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कृषि में चक्रिय अर्थव्यवस्था: अपशिष्ट से संपदा

प्रविष्टि तिथि: 17 FEB 2026 10:26AM by PIB Delhi

मुख्य बिन्दु

  • भारत के कृषि अवशेषों में प्रतिवर्ष 18,000 मेगावाट से अधिक विद्युत उत्पादन की क्षमता है।
  • सरकार ने 2018-19 से 2025-26 के बीच फसल अवशेष प्रबंधन पहल के अंतर्गत, 3,926 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की है।
  • इसके अतिरिक्त, 42,000 से अधिक कस्टम हायरिंग केंद्र स्थापित किए गए हैं तथा सतत  अवशेष प्रबंधन को बढ़ावा देने हेतु 3.24 लाख मशीनें उपलब्ध कराई गई हैं।
  • गोवरधन योजना के अंतर्गत, 14 जनवरी 2026 तक 51.4% जिलों में 979 बायोगैस संयंत्र संचालित हैं, जो गोबर, फसल अवशेष और खाद्य अपशिष्ट को स्वच्छ ऊर्जा एवं जैविक खाद में परिवर्तित कर रहे हैं।
  • चक्रिय कृषि, सतत विकास लक्ष्यों (एस डी जी) का समर्थन करती है, विशेषकर वर्ष 2022 में उत्पन्न 1.05 अरब टन वैश्विक खाद्य अपशिष्ट की समस्या के समाधान में, जिसमें से 60% घरेलू स्तर से उत्पन्न हुआ था।

 

परिचय

कृषि अपशिष्ट का उत्पादन प्रति वर्ष बढ़ता जा रहा है। यह एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती के रूप में उभरकर सामने आया है, जिसके महत्वपूर्ण आर्थिक दुष्प्रभाव भी हैं। भारत में कृषि, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, किंतु खेती, कटाई और प्रसंस्करण के दौरान पर्याप्त मात्रा में अपशिष्ट भी उत्पन्न करती है। कृषि अपशिष्ट के अपर्याप्त और उचित प्रबंधन ना होने के कारण वायु, मिट्टी और जल प्रदूषण की गंभीर समस्या उत्पन्न हो रही है। देश में प्रतिवर्ष अनुमानित 350 मिलियन टन कृषि अपशिष्ट उत्पन्न होता है, जिसमें फसल अवशेष, भूसी, पुआल तथा खाद्य प्रसंस्करण गतिविधियों से प्राप्त उप-उत्पाद शामिल हैं। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, भारत के कृषि अवशेषों में प्रतिवर्ष 18,000 मेगावाट से अधिक विद्युत उत्पादन की क्षमता है। ऊर्जा उत्पादन के अतिरिक्त, इन अवशेषों का उपयोग जैविक उर्वरक बनाने में किया जा सकता है क्योंकि यह पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। ऐसे उर्वरक मृदा स्वास्थ्य में सुधार करते हैं और कृषि में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता को कम करने में सहायक होते हैं।

प्रति वर्ष वैश्विक स्तर पर लगभग 1.3 अरब टन खाद्य पदार्थ व्यर्थ हो जाते हैं, जिनका उत्पादन मानव उपयोग हेतु किया जाता है। साथ ही नगरीय ठोस अपशिष्ट का लगभग एक-तिहाई भाग घरेलू रसोईघरों से उत्पन्न होता है। ऐसे में खाद्य अपशिष्ट, कृषि अवशेष तथा अन्य जैव-अवक्रमणीय नगरीय कचरे जैसे जैविक अपशिष्ट का उचित प्रबंधन नहीं किया जाता, तो यह कूड़ा फेंकने वाले स्थलों पर सड़ता है, कूड़े का पहाड़ तैयार होता है और मीथेन सहित अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इससे होता है। यह वायु और भूजल प्रदूषण को बढ़ावा देता है, दुर्गंध उत्पन्न करता है तथा पर्यावरणीय क्षरण को तीव्र करता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और अधिक गंभीर हो जाते हैं। अतः भूमि उपयोग, संसाधनों के समुचित उपयोग तथा टिकाऊ अपशिष्ट प्रबंधन समाधान अब पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के साथ-साथ आर्थिक आवश्यकताएँ भी बन गए हैं।

