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कचरे से ऊर्जा
स्वच्छ भारत मिशन में अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पादन की कहानी
प्रविष्टि तिथि:
27 SEP 2026 11:57AM by PIB Delhi
पूरे भारत में जैविक कचरे को ईंधन, बिजली और मूल्यवान खाद के रूप में नया जीवन मिल रहा है। अक्टूबर 2014 में शुरू किए गए स्वच्छ भारत मिशन के तहत, नगरपालिका ठोस अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन हमेशा से एक मुख्य उद्देश्य रहा है। जैसे-जैसे इस मिशन का विस्तार हुआ, जैविक कचरे को स्वच्छ ऊर्जा उत्पन्न करने वाले एक मूल्यवान संसाधन के रूप में पहचाना गया। जैविक कचरे के एनेरोबिक अपघटन से बनने वाली बायोगैस आज उपलब्ध सबसे व्यावहारिक, किफायती और पर्यावरण-अनुकूल रसोई ईंधनों में से एक है। इसकी सह-उत्पाद स्लरी (अवशिष्ट घोल) नाइट्रोजन से भरपूर होती है और एक प्रभावी जैविक उर्वरक का काम करती है। यह रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाती है, लागत कम करती है और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद करती है। इस प्रकार, यह एक ही पहल से दोहरा लाभ प्रदान करती है।
स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 (SBM-U 2.0) के तहत कचरे से ऊर्जा की पहल कचरे की उपलब्धता और स्थानीय समुदाय की ज़रूरतों के आधार पर देशभर में अलग-अलग रूप ले रही है। हैदराबाद में एक सब्ज़ी मंडी सड़ी-गली सब्ज़ियों से अपनी स्ट्रीटलाइट्स जलाती है। प्रयागराज में एक मल्टी-फीडस्टॉक बायो-सीएनजी संयंत्र विभिन्न प्रकार के जैविक कचरे को स्वच्छ ईंधन और खाद में बदलता है। गांधीनगर का एक शैक्षणिक संस्थान एलपीजी सिलेंडरों पर निर्भर रहे बिना प्रतिदिन 500 से अधिक लोगों का भोजन पकाता है। ग्वालियर की एक गौशाला गोबर को कंप्रेस्ड बायोगैस में बदल रही है। कचरे का कच्चा माल (फीडस्टॉक) अलग है, स्तर अलग हैं, लेकिन अंतर्निहित बदलाव एक ही है। ये पहल दिखाती हैं कि कैसे शहर और संस्थान की सततता दिशा में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। अपशिष्ट प्रबंधन में नवोन्मेषी और चक्रीय दृष्टिकोण अपनाकर वे पर्यावरणीय प्रभाव को कम कर रहे हैं और कचरे को एक मूल्यवान संसाधन में बदल रहे हैं।
गांधीनगर: एक शैक्षणिक परिसर जिसने खत्म की एलपीजी पर निर्भरता
गुजरात के गांधीनगर स्थित अदालज के पास 'श्रीमती मानकबा विनय विहार एजुकेशनल कॉम्प्लेक्स' की रसोई में हर दिन 500 से अधिक लोगों का खाना बनता है। परिसर में रहने वाले कर्मचारियों के 15 परिवारों के साथ-साथ हॉस्टल के लगभग 250 छात्रों को रोज़ाना दो समय का भोजन मिलता है। इस रसोई ने एलपीजी पर अपनी निर्भरता पूरी तरह ख़त्म कर दी है और बायोगैस आधारित कुकिंग प्रणाली अपना ली है।
इस परिसर का संचालन करने वाला 'वसुमती चैरिटेबल ट्रस्ट' प्रतिदिन 90 घन मीटर की कुल क्षमता वाले दो बायोगैस संयंत्र चलाता है। इसके फीडस्टॉक में ट्रस्ट की गौशाला में रखी गई 222 गायों का गोबर शामिल है। इसमें रसोई के कचरे और पास के खेतों से निकलने वाले कृषि अवशेषों को भी मिलाया जाता है। यह गैस परिसर की रसोई ईंधन की पूरी ज़रूरत को पूरा करती है; इसके अभाव में हर महीने 30 एलपीजी सिलेंडरों की आवश्यकता होती।
