीत जिसने देश को प्रेरित किया

करगिल युद्ध भारत के इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय बन गया। इसने भारतीय सैनिकों की अद्वितीय वीरता, सर्वोच्च बलिदान और अटूट संकल्प का परिचय दिया तथा पूरे राष्ट्र को गर्व और एकता के सूत्र में बांध दिया। 14 जुलाई 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए ऑपरेशन विजय की सफलता की घोषणा की और सशस्त्र बलों के साहस, बलिदान तथा समर्पण को नमन किया।

इस ऐतिहासिक विजय ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि भारत अपनी क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास करेगा। इसने सशस्त्र बलों के प्रति देशवासियों के विश्वास को और सुदृढ़ किया तथा भारतीयों की अनेक पीढ़ियों को राष्ट्रसेवा, साहस और बलिदान की भावना से प्रेरित किया।

करगिल की पहचान बना शौर्य

करगिल विजय अनगिनत वीरता, साहस और सर्वोच्च बलिदान की गाथाओं का परिणाम थी। पुनः प्राप्त की गई प्रत्येक चोटी भारतीय सैनिकों के अदम्य संकल्प, असाधारण पराक्रम और मातृभूमि के प्रति उनके समर्पण की साक्षी है। ऑपरेशन विजय में प्रत्येक सैनिक का योगदान महत्वपूर्ण था, किंतु कुछ अद्वितीय वीरता के उदाहरण इस संघर्ष के अमर अध्याय बन गए। ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव, कैप्टन विक्रम बत्रा, कैप्टन विजयंत थापर तथा अनेक अन्य वीर सैनिक साहस, नेतृत्व और निस्वार्थ राष्ट्रसेवा के प्रतीक बनकर उभरे।

राष्ट्र ने इन अद्वितीय बलिदानों और वीरता को अपने सर्वोच्च सैन्य अलंकरणों से सम्मानित किया। करगिल युद्ध के दौरान प्रदर्शित असाधारण शौर्य के लिए 4 सैनिकों को परमवीर चक्र, 9 को महावीर चक्र और 55 को वीर चक्र से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त 1 सैनिक को सर्वोत्तम युद्ध सेवा पदक, 6 को उत्तम युद्ध सेवा पदक तथा 8 को युद्ध सेवा पदक प्रदान किए गए। वहीं 83 सैनिकों को सेना पदक और 24 वायु योद्धाओं को वायु सेना पदक से सम्मानित किया गया। ये सम्मान करगिल युद्ध के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा प्रदर्शित अद्वितीय साहस, नेतृत्व, कर्तव्यनिष्ठा और सर्वोच्च बलिदान के अमिट प्रतीक हैं।

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युद्धक्षेत्र के अनुभवों से सशक्त रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र तक

करगिल युद्ध भारत की रक्षा यात्रा में एक अहम मोड़ साबित हुआ। इसने बेहतर तालमेल, तेजी से आधुनिकीकरण और ज़्यादा आत्मनिर्भरता की जरूरत को उजागर किया। पिछले कुछ वर्षों में, भारत ने अपने रक्षा तंत्र को मजबूत करने और स्वदेशी क्षमता विकसित करने के लिए कई बड़े सुधार किए हैं। आज, इन प्रयासों से एक सशक्त, अधिक सक्षम और तेजी से आत्मनिर्भर होती सेना तैयार हो रही है।

कुछ प्रमुख सुधार और पहल नीचे बताए गए हैं:

सैन्य मामलों के विभाग की स्थापना

उच्च रक्षा प्रबंधन में सुधारों के तहत सैन्य मामलों के विभाग की स्थापना की गई। यह विभाग चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के अधीन कार्य करता है, जो इसके सचिव भी होते हैं। डीएमए का उद्देश्य थल सेना, नौसेना और वायु सेना के बीच संयुक्तता को बढ़ावा देना तथा रक्षा संबंधी नीतियों, योजना निर्माण, संसाधन प्रबंधन और प्रक्रियाओं में बेहतर समन्वय सुनिश्चित करना है।

