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प्रगति: सहकारी, परिणामोन्मुख शासन का एक दशक
प्रविष्टि तिथि:
13 JAN 2026 7:08PM by PIB Delhi
- प्रगति ने 85 लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की परियोजनाओं को तेज़ी से आगे बढ़ाकर भारत के विकास को उल्लेखनीय गति प्रदान की।
- प्रगति के अंतर्गत 382 प्रमुख राष्ट्रीय परियोजनाओं की व्यवस्थित समीक्षा और कड़ी निगरानी की गई है।
- चिन्हित की गई 3,187 समस्याओं में से 2,958 का पहले ही समाधान किया जा चुका है, जिससे परियोजनाओं में विलंब होने तथा लागत में वृद्धि होने में उल्लेखनीय कमी आई है।
- यह मंच प्रधानमंत्री की प्रत्यक्ष देखरेख में केंद्र और राज्यों के बीच वास्तविक समय में तालमेल सुनिश्चित करते हुए जवाबदेही को और अधिक सुदृढ़ बनाता है।
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प्रगति: रीयल-टाइम शासन का मॉडल
प्रगति (प्रो-एक्टिव गवर्नेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंटेशन) भारत सरकार का एक प्रमुख मंच है, जो प्रधानमंत्री द्वारा राज्यों और केंद्रीय मंत्रालयों के साथ साझेदारी में परियोजनाओं, योजनाओं और शिकायत निवारण की प्रत्यक्ष एवं वास्तविक समय में या रीयल-टाइम समीक्षा के माध्यम से उन्हें तेज़ी से आगे बढ़ाता है। प्रगति इस बात का सशक्त उदाहरण है कि डिजिटल शासन किस प्रकार नीतिगत मंशा को वास्तविक और दृष्टिगोचर प्रगति में बदल सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2015 में प्रारंभ किया गया प्रगति, भारत में प्रमुख ढाँचागत परियोजनाओं और महत्वपूर्ण सामाजिक कार्यक्रमों की निगरानी एवं क्रियान्वयन की प्रक्रिया को नए सिरे से परिभाषित कर चुका है। यह केवल एक समीक्षा मंच भर नहीं है, बल्कि नौकरशाही की निष्क्रियता को तोड़ने, केंद्र और राज्यों के बीच टीम इंडिया के दृष्टिकोण को सशक्त बनाने तथा ऐसी कार्य-संस्कृति विकसित करने का प्रयास है जहाँ निर्णय समयबद्ध हों, उनके क्रियान्वयन की अपेक्षा की जाए और परिणामों का आकलन किया जाए। पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा प्रारंभ की गई लंबे समय से लंबित पड़ी कई परियोजनाओं को भी प्रगति मंच के अंतर्गत लाया गया, जिन्हें बाद में गति प्रदान की गई या सफलतापूर्वक पूर्ण किया गया। इन परियोजनाओं में बोगीबील रेल-सह-सड़क पुल (परिकल्पना: 1997), नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (परिकल्पना: 1997), भिलाई इस्पात संयंत्र का आधुनिकीकरण (स्वीकृति: 2007) सहित कई अन्य परियोजनाएँ शामिल हैं।
प्रगति : यह क्या है और इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी?
