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भारतीय कृषि में लचीली उत्पादन प्रणालियाँ

“खेतों से बाजार तक”

प्रविष्टि तिथि: 26 MAR 2026 3:05PM by PIB Delhi

परिचय

भारतीय कृषि क्षेत्र ग्रामीण आजीविका को बनाए रखने, आर्थिक सुदृढ़ता सुनिश्चित करने तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में निरंतर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कृषि और इससे जुड़ी अन्य गतिविधियाँ वर्तमान मूल्यों पर देश के सकल मूल्य वर्धन (GVA) का लगभग पाँचवां हिस्सा योगदान करती हैं, लगभग 46.1 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार प्रदान करती हैं तथा लगभग 55 प्रतिशत जनसंख्या के लिए संबल बनती हैं, जो इसके व्यापक सामाजिक-आर्थिक महत्व को दर्शाता है। पिछले पाँच वर्षों में इस क्षेत्र ने स्थिर मूल्यों पर लगभग 4.4 प्रतिशत की औसत वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त की है, जो उन्नत कृषि पद्धतियों, खेती में अच्छी प्रौद्योगिकी को शामिल करने तथा अधिक लचीली उत्पादन प्रणालियों के समर्थन से हुई प्रगति को परिलक्षित करता है।

भारतीय कृषि उत्पादन का प्रदर्शन

कृषि वर्ष 2024-25 में भारत ने 357.73 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) का अभूतपूर्व खाद्यान्न उत्पादन दर्ज किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 25.43 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) अधिक है। यह उपलब्धि उत्पादकता में निरंतर सुधार, इनपुट प्रबंधन की बेहतर व्यवस्था तथा किसानों को सुदृढ़ संस्थागत सहयोग के परिणामस्वरूप संभव हुई है। उत्पादन में वृद्धि मुख्यतः चावल, गेहूं, मक्का तथा मोटे अनाज (मिलेट्स सहित, जिन्हें ‘श्री अन्न’ के रूप में नामित किया गया है) के अधिक उत्पादन के कारण हुई है।

बागवानी क्षेत्र समानांतर रूप से कृषि परिवर्तन और मूल्य संवर्धन का एक प्रमुख वाहक बनकर उभरा है। वर्ष 2024-25 में कुल बागवानी उत्पादन 362.08 मिलियन टन (एमटी) तक पहुंच गया था, जो उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर संरचनात्मक बदलाव को दर्शाता है। दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार, वर्ष 2024-25 में उत्पादन बढ़कर 367.72 मिलियन टन हो गया है जो 2013-14 280.70 मिलियन टन के आसपास था। इस उत्पादन में लगभग 114.51 मिलियन टन फल, 219.67 मिलियन टन सब्जियां तथा 33.54 मिलियन टन अन्य बागवानी फसलें शामिल हैं। खाद्यान्न एवं बागवानी उत्पादन दोनों में क्रमिक वृद्धि भारत के सशक्त होते घरेलू कृषि आधार तथा वैश्विक कृषि-खाद्य प्रणालियों में इसकी बढ़ती भूमिका को रेखांकित करती है।

वैश्विक कृषि बाजार में भारत

भारत का कृषि निर्यात हाल के वर्षों में निरंतर बढ़ रहा है। कृषि निर्यात से होने वाली आय जहां वित्त वर्ष 2020 में 34.5 अरब अमेरिकी डॉलर थी वहीं वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 51.1 अरब अमेरिकी डॉलर हो गई, जो 8.2 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सी ए जी आर) को दर्शाती है। वित्त वर्ष 2025 में प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों सहित कृषि-खाद्य निर्यात 49.43 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जो कुल निर्यात का लगभग 11.2 प्रतिशत है। विशेष रूप से, प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात की हिस्सेदारी में भी निरंतर वृद्धि हुई है, जो वित्त वर्ष 2018 के 14.9 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 20.4 प्रतिशत हो गई है। यह कृषि निर्यात टोकरी में उच्च मूल्य संवर्धन की दिशा में प्रगतिशील बदलाव को भी इंगित करता है।

ये प्रवृत्तियाँ निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को सुदृढ़ करने में प्रसंस्कृत एवं विविधीकृत कृषि उत्पादों की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करती हैं, साथ ही उत्पादन, प्रसंस्करण तथा वैश्विक बाजार एकीकरण के क्षेत्रों में नए अवसर भी सृजित करती हैं।

विविधीकृत उत्पादन प्रणालियों तथा अनाज, दलहन, बागवानी और प्लांटेशन फसलों में क्षेत्र-विशिष्ट क्षमताओं के समर्थन से भारत वैश्विक कृषि क्षेत्र में एक मजबूत स्थिति रखता है। विश्व के दूसरे सबसे बड़े कृषि भूमि क्षेत्र के साथ, भारत कृषि उत्पादन में अग्रणी देशों में शामिल है और अनेक कृषि उत्पादों में विश्व के शीर्ष उत्पादकों में स्थान रखता है, जो इसके कृषि तंत्र के पैमाने और स्थिरता दोनों को दर्शाता है।