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद

उच्च रक्षा प्रबंधन में किए गए सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के पद की स्थापना शामिल है। सीडीएस सरकार के प्रमुख सैन्य सलाहकार के रूप में कार्य करते हैं तथा तीनों सेनाओं के बीच संयुक्तता, समन्वय और एकीकृत सैन्य योजना को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जनरल बिपिन रावत वर्ष 2020 में भारत के पहले सीडीएस बने थे। वर्तमान में यह दायित्व जनरल अनिल चौहान निभा रहे हैं।

रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश

रक्षा उद्योग को निजी क्षेत्र की व्यापक भागीदारी के लिए खोला गया है। रक्षा विनिर्माण में निवेश को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से ऑटोमैटिक रूट के तहत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा बढ़ाकर 74 प्रतिशत कर दी गई है। इसके अलावा, आधुनिक प्रौद्योगिकी से जुड़े मामलों में सरकारी रूट के माध्यम से 100 प्रतिशत तक एफडीआई की अनुमति दी गई है। मार्च 2026 तक रक्षा क्षेत्र में 6,670.59 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त हुआ है। सरकार उन्नत रक्षा विनिर्माण क्षमताओं को सुदृढ़ करने के लिए विदेशी ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स के साथ सह-विकास और सह-उत्पादन को भी सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रही है।

रक्षा बजट में निरंतर वृद्धि

भारत का रक्षा बजट 2013–14 में 2.53 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2026–27 में 7.85 लाख करोड़ रुपये हो गया है। इसी अवधि में पूंजीगत व्यय भी 2014–15 के 94,587.95 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026–27 में 2.19 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। रक्षा क्षेत्र में यह बढ़ा हुआ निवेश आधुनिक सैन्य उपकरणों, अत्याधुनिक अवसंरचना और रणनीतिक परिसंपत्तियों के विकास के माध्यम से देश की दीर्घकालिक सैन्य क्षमता को सुदृढ़ बना रहा है।

 

 

रक्षा उत्पादन और निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि

भारत का रक्षा उत्पादन 2025–26 में 1.78 लाख करोड़ रुपये के अब तक के सर्वाधिक स्तर पर पहुंच गया, जो 2014–15 के 46,429 करोड़ रुपये की तुलना में लगभग चार गुना अधिक है।

भारत का रक्षा निर्यात 2013–14 में 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025–26 में 38,424 करोड़ रुपये हो गया है, जो 56 गुना से अधिक की वृद्धि को दर्शाता है। भारतीय रक्षा उत्पादों का निर्यात आज 80 से अधिक देशों को किया जा रहा है।

'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' जैसी पहलों के परिणामस्वरूप भारत वैश्विक स्तर पर एक उभरते हुए रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। वर्तमान में देश की लगभग 65 प्रतिशत रक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति स्वदेशी रूप से निर्मित रक्षा उपकरणों से की जा रही है, जबकि पहले भारत की 65–70 प्रतिशत रक्षा जरूरतें आयात पर निर्भर थीं।

स्वदेशी रक्षा निर्माण को गति देना

रक्षा मंत्रालय ने 'सृजन डिफेंस पोर्टल' की शुरुआत की, जो स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने के लिए रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और सेवा मुख्यालयों को उद्योगों, एमएसएमई तथा स्टार्टअप्स से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण मंच है। 'आत्मनिर्भर भारत' पहल के तहत वर्ष 2021 में स्वदेशीकरण की सकारात्मक सूची भी शुरू की गई। मई 2026 तक डीपीएसयू के लिए 5,012 रक्षा मदों को शामिल करते हुए पांच स्वदेशीकरण की सकारात्मक सूची अधिसूचित की जा चुकी हैं। पिछले पांच वर्षों में 15,700 से अधिक रक्षा मदों का सफलतापूर्वक स्वदेशीकरण किया गया है, जिनमें स्वदेशीकरण की सकारात्मक सूची के 3,204 मद शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, डीपीएसयू द्वारा 9,782 करोड़ रुपये के घरेलू खरीद आदेश जारी किए गए हैं, जिससे एमएसएमई, स्टार्टअप्स, अनुसंधान संस्थानों तथा भारत के रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को महत्वपूर्ण बढ़ावा मिला है।

