राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग
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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने 'भिक्षावृत्ति पर पुनर्विचार: नीति, व्यवहार और गरिमा के बीच की खाई को पाटना' विषय पर खुली चर्चा की


चर्चा की अध्यक्षता करते हुए एनएचआरसी सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी ने भीख मांगने की प्रथा को समाप्त करने पर जोर दिया, कहा- इसके लिए समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय की संवैधानिक गारंटी पर आधारित अधिकार-आधारित, पुनर्वास-उन्मुख दृष्टिकोण की जरूरत है

एनएचआरसी सदस्य श्रीमती विजया भारती सयानी ने भीख माफियाओं और मानव तस्करी नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आह्वान किया और अल्पकालिक, अस्थायी उपायों के बजाय दीर्घकालिक पुनर्वास पर बल दिया

एनएचआरसी महासचिव श्री भरत लाल ने भीख मांगने वाले लोगों की पहचान करने और उन्हें कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने के प्रयासों को तेज करने पर जोर दिया

बहु-हितधारकों के साथ हुई चर्चाओं में विभिन्न सुझावों के साथ-साथ भीख मांगने की प्रथा को समाप्त करने के लिए अधिकार-आधारित, डेटा-संचालित और समन्वित राष्ट्रीय रणनीति पर बल दिया गया ताकि भीखमंगों को गरिमापूर्ण जीवन और दीर्घकालिक पुनर्वास प्रदान किया जा सके

प्रविष्टि तिथि: 25 FEB 2026 12:19PM by PIB Delhi

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने 'भिक्षावृत्ति पर पुनर्विचार: नीति, व्यवहार और गरिमा के बीच की खाई को पाटना' विषय पर हाइब्रिड मोड में सार्वजनिक चर्चा का आयोजन किया। एनएचआरसी सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी ने इसकी अध्यक्षता की। इस बैठक में एनएचआरसी सदस्य श्रीमती विजया भारती सयानी, महासचिव श्री भरत लाल, महानिदेशक (आई) श्रीमती अनुपमा नीलेकर चंद्र, विधि रजिस्ट्रार श्री जोगिंदर सिंह, संयुक्त सचिव श्री समीर कुमार और श्रीमती सैदिंगपुई छकछुआक, केंद्र और राज्यों के वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ उपस्थित थे।

न्यायमूर्ति सारंगी ने कहा कि भीख मांगना एक सामाजिक बुराई है और देश में यह एक गंभीर सामाजिक समस्या बनी हुई है। उन्होंने कहा कि आज विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत देश में भी भीख मांगने की समस्या का बने रहना एक गहरी संरचनात्मक और सामाजिक चुनौती को दर्शाता है, जिस पर तत्काल और निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने भीख मांगने को केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि एक सामाजिक बीमारी बताया जो समाज के कमजोर वर्गों की गरिमा और संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित करती है।

 

उन्होंने जोर देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत कानून के समक्ष समानता के अधिकार का संवैधानिक वादा सभी नागरिकों के लिए सार्थक रूप से पूरा किया जाना चाहिए, जिसमें भीख मांगने वाले भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षित, संरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है। उन्होंने बताया कि कई राज्यों ने भीख मांगने की समस्या से निपटने के लिए कानून बनाए हैं। हालांकि, केवल कानूनी प्रावधानों का होना ही पर्याप्त नहीं है जब तक कि ऐसे कानूनों के वास्तविक परिणामों का आकलन न किया जाए, विशेष रूप से पुनर्वास, पुनर्एकीकरण और जमीनी स्तर पर मापने योग्य सुधारों के संदर्भ में।