अनाज, दलहन एवं मोटे अनाज (मिलेट्स) में भारत की अग्रणी स्थिति

चावल एवं गेहूं: चावल और गेहूं दोनों के उत्पादन में भारत, विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। कृषि वर्ष 2024-25 के दौरान चावल का उत्पादन 150.18 मिलियन टन तथा गेहूं का उत्पादन 117.94 मिलियन टन दर्ज किया गया। चावल का व्यापक उत्पादन मुख्यतः उत्तर प्रदेश, तेलंगाना तथा पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में होता है। वहीं, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब गेहूं उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र हैं, जो देश में अनाज उत्पादन के भौगोलिक संकेंद्रण को दर्शाते हैं।

दलहन एवं मिलेट्स (श्री अन्न): दलहन उत्पादन में भी भारत वैश्विक स्तर पर अग्रणी राष्ट्र है, जहाँ वर्ष 2024-25 में 25.68 मिलियन टन का उत्पादन दर्ज किया गया। दलहन उत्पादन में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र तथा राजस्थान प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। मिलेट्स (श्री अन्न) के उत्पादन में भी भारत विश्व में प्रथम स्थान पर है, जहाँ वर्ष 2024-25 में लगभग 18.59 मिलियन टन उत्पादन हुआ, जिसमें प्रमुख योगदान रहा राजस्थान, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक का।

व्यापार प्रदर्शन के संदर्भ में वर्ष 2024-25 में चावल का निर्यात 12.95 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया, जबकि दलहन एवं मिलेट्स का निर्यात क्रमशः 855 मिलियन अमेरिकी डॉलर तथा 59.20 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा। ये आँकड़े विविधीकृत एवं जलवायु-अनुकूल अनाज फसलों की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय मांग को रेखांकित करते हैं, जिससे वैश्विक खाद्य एवं पोषण सुरक्षा में भारत की रणनीतिक भूमिका और अधिक सुदृढ़ होती है।

वैश्विक बागवानी में भारत की स्थिति

फल एवं सब्जियाँ: भारत फल एवं सब्जियों के उत्पादन में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। वर्ष 2024-25 में फल उत्पादन 114.51 मिलियन टन तथा सब्जियों का उत्पादन 219.67 मिलियन टन दर्ज किया गया। भारत के प्रमुख फल उत्पादक राज्यों में शामिल हैं- आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक तथा तमिलनाडु। सब्जी उत्पादन में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, बिहार तथा गुजरात अग्रणी हैं। वर्ष 2024-25 में फल एवं सब्जियों का निर्यात 1,818.56 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा, जो भारत के कृषि व्यापार में उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों के बढ़ते योगदान तथा वैश्विक बाजार में उसके एकीकरण को दर्शाता है।

सूखी प्याज: सूखे प्याज के वैश्विक उत्पादन के मामले में भारत विश्व में प्रथम स्थान पर है, जो कुल वैश्विक उत्पादन का लगभग 25 प्रतिशत योगदान देता है। इसका प्रमुख उत्पादन महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा गुजरात

उच्च मूल्य वाली नकदी फसलों में भारत की अग्रणी भूमिका

गन्ना: गन्ना उच्च मूल्य वाली नकदी फसलों में आता है और इसमें भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। वर्ष 2024-25 में गन्ना उत्पादन 454.61 मिलियन टन दर्ज किया गया, जिसका प्रमुख उत्पादन उत्तर प्रदेश तथा महाराष्ट्र से होता है।

कपास: कपास उत्पादन में भी भारत की स्थिति में विश्व दूसरे नंबर पर है, जहाँ वर्ष 2024-25 में उत्पादन लगभग 5.05 मिलियन टन (गांठ से मिलियन टन में रूपांतरित) आंका गया है। कपास का उत्पादन मुख्यतः कर्नाटक, महाराष्ट्र तथा गुजरात में केंद्रित है, जो भारत के प्रमुख कपास उत्पादक राज्य हैं। व्यापार के संदर्भ में, वैश्विक शुल्क संबंधी चुनौतियों के बावजूद, जनवरी से अक्टूबर 2025 के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका को भारत का कपास निर्यात 31.31 अरब अमेरिकी डॉलर का रहा, जो बदलती अंतरराष्ट्रीय बाजार परिस्थितियों के बीच निर्यात प्रदर्शन में अपेक्षाकृत स्थिरता को दर्शाता है।

चाय: भारत, चाय उत्पादन के मामले में विश्व में दूसरा स्थान रखता है, जहाँ अप्रैल–दिसंबर 2024-25 के दौरान उत्पादन 1.203 मिलियन टन तक पहुंच गया। चाय का उत्पादन मुख्यतः असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल तथा कर्नाटक में केंद्रित है। चाय का निर्यात अप्रैल से अक्टूबर 2025-26 की अवधि के दौरान 605.90 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 15.16 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है।

मसाले: मसालों के मामले में भारत विश्व का अग्रणी उत्पादक देश बना हुआ है, जहाँ वर्ष 2023-24 में कुल उत्पादन 12 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच गया। मसलों के प्रमुख उत्पादक राज्यों में शामिल हैं मध्य प्रदेश, गुजरात तथा आंध्र प्रदेश। वित्त वर्ष 2025 में मसालों का निर्यात 4.52 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जो इस क्षेत्र में भारत की मजबूत वैश्विक उपस्थिति को दर्शाता है।