विकास और सततता के संतुलन के लिए चक्रिय अर्थव्यवस्था का निर्माण

अपशिष्ट से संपदा” दृष्टिकोण अपनाने का महत्व इस बात में निहित है कि अपशिष्ट को आर्थिक बोझ या पर्यावरणीय समस्या के रूप में नहीं, बल्कि एक मूल्यवान संसाधन के रूप में पुनः परिकल्पित किया जाए। यह अर्थव्यवस्था के भीतर संसाधनों के प्रवाह पर पुनर्विचार की अपेक्षा करता है, जिसमें पुनर्प्राप्ति, पुनः उपयोग और मूल्य की पुनः एकीकृत प्रक्रिया पर विशेष बल दिया जाता है। चक्रिय अर्थव्यवस्था उत्पादों और प्रक्रियाओं के संपूर्ण जीवनचक्र में संसाधन दक्षता बढ़ाने के लिए एक व्यापक एवं विस्तार योग्य मॉडल दृष्टिकोण के रूप में उभरी है।

इसके मूल में यह है कि चक्रियता, उत्पादन और उपभोग के पारंपरिक तरीकों में एक संरचनात्मक बदलाव का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका उद्देश्य कच्चे माल, जल और ऊर्जा के दोहन को कम करते हुए प्रत्येक चरण पर अपशिष्ट को समाप्त करना है। यह दृष्टिकोण छह सिद्धांतों पर काम करता है जिसमें शामिल हैं उपयोग को सीमित करना, पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण, नवीनीकरण, पुनर्प्राप्ति और मरम्मत, जिससे सामग्री लंबे समय तक उत्पादक उपयोग में बनी रहे। इस दृष्टिकोण की एक विशेषता है “वास्तविक पुनर्चक्रण” है, जिसमें अपशिष्ट को उसकी गुणवत्ता से समझौता किए बिना उसके मूल रूप में परिवर्तित किया जाता है, जिससे उच्च मूल्य की पुनर्प्राप्ति संभव होती है और निम्न-स्तरीय पुनर्चक्रण से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है।

चक्रिय अर्थव्यवस्था के सिद्धांत एक व्यवहार्य और दूरदर्शी समाधान प्रस्तुत करते हैं, जो भारत को आर्थिक गतिविधियों और पारिस्थितिक सततता के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायता कर सकते हैं। वर्ष 2050 तक भारत की चक्रिय अर्थव्यवस्था का आकार 2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने और इसके द्वारा 1 करोड़ तक रोजगार सृजित करने का अनुमान है।

इसकी पूरी क्षमता को समझने और धरातल पर क्रियान्वित करने के लिए आर्थिक विस्तार को पर्यावरण संरक्षण के साथ समन्वित करना आवश्यक होगा तथा प्रकृति की कुशल और सुव्यवस्थित पुनर्चक्रण प्रणालियों से सीख लेनी होगी। ऐसी प्रणालियाँ संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग और न्यूनतम अपशिष्ट का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं और इस प्रकार सतत विकास के लिए एक आदर्श प्रारूप प्रदान करती हैं।

कृषि अपशिष्ट के उत्पादन से उपयोग तक की समझ

कृषि से जुड़े अपशिष्ट का उत्पादन खेत से लेकर भोजन की थाली तक की संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान होता है। इसमें फसल अवशेष, पशु मल, प्रसंस्करण उप-उत्पाद तथा फसल उत्पादन, पशुपालन, कटाई उपरांत प्रबंधन और अनाज, फल, सब्जियाँ, गन्ना, तिलहन एवं दुग्ध उत्पादों के प्रसंस्करण के दौरान उत्पन्न अपशिष्ट तत्व शामिल होते हैं।

