विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय

नगरपालिका ठोस अपशिष्ट का सतत प्रसंस्करण : ‘अपशिष्ट से धन’

Posted On: 23 OCT 2020 6:43PM by PIB Delhi

लगातार बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण की तेज गति की वजह से देश को अपशिष्ट प्रबंधन की एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। अपशिष्ट या कचरे का आयतन 62 मिलियन टन के वर्तमान स्तर से बढ़कर 2030 तक लगभग 150 मिलियन टन होने का अनुमान है। वर्तमान गति से उचित वैज्ञानिक उपचार के बिना कचरे के अंधाधुंध निपटान से प्रति वर्ष लैंडफिल क्षेत्र की भारी जरुरतहोगी। यह स्थिति आज के संदर्भ में वैज्ञानिक तरीके से ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के महत्व को दर्शाती है।

 प्लाज्मा अर्क गैसीकरण प्रक्रिया का उपयोग करते हुए ठोस अपशिष्ट उपचार और निपटान पर्यावरण के अनुकूल ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का एक विकल्प है, जिसमें कचरे के आयतन में 95% तक की बड़ी कमी संभव है। प्लाज्मा गैसीकरण प्रक्रिया प्लाज्मा रिएक्टर के अंदर उच्च तापमान वाला प्लाज्मा अर्क (3000 डिग्री सेल्सियस से ऊपर) उत्पन्न करने के लिए बिजली का उपयोग करती है, जो कचरे कोसिनगैस या संश्लेषित गैस में परिवर्तित करती है। इस उत्पादित  सिनगैस को जब उत्प्रेरक कनवर्टर, रेडॉक्स रिएक्टर, चक्रवात विभाजक, स्क्रबर और कंडेन्सर से लैस गैस शोधन प्रणाली की एक श्रृंखला से गुजारा जाता है, तो वह बिजली के उत्पादन के लिए गैस इंजन में इस्तेमाल होने के लिए तैयार होता है। इस क्रम में निकले अवशिष्ट राख को निर्माण में उपयोग के उद्देश्य से पुनर्नवीनीकृत ईंटें तैयार करने के लिए सीमेंट के साथ मिश्रित किया जा सकता है। इस प्रकार, विज्ञान 'अपशिष्ट से धन' के उपार्जन में मदद करता है।

हालांकि, यह तकनीक आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है क्योंकि कचरे के उपचार के लिए इस तकनीक का उपयोग करने में ऊर्जा की बहुत अधिक जरुरत होती है (~ 1.5 किलोवाट घंटा / किलोग्राम संसाधित कचरा छोटे पौधों के लिए (<100 एमटी क्षमता) और ~ 1.2 किलोवाट घंटा / किलोग्राम संसाधित कचरा 100 मीट्रिक टन से अधिक क्षमता वाले पौधों के लिए)।इसके अलावा, इलेक्ट्रोड खपत की उच्च दर (~ 500 मिलीग्राम / किग्रा संसाधित कचरा) आवर्ती खर्चों में वृद्धि करते हुए आगे की प्रक्रिया को महंगा बनाती है और इसे आर्थिक रूप से तर्कसंगत विकल्प नहीं बनने देती है।

विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में निकलने वाले नगरपालिका ठोस अपशिष्ट में ज्यादातर कार्बनिक कचरे का एक बड़ा अंश (>50%) होता है। जैविक कचरे के अवैज्ञानिक निपटान से ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) का उत्सर्जन और अन्य वायु प्रदूषक पैदा होते हैं। एमएसडब्ल्यू का अप्रभावी प्रसंस्करण भी कई बीमारियों का मूल कारण है क्योंकि कचरे के ढेर वाले लैंडफिलपैथोजेन, बैक्टीरिया और वायरस के लिए संदूषण हब में बदल जाते हैं। आम तौर पर सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला "कम्पोस्टिंग" प्रसंस्करण भी उद्यमियों के लिए प्रभावशाली आर्थिक रिटर्न नहीं देता है क्योंकि इसके लिए अधिक भूमि और जगह, अधिक श्रम, प्रभावी कीटाणुशोधन के लिए पास्चुरीकरण और भारी धातुओं की उपस्थिति के कारण उपयोग को प्रतिबंधित करने की जरुरत पड़ती है। बारिश के मौसम में अत्यधिक नमी होने की वजह से कम्पोस्ट या खाद का प्रबंधन मुश्किल हो जाता है।

 