नारियल: भारत, नारियल उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान पर है, जहाँ वार्षिक उत्पादन लगभग 21.3 अरब नारियल है। वर्ष 2024-25 में नारियल निर्यात का मूल्य 513 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी स्थिर मांग को परिलक्षित करता है।

कॉफी: भारत प्रतिवर्ष लगभग 0.36 मिलियन टन कॉफी का उत्पादन करता है, जिसमें से लगभग 70 प्रतिशत 128 देशों को निर्यात किया जाता है। इसका उत्पादन मुख्यतः कर्नाटक, केरल तथा तमिलनाडु में केंद्रित है। अप्रैल–अक्टूबर, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान कॉफी निर्यात 1,176.31 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 12 प्रतिशत अधिक है।

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केंद्रीय बजट 2026-27 में उच्च मूल्य वाली फसलों के प्रोत्साहन पर विशेष बल दिया गया है। इसके अंतर्गत तटीय क्षेत्रों में नारियल, चंदन, कोकोआ तथा काजू के लिए लक्षित समर्थन, पूर्वोत्तर राज्यों में अगर (अगरवुड) वृक्षों के संवर्धन तथा पहाड़ी क्षेत्रों में बादाम, अखरोट एवं पाइन नट्स जैसे उच्च मूल्य वाले मेवों के विकास की घोषणा की गई है। यह क्षेत्र-विशिष्ट दृष्टिकोण स्थानीय कृषि-जलवायु विशेषताओं के प्रभावी उपयोग तथा अधिक आर्थिक लाभ देने वाली फसलों की ओर विविधीकरण को प्रोत्साहित करने की नीति-गत मंशा को दर्शाता है।

अतः भारत का विविधीकृत कृषि उत्पाद आधार तथा भौगोलिक रूप से संतुलित उत्पादन तंत्र वैश्विक खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं को स्थिर करने में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करते हैं। उन्नत उत्पादन पद्धतियों के साथ विस्तारित निर्यात बाजारों का एकीकरण लचीली कृषि की ओर झुकाव को दर्शाते हैं, जो आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ दीर्घकालिक पर्यावरणीय संतुलन को भी बढ़ावा देता है।

लचीली उत्पादन प्रणालियों को समर्थन देने वाले सार्वजनिक नीतिगत हस्तक्षेप

कृषि के लिए भारतीय नीति किसानों के कल्याण के साथ-साथ क्षेत्रीय सुदृढ़ता को मजबूत करने के लिए वित्तीय सहायता, उत्पादकन में वृद्धि तथा जोखिम प्रबंधन उपायों का समन्वित समावेश करती है।

बजट आवंटन

सरकार ने कृषि क्षेत्र के लिए बजटीय आवंटन में उल्लेखनीय वृद्धि की है, जो किसानों के कल्याण और ग्रामीण आजीविका को सुदृढ़ करने के प्रति दीर्घकालिक नीतिगत प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है तथा समय के साथ किसानों के हितों के प्रति निरंतर समर्पण को दर्शाता है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के लिए बजट आवंटन 2013-14 में 21,933.50 करोड़ रुपये (लगभग 2.64 अरब अमेरिकी डॉलर) था, जिसे 2025-26 में बढ़ाकर 1,27,290.16 करोड़ रुपये (लगभग 15.34 अरब अमेरिकी डॉलर) किया गया, जो इस अवधि में सार्वजनिक निवेश में महत्वपूर्ण वृद्धि का प्रमाण है। इस प्रवृत्ति को आगे बढ़ाते हुए, वर्ष 2026-27 के लिए कृषि एवं किसान कल्याण विभाग को 1,30,561.38 करोड़ रुपये (लगभग 15.73 अरब अमेरिकी डॉलर) का बजट आवंटन किया गया है जो कृषि विकास को निरंतर प्राथमिकता दिए जाने की पुष्टि करता है।

लचीले विकास हेतु लागत समर्थन: भारत की उत्पादकता-आधारित कृषि रणनीति

कृषि विकास की भारत की रणनीति क्रमशः बेहतर लागत उपयोग दक्षता, प्रौद्योगिकी का समावेशन तथा सतत कृषि पद्धतियों के प्रोत्साहन के माध्यम से उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में अग्रसर हुई है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन, दलहन में आत्मनिर्भरता हेतु मिशन तथा खाद्य तेल–तिलहन एवं ऑयल पाम पर राष्ट्रीय मिशन जैसी मिशन-आधारित पहलों के साथ-साथ लक्षित विस्तार सेवाएं एवं संस्थागत ऋण समर्थन, इस परिवर्तन को गति दे रहे हैं। यह परिवर्तन उच्च उत्पादकता, आयात निर्भरता में कमी तथा कृषि क्षेत्र में सुदृढ़ लचीलापन सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन (एन एफ एस एन एम): केंद्र प्रायोजित यह योजना पूर्व में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एन एफ एस एम) के नाम से जानी जाती थी, जिसका उद्देश्य देश में चावल, गेहूं, दलहन तथा पोषक-अनाज तथा मोटे अनाज के उत्पादन में वृद्धि करना है।