भारत की सार्वजनिक परियोजनाओं और योजनाओं में समय और लागत का बहुत अधिक बढ़ जाना एक गंभीर चुनौती रही है। सरकार के सभी स्तरों पर इस समस्या के समाधान के लिए प्रधानमंत्री ने प्रगति की परिकल्पना एक समग्र समाधान के रूप में की। प्रगति एक विशिष्ट, एकीकृत और इंटरैक्टिव मंच है, जिसे भारत सरकार के प्रमुख कार्यक्रमों और परियोजनाओं के साथ-साथ राज्य सरकारों द्वारा चिन्हित परियोजनाओं की निगरानी, समीक्षा तथा शिकायतों के समाधान के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया है। प्रगति मंच तीन आधुनिक प्रौद्योगिकियों—डिजिटल डेटा प्रबंधन, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी—को विशिष्ट रूप से एक साथ जोड़ता है। इस प्रणाली के माध्यम से प्रधानमंत्री संबंधित केंद्रीय और राज्य अधिकारियों से सीधे संवाद कर सकते हैं, जहाँ परियोजना स्थलों से प्राप्त पूर्ण जानकारी और अद्यतन दृश्य साक्ष्य उन्हें उपलब्ध होते हैं। यह पहल ई-गवर्नेंस की दिशा में एक अभिनव कदम है और सुशासन के सिद्धांतों का उदाहरण भी प्रस्तुत करती है।
प्रगति की उत्पत्ति और विकास
प्रगति ने स्वागत (स्टेट वाइड अटेंशन ऑन ग्रिवेंसेज़ बाय एप्लिकेशन ऑफ टेक्नोलॉजी) से प्रेरणा ग्रहण की है। स्वागत गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की परिकल्पना थी, जिसे अप्रैल 2003 में प्रारंभ किया गया था और यह भारत के शुरुआती प्रौद्योगिकी-सक्षम शिकायत निवारण मंचों में से एक था। “स्वागत” मंच को उसके नाम के अनुरूप ही इस शासन को अधिक सुलभ और जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से डिज़ाइन किया गया था। नागरिक ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकते थे, अपने आवेदन की प्रगति को ट्रैक कर सकते थे, लिए गए निर्णय देख सकते थे और तो और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अधिकारियों से सीधे संवाद भी कर सकते थे। एक व्यवस्थित स्क्रीनिंग प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती थी कि गंभीर और उच्च प्राथमिकता वाली याचिकाएँ सीधे मुख्यमंत्री के डेस्क तक पहुँचें, जबकि मासिक जन-सुनवाइयों के माध्यम से नागरिकों को राज्य के नेतृत्व के समक्ष अपनी समस्याएँ रखने का प्रत्यक्ष मंच मिलता था। समय के साथ, स्वागत को सार्वजनिक सेवा प्रदायगी में पारदर्शिता, संवेदनशीलता और जवाबदेही को सशक्त बनाने के लिए व्यापक रूप से सराहा गया।
वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण करने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वागत में निहित अनुशासित कार्यप्रणाली को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित करने का प्रयास किया। प्रगति के माध्यम से ध्यान व्यक्तिगत शिकायतों से आगे बढ़कर प्रमुख परियोजनाओं और महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन जैसी अधिक व्यापक और जटिल चुनौती पर केंद्रित हुआ—विशेषकर उन मामलों में जहाँ बहु-एजेंसी निर्भरता या केंद्र–राज्य समन्वय के कारण अड़चनें बनी हुई थीं। इस दृष्टि से, प्रगति केवल एक डिजिटल उन्नयन भर नहीं; बल्कि शासन के क्रियान्वयन के तरीके में एक मौलिक परिवर्तन —अधिक समयबद्ध, अधिक परिणामोन्मुख और अधिक सहयोगात्मक—का प्रतीक है, जो “न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन” के व्यापक सिद्धांत के अनुरूप है।
व्यवस्थित समीक्षा और अनुवर्ती प्रक्रिया
