कृषि एवं किसान कल्‍याण मंत्रालय
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आनुवंशिक संसाधनों के प्रबंधन पर राष्ट्रीय सलाहकार बोर्ड ने भारत की कृषि-जैव विविधता के संरक्षण और स्थायी उपयोग को मजबूत करने के लिए एक रोडमैप तैयार किया है


बोर्ड ने 'विकसित भारत' और जलवायु-अनुकूल खेती को बढ़ावा देने के लिए पौधों, जानवरों, मछलियों, सूक्ष्मजीवों और कीटों के आनुवंशिक संसाधनों के एकीकृत प्रबंधन का आह्वान किया है

प्रविष्टि तिथि: 30 JUL 2026 5:57PM by PIB Delhi

भारत के खाद्य, पोषण, पर्यावरण और आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आनुवंशिक संसाधनों के रणनीतिक महत्व को स्वीकार करते हुए नवगठित 'आनुवंशिक संसाधनों के प्रबंधन पर राष्ट्रीय सलाहकार बोर्ड (एनएबीएमजीआर)' ने 29 जुलाई, 2026 को आईसीएआर-राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (आईसीएआर-एनबीपीजीआर) नई दिल्ली में अपनी पहली बैठक आयोजित की।

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एनएबीएमजीआर का गठन पहली बार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अध्यक्ष द्वारा 2011 में पद्म भूषण डॉ. आरएस परोदा, पूर्व सचिव, कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (डीएआरई) और महानिदेशक, आईसीएआर की अध्यक्षता में किया गया था। 2026 में, आईसीएआर ने डॉ. परोदा की अध्यक्षता और डीएआरई के सचिव तथा आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट की सह-अध्यक्षता में बोर्ड का पुनर्गठन किया। पुनर्गठित बोर्ड कृषि जैव विविधता पर राष्ट्रीय नीतियों और रणनीतियों की सिफारिश करने, पौधे, पशु, मछली, सूक्ष्मजीव और कीट आनुवंशिक संसाधनों के समन्वित प्रबंधन को बढ़ावा देने और आनुवंशिक संसाधनों से संबंधित उभरते राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर सलाह देने के लिए विशेषज्ञों और प्रमुख हितधारकों को एक मंच पर एक साथ लाता है।

29 जुलाई को आयोजित एनएबीएमजीआर की बैठक में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए), जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी), पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफएंडसीसी), कृषि और किसान कल्याण विभाग, पशुपालन और डेयरी विभाग, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (बीएसआई), राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (एनएमपीबी), भारतीय राष्ट्रीय बीज संघ (एनएसएआई), जैव विविधता (बायोवर्सिटी इंटरनैशनल), अंतर्राष्ट्रीय, आईसीएआर के उप महानिदेशक, आनुवंशिक संसाधनों का प्रबंधन करने वाले छह आईसीएआर राष्ट्रीय ब्यूरो के निदेशक, किसान प्रतिनिधियों और अन्य जाने-माने विशेषज्ञों ने भाग लिया।

अपनी प्रारंभिक भाषण में डॉ. परोदा ने कहा कि भारत में पौधे, पशु, मछली, सूक्ष्मजीव और कीट आनुवंशिक संसाधनों की समृद्ध विविधता एक राष्ट्रीय रणनीतिक संपत्ति है, जो दीर्घकालिक खाद्य और पोषण सुरक्षा, जलवायु अनुकूलता और स्थायी कृषि विकास को रेखांकित करती है। उन्होंने प्रत्येक राष्ट्रीय ब्यूरो द्वारा रणनीतिक प्राथमिकता की आवश्यकता पर जोर दिया ताकि संरक्षण और प्रबंधन के प्रयासों को उभरती राष्ट्रीय जरूरतों के साथ निकटता से जोड़ा जा सके। उन्होंने आनुवंशिक आधार को व्यापक बनाने और जलवायु-अनुकूल और उच्च प्रदर्शन करने वाली किस्मों और नस्लों के विकास में तेजी लाने के लिए फसल, पशुधन और मछली सुधार कार्यक्रमों में जंगली संबंधित प्रजातियां सहित संरक्षित जर्मप्लाज्म के उपयोग को बढ़ाने के महत्व पर प्रकाश डाला।

इस मौके पर डॉ. परोदा ने 2016 में प्रथम अंतर्राष्ट्रीय कृषि जैव विविधता सम्मेलन (आईएसी) के सफल आयोजन का स्मरण किया, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने किया था। उन्होंने सम्मेलन के दौरान अपनाई गई कृषि जैव विविधता पर दिल्ली घोषणा की सिफारिशों को प्रभावी ढंग से लागू करने का आग्रह किया। उन्होंने अब तक हुई प्रगति की समीक्षा करने और भविष्य की कार्रवाई के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करने को कहा। इसके अलावा उन्होंने मूल्यवान आनुवंशिक संसाधनों तक पहुंच को सुविधाजनक बनाने के लिए विशेष रूप से मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने मौजूदा समझौता ज्ञापनों को मजबूत करने और इन क्षेत्रों से कपास, रामबूटन, एवोकाडो, मैंगोस्टीन जैसी फसलों और भेड़ जैसे पशुओं के लिए जर्मप्लाज्म के रणनीतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने की ज़रूरत पर जोर दिया।  डॉ. परोदा ने पादप किस्मों के संरक्षण और किसान अधिकार अधिनियम (पीपीवीएंडएफआरए) की तर्ज पर पशु और मछली आनुवंशिक संसाधनों के लिए प्रजनकों (ब्रीडर्स ) और किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक उपयुक्त कानूनी ढांचे के विकास की भी वकालत की। उन्होंने कहा कि इस तरह की रूपरेखा पशुधन पालकों और मछली पालने वालों के हितों की रक्षा करते हुए नवाचार को प्रोत्साहित करेगी।