फसल अवशेष / पराली: कृषि अपशिष्ट चक्र की शुरुआत कटाई के बाद के चरण से होती है, जब फसलें अपने पीछे तने, भूसा और पराली जैसे अवशेष छोड़ जाती हैं। इस जैव-भार का एक बड़ा हिस्सा पशु चारे, कम्पोस्ट, बायोगैस, मल्च या ईंधन के रूप में रचनात्मक ढंग से उपयोग में लाया जाता है। जबकि पराली का एक महत्वपूर्ण भाग अभी भी अगली फसल के लिए खेतों को जल्द से जल्द तैयार करने की उम्मीद में खेत में ही जला दिया जाता है। अवशेष को जलाए जाने से खेत की मिट्टी के पोषक तत्वों में कमी आ जाती है, मृदा स्वास्थ्य का ह्रास तथा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।

बायोमास क्या है?

बायोमास उन कार्बनिक पदार्थों को संदर्भित करता है जो जीवित या हाल ही में जीवित रहे पौधों और पशुओं से प्राप्त होते हैं और जिनका उपयोग ऊर्जा, सामग्री या पोषक तत्वों के स्रोत के रूप में किया जा सकता है।

पशु मल, उप-उत्पाद एवं शव: कृषि अपशिष्ट का एक महत्वपूर्ण स्रोत है पशुपालन, विशेषकर भारत में, जहाँ विशाल पशु आबादी के कारण गोबर तथा बिछावन अपशिष्ट की अत्यधिक मात्रा उत्पन्न होती है। रोग प्रकोप की स्थिति में संक्रामक एवं जीव जनित रोगों के प्रसार को रोकने के लिए मृत पशुओं को सुरक्षित और समयबद्ध ढंग से निपटान करना अत्यावश्यक है। अतः उचित शव प्रबंधन पर्यावरणीय दृष्टि से संतुलित तथा जनस्वास्थ्य-सुरक्षित निपटान पद्धतियों को सुनिश्चित करने के लिए अवसंरचना, वित्तपोषण और तकनीकी क्षमता के विस्तार के महत्व को रेखांकित करता है।

कटाई उपरांत होने वाले नुकसान: कटाई उपरांत नुकसान किसी कृषि उत्पाद की मात्रा और गुणवत्ता दोनों में होने वाली मापी जा सकने वाली कमी को संदर्भित करती हैं। ये नुकसान कटाई उपरांत प्रणाली के किसी भी चरण में उत्पन्न हो सकता है। खाद्य हानियाँ मात्रात्मक हो सकती हैं, जैसे वजन या आयतन में कमी, अथवा गुणात्मक हो सकती हैं, जिनमें पोषक तत्वों की हानि तथा स्वाद, रंग, बनावट या स्वरूप में अवांछनीय परिवर्तन शामिल हैं। कटाई उपरांत आपूर्ति शृंखला के बेहतर प्रबंधन से अपव्यय में कमी आएगी, वास्तविक उपभोग में वृद्धि होगी तथा संपूर्ण अर्थव्यवस्था में आय में वृद्धि होगी।

खाद्य अपशिष्ट: खाद्य अपशिष्ट, खेत से उपयोगकर्ता की थाली तक की शृंखला के अंतिम चरणों में उत्पन्न होता है, जिनमें बाजार, खुदरा विक्रय केंद्र तथा घरेलू स्तर शामिल हैं, जहाँ खाने के लिए तैयार भोजन को थाली में छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार का अपव्यय ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उल्लेखनीय योगदान देता है। तथापि, उभरती प्रौद्योगिकियाँ खाद्य अपशिष्ट को मूल्य-वर्धित उत्पादों, जैसे अभियांत्रिकीकृत बायोचार, में परिवर्तित कर रही हैं, जिनमें कार्बन का अवशोषण करने, मृदा स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने तथा पर्यावरणीय प्रदूषकों को हटाने की क्षमता है। अपशिष्ट को संसाधन में रूपांतरित करते हुए, खाद्य अपशिष्ट प्रबंधन कृषि और खाद्य प्रणालियों में चक्रियता के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में विकसित हो रहा है।

बायोचार और इंजिनीयर्ड बायोचार क्या है ?

