राज्यसभा सचिवालय
राज्यसभा के 270वें सत्र के प्रारंभ में उपराष्ट्रपति और राज्यसभा अध्यक्ष श्री सी.पी. राधाकृष्णन का उद्घाटन भाषण
प्रविष्टि तिथि:
29 JAN 2026 12:50PM by PIB Delhi
माननीय सदस्यो, राज्यसभा के 270वें सत्र, संसद के बजट सत्र शुरुआत में आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। यह देखकर वास्तव में प्रसन्नता होती है कि भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है और शीघ्र ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। इस सत्र के प्रारंभ में, आइए हम स्वयं को याद दिलाएं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत का बढ़ता प्रभाव और कद, राष्ट्र की आर्थिक दिशा निर्धारित करने में सांसदों के रूप में हमारी भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
संसद के दोनों सदनों को माननीय राष्ट्रपति के संबोधन से प्रेरित होकर, जिसने हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के लिए निर्णायक दिशा तय की है, यह सदन भी अपने मूल विधायी और विचार-विमर्श संबंधी कर्तव्यों के माध्यम से अपना योगदान देगा। 30 बैठकों के दौरान, हम केंद्रीय बजट 2026-27 और सरकार के विधायी प्रस्तावों की गहन जांच करेंगे। इसके अलावा, विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समितियां अवकाश के दौरान मंत्रालयों और विभागों की अनुदान मांगों की गहन जांच करेंगी। अतः, मैं सभी माननीय सदस्यों से सदन और समितियों में विचार-विमर्श में सार्थक योगदान देने का आह्वान करता हूं।
सरकार के बजट प्रस्तावों पर गहन विचार-विमर्श के साथ-साथ, हमारे सामने कई महत्वपूर्ण विधेयक भी हैं जिन पर सदन की कार्यवाही में काफी समय लगेगा। विधायी कार्य की व्यापकता इस बात को रेखांकित करती है कि सदन की निर्धारित कार्यवाही के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करके हम उन लोगों की आकांक्षाओं को साकार करने के लिए प्रतिबद्ध हैं जिनका हम प्रतिनिधित्व करते हैं।
मैं सभी माननीय सदस्यों से आग्रह करता हूँ कि वे सशक्त संसदीय निगरानी रखने और सदन में सूचीबद्ध कार्यसूची का सार्थक संचालन सुनिश्चित करने के लिए उच्चतम संसदीय मर्यादा और व्यवस्था बनाए रखने में अपना योगदान दें। हमारा लोकतंत्र विचारों की विविधता और जीवंत वाद-विवाद से ही फलता-फूलता है। विचारों का सम्मानपूर्वक आदान-प्रदान और रचनात्मक चर्चाएं हमारे संसदीय संवाद का आदर्श होनी चाहिए। आइए हम एक ऐसे सत्र के लिए प्रतिबद्ध हों जो मर्यादा, अनुशासन और गरिमामय आचरण से परिपूर्ण हो।
मैं माननीय सदस्यों से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी द्वारा परिकल्पित लोकतंत्र, अनुशासन और ज्ञानोदय के मूल्यों को बनाए रखने का आग्रह करता हूं। मैं उनके शब्दों को उद्धृत करता हूं, 'अनुशासित और ज्ञानोदय से परिपूर्ण लोकतंत्र ही संसार की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था है।' सदन में हमारा आचरण इस अनुशासन और ज्ञानोदय को प्रतिबिंबित करना चाहिए।
मैं सभी संसदीय दलों के नेताओं और सदस्यों से इस सत्र को रचनात्मक बनाने और समृद्ध, आत्मनिर्भर एवं विकसित भारत की दिशा में एक मजबूत कदम सिद्ध करने में पूर्ण सहयोग की आशा करता हूं। आइए, हम सब मिलकर इस बजट सत्र को संसदीय लोकतंत्र के उच्चतम मानकों को प्रतिबिंबित करते हुए सफल बनाएं।
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पीके/केसी/एसएस/एचबी
(रिलीज़ आईडी: 2220016)
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