रक्षा औद्योगिक गलियारे द्वारा क्षेत्रीय रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा

रक्षा औद्योगिक गलियारे रक्षा विनिर्माण के प्रमुख विकास केंद्रों के रूप में उभर रहे हैं। ये क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ करने के साथ-साथ एकीकृत औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र के विकास को भी बढ़ावा दे रहे हैं। अप्रैल 2026 तक उत्तर प्रदेश रक्षा औद्योगिक गलियारे में 42,057 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए थे, जिनमें से 4,409 करोड़ रुपये का निवेश धरातल पर उतर चुका है। परीक्षण और नवाचार क्षमताओं को सुदृढ़ करने के लिए रक्षा प्रौद्योगिकी एवं परीक्षण केंद्र की स्थापना भी की गई है। इसी अवधि में तमिलनाडु रक्षा औद्योगिक गलियारे में 32,699 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए, जिनमें से 4,446 करोड़ रुपये का वास्तविक निवेश हो चुका है। ये दोनों रक्षा औद्योगिक गलियारे औद्योगिक अवसंरचना के विकास में तेजी लाने, स्वदेशी रक्षा विनिर्माण क्षमता को सुदृढ़ करने तथा रोजगार के नए अवसर सृजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

अग्निपथ योजना

अग्निपथ योजना सशस्त्र बलों में युवाओं (पुरुष एवं महिलाओं) की 'अग्निवीर' के रूप में चार वर्ष की सेवा अवधि के लिए भर्ती के उद्देश्य से शुरू की गई है। इस योजना का लक्ष्य एक युवा, तकनीक-सक्षम और आधुनिक सैन्य बल तैयार करना है, जो भविष्य की चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए सदैव तैयार रहे। अग्निवीरों को सैन्य प्रशिक्षण के साथ-साथ विशेष कौशल विकास का अवसर प्रदान किया जाता है। साथ ही, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान जैसे संस्थानों के सहयोग से शैक्षणिक अवसर भी उपलब्ध कराए जाते हैं। यह योजना सेवा पूर्ण होने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कौशल प्रमाण-पत्र तथा विभिन्न क्षेत्रों में करियर के अवसर भी प्रदान करती है।

करगिल की विरासत आज भी उन सुधारों को प्रेरित करती है, जो भारत के सशस्त्र बलों को अधिक सक्षम, आधुनिक एवं आत्मनिर्भर बनाते हुए देश की सुरक्षा को और सुदृढ़ कर रहे हैं।

भविष्य के लिए तैयार सेना की ओर

करगिल युद्ध के बाद युद्ध की प्रकृति में व्यापक परिवर्तन आया है। आधुनिक युद्धक्षेत्र में उन्नत प्रौद्योगिकी, अधिक सटीक एवं प्रभावी मारक क्षमता तथा त्वरित निर्णय लेने की क्षमता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। भारत ने आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्मों को शामिल करने और अगली पीढ़ी की रक्षा प्रौद्योगिकियों के विकास के माध्यम से अपनी सैन्य क्षमताओं को निरंतर सुदृढ़ किया है। इन क्षमताओं ने थल, वायु, नौसेना, अंतरिक्ष तथा अन्य उभरते परिचालन क्षेत्रों में देश की युद्धक तैयारी एवं परिचालन दक्षता को और मजबूत किया है।

इस परिवर्तन को गति देने वाले प्रमुख सैन्य प्लेटफॉर्मों और उभरती रक्षा प्रौद्योगिकियों का विवरण निम्नलिखित है।

सेवा में आधुनिक प्लेटफॉर्म

भारत ने युद्ध क्षमता को मजबूत करने और ऑपरेशनल प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए तीनों सेनाओं में आधुनिक प्लेटफॉर्म शामिल किए हैं।

