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दिल्ली में विजय दशमी समारोह में प्रधानमंत्री के संबोधन का मूल पाठ

प्रविष्टि तिथि: 20 OCT 2026 7:53PM by PIB Delhi

सियावर रामचंद्र की जय !

सियावर रामचंद्र की जय !

सियावर रामचंद्र की जय !

विजयदशमी के इस पावन पर्व पर मैं प्रभु श्रीराम, माँ जानकी और बजरंग बली के चरणों में प्रणाम करता हूँ। इस पवित्र वातावरण में, मैं सभी देशवासियों को विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।

साथियों,

आज भारत का कोना-कोना राममय है। गाँव-गाँव, शहर-शहर रामलीला के रस में देश डूबा हुआ है। देशभर में रामलीलाओं का मंचन, प्रभु श्रीराम के आदर्शों को जीवंत रखने की परंपरा, अत्याचार और आतंक के अंत का उद्घोष और असत्य पर सत्य सनातन की विजय का विश्वास, हमारे लिए ये केवल त्योहार नहीं है, ये भारत की प्राण ऊर्जा है। इसलिए, आज जब देश का जन-जन अधर्म पर धर्म की विजय का उद्घोष कर रहा है, तो आइये, फिर एक बार मेरे साथ बोलिए -

सियावर रामचंद्र की जय!

सियावर रामचंद्र की जय!

सियावर रामचंद्र की जय!

साथियों,

इस देश ने, इसकी संस्कृति ने और इसके पूर्वजों ने हजारों वर्षों से प्रभु श्रीराम की उपासना की है। ये आस्था केवल इसलिए नहीं है कि, श्रीराम ने राक्षसराज रावण का अंत किया था। ये आस्था इसलिए भी है, क्योंकि प्रभु राम ने हमें ऐसे आदर्श दिये, जो मानवता के इतिहास में अतुलनीय है।

साथियों,

प्रभु श्रीराम ने अपने जीवन में कितनी ही कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन उन्होंने सच्चाई और नीति का रास्ता कभी नहीं छोड़ा। उनका चरित्र ही ऐसा है, ‘प्रसन्नतां या न गत अभिषेकतः तथा,न मम्ले वनवास दुःखतः॥’ अर्थात्, प्रभु राम के चेहरे पर न राजपद पाने की प्रसन्नता हुई, और न वन जाने से उन्हें कोई दुख हुआ। उन्होंने हर संकट को सहकर भी धर्म का पालन किया और सत्य की स्थापना की। जब हमारे राम जंगल गए, तो वहाँ उन्होंने निषादराज को गले लगाया, माता शबरी को सम्मान दिया। उन्होंने दया, करुणा, प्रेम और सौहार्द के मानदंड स्थापित किए। और जब वापस आकर प्रभु राम अयोध्या के राजा बने, तो ऐसे रामराज्य की स्थापना की, जो आज भी सुशासन का, गवर्नेंस का मानदंड माना जाता है। रामराज्य अर्थात् ऐसा शासन, जहां किसी के प्रति भेदभाव नहीं हो, जहां सबको न्याय मिले, जहां सबको समान अवसर मिलें, जहाँ सत्ता का उद्देश्य शासन करना नहीं, जन-कल्याण का हो। और इसलिए ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा था - ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥’ यही मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम का आदर्श है। इसलिए हमें हमेशा जनता को जनार्दन मानकर, नागरिक देवो भव के मंत्र पर आगे बढ़ना है। हमें गरीब, वंचित की सेवा को सर्वोपरि रखना है।