- प्रगति एक प्रौद्योगिकी-आधारित मंच है, जो परियोजनाओं की निगरानी, नागरिक शिकायतों का निवारण तथा केंद्रीय मंत्रालयों और राज्य सरकारों के समन्वित प्रयासों के जरिए योजनाओं के क्रियान्वयन की समीक्षा करता है। इसके अलावा यह पीएम गतिशक्ति, परिवेश और पीएम रेफ पोर्टल जैसे मंचों को भी एकीकृत करता है।
- शीर्ष स्तर पर, प्रधानमंत्री राज्यों के मुख्य सचिवों तथा केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों के सचिवों के साथ प्रगति समीक्षा बैठकों की अध्यक्षता करते हैं, जिनमें चिन्हित परियोजनाओं और योजनाओं से संबंधित मुद्दों का समाधान किया जाता है।
- बैठकों के पश्चात्, एक बहु-स्तरीय अनुवर्ती तंत्र निर्णयों का समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित करता है। परियोजनाओं की निगरानी कैबिनेट सचिवालय द्वारा की जाती है, जबकि योजनाओं और शिकायतों की समीक्षा मंत्रालय स्तर पर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की निरंतर निगरानी में की जाती है।
परियोजना एवं समस्या को उच्च स्तर पर अग्रेषित करने का तंत्र
सामान्य समस्याओं का समाधान मंत्रालय स्तर पर किया जाता है, जबकि जटिल और महत्वपूर्ण मुद्दों को समीक्षा के लिए प्रगति को अग्रेषित किया जाता है।
सहकारी संघवाद और शासन को सशक्त बनाना
प्रगति मंच सहकारी संघवाद को व्यावहारिक रूप में संस्थागत रूप प्रदान करता है। राज्यों के मुख्य सचिव और भारत सरकार के सचिव एक साथ में भाग लेते हुए, वास्तविक समय में जवाबदेही निभाते हुए, राज्यों के बीच तथा केंद्र-राज्य मामलों के त्वरित समाधान को सक्षम बनाते हैं। यह मंच विभाजन को समाप्त कर निम्नलिखित सुनिश्चित करता है:
- विविध मंत्रालयों और राज्य सरकारों के बीच सीधा ताल-मेल।
- कैबिनेट सचिवालय द्वारा समयबद्ध अनुवर्ती निगरानी।
- बँटी हुई जिम्मेदारी की जगह परिणामों की साझा जिम्मेदारी
इस मॉडल ने अंतर-मंत्रालयी समन्वय को काफी हद तक बेहतर बनाया है और बड़ी सार्वजनिक परियोजनाओं में पारंपरिक रूप से देरी का कारण बनने वाली प्रक्रियात्मक बाधाओं को कम किया है।

प्रमुख ढाँचागत क्षेत्रों में प्रगति का प्रभाव
प्रगति ने प्रमुख ढाँचागत क्षेत्रों में क्रियान्वयन में तेजी लाने और बाधाओं को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कुछ प्रमुख क्षेत्रीय प्रभाव नीचे रेखांकित किए गए हैं।
अवसंरचना से परे: सामाजिक क्षेत्र और नागरिक-केंद्रित शासन
प्रारंभ में प्रगति मंच मुख्य रूप से बड़ी ढाँचागत परियोजनाओं पर केंद्रित था, लेकिन इसका दायरा अब सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं और सार्वजनिक शिकायतों तक विस्तारित करते हुए इसको एक नागरिक-केंद्रित शासन उपकरण बनाया गया है।
काफी अर्से से लंबित पड़ी परियोजनाओं के उदाहरण, जिन्हें प्रगति के जरिए आगे बढ़ाया गया
कई ऐसी परियोजनाएँ, जो दशकों से अवरुद्ध पड़ी थी, उन्हें प्रगति मंच के अंतर्गत लाकर या तो पूर्ण किया गया या निर्णायक रूप से आगे बढ़ाया गया, जिससे निरंतर उच्च-स्तरीय निगरानी और सरकारों के बीच तालमेल का प्रभाव स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हुआ।
- असम में स्थित बोगीबील रेल-सह-सड़क पुल, जिसकी 1997 में पहली बार परिकल्पना की गई थी। यह परियोजना वित्तीय और समन्वय संबंधी चुनौतियों के कारण दो दशकों से अधिक समय तक लंबित रही। प्रगति के तहत नियमित समीक्षा के बाद विभिन्न एजेंसियों के मुद्दों का समाधान किया गया और कार्यान्वयन पर कड़ी निगरानी रखी गई, जिसके परिणामस्वरूप यह परियोजना पूर्ण हुई और 2018 में उद्घाटन किया गया। इससे उत्तर-पूर्व में कनेक्टिविटी और रणनीतिक गतिशीलता में उल्लेखनीय सुधार हुआ।