दलहन में आत्मनिर्भरता हेतु मिशन (2025–31): इस मिशन का उद्देश्य घरेलू उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि कर दलहन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना, आयात निर्भरता को कम करना तथा “आत्मनिर्भर भारत” के लक्ष्य को साकार करना है।

खाद्य तेलों पर राष्ट्रीय मिशन (एन एम ई ओ): ऑयल पाम (एन एम ई ओ –ओ पी) एवं तिलहन (एन एम ई ओ – तिलहन) पहलों सहित इस मिशन के अंतर्गत वर्ष 2030-31 तक खाद्य तेल उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अंतर्गत खेती के क्षेत्र का विस्तार, गुणवत्तापूर्ण बीजों एवं उन्नत प्रौद्योगिकी के माध्यम से उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि तथा किसानों की आय बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जाता है, जिससे आयात निर्भरता में कमी लाई जा सके।

गुणवत्ता पूर्ण बीज एवं मृदा स्वास्थ्य

“हरित क्रांति–कृषोन्नति योजना” के अंतर्गत संचालित उप-मिशन ऑन सीड्स एंड प्लांटिंग मैटेरियल (एस एम एस पी) पहल के अंतर्गत लगभग 6.85 लाख बीज ग्राम स्थापित किए गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप 1,649.26 लाख क्विंटल गुणवत्तापूर्ण बीजों का उत्पादन हुआ है।

  • स्थान की विशिष्टता के अनुसार मिट्टी में पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देने हेतु वर्ष 2025 में नवंबर के मध्य तक संतुलित एवं मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के अंतर्गत लगभग 25.55 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए जा चुके हैं।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पी एम के एस वाई) के तहत सकल सिंचित क्षेत्र का हिस्सा बढ़कर 55.8 प्रतिशत हो गया है, जो सिंचाई कवरेज के विस्तार तथा जल उपयोग दक्षता में सुधार को दर्शाता है।

उप-मिशन ऑन सीड्स एंड प्लांटिंग मैटेरियल (एस एम एस पी): इस पहल के अंतर्गत प्रमाणित एवं गुणवत्तापूर्ण बीजों की आपूर्ति का विस्तार करने, बीज प्रतिस्थापन दर में सुधार लाने तथा किसानों द्वारा संरक्षित बीजों के मानक को उन्नत करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही यह पहल बीज उत्पादन, प्रसंस्करण, परीक्षण एवं भंडारण अवसंरचना के आधुनिकीकरण पर कार्य करती है तथा बीज मूल्य श्रंखला में उन्नत तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती है।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड: प्रत्येक भू-खण्ड के लिए किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किया जाता है, जिसमें 12 मापदंडों—नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर, जिंक, आयरन, कॉपर, मैंगनीज, बोरॉन, pH, विद्युत चालकता तथा जैविक कार्बन—के आधार पर मृदा की स्थिति का विवरण होता है। यह कार्ड प्रत्येक दो वर्ष में जारी किया जाता है और किसानों को उपयुक्त उर्वरकों एवं मृदा उपचार के संबंध में मार्गदर्शन प्रदान करता है, जिससे दीर्घकालिक मृदा स्वास्थ्य बनाए रखा जा सके।

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): इस योजना का उद्देश्य ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा देकर खेत स्तर पर जल उपयोग दक्षता में सुधार करना है। साथ ही, यह छोटे स्तरों पर जल भंडारण एवं संरक्षण उपायों का समर्थन करती है, जिससे सूक्ष्म सिंचाई के लिए जल उपलब्धता को सुदृढ़ किया जा सके।

 

ऋण, यंत्रीकरण एवं प्रौद्योगिकी:

  • वित्त वर्ष 2024-25 में जमीनी स्तर पर कृषि ऋण वितरण 28.67 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो कृषि क्षेत्र में संस्थागत वित्त के संरचनात्मक विस्तार को दर्शाता है।
  • 31 मार्च 2025 तक 7.72 करोड़ संचालित किसान क्रेडिट कार्ड (के सी सी) खाते सक्रिय थे, जिससे किसानों की समय पर एवं सुलभ ऋण तक पहुंच सुदृढ़ हुई है।
  • वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच 27,554 कस्टम हायरिंग सेंटर (सी एच सी) स्थापित किए गए, जिससे लघु एवं सीमांत किसानों को कृषि यंत्रीकरण सेवाओं तक बेहतर पहुंच मिली है। कस्टम हायरिंग सेंटर (सी एच सी) वह इकाई है जिसमें कृषि मशीनरी, उपकरण एवं औजारों का एक सेट होता है, जिसे किसानों को किराये पर उपलब्ध कराया जाता है।
  • पशुधन क्षेत्र की उत्पादकता को बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी उपयोग एवं स्वास्थ्य देखभाल के माध्यम से सुदृढ़ किया गया है, जिसमें वर्ष 2020 से अब तक खुरपका-मुंहपका रोग (एफ एम डी) की रोकथाम के लिए लगभग 125 करोड़ टीकाकरण तथा वर्ष 2024-25 के दौरान 88.32 मिलियन कृत्रिम गर्भाधान शामिल हैं।