यह संस्थान दर्शाता है कि नवाचार और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन के माध्यम से ऊर्जा आत्मनिर्भरता और सतत विकास को बढ़ावा दिया जा सकता है। गुजरात सरकार की संस्थागत बायोगैस संयंत्र योजना और गुजरात ऊर्जा विकास एजेंसी (GEDA) जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं ने इस बदलाव को साकार करने के लिए नीतिगत और वित्तीय सहायता प्रदान की।

चित्र 1: श्रीमती मानकबा विनय विहार एजुकेशनल कॉम्प्लेक्स, अदालज, गुजरात में स्थापित बायोगैस संयंत्र
गुजरात वैकल्पिक ऊर्जा और सतत विकास को निरंतर आगे बढ़ा रहा है, जिससे प्रदूषण में कमी आ रही है और ऊर्जा आत्मनिर्भरता हासिल हो रही है। यह गौशालाओं और शैक्षणिक संस्थानों से निकलने वाले जैविक कचरे के वैज्ञानिक निपटान को भी संभव बना रहा है।
प्रयागराज: एक संयत्र, चार फीडस्टॉक
प्रयागराज की बायो-सीएनजी सुविधा विभिन्न प्रकार के जैविक कचरे को प्रसंस्कृत करने के लिए तैयार किया गया एक वेस्ट-टू-एनर्जी संयंत्र है।

चित्र 2: प्रयागराज, उत्तर प्रदेश स्थित बायो-सीएनजी संयंत्र
इस संयंत्र के शुरू होने के साथ ही उत्तर प्रदेश ने हरित ऊर्जा और अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। यह परियोजना कचरे को बहुमूल्य संसाधन में बदलने के मिशन को आगे बढ़ाते हुए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक दूरदर्शी कदम का प्रतिनिधित्व करती है।
यह संयंत्र प्रतिदिन 343 टन जैविक कचरे को प्रोसेस कर लगभग 21 टन बायो-सीएनजी का उत्पादन करने में सक्षम है। इसका मल्टी-फीडस्टॉक मॉडल गीले कचरे, धान की पराली, मवेशियों के गोबर और पोल्ट्री अपशिष्ट का उपयोग करता है। इससे कृषि अवशेषों का उत्पादक उपयोग सुनिश्चित होता है और साथ ही पराली जलाने की समस्या से निपटने में भी मदद मिलती है।
यह सुविधा सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत संचालित होती है और होटलों, रेस्तराओं और आवासीय परिसरों से बड़ी मात्रा में जैविक कचरा लेती है। शुरुआत में यहाँ गीले कचरे की दैनिक आपूर्ति केवल 7–8 टन थी, जो अब बढ़कर लगभग 125 टन हो गई है, जिससे शहर में कचरे के पुनर्चक्रण को मज़बूती मिली है। उत्पादित बायो-सीएनजी को कंप्रेस्ड बायो-गैस (सीबीजी) - सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (सीजीडी) सिंक्रोनाइज़ेशन योजना के तहत बेचा जाता है, जो ईंधन कैस्केड मार्ग से उपभोक्ताओं तक पहुँचती है और वर्तमान में शहर के परिवहन में सहयोग दे रही है।
इस प्रक्रिया से प्रतिदिन 28 टन उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद भी तैयार होती है, जिसे स्थानीय किसानों को उपलब्ध कराया जाता है, जिससे पुनर्योजी खेती (रीजनरेटिव फार्मिंग) को बढ़ावा मिलता है। भविष्य में इस परियोजना के ज़रिये पाइप्ड गैस के माध्यम से लगभग 45,000 घरों तक स्वच्छ ऊर्जा पहुँचाने और सालाना लगभग 57,000 टन कार्बन उत्सर्जन घटाने की उम्मीद है।
ग्वालियर: एक गौशाला जो बन गई पावर प्लांट