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- नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, जिसकी परिकल्पना 1997 में की गई थी, मुख्यत: भूमि अधिग्रहण, परियोजना से प्रभावित होने वाले परिवारों के पुनर्वास और कई एजेंसियों की भागीदारी के कारण लगभग 25 वर्षों तक लंबित रहा। प्रगति के हस्तक्षेप के बाद, लंबे समय से लंबित पड़े इन मुद्दों को केंद्र–राज्य समन्वय के माध्यम से समयबद्ध तरीके से हल किया गया, जिससे परियोजना को गति मिली और निर्माण कार्य में उल्लेखनीय तेजी आई। माननीय प्रधानमंत्री ने अक्टूबर 2025 में परियोजना के प्रथम चरण का उद्घाटन किया।

- भिलाई इस्पात संयंत्र का आधुनिकीकरण और विस्तार, 2007 में स्वीकृत किया गया था, लेकिन संविदा विवाद, कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियों और लागत में वृद्धि के कारण लगभग 15 वर्षों तक यह लंबित रहा। प्रगति के तहत उच्च-स्तरीय निगरानी ने अंतर-मंत्रालयी और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम स्तर की अड़चनों को हल करने में मदद की, जिससे आधुनिकीकरण कार्यक्रम पूरा हुआ और संयंत्र की क्षमता व कार्यकुशलता में सुधार हुआ।
- छत्तीसगढ़ स्थित लारा सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट (चरण-I), जिसे दिसंबर 2012 में स्वीकृत किया गया था, भूमि अधिग्रहण और ठेकेदार से संबंधित अड़चनों के कारण 13 वर्षों से अधिक समय तक विलंबित रहा। प्रगति के माध्यम से निरंतर निगरानी और मुद्दों के समाधान ने परियोजना की बाधाएँ दूर करने में मदद की, जिसके परिणामस्वरूप यूनिट्स की कमीशनिंग हुई और राष्ट्रीय विद्युत उत्पादन क्षमता में वृद्धि हुई।
- मध्य प्रदेश स्थित गाडरवारा सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट, जिसे 2008 में स्वीकृत किया गया था, भूमि, ईंधन लिंकेज और कार्यान्वयन-संबंधी समस्याओं के कारण एक दशक से अधिक समय तक विलंबित रहा। प्रगति के तहत इस शामिल किए जाने के बाद लंबित मंजूरी और समन्वय संबंधी मुद्दों को तेज़ी से निपटाया गया, जिससे परियोजना की कमीशनिंग संभव हुई और क्षेत्रीय विद्युत उपलब्धता सुदृढ़ हुई।

- भारत के पूर्वी विद्युत उत्पादन परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में मान्यता प्राप्त नॉर्थ करनपुरा सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट (एनकेएसटीपीपी) एक प्रमुख पिट-हेड थर्मल पावर पहल है, जिसका उद्देश्य पूर्वी भारत में बेस-लोड विद्युत उपलब्धता और ग्रिड विश्वसनीयता को सुदृढ़ करना है। वित्तीय वर्ष 2019–20 के दौरान परियोजना की भौतिक प्रगति लगभग 60% थी। सितंबर 2021 में आयोजित प्रगति समीक्षा सहित केंद्रित समीक्षाओं और समन्वित हस्तक्षेपों के बाद, परियोजना के कार्यान्वयन में उल्लेखनीय गति देखी गई और वित्तीय वर्ष 2023–24 तक भौतिक प्रगति लगभग 87% तक पहुँच गई।
- नबीनगर सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट (एनएसटीपीपी) भारत की ऊर्जा सुरक्षा संरचना में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस परियोजना को प्रगति तंत्र के तहत लाए जाने के बाद भूमि और पुनर्वास संबंधी लंबित मुद्दों का समाधान किया गया। इस हस्तक्षेप ने केंद्रित निगरानी और जवाबदेही को सक्षम बनाया, जिससे भूमि से संबंधित अड़चनों का क्रमिक समाधान हुआ और परियोजना के कार्यान्वयन को पुनः शुरू किया जा सका।
- अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), बीबीनगर को तेलंगाना के यदाद्री भुवनगिरी जिले के बीबीनगर में प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (पीएमएसएसवाई) के अंतर्गत स्थापित किया जा रहा है। प्रगति तंत्र के तहत इस परियोजना की समीक्षा 28.06.2023 को की गई, जिसके बाद परियोजना के क्रियान्वयन में स्पष्ट प्रगति देखी गई। 14.09.2023 तक भौतिक प्रगति 29% थी, जो वित्तीय वर्ष 2023–24 के अंत तक तीव्र रूप से बढ़कर 57% हो गई, जो प्रगति के तहत केंद्रित निगरानी और त्वरित निर्णय लेने के प्रभाव को दर्शाती है।
- जम्मू के सांबा में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की स्थापना के साथ ही जम्मू और कश्मीर ने स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच और उत्कृष्टता के एक नए युग में प्रवेश किया है। क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सुदृढ़ करने में एम्स,जम्मू के राष्ट्रीय महत्व को देखते हुए, परियोजना और इसकी महत्वपूर्ण अड़चनें पहले परियोजना निगरानी समूह (पीएमजी) के माध्यम से उठाई गईं और इसके बाद इसे प्रगति तंत्र को अग्रेषित किया गया। प्रगति के तहत 28-06-2023 को परियोजना की समीक्षा की गई। परियोजना के कार्यान्वयन के माहौल में बदलाव लाने में प्रगति का हस्तक्षेप निर्णायक साबित हुआ। मुद्दे को शासन के उच्चतम स्तर तक ले जाए जाने के साथ ही सभी विभागों में जवाबदेही तेजी से सुदृढ़ हुई।
- अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), गुवाहाटी को प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (पीएमएसएसवाई) के तहत 24 मई 2017 को स्वीकृत किया गया। अप्रैल 2018 और फरवरी 2023 में परियोजना की समीक्षा सहित प्रगति ने एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप मंच के रूप में काम किया। प्रगति की निगरानी ने प्रमुख निर्भरताओं के सीधे समाधान को सक्षम बनाया, जिनमें विद्युत अवसंरचना की कमीशनिंग, वर्षा जल प्रबंधन प्रणाली में तेजी, जल आपूर्ति की तैयारी का संरेखन और संचालन के लिए आवश्यक समग्र समन्वय शामिल हैं।
- मुंबई ऊर्जा मार्ग लिमिटेड (एमयूएमएल) महाराष्ट्र में भारत सरकार के विद्युत मंत्रालय द्वारा परिकल्पित एक ट्रांसमिशन सुदृढ़ीकरण परियोजना है, जिसे मुंबई मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के लिए विद्युत ट्रांसमिशन की रीढ़ मजबूत करने के लिए डिजाइन किया गया है। इस परियोजना को कई तरह की परस्पर सम्बद्ध भूमि, वन, राइट ऑफ वे (आरओडब्ल्यू) और प्रशासनिक अड़चनों का सामना करना पड़ा। इसे अक्टूबर 2024 में स्वीकृत किया गया। प्रगति के माध्यम से किए गए हस्तक्षेपों ने बँटे हुए अनुमोदनों को समन्वित कार्रवाई में परिवर्तित किया, जिससे परियोजना की प्रगति को सुनिश्चित किया गया—2023 तक 80 प्रतिशत आरओडब्ल्यू मंजूरी, अगस्त 2024 तक 100 प्रतिशत नींव, निर्माण और स्ट्रिंगिंग के कार्य की पूर्णता, और सितंबर 2024 में ट्रांसमिशन लाइनों की सफल चार्जिंग—इस प्रकार कार्यान्वयन की गति बहाल हुई और एमयूएमएल परियोजना की समयबद्ध कमीशनिंग सुनिश्चित हुई।