बायोचार एक कार्बन-समृद्ध पदार्थ है, जिसे बायोमास (जैसे फसल अवशेष या लकड़ी के अपशिष्ट) को कम ऑक्सीजन की अवस्था में गर्म करके तैयार किया जाता है। जब इस बायोचार को अभियांत्रिकीकृत किया जाता है, तो इसके विशिष्ट गुणों—जैसे मृदा उर्वरता और जल धारण क्षमता—को बेहतर बनाने तथा पोषक तत्वों के उपयोग दक्षता को बढ़ाने के लिए इसे अतिरिक्त रूप से उपचारित या संवर्धित किया जाता है।

 

कृषि में चक्रियता को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे उपाय

सरकार कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में अपशिष्ट को मूल्यवान संसाधनों में परिवर्तित कर चक्रिय को प्रोत्साहित करने हेतु विभिन्न नीतियों का कार्यान्वयन कर रही है। गैल्वनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज धन (गोबरधन) तथा फसल अवशेष प्रबंधन जैसी पहलें कृषि, पशु एवं खाद्य अपशिष्ट को जैविक खाद में परिवर्तित कर रही हैं।

 

अपशिष्ट को संपदा में परिवर्तित करने की इन योजनाओं को सहायता दे रही हैं कृषि अवसंरचना कोष (ए आई एफ) तथा पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (ए एच आई डी एफ) [Agriculture Infrastructure Fund (AIF) and Animal Husbandry Infrastructure Development Fund (AHIDF) ]और इससे कृषि अपशिष्ट को संपदा में परिवर्तित करने हेतु आवश्यक अवसंरचना का विकास हो रहा है। इसके अतिरिक्त, जल शक्ति मिशन घरेलू एवं औद्योगिक अपशिष्ट जल के गैर-पेय प्रयोजनों, जैसे कृषि, भूमि उपयोगों तथा बागवानी, में पुनः उपयोग को प्रोत्साहित करता है। ये सभी पहलें कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में संसाधन पुनर्प्राप्ति, पुनः उपयोग और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देकर ‘अपशिष्ट से संपदा’ दृष्टिकोण की दिशा में कार्य कर रही हैं।

फसल अवशेषों और बायोमास को संसाधन में परिवर्तित करना

गैल्वनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज धन (गोबरधन): यह योजना गोबर, फसल अवशेष एवं खाद्य अपशिष्ट को कम्प्रेस्ड  बायोगैस (सी बी जी) तथा जैविक खाद में परिवर्तित करने हेतु अनेक मंत्रालयों को एकीकृत करती है। वर्ष 2023 में सरकार ने पारदर्शिता एवं कार्यकुशलता बढ़ाने के उद्देश्य से एकीकृत गोबरधन पोर्टल का शुभारंभ किया। 14 जनवरी 2026 तक यह योजना भारत के 51.4% जिलों को आच्छादित कर चुकी थी तथा 979 संचालित बायोगैस संयंत्र स्थापित किए जा चुके थे, जो सतत अपशिष्ट प्रबंधन में उल्लेखनीय प्रगति को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आई सी ए आर) ने मृदा स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने के लिए किसानों को बायोगैस स्लरी के उपयोग हेतु फसल-विशिष्ट दिशानिर्देश विकसित किए हैं।

इसके अतिरिक्त, सरकार ने योजना के प्रभाव को बढ़ाने हेतु विनियमों को सरल बनाया है तथा लक्षित प्रोत्साहन उपायों की शुरुआत की है। कम्प्रेस्ड बायोगैस (सी बी जी) को कार्बन क्रेडिट व्यापार में सम्मिलित करना, सी बी जी-मिश्रित ईंधनों पर कर रियायत प्रदान करना तथा उर्वरक नियंत्रण आदेश के अंतर्गत जैविक खाद के लिए सरलीकृत मानदंड लागू करना—इन सभी कदमों ने बायोगैस के प्रसार को गति दी है, निजी निवेश को आकर्षित किया है तथा राष्ट्रीय ‘अपशिष्ट से संपदा’ पारितंत्र को सुदृढ़ किया है।