ग्वालियर की सबसे बड़ी गौशाला, लालटिपारा स्थित 'आदर्श गौशाला' में 10,000 से अधिक गोवंश रहते हैं। अक्टूबर 2024 में, 100 टन प्रतिदिन (टीपीडी) क्षमता वाले कंप्रेस्ड बायो-गैस (सीबीजी) संयंत्र के उद्घाटन के साथ गौशाला ने दैनिक गोबर को एक नया उद्देश्य दिया। इस सुविधा ने आदर्श गौशाला को एक अत्याधुनिक सीबीजी संयंत्र आधारित भारत की पहली आधुनिक, आत्मनिर्भर गौशाला बना दिया।

चित्र 3: मवेशियों के गोबर पर आधारित कंप्रेस्ड बायो-गैस (सीबीजी) संयंत्र, लालटिपारा, ग्वालियर, मध्य प्रदेश
इस संयंत्र की रूपरेखा केवल मवेशियों के गोबर तक ही सीमित नहीं है। यह मध्य प्रदेश का पहला ऐसा सीबीजी संयंत्र है, जिसे बाज़ारों और घरों से एकत्र होने वाले सब्ज़ी और फलों के कचरे को भी प्रोसेस करने के लिए तैयार किया गया है। 5 एकड़ में फैली 31 करोड़ रुपये की यह परियोजना इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के सहयोग से विकसित की गई है। यह संयंत्र प्रतिदिन 100 टन गोबर को दो टन कंप्रेस्ड बायोगैस में बदलता है। साथ ही रोज़ाना 10-15 टन सूखी जैविक खाद भी तैयार करता है, जो आसपास के ज़िलों के किसानों के लिए एक किफायती विकल्प प्रदान कर जैविक खेती को बढ़ावा देती है।
इसके लाभ गौशाला की सीमाओं से परे भी हैं। सीबीजी जीवाश्म ईंधनों का एक स्वच्छ, पर्यावरण-अनुकूल विकल्प प्रदान करती है, जबकि गोबर को ऊर्जा में बदलने से कार्बन उत्सर्जन कम होता है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को घटाने में मदद मिलती है। इस परियोजना ने स्थानीय स्तर पर रोज़गार के अवसर भी पैदा किए हैं, जिससे हरित ऊर्जा और सतत प्रथाओं में कौशल को बढ़ावा मिला है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा मिला है।
यह सीबीजी संयंत्र सिर्फ एक औद्योगिक इकाई नहीं है। यह समाज और सरकार के बीच सहयोग का प्रतीक है और यह दर्शाता है कि कचरे को किस प्रकार उपयोगी संसाधनों में बदला जा सकता है।
बोवेनपल्ली: एक सब्जी मंडी से रोशन होता बाजार
इन चार कहानियों में, बोवेनपल्ली की सब्ज़ी मंडी की कहानी अपशिष्ट प्रबंधन की सबसे अनूठी प्रणालियों में से एक को सामने लाती है। हैदराबाद की बोवेनपल्ली सब्ज़ी मंडी में हर रोज़ लगभग 10 टन सब्ज़ी और फलों का कचरा एकत्र होता है। पहले यह कचरा कूड़े के ढेरों तक जाता था। जब से परिसर में ही एक बायोगैस संयंत्र स्थापित किया गया है, बाज़ार से एकत्र होने वाले लगभग पूरे कचरे का सदुपयोग होने लगा है। यह प्रतिदिन लगभग 400-500 यूनिट बिजली और 30 किलोग्राम जैव-ईंधन बनाता है। उत्पन्न बिजली का उपयोग मंडी की स्ट्रीटलाइट्स, दुकानों, प्रशासनिक भवन और जलापूर्ति नेटवर्क को चलाने के लिए किया जाता है। जैव-ईंधन की आपूर्ति मंडी की व्यावसायिक रसोई में की जाती है, जिससे बाज़ार को स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त रखने में मदद मिलती है।

चित्र 4: बोवेनपल्ली सब्ज़ी मंडी और बोवेनपल्ली का बायोगैस संयंत्र, हैदराबाद