नवीन तकनीक

 सीएसआईआर सीएमईआरआई द्वारा विकसित नगरपालिका ठोस अपशिष्ट प्रसंस्करण सुविधा ने न केवल ठोस कचरे में विकेंद्रीकृत कमी करने में मदद की है, बल्कि सूखे पत्तों, सूखी घास आदि जैसे बहुतायत से उपलब्ध निरर्थक सामानों से मूल्य वर्धित उत्पाद बनाने में भी मदद की है।केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा निर्धारित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम (एसडब्ल्यूएम) 2016 के बाद वैज्ञानिक तरीके से ठोस कचरे के निपटान के लिए एमएसडब्ल्यू प्रसंस्करण की सुविधा विकसित की गई है। सीएसआईआर सीएमईआरआई का प्राथमिक ध्यान कचरों को अलग करने की उन्नत तकनीक के जरिए कचरे को अलग करने की जिम्मेदारियों के बोझ से आम लोगों को बचाना है। यंत्रीकृत पृथक्करण प्रणाली ठोस कचरे को धात्विक कचरे (मेटल बॉडी, मेटल कंटेनर आदि), जैव-अपघटनीय या बायोडिग्रेडेबल कचरे (खाद्य पदार्थ, सब्जियां, फल, घास आदि), गैर –जैव अपघटनीय या नॉन-बायोडिग्रेडेबल (प्लास्टिक, पैकेजिंग मटीरियल, पाउच, बोतलें आदि) तथा अक्रिय (कांच, पत्थर आदि) कचरे से अलग करती है।कचरे का जैव-अपघटनीय घटक जैव-गैसीकरण के रूप में जाना जाने वाले अवायवीय वातावरण में विघटित हो जाता है। इस प्रक्रिया में जैविक पदार्थों के रूपांतरण के माध्यम से बायोगैस को मुक्त किया जाता है। इस बायोगैस का उपयोग खाना पकाने में ईंधन के रूप में किया जा सकता है। इस गैस का उपयोग बिजली के उत्पादन के लिए गैस इंजन में भी किया जा सकता है। बायोगैस संयंत्र के अवशिष्ट घोल को एक प्राकृतिक प्रक्रिया में केंचुओं के सहारे खाद में परिवर्तित किया जाता है जिसे वर्मी-कम्पोस्टिंग के रूप में जाना जाता है। जैविक खेती में वर्मी-कम्पोस्ट का उपयोग किया जाता है।

बायोमास अपशिष्ट निपटान

सूखी पत्तियां, मृत शाखाएं, सूखी घास आदि जैसे बायोमास अपशिष्ट के निपटान क्रम में पहले कचरे को उपयुक्त आकार के टुकड़ों में बांटा जाता है। इसके बाद, इसे बायोगैस डाइजेस्टर के घोल में मिलाया जाता है। यह मिश्रण कोयले की ईंट या ब्रिकेट के लिए फीडस्टॉक है, जिसे खाना पकाने के ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है। इन ईंटों या ब्रिकेटों का उपयोग गैसीफायर में सिनगैस के उत्पादन के लिए भी किया जा रहा है, जिसका उपयोग बिजली उत्पादन के लिए गैस इंजन में किया जा सकता है। ईट के जलने से उत्पन्न राख को सीमेंट और पानी के साथउचित अनुपात में मिलाकर ईंटों का उत्पादन किया जाता है, जिसका उपयोग निर्माण कार्य में किया जाता है।

बहुलक अपशिष्ट निपटान

प्लास्टिक, सैनिटरी कचरे आदि से बने बहुलक कचरे को दो मुख्य प्रक्रियाओं यानी पायरोलिसिस और प्लाज्मा गैसीकरण के माध्यम से निपटाया जा रहा है। पायरोलिसिस प्रक्रिया के तहत उपयुक्त उत्प्रेरक की उपस्थिति में अवायवीय वातावरण में बहुलक कचरे को 400 - 600 ° C के तापमान तक गर्म किया जाता है। गर्म करने के परिणामस्वरूप बहुलक कचरे से वाष्पशील पदार्थ निकलता है जो संघनन होने पर पायरोलिसिस तेल देता है। शुद्धिकरण के बाद बिना संघननित सिनगैस और कच्चे पाइरोलिसिस तेल का पुन: उपयोग गर्म करने की प्रक्रिया के लिए किया जाता है और यह आत्मस्थिरता की स्थिति हासिल करने में मदद करता है। ठोस अवशिष्ट को, जिसे चार के रूप में जाना जाता है,ब्रिकेट के उत्पादन के लिए बायोगैस घोल के साथ मिश्रित किया जाता है।

सेनेटरी अपशिष्ट निपटान

सैनिटरी आइटम, जिनमें मास्क, सैनिटरी नैपकिन, डायपर आदि शामिल हैं, का निपटान उच्च तापमान वाले प्लाज्मा का उपयोग कर किया जाता है। यूवी-सी लाइट्स और हॉट-एयर कन्वेंशन विधियों के माध्यम से कोविड की श्रृंखला को तोड़ने में मदद करने वाली एमएसडब्ल्यू सुविधा विशेष कीटाणु शोधन क्षमताओं से लैस है। सीएसआईआर-सीएमईआरआई द्वारा विकसित विकेंद्रीकृत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन संयंत्र में सभी कचरे, जिसमें कचरे में मौजूद कोविड एवं अन्य वायरस भी शामिल हैं, को वैज्ञानिक रूप से प्रबंधित करने की क्षमता है। एकीकृत एमएसडब्ल्यू पायलट संयंत्र छत पर सौर पैनलों की स्थापना के माध्यम से ऊर्जा की आवश्यकता के मामले में भी आत्मनिर्भर है, जोकि एक लघु -ग्रिड पर अधिशेष ऊर्जा आपूर्ति को भी अंजाम दे सकता है।

विकेन्द्रीकृत एमएसडब्ल्यू (0.5 से 5.0 टन / दिन) की तकनीक और इसका टिकाऊ (आयातित डीजल के बोझ को कम करने और कार्बन डाईऑक्साइड प्रदूषण पैदा करने के लिए नगण्य परिवहन) प्रसंस्करण 100 गीगावाट सौर ऊर्जा पैदा करने और "शून्य-अपशिष्ट और शून्य-लैंडफिल पारिस्थितिकी" के साथ एक शहर बनाने के सपने को साकार करने के अवसरों को संभव बनाता है और यह प्रक्रिया- संलग्नता और विनिर्माण, दोनों, के माध्यम से "रोजगार सृजन का स्रोत" बन सकता है, जोकि देशभर में मध्यम एवं लघु उद्यमों, स्टार्ट-अप और कई छोटे उद्यमियों की सहायता करने में मदद कर सकता है।

 

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