  • अर्जुन एमके-1ए मुख्य युद्धक टैंक: अर्जुन एमके-1ए मुख्य युद्धक टैंक को फरवरी 2021 में भारतीय सेना में शामिल किया गया। इसने भारत की स्वदेशी बख्तरबंद युद्ध क्षमता को और सुदृढ़ किया।
  • आईएनएस विक्रांत: भारत के पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत को 2 सितंबर 2022 को भारतीय नौसेना में शामिल किया गया। यह भारत की समुद्री शक्ति और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
  • राफेल लड़ाकू विमान: वर्ष 2030 तक भारत 62 राफेल लड़ाकू विमानों का संचालन करेगा, जिनमें 26 नौसैनिक राफेल विमान भी शामिल होंगे। इसके साथ ही फ्रांस के बाद भारत राफेल के दोनों संस्करणों का संचालन करने वाला पहला देश बन जाएगा।
  • अपाचे और चिनूक हेलीकॉप्टर: अपाचे आक्रमण हेलीकॉप्टर और चिनूक भारी-भरकम परिवहन हेलीकॉप्टर के शामिल होने से भारतीय सशस्त्र बलों की युद्ध क्षमता तथा सामरिक वायु परिवहन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
  • ड्रोन आधारित युद्ध क्षमता: भारत ने अपनी सैन्य रणनीति में ड्रोन तकनीक को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। ड्रोन का उपयोग अब निगरानी, टोही, सटीक हमलों तथा युद्धक्षेत्र में अभियान की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।
  • ब्रह्मोस क्रूज़ मिसाइल: ब्रह्मोस का पहला सफल प्रक्षेपण 12 जून 2001 को हुआ था। यह एक बहु-मंचीय, ध्वनि की गति से तेज़ क्रूज़ मिसाइल है, जिसे थल, जल और वायु—तीनों माध्यमों से प्रक्षेपित किया जा सकता है। इसकी मारक क्षमता 290 किलोमीटर तक है तथा इसकी गति लगभग ध्वनि की गति से 2.8 गुना (मैक 2.8) है।
  • प्रोजेक्ट 17ए स्टील्थ फ्रिगेट: प्रोजेक्ट 17ए भारतीय नौसेना का उन्नत स्टील्थ फ्रिगेट कार्यक्रम है, जिसके तहत सात अगली पीढ़ी के निर्देशित मिसाइल युद्धपोत बनाए जा रहे हैं। इन युद्धपोतों को वायु रक्षा, सतह पर युद्ध और पनडुब्बी-रोधी अभियानों के लिए विकसित किया गया है।
  • संधायक श्रेणी के सर्वेक्षण पोत: संधायक श्रेणी के सर्वेक्षण पोत समुद्र तल और तटीय क्षेत्रों का मानचित्रण कर भारतीय नौसेना की जलमापकीय (हाइड्रोग्राफिक) क्षमता को सुदृढ़ करते हैं। इस स्वदेशी श्रेणी में आईएनएस संधायक, आईएनएस निर्देशक, आईएनएस इक्षक और आईएनएस संशोधक शामिल हैं, जो भारत की समुद्री सर्वेक्षण और नौवहन क्षमताओं को मजबूत करते हैं।
  • अनाला श्रेणी के उथले जल पनडुब्बी-रोधी युद्धपोत: अनाला श्रेणी भारतीय नौसेना की तटीय सुरक्षा और पनडुब्बी-रोधी युद्ध क्षमता को सुदृढ़ करती है। इस स्वदेशी श्रेणी के आठ युद्धपोतों में आईएनएस अनाला, आईएनएस एंड्रॉथ, आईएनएस अंजादीप, आईएनएस अमिनी, आईएनएस अभय, आईएनएस अग्रय, आईएनएस अक्षय और हाल ही में नौसेना में शामिल आईएनएस अजय शामिल हैं। आईएनएस अनाला भारतीय नौसेना का अब तक का सबसे बड़ा वाटरजेट-चालित युद्धपोत है।

विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें: भारत की समुद्री सीमाओं के रक्षक

उभरती प्रौद्योगिकियां और सामरिक क्षमताएं

भारत भविष्य के युद्धक्षेत्रों की चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए अपनी सशस्त्र सेनाओं को अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों से सुसज्जित कर रहा है। इसके लिए उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों, आधुनिक सैन्य प्रणालियों तथा रणनीतिक क्षमताओं के विकास और विस्तार में निरंतर निवेश किया जा रहा है।