- 400 केवी डी/सी तीस्ता III–किशनगंज ट्रांसमिशन लाइन (214 किमी) एक अंतर-राज्यीय ट्रांसमिशन सिस्टम (आईएसटीएस ) परियोजना है, जिसे सिक्किम के कमीशन किए गए जलविद्युत संसाधनों से विद्युत निकासी के लिए डिजाइन किया गया है। यह इस बात का प्रमाण है कि प्रगति इंजीनियरिंग डिजाइन में परिवर्तन करने की बजाए अधिकार क्षेत्र से संबंधित अड़चनों को हल करके और बहु-एजेंसी निष्पादन को संरेखित करके, किस प्रकार उच्च-स्तरीय निर्देशों को व्यवहारिक कार्यान्वयन में बदलता है। इसको इस संदर्भ के तौर पर देखा जा सकता है कि केंद्र–राज्य समन्वित हस्तक्षेप कैसे चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों में परियोजना की कमीशनिंग और निरंतर परिचालन संबंधी प्रदर्शन को संभव बनाता है।
- एनएच-344एम पर यूईआर-II परियोजना को दिल्ली की सड़क अवसंरचना को सुदृढ़ करने और यातायात दक्षता बहाल करने की परिवर्तनकारी पहल के रूप में परिकल्पित किया गया था। दिल्ली-एनसीआर की गतिशीलता के लिए इसके रणनीतिक महत्व को देखते हुए, परियोजना निगरानी समूह (पीएमजी) के तहत इस परियोजना की पैनी निगरानी की गई और बाद में प्रगति तंत्र के माध्यम से इसकी राष्ट्रीय स्तर पर समीक्षा की गई। प्रगति का हस्तक्षेप लंबे समय से चली आ रही अंतर-विभागीय अड़चनों को दूर करने में निर्णायक साबित हुआ, क्योंकि प्रत्येक लंबित मुद्दे को डिजिटल रूप से ट्रैक किया गया, जिम्मेदारियाँ निर्धारित की गईं और समय-सीमाएँ तय की गईं।

- एनएच-161 के संगारेड्डी-अकोला-नांदेड़ खंड को चार लेन का बनाने की परियोजना का विस्तार महाराष्ट्र में अकोला (एनएच-53) से तेलंगाना में संगारेड्डी तक 426 किमी तक है, जो वाशिम, हिंगोली, नांदेड़ और देग्लूर से होकर गुज़रता है। भरतमाला परियोजना के तहत इंदौर–हैदराबाद आर्थिक गलियारे का हिस्सा बनने वाला यह रणनीतिक राजमार्ग मध्य और दक्षिणी भारत के प्रमुख शहरी और आर्थिक केन्द्रों के बीच निर्बाध कनेक्टिविटी प्रदान करता है। इस परियोजना को प्रगति पोर्टल तक अग्रेषित किया गया। समन्वित हस्तक्षेप सभी हितधारकों—राज्य प्राधिकरण, जिला प्रशासन और परियोजना प्रस्तावक—को एक ही कार्यान्वयन ढांचे में लाया, जिसमें स्पष्ट समय-सीमाएँ और जवाबदेही निर्धारित की गई। छह महीनों की अल्पावधि में लंबे समय से लंबित इन मुद्दों का समाधान अवसंरचना से संबंधित जटिल अड़चनों को सुलझाने और समयबद्ध निष्पादन सुनिश्चित करने में प्रगति तंत्र की परिवर्तनकारी भूमिका को दर्शाता है।
- जम्मू–उधमपुर–श्रीनगर–बरामूला रेल लिंक पर कार्य अक्टूबर 1994 में शुरू हुआ, जबकि स्वीकृति की तिथि 31 मार्च 1994 थी, लेकिन कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ, भूमि अधिग्रहण संबंधी बाधाएँ, वन मंजूरी और सुरक्षा-संबंधी चुनौतियों के कारण लगभग 25 वर्षों तक प्रगति धीमी रही। प्रगति के तहत परियोजना की समीक्षा के बाद, महत्वपूर्ण मंजूरियाँ प्रदान करने के काम में तेजी आई और अड़चनों को समन्वित कार्रवाई के माध्यम से दूर किया गया, जिससे परियोजना पूर्ण हुई और कश्मीर घाटी में रेल कनेक्टिविटी संचालित हुई।

- एनएच-75 (खंड-V) के खजुरी-विंढमगंज खंड को चार लेन का बनाया जाना झारखंड में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राजमार्ग उन्नयन पहल का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय और अंतर-राज्यीय सड़क कनेक्टिविटी को मजबूती प्रदान करना है। प्रगति के नेतृत्व वाली निगरानी का महत्व बाद के अधिक जटिल चरणों में भी गति बनाए रखने की इस परियोजना की क्षमता में परिलक्षित हुआ। अगस्त 2024 में प्रगति समीक्षा से पहले भौतिक प्रगति 44.4% थी, और इसके बाद यह बढ़कर 92.02% हो गई, जो निरंतर कार्यान्वयन और समस्या के प्रभावी प्रबंधन को दर्शाता है। ऐसे चरण में, जहाँ बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं में अक्सर भूमि, मंजूरी और समन्वय संबंधी चुनौतियों के कारण विलंब होते हैं, इसकी निरंतर प्रगति से यह स्पष्ट होता है कि राज्य और जिला स्तर पर उच्च-स्तरीय निगरानी और समन्वित कार्रवाई ने गतिरोध उत्पन्न नहीं होने दिया और कार्यों को समयबद्ध रूप से संपन्न किया गया।
- मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक (एमटीएचएल), जिसका आधिकारिक नाम अटल बिहारी वाजपेयी सेवरी-न्हावा शेवा अटल सेतु है, भारत की सबसे परिवर्तनकारी शहरी परिवहन अवसंरचना पहलों में से एक है। यह परियोजना भारत सरकार, महाराष्ट्र सरकार और जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जेआईसीए) के वित्तीय समर्थन के साथ मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (एमएमआरडीए) द्वारा कार्यान्वित की गई। यह परियोजना भारत का सबसे लंबा समुद्री पुल है, जिसकी लंबाई 21.8 किलोमीटर है, और यह राष्ट्रीय परिवहन नेटवर्क में एक मील का पत्थर है। प्रगति तंत्र के तहत मार्गदर्शन मिलने से परियोजना एक अनुशासित, समयबद्ध शासन ढाँचे के माध्यम से आगे बढ़ी, जिसने प्रारंभिक संस्थागत समन्वय और सतत कार्यान्वयन गति सुनिश्चित की।

- जगदीशपुर–हल्दिया और बोकारो–धामरा प्राकृतिक गैस पाइपलाइन (जेएचबीडीपीएल), जिसे गेल (इंडिया) लिमिटेड द्वारा कार्यान्वित किया गया, एक क्रॉस-कंट्री पाइपलाइन परियोजना है जो राष्ट्रीय गैस ग्रिड को पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत तक विस्तारित करती है। प्रगति के बाद, जहां तकनीकी रूप से संभव था, वहाँ कमीशनिंग की प्रक्रिया जारी रही, जबकि अनसुलझे खंडों को प्रधानमंत्री कार्यालय, कैबिनेट सचिवालय और डीपीआईआईटी में व्यवस्थित निगरानी चक्रों के माध्यम से “उच्च प्राथमिकता स्थिति” में अग्रेषित किया गया, और राज्यों को जिला स्तर पर लंबित मुद्दों का समाधान करने का निर्देश दिया गया। क्रमिक निर्भरता से मॉड्यूलर कार्यान्वयन की दिशा में इस बदलाव ने परियोजना की कार्यान्वयन दिशा को बदल दिया और इसे विलंबित तैयारी से लगभग पूर्णता की ओर ले जाने में सक्षम बनाया।
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प्रगति : परियोजनाओं को तेज़ी से पूरा करने की एक वैश्विक केस स्टडी
ऑक्सफ़ोर्ड के सईद बिज़नेस स्कूल द्वारा तैयार एक महत्वपूर्ण केस स्टडी, जिसका शीर्षक है “फ्रॉम ग्रिडलॉक टू ग्रोथ: हाउ लीडरशिप एनेबल्स इंडियाज़ प्रगति इकोसिस्टम टू पावर प्रोग्रेस,” प्रगति को निम्न रूप में रेखांकित करती है:
- एक परिवर्तनकारी डिजिटल शासन प्लेटफॉर्म, जिसने वरिष्ठ स्तर की जवाबदेही को सुदृढ़ किया और लंबे समय से लंबित पड़ी अवसंरचना तथा सामाजिक क्षेत्र की परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया।
- वास्तविक समय में परियोजना निगरानी और अंतर-सरकारी समन्वय के लिए एक वैश्विक मानक और “सिंगल सोर्स ऑफ ट्रुथ।”
- वैश्विक स्तर की श्रेष्ठ पद्धति विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए अनुकरणीय मॉडल, जो अवसंरचना डिलीवरी, आर्थिक वृद्धि और सार्वजनिक विश्वास में सुधार को आगे बढ़ा सकता है।
- सहकारी संघवाद में संस्थान, जो राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन और केंद्रीय मंत्रालयों को एक ही प्लेटफॉर्म पर लाता है, और परियोजनाओं पर अराजनीतिक, समान ध्यान सुनिश्चित करता है।