फसल अवशेष प्रबंधन (सी आर एम): सीआरएम पहल का उद्देश्य फसल अवशेषों को खुले में जलाने की घटनाओं को कम करना है, जिसके लिए इन-सीटू प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाता है, जिसमें अवशेषों को सीधे मृदा में सम्मिलित किया जाता है या मल्च के रूप में उपयोग किया जाता है, तथा एक्स-सीटू प्रबंधन के अंतर्गत अवशेषों को एकत्र कर कम्पोस्टिंग, बायोगैस उत्पादन या जैव-ऊर्जा के लिए प्रयुक्त किया जाता है। ये प्रक्रियाएँ मृदा स्वास्थ्य में सुधार, कृषि उत्पादकता में वृद्धि तथा प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन को प्रोत्साहित करती हैं।

कृषि अपशिष्ट को संपदा में बदलने हेतु बुनियादी ढांचे का निर्माण

कृषि अवसंरचना कोष (ए आई एफ): एआईएफ कृषि मूल्य शृंखलाओं को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिनमें जैविक कृषि से संबंधित गतिविधियाँ भी सम्मिलित हैं। जैविक किसानों, किसान उत्पादक संगठनों (एफ पी ओ), प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पी ए सी एस) तथा कृषि उद्यमियों ने एआईएफ के समर्थन का उपयोग कर गोदाम, शीतगृह सुविधाएँ, छंटाई एवं ग्रेडिंग इकाइयाँ तथा प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्र स्थापित किए हैं।

  • वर्ष 2020-21 में प्रारंभ किए गए एआईएफ के अंतर्गत कटाई उपरांत अवसंरचना तथा कृषक-स्तरीय परिसंपत्तियों के विकास हेतु मध्यम से दीर्घकालिक संस्थागत ऋण प्रदान किया जाता है।
  • वर्ष 2025 तक, एआईएफ ने जैविक इनपुट उत्पादन से संबंधित 545 परियोजनाओं को समर्थन प्रदान किया है, जिनके लिए कुल ₹ 850 करोड़ के ऋण स्वीकृत किए गए हैं, जो यह दर्शाता है कि जैविक खेती को पर्यावरणीय दृष्टि से सतत एवं आर्थिक रूप से व्यवहार्य मॉडल के रूप में बढ़ती मान्यता प्राप्त हो रही है।
  • इसके अतिरिक्त, 1,13,419 परियोजनाओं के अंतर्गत 66,310 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं, जिससे कृषि क्षेत्र में कुल 1,07,502 करोड़ रुपये का निवेश संचित हुआ है। एआईएफ के अंतर्गत समर्थित प्रमुख परियोजनाओं में शामिल हैं:

a. 30,202 कस्टम हायरिंग सेंटर,

b. 22,827 प्रसंस्करण इकाइयाँ,

c. 15,982 गोदाम,

d. 3,703 छंटाई एवं ग्रेडिंग इकाइयाँ,

e. 2,454 शीतगृह परियोजनाएँ, तथा

f. लगभग 38,251 अन्य कटाई उपरांत प्रबंधन परियोजनाएँ।

इन सबके साथ व्यवहार्य सामुदायिक कृषि परिसंपत्तियों के सृजन को भी प्रोत्साहित किया गया है। ये पहलें मूल्य संवर्धन में वृद्धि, कटाई उपरांत होने वाले नुकसान में कमी तथा किसानों के लिए आय के उन्नत अवसरों के सृजन में योगदान देती हैं।

पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (ए एच आई डी एफ): वर्ष 2020 में सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत 15,000 करोड़ रुपये की कोष राशि के साथ एएचआईडीएफ की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य पशुधन मूल्य शृंखला में बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करना है। यह कोष मांस एवं दुग्ध प्रसंस्करण, पशु आहार उत्पादन तथा ‘अपशिष्ट से संपदा’ प्रबंधन में निजी एवं सहकारी निवेश को प्रोत्साहित करने हेतु अभिकल्पित है, जिससे पशुपालन क्षेत्र में मूल्य संवर्धन, दक्षता और लचीलापन बढ़ाया जा सके। दुग्ध ईकोसिस्टम में निरन्तरता और चक्रियता को समाहित करने के उद्देश्य से सरकार ने विशिष्ट लक्ष्यों के साथ तीन विशेष बहु-प्रांतीय सहकारी समितियों (एम एस सी एस) के गठन की पहल की है: -