साथियों,

प्रभु राम के जीवन से हमें बहुत बड़ी सीख मिलती है। संकट कितना भी बड़ा क्यों ना हो, चुनौती कितनी भी कठिन क्यों ना हो, हमें दूसरों के भरोसे नहीं बैठना है, हमें अपना सामर्थ्य पहचानना है, हमें अपने संसाधनों पर विश्वास करना है, अपने संकल्प को शक्ति बनाना है, और अपने परिश्रम से समाधान निकालना है। प्रभु राम ने हमें सिखाया कि रास्ते की कठिनाइयाँ, हमारी यात्रा को रोक नहीं सकतीं। समुद्र सामने था, लंका दूर थी, लेकिन संकल्प अडिग था। इसलिए राम जी ने जनता की सामूहिक शक्ति को जगाया, जनभागीदारी को अपना संबल बनाया, उपलब्ध संसाधनों को जोड़ा। और असंभव लगने वाले लक्ष्य को संभव बनाया। यही सफलता का मूल मंत्र है। अपनी शक्ति पर विश्वास, अपने सामर्थ्य पर भरोसा, अपने संसाधनों का सही उपयोग और अपने लक्ष्य के प्रति अटूट संकल्प। आज हमें भी इसी मंत्र को लेकर आगे बढ़ना है। हमारे सामने विकसित भारत का लक्ष्य है, हमारे सामने आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य है। हमें जनशक्ति से जनकल्याण करते हुए, जनता की हर आकांक्षाओं को पूरा करना है और इसके लिए भी हमें भगवान राम से ही प्रेरणा भी लेनी है।

साथियों,

एक राष्ट्र तभी प्रगति करता है, जब उसके पास आत्मसम्मान का भाव होता है। और इस आत्मसम्मान में बहुत बड़ी भूमिका उसकी विरासत की होती है। इसलिए, आज देश अपनी विरासत और पहचान को भी संरक्षित करने में जुटा है। सदियों तक हमारी धरोहरों को लूटकर विदेश ले जाया गया, लेकिन आज हम अपनी उन धरोहरों को वापिस ला रहे हैं। बीते 12 वर्षों में साढ़े छह सौ से ज्यादा प्राचीन मूर्तियों को भारत वापिस लाया गया है। इसी तरह, भारत अपने सांस्कृतिक केन्द्रों को दुनिया में नई पहचान दिलवा रहा है। बीते वर्षों में, हमारे कितने ही स्थानों को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स की लिस्ट में शामिल किया गया है। पिछले साल दीपावली को भी यूनेस्को ने मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया है। ये करोड़ों भारतीयों की सामूहिक इच्छाशक्ति का ही परिणाम है। हमें इसी निष्ठा से आगे भी काम करना है।

साथियों,

विजयदशमी, विजय का पर्व है, जीत का पर्व है। ये पर्व हमें साहस देता है कि शत्रु कितना भी बड़ा क्यों न हो, लेकिन जब हम सच्चाई और मानवता के साथ होते हैं, तो अंत में जीत हमारी होती है। विजयदशमी की यही भावना हमेशा से भारत की विचारधारा रही है। हमारे ऋषियों ने हमें प्रेरणा दी है - ‘समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।’ अर्थात्, हमारे विचार समान हों, हमारी समितियां,अर्थात् राष्ट्र की सभी संस्थाएं, सभी राजनीतिक दल, राष्ट्रहित के लिए एक साथ खड़े हों। हमें इसी भावना पर चलना होगा, हमें देश के दुश्मनों के साथ मिलकर लड़ना होगा। देश के मान-सम्मान को चोट पहुंचाने वाली ताक़तें, समाज को बांटने वाले लोग, हमारी संस्कृति से नफरत करने वाले की मानसिकता, ये देश के दुश्मन हैं। आज विजयदशमी के शुभ पर्व पर हमें अपना संकल्प फिर दोहराना है, हमें मॉं भारती के शत्रुओं को पहचानना होगा, उन्हें परास्त करना होगा। और राष्ट्र प्रथम का संकल्प लेते हुए, सबको एक साथ आना होगा। मुझे विश्वास है, अयोध्या मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान ‘राम से राष्ट्र’ और ‘देव से देश’ की जो संकल्पना हमने की है, उसे हम जरूर पूरा करेंगे। मैं एक बार फिर सभी देशवासियों को दशहरे की बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।

जय सिया राम !

जय सिया राम !

जय सिया राम !

भारत माता की जय।

भारत माता की जय।

बहुत-बहुत धन्यवाद।

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MJPS/SS/SS/RK


(रिलीज़ आईडी: 2325530) आगंतुक पटल : 188
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