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अवसंरचना प्रदान करने पर प्रगति का प्रभाव चार आयामों में दिखाई देता है:
आर्थिक: विलंब मूल्य वृद्धि और लॉजिस्टिक जटिलताओं के कारण केवल परियोजना की लागत को ही नहीं बढ़ाते, अपितु इन परिसंपत्तियों के जरिए यात्री आवागमन और व्यावसायिक गतिविधियों से होने वाले आर्थिक लाभ भी स्थगित हो जाते हैं। समस्याओं के समाधान और परियोजनाओं को तेजी से पूर्ण करके प्रगति इन आर्थिक लाभों को जल्दी उपलब्ध कराता है और निवेश किए गए प्रत्येक रुपये की अहमियत बढ़ाता है।
सामाजिक: तेज़ गति से पूर्णता का आशय, समुदायों को जल्दी लाभ मिलना है। बेहतर सड़कें दूर-दराज़ के क्षेत्रों को स्कूलों, अस्पतालों और बाज़ारों से जोड़ती हैं; रेल लिंक, पुल और लॉजिस्टिक्स में सुधार स्थानीय उद्यम और रोजगार सृजन में सहायता करते हैं। इसका कुल प्रभाव यह है कि भारत अधिक कनेक्ट हुआ है—पहुंच, अवसर और जीवन की गुणवत्ता में ऐसा सुधार हुआ है, जो नागरिक महसूस कर सकते हैं ।
पर्यावरणीय: आधुनिकीकरण स्थिरता की कीमत पर नहीं होना चाहिए। प्रगति पर्यावरण-संबंधी निर्णय तेजी से लेने में मदद करके जिम्मेदार विकास को सशक्त बनाता है, साथ ही सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखता है, जिससे उत्सर्जन और संसाधन उपयोग में वृद्धि का सबब बनने वाले अनावश्यक विलंब में कमी आती है। पीएम गतिशक्ति में जंगलों, वन्यजीव और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र को उसी जीआईएस योजना कैनवास पर उकेरा जाता है, ताकि पर्यावरणीय संवेदनशीलताओं को परियोजना को अंतिम रूप देने से पहले स्पष्ट रूप से देखा जा सके। इस प्रारंभिक जानकारी से समन्वित योजना, स्थल उपयुक्तता और अनुपालन जांच संभव होती है—जिससे एजेंसियाँ संवेदनशील पर्यावासों को टालने और पारिस्थितिक प्रभाव कम करने के लिए वैकल्पिक मार्ग और डिज़ाइन उपाय पहले से ही अपना सकती हैं। साथ ही, डिजिटल समीक्षा और वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग पर निर्भरता, कार्बन-गहन यात्रा की आवश्यकता को भी कम करती है।
सकारात्मक शासन: प्रगति केवल परियोजनाओं को तेज़ी से आगे ही नहीं बढ़ाता —यह प्रदायगी की संस्कृति को भी मजबूत करता है। यह पारदर्शिता, समयबद्ध जवाबदेही और अंतर-सरकारी समन्वय को सुदृढ़ करता है, और सभी विभागों में प्रक्रिया में सुधार लाने में मदद करता है। ऐसा करते हुए, यह व्यापक आधुनिकीकरण और उन पहलों के लिए उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है, जिनका उद्देश्य विकास के लाभ को पूरे देश में अधिक समान रूप से पहुँचाना है।
प्रगति ने 50वीं बैठक की है,जो इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि प्रौद्योगिकी-सक्षम नेतृत्व, सहकारी संघवाद और सतत निगरानी से कैसे राष्ट्रीय स्तर पर इरादों को ठोस परिणामों में बदला जा सकता है। प्रधानमंत्री ने इस बैठक के दौरान विभिन्न क्षेत्रों—सड़क, रेलवे, विद्युत, जल संसाधन और कोयला—की पाँच महत्वपूर्ण अवसंरचना परियोजनाओं की समीक्षा की। ये परियोजनाएँ 5 राज्यों में फैली हैं, जिनकी कुल लागत 40,000 करोड़ रुपये से अधिक है। यह पिछले एक दशक में भारत में शासन की संस्कृति में आए गहन परिवर्तन का प्रतीक है।
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(रिलीज़ आईडी: 2214534)
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