 

किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना: किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना खेती के विभिन्न चरणों में किसानों की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करती है। इस योजना का उद्देश्य किसानों को बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से एकल खिड़की के तहत लचीली एवं सरल प्रक्रिया द्वारा पर्याप्त एवं समयबद्ध ऋण सहायता उपलब्ध कराना है। इसके अंतर्गत फसलों की खेती हेतु अल्पकालिक ऋण आवश्यकताएँ, फसल कटाई के बाद के खर्च, कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों के लिए निवेश ऋण, उत्पाद विपणन हेतु ऋण, किसान परिवार की उपभोग संबंधी आवश्यकताएँ, कृषि परिसंपत्तियों के रखरखाव हेतु कार्यशील पूंजी तथा अन्य कृषि संबद्ध गतिविधियों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

सतत कृषि, विस्तार और मिशन मोड पहल:

 

  • प्राकृतिक खेती का विस्तार 17,632 क्लस्टरों तक हुआ, जो 6.39 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करता है, जिसमें 15.79 लाख किसान शामिल हैं।
  • किसान कॉल सेंटरों ने वर्ष 2024-25 में 30.65 लाख किसानों के प्रश्नों का समाधान किया।
  • तिलहन मिशन के तहत वर्ष 2014-15 से 2024-25 के बीच तिलहन क्षेत्र में 18 प्रतिशत से अधिक वृद्धि, उत्पादन में लगभग 55 प्रतिशत तथा उत्पादकता में लगभग 31 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
  • वर्ष 2023-24 में देश में खाद्य तेल की उपलब्धता 121.75 लाख टन तक पहुंच गई।
  • अगस्त 2025 तक एथेनॉल मिश्रण के माध्यम से 1.44 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत हुई।
  • ये हस्तक्षेप प्रौद्योगिकी-आधारित, संसाधन-कुशल तथा उन्नत उत्पादन प्रणालियों की ओर अग्रसर होने को दर्शाते हैं, जो कृषि उत्पादकता और लचीलापन को सुदृढ़ करते हैं।

किसानों के कल्याण, जोखिम प्रबंधन और सामूहिक कार्रवाई के लिए एकीकृत समर्थन प्रणाली

स्थिर कृषि आय सुनिश्चित करना, जोखिम को कम करने के लिए कार्यरत तंत्रों का संस्थागतकरण करना, तथा सहकारी नेटवर्क को सुदृढ़ करना—ये सभी बढ़ती जलवायु एवं बाज़ार अनिश्चितताओं के बीच किसानों की लचीलापन क्षमता बढ़ाने और कृषि विकास को सतत बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

मूल्य एवं आय समर्थन:

  • न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम एस पी) 22 अधिसूचित फसलों के लिए घोषित किया गया है और इसे उत्पादन लागत के कम से कम 1.5 गुना पर निर्धारित किया गया है। साथ ही, खरीफ विपणन मौसम (के एम एस) 2025-26 और रबी विपणन मौसम (आर एम एस) 2026-27 के लिए इसमें बढ़ोतरी भी की गई है।
  • प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पी एम-किसान) के तहत 17 मार्च 2026 तक 22 किस्तों में 4.27 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि वितरित की जा चुकी है, जिससे किसानों को प्रत्यक्ष आय सहायता प्रदान की जा रही है।
  • प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना (पी एम के एम वाई) के अंतर्गत 2 फरवरी 2026 तक 24.95 लाख किसानों का नामांकन किया जा चुका है, जिससे छोटे और सीमांत किसानों को सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिल रहा है।

 

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पी एम-किसान) एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक पात्र किसान परिवार को प्रतिवर्ष 6,000 रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। यह राशि 2,000 रुपये की तीन समान किस्तों में, डीबीटी (प्रत्यक्ष लाभ अंतरण) के माध्यम से किसानों के आधार-लिंक्ड बैंक खातों में हस्तांतरित की जाती है।

प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना (पी एम के एम वाई) का उद्देश्य छोटे और सीमांत किसानों (एस एम एफ) के लिए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यह योजना पेंशन के रूप में सुरक्षा प्रदान करती है, क्योंकि इन किसानों के पास वृद्धावस्था में आजीविका बनाए रखने के लिए कोई बचत नहीं होती है। यह योजना आजीविका के संभावित नुकसान की स्थिति में उन्हें सहारा देने का प्रावधान करती है। इस योजना के अंतर्गत, कुछ अपवर्जन शर्तों के अधीन, पात्र छोटे और सीमांत किसानों को 60 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर न्यूनतम 3,000 रुपये प्रति माह की निश्चित पेंशन प्रदान की जाती है। यह एक स्वैच्छिक एवं अंशदायी पेंशन योजना है, जिसमें प्रवेश आयु 18 से 40 वर्ष निर्धारित की गई है।

 

फसल बीमा संरक्षण:

