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उपराष्ट्रपति ने 'एकात्म मानव दर्शन - भारत का विश्वदृष्टिकोण' विषय पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का वर्चुअल रूप से उद्घाटन किया


पंडित दीनदयाल उपाध्याय का 'एकात्म मानव दर्शन' आज भी प्रासंगिक है

प्रौद्योगिकी को मानव कल्याण की सेवा करनी चाहिए और लोक-संग्रह के आदर्श के अनुरूप ज्ञान द्वारा निर्देशित होना चाहिए

प्रविष्टि तिथि: 25 MAR 2026 6:35PM by PIB Delhi

उपराष्ट्रपति श्री सीपी राधाकृष्णन ने आज मैसूरु स्थित कर्नाटक राज्य मुक्त विश्वविद्यालय में 'एकात्म मानव दर्शन-भारत का विश्वदृष्टिकोण' विषय पर अंतर्राष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलन का वर्चुअल रूप से उद्घाटन किया।

सम्मेलन के आयोजन के लिए कर्नाटक राज्य मुक्त विश्वविद्यालय, मैसूरु, प्रज्ञा प्रवाह और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी अनुसंधान फाउंडेशन की सराहना करते हुए कहा कि यह सम्मेलन पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानव दर्शन (समग्र मानवतावाद) के 60 वर्ष पूरे होने का प्रतीक है, जो एक गहन दार्शनिक और सभ्यतागत ढांचा है और समकालीन समय में भी अत्यंत प्रासंगिक बना हुआ है।

इसके मूल सिद्धांतों पर उपराष्ट्रपति ने कहा कि समग्र मानवतावाद व्यक्ति, समाज, प्रकृति और ब्रह्मांड के अंतर्संबंध पर बल देता है। उन्होंने कहा कि बढ़ती फूट, तनाव और विश्वास की कमी से जूझ रहे विश्‍व में यह दर्शन धर्म के माध्यम से सद्भाव का मार्ग प्रशस्त करता है, जो कर्तव्य और सत्य, करुणा और सेवा जैसे मूल्यों द्वारा निर्देशित होता है।

उन्होंने कहा कि सच्चा विकास समग्र होना चाहिए, जिसमें शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का पोषण हो, साथ ही प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखा जाए।

उपराष्ट्रपति ने जनजीवन में कर्तव्य और सेवा के महत्व पर बल दिया और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास' के दृष्टिकोण का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत पर आधारित समावेशी और सतत विकास की परिकल्पना करता है, जो वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत के अनुरूप है।

उपराष्‍ट्रपति ने तीव्र तकनीकी प्रगति के संदर्भ में कहा कि यद्यपि मानवता के पास अपार तकनीकी क्षमताएं हैं, फिर भी नैतिक मार्गदर्शन आवश्यक बना हुआ है। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी को मानव कल्याण की सेवा करनी चाहिए और लोक-संग्रह के आदर्श के अनुरूप ज्ञान द्वारा निर्देशित होना चाहिए।

उपराष्ट्रपति ने समग्र मानवतावाद के व्यावहारिक अनुप्रयोग का आह्वान करते हुए सभी हितधारकों से संतुलित और सामंजस्यपूर्ण विश्व के निर्माण के लिए नीति और कार्य में इसके सिद्धांतों को आगे बढ़ाने का आग्रह किया। उन्होंने सम्मेलन की सफलता के लिए अपनी शुभकामनाएं भी दीं।

यह सम्मेलन 25 से 27 मार्च तक कर्नाटक राज्य मुक्त विश्वविद्यालय (केएसओयू), मैसूरु द्वारा प्रज्ञा प्रवाह और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी अनुसंधान फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।

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