न्यायमूर्ति सारंगी ने कहा कि यह जांच करना आवश्यक है कि भीख मांगने में संलग्न गरीब, अशिक्षित बच्चों, महिलाओं और दिव्यांगजनों के संरक्षण और पुनर्वास से संबंधित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की सलाह (2024) और भारत सरकार की स्माइल-बी योजना (आजीविका और उद्यम के लिए हाशिए पर रहने वाले लोगों को सहायता) के इच्छित उद्देश्यों से सार्थक परिवर्तन हुआ है या नहीं। उन्होंने इन उपायों की प्रगति की समीक्षा करने और कार्यान्वयन में कमियों की पहचान करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भीक्षावृत्ति को कम करने और अंततः समाप्त करने के लिए समानता, गरिमा और सामाजिक सुरक्षा के संवैधानिक मूल्यों पर आधारित अधिकार-आधारित और पुनर्वास-उन्मुख रणनीति की जरूरत है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की सदस्य श्रीमती विजया भारती सयानी ने भीख मांगने के संदर्भ में महिलाओं, बच्चों और श्रम से संबंधित मुद्दों के समाधान के लिए स्पष्ट समयसीमा और जवाबदेही तंत्र के साथ एक समन्वित राष्ट्रीय रणनीति की तत्काल जरूरत पर बल दिया। उन्होंने राष्ट्रीय पोर्टल विकसित करने और व्यापक डेटा सर्वेक्षण करने के महत्व पर बल देते हुए कहा कि विश्वसनीय डेटा के बिना प्रभावी नीति निर्माण संभव नहीं है। उन्होंने भीख माफियाओं और मानव तस्करी नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आह्वान किया। साथ ही, इस बात पर जोर दिया कि अल्पकालिक, अस्थायी उपायों के बजाय दीर्घकालिक पुनर्वास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) महासचिव श्री भरत लाल ने इस बात पर जोर दिया कि भारत अपने सुदृढ़ कानूनी ढांचे और संवैधानिक मूल्यों के लिए जाना जाता है, जो सभी नागरिकों के सम्मान और अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी अधिकारी अकेले इस उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकते और उन्हें गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज संगठनों के साथ मिलकर काम करना होगा। उन्होंने आगे कहा कि यद्यपि सरकार अक्सर क्षेत्रीय कार्यक्रमों के माध्यम से कार्य करती है, फिर भी ऊर्धगामी दृष्टिकोण- सामाजिक समावेश के व्यापक उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए एक समय में एक क्षेत्र की समस्याओं का समाधान करना- अपनाने की जरूरत है।

श्री लाल ने इस मुद्दे को एक अभियान के रूप में उठाने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि समावेशी भारत में किसी को भी पीछे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को लोगों से सरकारी कार्यालयों में आने की अपेक्षा करने के बजाय, आधार कार्ड जारी करने के लिए स्वयं पहल करनी चाहिए। उन्होंने भीख मांगने वाले लोगों की पहचान करने और उन्हें कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने और उन पर ध्यान केंद्रित करने के महत्व को भी रेखांकित किया।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की वरिष्ठ आर्थिक सलाहकार श्रीमती योगिता स्वरूप ने भीख मांगने वाले लोगों से संबंधित 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर प्रकाश डाला और उनके पुनर्वास, शिक्षा एवं कौशल विकास के उद्देश्य से शुरू की गई प्रमुख पहलों, जिनमें स्माइल योजना भी शामिल है, की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने सभा को भीख मांगने से संबंधित मामलों में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन के बारे में जानकारी दी और गरिमा एवं सतत पुनर्एकीकरण पर केंद्रित "भीख मुक्त भारत" के दृष्टिकोण को दोहराया।

 

भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) के उप महानिदेशक श्री शैलेंद्र सिंह ने जरूरतमंद लोगों, विशेषकर बच्चों और दिव्यांगजनों को आधार कार्ड उपलब्ध कराने के लिए यूआईडीएआई की पहलों पर प्रकाश डाला, जिससे वे सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें। उन्होंने नामांकन प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के परामर्श से जारी की गई दो मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) के बारे में प्रतिभागियों को जानकारी दी। उन्होंने आश्रय गृहों में यूआईडीएआई के आयोजित जागरूकता शिविरों के साथ-साथ इन प्रक्रियाओं के व्यापक प्रसार की जरूरत पर बल दिया।

कोशिश ट्रस्ट के संस्थापक मोहम्मद तारिक ने कहा कि भिखारियों से निपटने के मामले में सरकारी अधिकारियों के दृष्टिकोण में बदलाव की जरूरत है। उन्होंने अधिक संवेदनशील और प्रभावी दृष्टिकोण सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के महत्व पर बल दिया।