  • मिशन शक्ति: 27 मार्च 2019 को भारत ने डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वीप से 'मिशन शक्ति' के तहत एंटी-सैटेलाइट (एएसएटी) मिसाइल का सफल परीक्षण किया। इस उपलब्धि के साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया, जिनके पास उपग्रह-रोधी मिसाइल क्षमता है।
  • रक्षा क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: वर्ष 2022 में भारत ने निगरानी, साइबर सुरक्षा, रसद प्रबंधन, स्वायत्त प्रणालियों तथा युद्धक्षेत्र में निर्णय-सहायता के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित 75 प्रौद्योगिकियां शुरू कीं।
  • मिशन दिव्यास्त्र: 11 मार्च 2024 को भारत ने 'मिशन दिव्यास्त्र' के तहत एक ऐसी लंबी दूरी की मिसाइल का सफल परीक्षण किया, जिसमें एकाधिक स्वतंत्र रूप से लक्ष्यभेदी वारहेड (एमआईआरवी) तकनीक का उपयोग किया गया है। यह मिसाइल एक साथ अलग-अलग लक्ष्यों पर प्रहार करने में सक्षम है।
  • पिनाका लंबी दूरी का निर्देशित रॉकेट: 29 दिसंबर 2025 को पिनाका लंबी दूरी के निर्देशित रॉकेट का पहला सफल उड़ान परीक्षण किया गया। इसने 120 किलोमीटर तक की अधिकतम मारक क्षमता का प्रदर्शन करते हुए अत्यंत सटीक लक्ष्यभेदन किया।
  • उन्नत वायु रक्षा प्रणाली: 23 अगस्त 2025 को डीआरडीओ ने एक उन्नत वायु रक्षा प्रणाली का सफल परीक्षण किया। इस प्रणाली में मिसाइल अवरोधक, कम दूरी के वायु रक्षा हथियार तथा लेजर आधारित प्रौद्योगिकियां शामिल हैं।
  • हाइपरसोनिक मिसाइल प्रौद्योगिकी: भारत हाइपरसोनिक मिसाइलों के लिए अगली पीढ़ी की उन्नत प्रणोदन तकनीक विकसित कर रहा है। जनवरी 2026 में डीआरडीओ ने स्क्रैमजेट दहन प्रणाली का लंबी अवधि वाला ग्राउंड टेस्ट सफलतापूर्वक पूरा किया। साथ ही, हैदराबाद में स्थापित नई हाइपरसोनिक विंड टनल भविष्य की उच्च गति वाली मिसाइलों के विकास को गति दे रही है।
  • कुशा लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल: जुलाई 2026 में डीआरडीओ ने कुशा मिसाइल का पहला सफल उड़ान परीक्षण किया। इसने हवा में तेज़ गति से आने वाले काल्पनिक खतरे को सफलतापूर्वक नष्ट किया। यह प्रणाली लड़ाकू विमान, मिसाइल, मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी) तथा बड़े शत्रु विमानों को लंबी दूरी और ऊंचाई पर निष्क्रिय करने में सक्षम है। इसका विकास डीआरडीओ और भारतीय उद्योग साझेदारों द्वारा स्वदेशी रूप से किया गया है।
  • लंबी दूरी की भूमि पर प्रहार करने वाली क्रूज़ मिसाइल: जून 2026 में डीआरडीओ ने डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वीप से लंबी दूरी की भूमि पर प्रहार करने वाली क्रूज़ मिसाइल का सफल उड़ान परीक्षण किया। मिसाइल ने परीक्षण के सभी निर्धारित मानकों और लक्ष्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया। यह पूर्णतः स्वदेशी प्रणाली है, जिसके सभी प्रमुख उप-तंत्र डीआरडीओ की प्रयोगशालाओं तथा भारतीय उद्योग साझेदारों द्वारा विकसित किए गए हैं।
  • नेत्र हवाई पूर्व चेतावनी एवं नियंत्रण प्रणाली: जून 2026 में डीआरडीओ ने स्वदेशी 'नेत्र' हवाई पूर्व चेतावनी एवं नियंत्रण (एईडब्ल्यू एंड सी) प्रणाली को अंतिम परिचालन स्वीकृति (फ़ाइनल ऑपरेशनल क्लियरेंस) प्रदान की। डीआरडीओ, भारतीय वायु सेना और उद्योग साझेदारों द्वारा संयुक्त रूप से विकसित यह प्रणाली हवाई निगरानी, वास्तविक समय में स्थिति की जानकारी तथा युद्ध प्रबंधन क्षमताओं को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ करती है।