  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पी एम एफ बी वाई) के अंतर्गत वर्ष 2024-25 के दौरान 4.19 करोड़ किसानों का बीमा किया गया, जिसमें 6.2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया।
  • वर्ष 2016-17 से अब तक 86 करोड़ से अधिक आवेदनों का निपटान किया जा चुका है, तथा 1.90 लाख करोड़ रुपये से अधिक के दावों का भुगतान किया गया है।
  • वर्ष 2022-23 की तुलना में कवरेज में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिससे जलवायु और बाज़ार से संबंधित जोखिमों के विरुद्ध सुरक्षा को और सुदृढ़ किया गया है।

 

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पी एम एफ बी वाई) का उद्देश्य प्राकृतिक आपदाओं (ओलावृष्टि, सूखा, अकाल), कीटों एवं रोगों के कारण होने वाली फसल हानि के विरुद्ध किसानों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना है। यह योजना बीमा कंपनियों और बैंकों के नेटवर्क के माध्यम से सभी भारतीय किसानों को सस्ती किस्त पर फसल बीमा उपलब्ध कराती है।

 

सहकारी संस्थाओं और सामूहिक प्रणालियों को सुदृढ़ बनाना:

 

  • कंप्यूटरीकरण के अंतर्गत 67,930 प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पी ए सी एस) में से 54,150 को एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग (ई आर पी) प्लेटफॉर्म पर जोड़ा जा चुका है, जिनमें से 43,658 संचालन में हैं।
  • मार्च 2025 तक कुल 18,183 नई बहुउद्देश्यीय सहकारी समितियों का पंजीकरण किया गया है।
  • विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण कार्यक्रम 11 पी ए सी एस में संचालित है, तथा स्थानीय भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए वर्ष 2024 में 500 नए गोदामों की घोषणा की गई है।
  • राष्ट्रीय सहकारिता नीति और त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय के माध्यम से संस्थागत सुधारों का उद्देश्य सहकारी क्षेत्र में सुशासन और क्षमता निर्माण को सुदृढ़ करना है।

सामूहिक रूप से, ये पहलें आय स्थिरता को सुदृढ़ करती हैं, संस्थागत जोखिम सुरक्षा को मजबूत बनाती हैं तथा सामूहिक बाज़ार पहुंच का विस्तार करती हैं। इस प्रकार ये योजनाएं भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था की लचीलेपन क्षमता और दीर्घकालिक स्थिरता को और अधिक सशक्त बनाती हैं।

बाजार सुधार, मूल्य शृंखला आधुनिकीकरण, और सार्वजनिक वितरण प्रणाली

खाद्य प्रबंधन प्रणालियों, बाज़ार संबंधी बुनियादी ढांचे और मूल्य संवर्धन तंत्रों के सुदृढ़ीकरण खेत से बाज़ार तक की भारत की रणनीति का एक प्रमुख स्तंभ बनकर उभरे हैं। भंडारण क्षमता, प्रसंस्करण सुविधाओं, डिजिटल बाज़ार प्लेटफॉर्म तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार हेतु किए जा रहे रणनीतिक निवेश से आपूर्ति श्रृंखला की दक्षता बढ़ रही है, कीमतों में स्थिरता आ रही है और किसानों को बेहतर पारिश्रमिक मिल रहा है। सामूहिक रूप से, ये पहलें एक अधिक सुदृढ़, पारदर्शी और एकीकृत खाद्य पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित कर रही हैं, जो उत्पादकों के प्रोत्साहनों और उपभोक्ताओं के कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करता है।

बाज़ार संपर्क और बुनियादी ढांचा:

बाज़ार संपर्क और फसल कटाई-मड़ाई (पोस्ट-हार्वेस्ट) संबंधी बुनियादी ढांचे में किए गए महत्वपूर्ण निवेशों ने कृषि मूल्य श्रृंखलाओं को सुदृढ़ किया है और उत्पादकों के औपचारिक बाज़ारों के साथ एकीकरण में सुधार किया है। 28 फरवरी 2026 तक, 49,796 भंडारण परियोजनाओं को 4,832.70 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की गई, जबकि 25,009 विपणन अवसंरचना परियोजनाओं को कुल 2,193.17 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई। ई-राष्ट्रीय कृषि बाज़ार (e-NAM) प्लेटफॉर्म ने 1.8 करोड़ किसानों, 2.72 लाख व्यापारियों और 4,724 किसान उत्पादक संगठनों (एफ पी ओ) तक अपनी पहुंच का विस्तार किया है। यह प्लेटफॉर्म 23 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों की 1,656 मंडियों में संचालित हो रहा है, जिससे डिजिटल मंच पर भाव का पता लगाने (प्राइस डिस्कवरी) और अंतर-बाज़ार व्यापार को बढ़ावा मिला है।

 