बायोगैस संयंत्र के भीतर सब्ज़ियों को काटा, छाँटा और पीसकर स्लरी में बदला जाता है। फिर यह स्लरी अवायवीय डाइजेस्टरों में भेजी जाती है, और बनने वाली गैस को आगे के उपयोग तक गुब्बारों में जमा किया जाता है। बची हुई स्लरी से तरल जैविक खाद बनती है, जिसे किसान उर्वरक के रूप में उपयोग करते हैं। बायोगैस को एक अलग टैंक में भी इकट्ठा किया जाता है और खाना पकाने के लिए पाइपलाइन प्रणाली के ज़रिये भेजा जाता है। इस बायोफ्यूल की आपूर्ति 100% बायोगैस जनरेटर को की जाती है, जिससे कोल्ड स्टोरेज रूम, पानी के पंप, दुकानें और स्ट्रीटलाइट्स चलती हैं।
इस संयंत्र ने मंडी के मासिक बिजली बिल को पहले के औसतन 3 लाख रुपये से घटाकर लगभग आधा कर दिया है। इसके शानदार परिणामों को देखते हुए अन्य बाज़ार प्रांगणों में ऐसे पाँच और संयंत्रों को मंज़ूरी दी गई है। इनमें गुडीमलकापुर, गड्डियान्नारम, एरागाड्डा, अलवाल और सरूरनगर शामिल हैं, जिनकी क्षमताएँ प्रत्येक प्रांगण में उत्पन्न होने वाले कचरे के अनुरूप तय की गई हैं।

चित्र 5: बोवेनपल्ली बायोगैस संयंत्र
इस संयंत्र ने मंडी में महिलाओं के लिए नियमित रोज़गार भी पैदा किया है। वे कचरे की छँटाई और पृथक्करण करती हैं, मशीनें चलाती हैं और प्रशासनिक कार्य सँभालती हैं। यह संयंत्र महिला श्रमिकों को नियमित आमदनी और कौशल विकास का अवसर देता है।

चित्र 6: रुक्मिणी देवम्मा, बोवेनपल्ली सब्ज़ी मंडी में एक महिला कर्मचारी
बायोगैस संयंत्र पर रुक्मिणी देवम्मा के विचार: "जब से यह बायोगैस संयंत्र स्थापित हुआ है, हमें अपने काम के लिए अच्छा पारिश्रमिक मिल रहा है। हमें मास्क, गमबूट और दस्ताने जैसे सभी ज़रूरी सुरक्षा उपकरण भी दिए गए हैं। काम के सुरक्षित माहौल को देखते हुए, हम अन्य लोगों को भी हमारे साथ जुड़ने और काम करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।"
इन सभी कहानियों को आपस में क्या जोड़ता है?
इन चारों कहानियों में भले ही कचरे का प्रकार बदलता है, लेकिन सिद्धांत वही रहता है: कचरा अब चक्र का अंत नहीं है। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि जब कचरा प्रबंधन को संसाधन रिकवरी के दृष्टिकोण से तैयार किया जाता है, तो क्या परिणाम निकलते हैं। स्वच्छ भारत मिशन के तहत यह दृष्टिकोण शहरी कचरा अवसंरचना की भूमिका को केवल एकत्र करने और फेंकने से आगे बढ़ाकर प्रसंस्करण, ऊर्जा उत्पादन और सह-उत्पादों के उपयोगी इस्तेमाल की ओर ले जा रहा है। गोबर, रसोई का कचरा, फ़सल अवशेष और सड़ी-गली सब्ज़ियाँ अब ईंधन, बिजली और खाद में तब्दील हो रहे हैं। भारत के शहरों, परिसरों, गौशालाओं और बाज़ारों में इस दृष्टिकोण का विस्तार इसे अलग-थलग पहल से आगे ले जाता है। स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन से लेकर जैविक प्रथाओं को बढ़ावा देने तक, ये प्रयास शहरी भारत के लिए एक ऐसा व्यावहारिक मॉडल पेश करते हैं, जहाँ वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन, जनभागीदारी और दूरदर्शी नीतियां मिलकर स्वच्छ, हरित और अधिक आत्मनिर्भर शहरों का मार्ग प्रशस्त करती हैं।
संदर्भ
आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय
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पीआईबी रिसर्च
पीके/केसी/आरटी/जेएस
(रिलीज़ आईडी: 2315939)
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