आधुनिक युद्धक प्लेटफॉर्मों से लेकर अगली पीढ़ी की अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों तक, भारत भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप एक सक्षम, आधुनिक और आत्मनिर्भर सैन्य शक्ति का निर्माण कर रहा है। ये क्षमताएं देश की निवारक शक्ति को सुदृढ़ करने, परिचालन तैयारी को और प्रभावी बनाने तथा भारत की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता एवं राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करने की क्षमता को निरंतर मजबूत कर रही हैं।

करगिल की स्थायी विरासत

एक मजबूत सेना तभी सबसे ज़्यादा असरदार होती है जब उसके साथ अटूट संकल्प भी हो। कारगिल के बाद से, भारत ने अपनी रक्षा क्षमताओं और सुरक्षा से जुड़ी बदलती चुनौतियों का सामना करने की अपनी तैयारी, दोनों को लगातार मजबूत किया है। यही सोच देश की सुरक्षा नीति और ऑपरेशनल तैयारी को आकार देती रही है।

सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक

पिछले दशक में सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद के प्रति भारत की नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला है। उरी आतंकी हमले के बाद भारतीय सशस्त्र बलों ने 28–29 सितंबर 2016 की रात नियंत्रण रेखा के पार स्थित आतंकवादी लॉन्च पैडों पर सर्जिकल स्ट्राइक कर उन्हें नष्ट किया। इस कार्रवाई में आतंकवादियों और उन्हें समर्थन देने वाले ढांचे को भारी क्षति पहुंचाई गई। यह अभियान सीमा पार आतंकवाद के विरुद्ध भारत की सक्रिय और दृढ़ नीति का स्पष्ट संकेत था।

इसके कुछ वर्षों बाद 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में हुए आतंकी हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के 40 जवान शहीद हो गए। इसके जवाब में भारत ने 26 फरवरी 2019 को खुफिया सूचनाओं के आधार पर बालाकोट हवाई कार्रवाई को अंजाम दिया, जिसमें जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी प्रशिक्षण शिविर को निशाना बनाया गया। यह ठिकाना नागरिक आबादी से दूर स्थित था और इसका संचालन मौलाना यूसुफ अज़हर, जो जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अज़हर का बहनोई है, द्वारा किया जाता था। इन दोनों निर्णायक कार्रवाइयों ने स्पष्ट संदेश दिया कि भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के विरुद्ध आतंकवाद और छद्म युद्ध को किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं करेगा तथा आवश्यक होने पर उसके विरुद्ध प्रभावी व निर्णायक कार्रवाई करने में सक्षम है।

ऑपरेशन सिंदूर

मई 2025 में संचालित 'ऑपरेशन सिंदूर' ने भारत की विकसित होती सैन्य नीति और आतंकवाद के विरुद्ध उसके निर्णायक दृष्टिकोण को एक बार फिर स्पष्ट किया। यह अभियान पहलगाम में आम नागरिकों पर हुए आतंकी हमले के जवाब में चलाया गया। भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान तथा पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में स्थित नौ आतंकी ठिकानों को सटीक हमलों में निशाना बनाया।