ई-राष्ट्रीय कृषि बाज़ार (ई-एन ए एम) एक अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है, जिसे देशभर की मौजूदा एपीएमसी (कृषि उपज मंडी समिति) मंडियों को एकीकृत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ने के लिए विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य कृषि जिंसों के लिए “एक राष्ट्र, एक बाज़ार” की अवधारणा को साकार करना है। यह प्लेटफॉर्म कृषि विपणन प्रक्रिया को सरल बनाता है, जिसमें एकल-विंडो सेवाएँ जैसे फसलों की आवक (कमोडिटी अराइवल), एआई-आधारित गुणवत्ता परीक्षण, ई-बिडिंग (ऑनलाइन बोली) और किसानों को सीधे ई-भुगतान शामिल हैं। इसका उद्देश्य कृषि व्यापार में पारदर्शिता, दक्षता और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना, किसानों के लिए बाज़ार तक पहुँच का विस्तार करना तथा सूचना विषमता को कम करना है।

10,000 किसान उत्पादक संगठनों (एफ पी ओ) के गठन के लक्ष्य के साथ वर्ष 2020 में शुरू की गई इस योजना के अंतर्गत 28 फरवरी 2026 तक 10,000 एफपीओ का पंजीकरण किया जा चुका है। मत्स्य क्षेत्र में भी सामूहिकीकरण को सुदृढ़ किया गया है, जिसके तहत 2,195 किसान मत्स्य उत्पादक संगठनों (एफ एफ पी ओ) का गठन किया गया है। साथ ही, 4.39 लाख मछुआरों को किसान क्रेडिट कार्ड (के सी सी) के लाभ का विस्तार किया गया है, जिससे संस्थागत ऋण तक उनकी पहुंच बढ़ी है और क्षेत्र की समग्र सुदृढ़ता में सुधार हुआ है।

खाद्य प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन:

खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र भारत के औद्योगिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और यह संगठित विनिर्माण क्षेत्र का कुल 12.91 प्रतिशत रोजगार प्रदान करता है। प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (पी एम के एस वाई) के अंतर्गत 30 नवंबर 2025 तक 1,185 परियोजनाएँ पूर्ण की जा चुकी हैं, जिससे आधुनिक प्रसंस्करण और कोल्ड-चेन अवसंरचना को सुदृढ़ किया गया है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (पी अल ई एस एफ ई) के तहत 169 आवेदनों को स्वीकृति दी गई है, जिसके माध्यम से 9,207 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित हुआ है। साथ ही, 31 दिसंबर 2025 तक 2,162.55 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि वितरित की जा चुकी है।

इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम औपचारिकरण योजना (पी एम एफ एम ई) के तहत 31 दिसंबर 2025 तक 4,04,062 आवेदनों को समर्थन प्रदान किया गया है। इसके माध्यम से 1,72,707 ऋणों को सुगम बनाया गया, जिनमें 14.19 हजार करोड़ रुपये का टर्म लेंडिंग शामिल है। साथ ही, महिला स्वयं सहायता समूहों (एस एच जी) को 1,277.45 करोड़ रुपये की सीड कैपिटल सहायता प्रदान की गई है, जिससे विकेंद्रीकृत मूल्य संवर्धन और समावेशी उद्यम विकास को बढ़ावा मिला है।

प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (पी एम के एस वाई) एक व्यापक पहल है, जिसका उद्देश्य खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के लिए आधुनिक अवसंरचना का विकास करना है। यह खेत स्तर से लेकर खुदरा बाज़ार तक एक एकीकृत और दक्ष आपूर्ति श्रृंखला स्थापित करने का प्रयास करती है। यह योजना सुनिश्चित करती है कि किसानों को किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त हो, फसल कटाई के दौरान और बाद के होने वाले नुकसान को कम करती है, मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देती है और आय वृद्धि में सहायक होती है। इसके अतिरिक्त, यह ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन, प्रसंस्करण क्षमता में वृद्धि तथा प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को सुदृढ़ करती है।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (पी अल आई एस एफ आई) का उद्देश्य खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को आधुनिक बनाना और उसकी प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना है। इसके अंतर्गत उन विशिष्ट खाद्य उत्पाद श्रेणियों के निर्माण को प्रोत्साहन दिया जाता है, जिनमें उत्पादन और मूल्य संवर्धन की उच्च संभावनाएं होती हैं।

प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम औपचारिकरण योजना (पी एम एफ एम ई) खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय द्वारा संचालित एक केंद्र प्रायोजित योजना है। इसका उद्देश्य सूक्ष्म उद्यमों के समक्ष आने वाली चुनौतियों का समाधान करना तथा समूहों और सहकारी संस्थाओं की क्षमता का उपयोग करते हुए इन उद्यमों के उन्नयन और औपचारिकरण को बढ़ावा देना है।

 

खरीद एवं खाद्य सुरक्षा:

केंद्र सरकार खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए खाद्यान्न की खरीद करती है, साथ ही कृषि एवं किसान कल्याण तथा सहकारिता विभाग द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम एस पी) के माध्यम से किसानों को मूल्य समर्थन प्रदान करती है। खाद्यान्न की खरीद का विवरण निम्नलिखित है:

