विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय
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हिमालयी अर्थव्यवस्था भारत के भविष्य की प्रगति को विकसित भारत 2047 की ओर अग्रसर करेगी: डॉ. जितेंद्र सिंह


केंद्रीय मंत्री महोदय ने कहा कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीत गतिविधियों के माध्यम से हिमालय के अनछुए जैव संसाधन आर्थिक मूल्य सृजन के नए इंजन के तौर पर उभर रहे हैं

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विज्ञान आधारित हिमालयी प्रगति को गति मिल रही है

राष्ट्र की प्रगति के लिए हिमालयी जैव विविधता का दोहन करने में सीएसआईआर-आईएचबीटी पालमपुर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है : डॉ. जितेंद्र सिंह

अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा की प्रार्थना के दौरान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की ओर से अर्पित भेंट में इसी संस्थान का ट्यूलिप फूल शामिल था

प्रविष्टि तिथि: 28 MAY 2026 5:35PM by PIB Delhi

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज कहा कि हिमालयी अर्थव्यवस्था भारत की भावी आर्थिक प्रगति में एक प्रमुख योगदानकर्ता बनने के लिए तैयार है, क्योंकि राष्ट्र विकसित भारत 2047 के विचार की ओर बढ़ रहा है।

मंत्री जी ने कहा कि भारत के आर्थिक विस्तार का अगला चरण उन क्षेत्रों और संसाधनों से उभर कर आएगा, जिनका दशकों से, विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्र में, कम अन्वेषण किया गया है।

पालमपुर स्थित सीएसआईआर-हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएचबीटी) में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अरोमा मिशन और फ्लोरीकल्चर मिशन जैसी पहलों के जरिए हिमालयी क्षेत्रों में केंद्रित वैज्ञानिक हस्तक्षेपों को अभूतपूर्व गति मिली है, जो हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में किसानों, महिलाओं, युवाओं, स्टार्ट-अप और उद्यमियों के लिए आजीविका के मौके पैदा कर रहे हैं।

मंत्री जी ने याद दिलाया कि अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा की प्रार्थना के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अर्पित भेंट में इसी संस्थान का ट्यूलिप फूल भी हिस्सा था।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने संस्थान की विभिन्न सुविधाओं का दौरा किया और सीएसआईआर-आईएचबीटी की ओर से संचालित कई हिमालयी प्रौद्योगिकी मिशनों से जुड़े वैज्ञानिकों, नवप्रवर्तकों, किसानों, स्टार्टअप और उद्यमियों से बातचीत की। उन्होंने कहा कि संस्थान हिमालयी जैव संसाधनों को चिकित्सा, स्वास्थ्य, पोषण, सौंदर्य प्रसाधन, पुष्पकृषि और कृषि-जैव प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों के लिए व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल योग्य उत्पादों और प्रौद्योगिकियों में परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

इस कार्यक्रम में सीएसआईआर महानिदेशक और डीएसआईआर सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी, वरिष्ठ वैज्ञानिक और सीएसआईआर-आईएचबीटी के अधिकारी, साथ ही उद्योग, शिक्षा जगत, किसान समुदाय और अनुसंधान संस्थानों के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने सीएसआईआर-आईएचबीटी को हिमालयी जैव विविधता, पारंपरिक ज्ञान और व्यावसायिक नवाचार के बहुआयामी पहलुओं को इकट्ठा करने वाला एक अनूठा वैज्ञानिक संस्थान बताते हुए कहा कि यह संस्थान हिमालयी जैव संसाधनों के संपोषित इस्तेमाल के लिए देश के अग्रणी केंद्रों में से एक के तौर पर उभरा है। उन्होंने आगे कहा कि संस्थान का कार्य कृषि प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी, पर्यावरण विज्ञान, पोषण प्रौद्योगिकी, पादप औषधियां और किण्वन प्रौद्योगिकी सहित विविध क्षेत्रों में फैला हुआ है।

अरोमा मिशन की सफलता का जिक्र करते हुए मंत्री जी ने कहा कि हिमाचल प्रदेश सुगंधित जंगली गेंदे के तेल का देश में बतौर अग्रणी उत्पादक बनकर उभरा है, जिससे किसानों और उद्यमियों को अच्छी आमदनी हो रही है। उन्होंने बताया कि संस्थान ने कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सुगंधित फसलों की खेती का विस्तार किया है और साथ ही हिमालयी परिस्थितियों के अनुकूल लैवेंडर और कैमोमाइल की एडवांस किस्में तैयार की हैं।

पुष्पकृषि मिशन के असर को रेखांकित करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सीएसआईआर-आईएचबीटी ने हिमालयी क्षेत्रों में पुष्पकृषि को आजीविका और कृषि-पर्यटन के एक महत्वपूर्ण स्रोत में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के ट्यूलिप गार्डन का उदाहरण दिया, जिसे स्थानीय किसानों की ओर से उगाए गए कंदों से तैयार किया गया है और इस वर्ष 15 लाख से अधिक पर्यटक इसे देखने आए। उन्होंने कहा कि संस्थान की ओर से सहयोग की गई पुष्पकृषि गतिविधियों से हिमाचल प्रदेश, लद्दाख, उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा के हजारों किसानों को लाभ मिल रहा है।

मंत्री जी ने आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना के अंतर्गत हींग, केसर, दालचीनी और मोंक फल की खेती के माध्यम से आयात प्रतिस्थापन में संस्थान के योगदान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि लाहौल और स्पीति के अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हींग के सफल पुष्पन और बीज उत्पादन ने भारत में इस फसल की स्वदेशी खेती के लिए नए मौके खोले हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सीएसआईआर-आईएचबीटी कुपोषित बच्चों के लिए पोषक तत्वों से भरपूर उत्पादों के विकास और जीवनशैली संबंधी विकारों के लिए वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित फॉर्मूलेशन के माध्यम से पोषण अभियान के अनुरूप पोषण और स्वास्थ्य देखभाल पहलों में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

कृषि और जैव विविधता प्रबंधन में गहन प्रौद्योगिकी की बढ़ती भूमिका पर जोर देते हुए मंत्री जी ने कहा कि संस्थान फसल सुधार, रोग पूर्वानुमान और जैव विविधता अनुसंधान के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, मशीन लर्निंग, जीनोमिक्स और ड्रोन-आधारित बेहतर कृषि प्रौद्योगिकियों का लाभ उठा रहा है।

मंत्री ने जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता, कचरे से पैसा कमाने की प्रौद्योगिकियों, हरित रसायन विज्ञान, बायोप्लास्टिक्स, जैव विविधता संरक्षण और हिमालयी संसाधनों के संपोषित इस्तेमाल के क्षेत्र में संस्थान की ओर से किए जा रहे कार्यों का भी उल्लेख किया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वैज्ञानिक संस्थान ग्रामीण विकास और आर्थिक सशक्तिकरण के साथ विज्ञान, नवाचार और उद्यमिता को एकीकृत करके जमीनी स्तर पर बदलाव के साधन के तौर पर तेजी से उभर रहे हैं।

वैज्ञानिकों, किसानों, उद्योगों और स्टार्टअप्स के बीच अधिक सहयोग का आह्वान करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में अपार अप्रयुक्त क्षमता मौजूद है, जो भारत की भविष्य की जैव-अर्थव्यवस्था और लगातार विकास यात्रा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

 

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पीके/केसी/एमएम


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