इस अभियान में सटीक खुफिया जानकारी, ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन तथा बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रणाली का प्रभावी उपयोग किया गया। जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख आतंकी ठिकानों और कमांड सेंटरों को नष्ट कर दिया गया। इन हमलों में 100 से अधिक आतंकवादी मारे गए। मारे गए आतंकवादियों में आईसी-814 विमान अपहरण और पुलवामा आतंकी हमले से जुड़े यूसुफ अजहर, अब्दुल मलिक रऊफ और मुदस्सिर अहमद जैसे प्रमुख आतंकवादी भी शामिल थे। इसके बाद 7 और 8 मई 2025 को पाकिस्तान की ओर से ड्रोन और मिसाइलों के माध्यम से हमलों का प्रयास किया गया, जिन्हें भारत की एकीकृत वायु रक्षा प्रणाली ने सफलतापूर्वक निष्क्रिय कर दिया। इस जवाबी कार्रवाई ने भारत की नेटवर्क-केंद्रित युद्ध क्षमता और एकीकृत ड्रोन-रोधी रक्षा तंत्र की प्रभावशीलता को प्रदर्शित किया।

करगिल युद्ध से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक, आतंकवाद के विरुद्ध भारत की रणनीति अधिक सक्रिय, सटीक और निर्णायक हुई है। आधुनिक सैन्य प्रौद्योगिकी, उच्च स्तरीय खुफिया समन्वय एवं त्वरित कार्रवाई की क्षमता ने भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाया है।

करगिल की भावना का जश्न

करगिल की विरासत न सिर्फ भारत के सैन्य संकल्प को आकार देती है, बल्कि यह देश की सामूहिक यादों में भी बसी हुई है। हर साल, करगिल विजय दिवस देश को 1999 के वीर सैनिकों के साहस और बलिदान का सम्मान करने के लिए एकजुट करता है। देश भर में उनके सर्वोच्च बलिदान को श्रद्धांजलि देने के लिए कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ये पहल उनकी विरासत का सम्मान करती हैं और साथ ही आने वाली पीढ़ियों को साहस, कर्तव्य एवं देशभक्ति के मूल्यों से प्रेरित करती हैं।

शौर्य विजय यात्रा

रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने 14 जुलाई 2026 को 13 दिनों तक चलने वाली 'शौर्य विजय यात्रा' को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। मोटरसाइकिल का यह अभियान नई दिल्ली के नेशनल वॉर मेमोरियल से शुरू हुआ। 1,900 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद यह यात्रा द्रास स्थित कारगिल वॉर मेमोरियल पर समाप्त होगी। इस अभियान में 28 राइडर्स हिस्सा ले रहे हैं, जिनमें सेना के मौजूदा और रिटायर्ड जवान व उनके परिवार शामिल हैं। इस अभियान का ध्येय वाक्य है - "एक राइड, एक देश, एक सलाम।"

व्हील्स ऑफ वेलोर: संचार शक्ति

देशव्यापी व्हील्स ऑफ वेलोर: संचार शक्ति अभियान के तहत भारतीय सेना की सिग्नल कोर की प्रसिद्ध डेयर डेविल्स मोटरसाइकिल प्रदर्शन टीम ने 1 जुलाई 2026 को एक नया विश्व कीर्तिमान स्थापित किया। इस अभियान के दौरान 10 मोटरसाइकिल सवारों ने दो मोटरसाइकिलों पर सवार होकर अटल सुरंग के भीतर साहसिक करतबों का प्रदर्शन किया। उन्होंने 9.8 किलोमीटर लंबी सुरंग की दूरी मात्र 9 मिनट 47.97 सेकंड में पूरी की। यह उपलब्धि भारतीय सेना के साहस, कौशल, अनुशासन, सहनशक्ति और टीम भावना का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह अभियान कारगिल विजय दिवस की वीरता और बलिदान की गौरवशाली परंपरा को समर्पित है तथा राष्ट्र की सेवा में समर्पित सैनिकों के अदम्य साहस को श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

टाइगर हिल अभियान 2026

भारतीय सेना और द्रास के नागरिक प्रशासन ने 17 जुलाई 2026 को टाइगर हिल अभियान का आयोजन किया। इस पहल का उद्देश्य कारगिल युद्ध की गौरवशाली विरासत को संरक्षित करते हुए सैन्य पर्यटन को बढ़ावा देना था। इस अभियान में 11 प्रशिक्षित स्थानीय ट्रेकिंग गाइडों ने भी भाग लिया, जिससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित हुए। यह पहल करगिल की ऐतिहासिक विरासत को नई पीढ़ी तक ले जाने के साथ-साथ स्थानीय समुदाय की आजीविका को सशक्त बनाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