  • आरएमएस 2025-26 (गेहूं): 300.35 एलएमटी की खरीद; 25.13 लाख किसान लाभान्वित।
  • केएमएस 2024-25 (धान): 832.17 एलएमटी की खरीद; 118.59 लाख किसान लाभान्वित।
  • केएमएस 2025-26 (धान) (17.11.2025 तक): 243.48 एलएमटी की खरीद; 21.22 लाख किसान लाभान्वित।
  • मोटे अनाज/श्री अन्न 2024-25: 11.72 एलएमटी की खरीद।
  • केएमएस 2025-26 (मोटे अनाज/श्री अन्न) (16.11.2025 तक): 64,365 मीट्रिक टन की खरीद (प्रक्रिया जारी)।
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अतः सरकार खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बफर मानकों के अनुरूप पर्याप्त खाद्यान्न भंडार बनाए रखती है, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करती है तथा खुले बाज़ार में कीमतों को स्थिर रखने के लिए बाज़ार हस्तक्षेप करती है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत 81.35 करोड़ लाभार्थियों को रियायती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराया गया है, जिसमें ग्रामीण आबादी के 75 प्रतिशत तथा शहरी आबादी के 50 प्रतिशत तक को कवर किया गया है।

भंडारण एवं सार्वजनिक वितरण प्रणाली:

वन नेशन वन राशन कार्ड (ओ एन ओ आर सी) के कार्यान्वयन के अंतर्गत राशन कार्डों की 99.8 प्रतिशत आधार सीडिंग सुनिश्चित की जा चुकी है। इसे सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया गया है, जिससे लाभार्थियों की पोर्टेबिलिटी और समावेशन में वृद्धि हुई है। 5.43 लाख से अधिक उचित मूल्य की दुकानों में से 99 प्रतिशत से अधिक को इलेक्ट्रॉनिक  प्वाइंट-ऑफ-सेल (ई – पी ओ एस) उपकरणों से सुसज्जित किया गया है, जिससे 98 प्रतिशत से अधिक लेनदेन का डिजिटलीकरण संभव हुआ है और वितरण प्रणाली में पारदर्शिता मजबूत हुई है। वित्त वर्ष 2023-24 में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम से 10 लाख से अधिक लाभार्थियों को 267.6 करोड़ रुपये की राशि हस्तांतरित की गई, जिससे लक्षित वितरण की दक्षता और जवाबदेही में सुधार हुआ है। सामूहिक रूप से, ये सुधार बाज़ार एकीकरण को सुदृढ़ करते हैं, वितरण संबंधी अक्षमताओं को कम करते हैं और एक तेजी से डिजिटलीकृत खेत से वितरण प्रणाली में खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाते हैं।

सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) से जुड़ाव:

भारत की कृषि पहलें संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एस डी जी) के साथ महत्वपूर्ण रूप से जुड़ी हुई हैं, जो राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं को वैश्विक स्थिरता प्रतिबद्धताओं के साथ एकीकृत करती हैं। उत्पादकता में वृद्धि, सार्वजनिक खरीद और खाद्य सुरक्षा उपाय सीधे तौर पर एसडीजी 2 (भूख मरी की समाप्ति) में योगदान देते हैं। सतत कृषि को बढ़ावा देने वाली पहलें, जैसे मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, प्राकृतिक खेती और संसाधन-कुशल प्रथाएँ, एसडीजी 12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन) तथा एसडीजी 13 (जलवायु कार्रवाई) का समर्थन करती हैं। कटाई-मड़ाई संबंधी बुनियादी ढांचा, मूल्य संवर्धन, भंडारण और डिजिटल कृषि बाज़ारों में किए गए रणनीतिक निवेश एसडीजी 9 (उद्योग, नवाचार और अवसंरचना) को सुदृढ़ करते हैं। सामूहिक रूप से, ये हस्तक्षेप एक सुदृढ़ और लचीले कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करते हैं, जो वैश्विक विकास प्राथमिकताओं के अनुरूप है।

 

निष्कर्ष

भारत के कृषि में आ रहा यह बदलाव एक संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो सशक्त उत्पादन वृद्धि, वैश्विक बाज़ार में बढ़ती उपस्थिति और खेत से बाज़ार तक की मूल्य श्रृंखला में लक्षित नीतिगत हस्तक्षेपों का समन्वय करता है। रिकॉर्ड खाद्यान्न और बागवानी उत्पादन, बढ़ते निर्यात तथा फसलों में विविधीकरण इस क्षेत्र की स्थिरता और बदलती आर्थिक एवं जलवायु परिस्थितियों के प्रति अनुकूलन क्षमता को प्रदर्शित करते हैं। लागत, आय संरक्षण, बाज़ार बुनियादी ढांचा और डिजिटल खाद्य प्रणालियों के माध्यम से मिशन-आधारित समर्थन ने उत्पादकता को सुदृढ़ किया है, किसानों के कल्याण में सुधार किया है और खाद्य सुरक्षा के परिणामों को बेहतर बनाया है। जैसे-जैसे लचीली उत्पादन प्रणालियाँ विकसित होती जा रही हैं, कृषि की बढ़ती भूमिका संबद्ध क्षेत्रों के साथ गहन एकीकरण के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करती है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका, मूल्य संवर्धन और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को और अधिक सुदृढ़ करती है।

संदर्भ

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भारतीय कृषि में लचीली उत्पादन प्रणालियाँ

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