डॉ. एम.एल. जाट ने इस बात पर प्रकाश डाला कि आनुवंशिक संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन को मृदा विज्ञान, डिजिटल कृषि और फसल सुधार में प्रगति के साथ निकटता से एकीकृत किया जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि खास तरह की मिट्टी और कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों के लिए सबसे उपयुक्त फसल किस्मों की पहचान करने से जलवायु-अनुकूल और स्थान-विशेष उत्पादन प्रणालियों के विकास में तेजी आएगी। उन्होंने कहा कि भारत ने आईसीएआर के नेतृत्व में एक मजबूत और अद्वितीय राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार प्रणाली (एनएआरईईएस) का निर्माण किया है, जिसने आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण, लक्षण वर्णन और स्थायी उपयोग को महत्वपूर्ण रूप से सुगम बनाया है, जिससे वर्तमान और भावी दोनों पीढ़ियों के लिए उनकी उपलब्धता सुनिश्चित हुई है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि संबंधित मंत्रालयों, विभागों और आईसीएआर ब्यूरो के प्रतिनिधित्व के साथ पुनर्गठित एनएबीएमजीआर एजेंसियों के बीच तालमेल को मजबूत करेगा और भारत के आनुवंशिक संसाधनों से होने वाले लाभों के संरक्षण, स्थायी उपयोग और समान बंटवारे के लिए रणनीतिक मार्गदर्शन प्रदान करेगा।

बैठक के दौरान छह आईसीएआर राष्ट्रीय ब्यूरो के निदेशकों ने 2021-2026 की अवधि के दौरान अपने-अपने संस्थानों की प्रमुख उपलब्धियां पेश कीं और 2026-2031 के लिए अपने रोडमैप की रूपरेखा बताई। इसमें राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी)  के अनुरूप पहलों पर ध्यान केंद्रित किया गया।

बोर्ड ने कृषि आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण और सतत उपयोग से संबंधित कई रणनीतिक मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। इसने फसल सुधार में संरक्षित जर्मप्लाज्म के अधिक से अधिक उपयोग की सुविधा के लिए पूर्व-प्रजनन कार्यक्रमों को मजबूत करने, 2026-2031 के दौरान व्यवस्थित जर्मप्लाज्म संग्रह के लिए अनछुए (वंचित) क्षेत्रों की पहचान करने और एक एकीकृत राष्ट्रीय आनुवंशिक संसाधन प्रबंधन ढांचा विकसित करने के लिए आईसीएआर राष्ट्रीय ब्यूरो के बीच सहयोग बढ़ाने की सिफारिश की। पौधों, सूक्ष्मजीवों, कीटों, पशुओं और मछलियों की पारंपरिक या खास किस्मों, नस्लों और प्रजातियों को मुख्यधारा में लाने के लिए एक पूर्ण-विकसित अंतर-संस्थागत कार्यक्रम की सिफारिश की गई थी, जिसका समर्थन प्रगतिशील किसान पद्मश्री श्री सुण्डाराम वर्मा ने किया। बोर्ड ने जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के तहत राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण से डीएआरई/आईसीएआर को कृषि जैव विविधता से संबंधित जिम्मेदारियां सौंपने की स्थिति की भी समीक्षा की और एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग (एबीएस) प्रावधानों के कार्यान्वयन को मजबूत करने के उपायों पर चर्चा की। सदस्यों ने एक अंतर-संस्थागत कार्यक्रम के माध्यम से पारंपरिक और कम उपयोग की जाने वाली फसलों की किस्मों, पशु नस्लों, मछली प्रजातियों, सूक्ष्मजीवों और कीटों को मुख्यधारा में लाने पर विचार-विमर्श किया और राष्ट्रीय सुरक्षा जीन बैंक (एनएसजी) की स्थापना में हुई प्रगति की समीक्षा की।

एनबीएएमजीआर के अध्यक्ष ने सुझाव दिया कि एनएसजी को समय पर पूरा करने के प्रयास किए जाएं ताकि इसे आईसीएआर (2028-29) के शताब्दी समारोह के दौरान राष्ट्र को समर्पित किया जा सके।

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बैठक में भारत के अमूल्य आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण और सतत उपयोग के लिए वैज्ञानिक सहयोग, संस्थागत समन्वय और साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने के माध्यम से रणनीतिक नीतिगत मार्गदर्शन प्रदान करने की बोर्ड की प्रतिबद्धता की पुष्टि की गई। इन सुझावों से देश में कृषि-जैव विविधता के प्रबंधन को मजबूती मिलने और कृषि क्षेत्र की अनुकूल क्षमता, खाद्य सुरक्षा व सतत विकास को बढ़ावा देकर 'विकसित भारत' के दृष्टिकोण में अहम योगदान मिलने की उम्मीद है।

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पीके/केसी/आरकेजे/एसएस

 


(रिलीज़ आईडी: 2292012) आगंतुक पटल : 630
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