पूर्व सैनिकों और वीर योद्धाओं का सम्मान

तीनों सेनाओं के पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों ने 16 जुलाई 2026 को करगिल युद्ध स्मारक और हेरिटेज हट म्यूजियम का दौरा किया। इस दौरे से कारगिल के वीर योद्धाओं को सम्मान दिया गया और पूर्व सैनिकों, सेवारत जवानों और उनके परिवारों के बीच के मजबूत रिश्ते को और पक्का किया गया। 10 जुलाई 2026 को पूर्व सैनिकों, स्कूली बच्चों और ग्रामीणों ने भी खालुबार युद्ध स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की। इस समारोह ने देशभक्ति, साहस और निस्वार्थ सेवा के स्थायी मूल्यों को फिर से दोहराया।

स्मृति ट्रेक और सैन्य प्रदर्शनी

13 जुलाई 2026 को भारतीय सेना के 137 सैनिकों ने पॉइंट 5140 (जिसे 'गन हिल' के नाम से भी जाना जाता है) तक एक स्मृति ट्रेक किया। यह ट्रेक ऑपरेशन विजय के दौरान तोपखाना रेजिमेंट के महत्वपूर्ण योगदान और वीरता को सम्मान देने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था।

इसके अलावा, भारतीय सेना ने हानले में हथियार एवं सैन्य उपकरण प्रदर्शनी का आयोजन किया। इस प्रदर्शनी में आधुनिक हथियारों, ड्रोन तथा निगरानी प्रणालियों का प्रदर्शन किया गया। इसके माध्यम से ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में भारतीय सेना की तकनीकी क्षमता, आधुनिक युद्धक संसाधनों और परिचालन तैयारियों को प्रदर्शित किया गया।

लेह से द्रास तक मोटरसाइकिल अभियान

भारतीय सेना के राइडर्स ने 12 और 13 जुलाई 2026 को लेह से द्रास में करगिल युद्ध स्मारक तक एक मोटरसाइकिल अभियान चलाया। राइडर्स ने मुश्किल रास्तों - फोटू ला, नामिका ला और उम्बा ला - को पार किया। इस अभियान ने सहनशक्ति, आपसी भाईचारे और सैन्य भावना का प्रदर्शन करते हुए 'ऑपरेशन विजय' के वीर सैनिकों को सम्मान दिया।

ये यादगार कार्यक्रम यह सुनिश्चित करते हैं कि कारगिल की विरासत साहस, बलिदान और देश सेवा के शाश्वत आदर्शों के साथ हर पीढ़ी को प्रेरित करती रहे।

वह विजय जो सदैव स्मरणीय रहेगी

सत्ताइस वर्ष बाद भी करगिल विजय की गूंज पूरे देश में सुनाई देती है। यह विजय साहस, बलिदान और अटूट राष्ट्रभक्ति का अमर प्रतीक है। पुनः प्राप्त की गई प्रत्येक चोटी इस बात की याद दिलाती है कि भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता तथा इसकी रक्षा हर परिस्थिति में की जाएगी। करगिल के वीर सैनिकों के अदम्य साहस एवं सर्वोच्च बलिदान से प्रेरित होकर भारत आज अधिक सशक्त, अधिक सक्षम और अधिक आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ रहा है। करगिल विजय दिवस पर देश अपने वीर नायकों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए उनकी अमर विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने के संकल्प को दोहराता है। इन वीरों का अदम्य साहस, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण आने वाली पीढ़ियों को सदैव राष्ट्रसेवा, सम्मान व सर्वोच्च बलिदान के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता रहेगा।

संदर्भ:

पीआईबी पृष्ठभूमि सामग्री

रक्षा मंत्रालय:

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पीके/केसी/एनके


(रिलीज़ आईडी: 2289273) आगंतुक पटल : 18
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