  • पशुधन उत्पादकता को बढ़ाने हेतु पशु आहार, खनिज मिश्रण तथा तकनीकी इनपुट की आपूर्ति करना।
  • सहकारी मॉडल के माध्यम से जैविक खाद उत्पादन एवं सतत अपशिष्ट उपयोग को प्रोत्साहित करना, जिससे गोबर एवं कृषि अपशिष्ट को जैविक उर्वरक तथा बायोगैस में परिवर्तित किया जा सके।
  • मृत पशुओं की खाल, हड्डियों एवं सींगों का वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित करना, ताकि उत्तरदायी निपटान के साथ-साथ पशुधन क्षेत्र में अतिरिक्त मूल्य शृंखलाओं का सृजन किया जा सके।

यह दृष्टिकोण प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को सहायता प्रदान करता है, अपशिष्ट को न्यूनतम कर चक्रिय को प्रोत्साहित करता है तथा पर्यावरणीय रूप से सतत मृदा इनपुट की बढ़ती मांग को संबोधित करता है, जिससे पशुधन क्षेत्र की लचीलापन क्षमता और दीर्घकालिक सततता सुदृढ़ होती है।

सतत कृषि हेतु जल प्रबंधन: जल शक्ति मिशन के अंतर्गत शुरू की गईं पहल

जल शक्ति मंत्रालय, घरेलू और अपशिष्ट जल के उपचार और पुन: उपयोग को बढ़ावा देता है, जिसे कृषि, भू-उपयोग और बागवानी जैसे गैर-पीने योग्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सके। इसके लिए मंत्रालय राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन, पीएमकेएसवाई–वाटरशेड डेवलपमेंट, और जल शक्ति अभियान जैसी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से प्रयास करता है। जल शक्ति मंत्रालय, जल संरक्षण और स्रोतों के स्थायित्व पर भी ध्यान केंद्रित करता है। इसके अंतर्गत वाटरशेड विकास, वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार, और भूजल पुनर्भरण को प्रोत्साहित किया जाता है। इन प्रयासों से सिंचाई के लिए जल उपलब्धता बढ़ती है, भूजल पर दबाव कम होता है, और कृषि व संबंधित क्षेत्रों में संसाधन-कुशल और सतत जल प्रबंधन को बढ़ावा मिलता है।

अपशिष्ट जल पुन: उपयोग की पहलों के पूरक के रूप में, जल जीवन मिशन–हर घर जल (अगस्त 2019 में प्रारंभ हुआ) ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित और पीने के पर्याप्त पानी तक सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करने पर केंद्रित है। इस मिशन के तहत प्रत्येक घर में 55 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन शुद्ध जल का कार्यशील नल कनेक्शन उपलब्ध कराया जाता है, जिससे भारत के दीर्घकालीन जल सुरक्षा और सतत जल शासन के उद्देश्यों को मजबूती मिलती है।

सतत विकास लक्ष्य (SDG)-संगत चक्रिय कृषि प्रथाएँ

चक्रिय कृषि वैश्विक स्तर पर सतत विकास लक्ष्यों (एस डी जी) को प्राप्त करने के उद्देश्य से गहराई से जुड़ी हुई है। यह एस डी जी - 2 का समर्थन करती है, जिसका लक्ष्य है “भूख को समाप्त करना, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना, पोषण में सुधार करना, और सतत कृषि को बढ़ावा देना।”

विशेष रूप से, एस डी जी संकेतक 2.4.1 यह रेखांकित करता है कि कृषि प्रणालियाँ लचीली होनी चाहिए, जो मृदा स्वास्थ्य को सुधारें और रासायनिक उपयोग पर निर्भरता को कम करें। भारत में, खाद बनाना (कंपोस्टिंग), बायोचार (बायोचार) का उपयोग, और जैव-द्रव्य (बायोमास) पुनर्चक्रण जैसी प्रथाएँ इन उद्देश्यों में योगदान देती हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, उत्पादकता में सुधार होता है, और पर्यावरणीय रूप से सतत कृषि को बढ़ावा मिलता है।