इससे पहले, बैठक का एजेंडा तय करते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की संयुक्त सचिव श्रीमती सैदिंगपुई छकछुआक ने तीन तकनीकी सत्रों - 'भिखारीपन के दायरे और चुनौतियों का समाधान', 'डेटा प्रलेखन एवं जमीनी हकीकत' और 'पुनर्वास, रोजगार एवं दीर्घकालिक समाधान' विषय का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया।

इस कार्यक्रम में दिल्ली के विशेष पुलिस आयुक्त श्री अजय चौधरी, यूआईडीएआई के उप महानिदेशक श्री शैलेंद्र सिंह, केरल में कोझिकोड जिले के जिला कलेक्टर श्री स्नेहल कुमार सिंह, यूआईडीएआई के निदेशक कर्नल निखिल सिन्हा, एनआईएसडी के उप निदेशक (टी एंड बी) डॉ. आर. गिरि राज, राजस्थान की अतिरिक्त निदेशक (समाज कल्याण विभाग) रीना शर्मा, उत्तर प्रदेश में समाज कल्याण विभाग की उप निदेशक श्रीमती सुनीता यादव, सामाजिक सुरक्षा विभाग के अधीक्षक श्री जाकिर हुसैन, महाराष्ट्र के महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त आयुक्त राहुल मोरे, एनएचआरसी के अधिवक्ता फौजान अल्वी, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के प्रोफेसर विजय राघवन, भिखारी निगम के निदेशक श्री चंद्र मिश्रा, कोशिश ट्रस्ट के संस्थापक मोहम्मद तारिक, पटना के ग्रामीण एवं नगर विकास परिषद के संस्थापक श्री राम किशोर, अत्चयम ट्रस्ट के निदेशक श्री नवीन कुमार, बदलाव के संस्थापक श्री शरद पटेल और एनआईएसडी की सलाहकार सुश्री श्वेता सहगल शामिल थे।

चर्चाओं से निकले कुछ अन्य सुझाव निम्नलिखित हैं:

दंडात्मक प्रावधानों से हटकर अपराध की श्रेणी से बाहर करने और सामाजिक सुरक्षा-आधारित कार्यक्रमों की ओर बदलाव;

मौजूदा कानूनों और योजनाओं का समय-समय पर प्रभाव आकलन करना;

भीख मांगने की समस्या पर एक राष्ट्रीय रणनीति विकसित करना जिसमें निर्धारित समयसीमा, भूमिकाएं, अंतर-मंत्रालयी समन्वय और मापने योग्य परिणाम शामिल हों;

भीख मांगने की समस्या के लिए एक राष्ट्रीय पोर्टल स्थापित करना जिसमें पहचान, सेवा वितरण, ट्रैकिंग और पुनर्वास परिणामों को एकीकृत किया गया हो;

लिंग, आयु, विकलांगता, क्षेत्र के आधार पर विखंडित, वास्तविक समय का डेटा प्राप्त करने के लिए राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण और संवेदनशील क्षेत्रों का मानचित्रण करना;

आश्रय स्थलों और संवेदनशील क्षेत्रों में शिविर आधारित जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से आधार नामांकन में तेजी लाना, बच्चों और दिव्यांगजनों को शामिल करना सुनिश्चित करना;

सुरक्षित डिजिटल एकीकरण के माध्यम से चिन्हित लोगों को कल्याणकारी डेटाबेस से जोड़ना;

समयबद्ध लक्ष्यों के साथ अभियान मोड में रणनीति को लागू करें;

स्पष्ट पुनर्वास उपायों के साथ स्माइल-बी (आजीविका और उद्यम के लिए हाशिए पर रहने वाले लोगों को सहायता) के कार्यान्वयन को मजबूत करना;

भीख मांगने वाले संगठित गिरोहों और तस्करी नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू करना।

दंडात्मक दृष्टिकोण से गरिमा-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर बदलाव को बढ़ावा देने के लिए पुलिस, नगरपालिका अधिकारियों, सामाजिक कल्याण अधिकारियों और आश्रय कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण और क्षमता-निर्माण कार्यक्रमों को संस्थागत रूप देना; और

पहचान, संपर्क, परामर्श और अंतिम व्यक्ति तक सेवाएं पहुंचाने के लिए गैर सरकारी संगठनों के साथ साझेदारी को औपचारिक रूप देना।

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पीके/केसी/एके/पीके


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