इसके अतिरिक्त, चक्रिय कृषि एस डी जी का समर्थन इस प्रकार भी करती है कि यह वैश्विक खाद्य अपव्यय को कम करती है, जो 2022 में 1.05 बिलियन टन तक पहुँच गया था, जिसमें से 60% अपव्यय घरेलू स्तर पर उत्पन्न हुआ।

निष्कर्ष

भारत में कृषि में चक्रिय अर्थव्यवस्था की ओर बदलाव यह दर्शाता है कि पर्यावरणीय स्थिरता और आर्थिक विकास परस्पर सहायक हो सकते हैं। जब कृषि और खाद्य अपव्यय का स्तर एक महत्वपूर्ण चुनौती प्रस्तुत बने रहे हों तो लक्षित नीतियाँ, रणनीतिक अवसंरचना निवेश, और समन्वित संस्थागत कार्रवाई करके अपशिष्ट को ऊर्जा, जैविक इनपुट, जल संसाधन और आजीविका के अवसरों में परिवर्तित किया जा सकता है। प्रमुख पहलें जैसे गोबरधन, फसल अवशेष प्रबंधन कार्यक्रम, कृषि अवसंरचना कोष (ए आई एफ), और पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (ए एच आई डी एफ) यह प्रदर्शित करती हैं कि चक्रिय कृषि मिट्टी की उर्वरता और जल सुरक्षा बढ़ाने तथा कृषि प्रणाली के लचीलेपन को मजबूत करने की क्षमता रखती है। सिद्ध हस्तक्षेपों को व्यापक रूप से अपनाकर, स्थानीय संस्थाओं को सशक्त बनाकर, और आर्थिक प्रोत्साहनों को पारिस्थितिक परिणामों के अनुरूप करके, चक्रिय कृषि दीर्घकालीन खाद्य सुरक्षा, जलवायु लचीलापन, और समावेशी ग्रामीण विकास सुनिश्चित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, और कृषि अपशिष्ट को सतत समृद्धि की आधारशिला में बदल सकती है।

संदर्भ

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय

https://agriwelfare.gov.in/Documents/NPMCR_1.pdf

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आई सी ए आर)

https://icar.org.in/sites/default/files/Circulars/Creating-Wealth-From-Agricultural-Waste.pdf

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय/ऊर्जा संबंधी मंच

https://gobardhan.eil.co.in/whats-new/1703227428_5369bb58d9993c5ccfc2.pdf

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय

https://www.mofpi.gov.in/sites/default/files/study_report_of_post_harvest_losses.pdf

आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय

https://mohua.gov.in/pdf/627b8318adf18Circular-Economy-in-waste-management-FINAL.pdf

मत्स्य, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय

https://www.dahd.gov.in/sites/default/files/2023-11/ImplementationGuidelinesAHIDF.pdf

प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (डी ए आर पी जी)

https://darpg.gov.in/sites/default/files/CSD-2023/Circular_Economyt.pdf

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय

https://www.pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=2104349

https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?NoteId=153829&ModuleId=3

जल शक्ति मंत्रालय

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1998924

भारतीय संसद

https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/185/AU4233_yHVeoO.pdf?source=pqals

https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/185/AS36_72du7j.pdf

https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/185/AU4304_cpD5X1.pdf?source=pqals

https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/185/AS364_V5q5jG.pdf?source=pqals

https://sansad.in/getFile/annex/268/AU2481_Xt5zi1.pdf?source=pqars

https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/185/AU3040_K9e3Sz.pdf

अंतर्राष्ट्रीय एवं बहु पक्षीय संगठन / शोध

https://www.fao.org/fileadmin/user_upload/remesa/library/FAO%20Carcass%20Management%20guidelines.pdf

https://sdgs.un.org/goals

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