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दो बेहतरीन फ़िल्में ‘रावसाहब’ और ‘श्रीकांत’ 55वें आईएफएफआई के भारतीय पैनोरामा खंड में छाईं


‘रावसाहब’ - पर्यावरण विषय के साथ एक सस्पेंस थ्रिलर है, जो मनुष्य-पशु संघर्ष को एक नए नज़रिए से दिखाती है

श्रीकांत की कहानी न केवल दिव्यांगों के लिए बल्कि अपने सपने पूरा करने की कोशिश करने वाले हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा स्रोत:” तुषार हीरानंदानी, निर्देशक

भारत के 55वें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) में दो प्रभावशाली फिल्मों रावसाहब (मराठी) और श्रीकांत (हिन्दी) को जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली, जिन्हें प्रतिष्ठित भारतीय पैनोरमा खंड में दिखाया गया। दोनों ने अपनी सम्मोहक कहानियों और अनूठे नजरिये से दर्शकों का मन मोह लिया।

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता निखिल महाजन द्वारा निर्देशित रावसाहब मानव-पशु संघर्ष के महत्वपूर्ण मुद्दे को सामने लाती है। आईएफएफआई में प्रेस को संबोधित करते हुए महाजन ने कहा, "रावसाहब सिर्फ़ एक फिल्म नहीं है; यह वास्तविक दुनिया के संकट का प्रतिबिंब है। हम इस मुद्दे की तात्कालिकता को थ्रिलर प्रारूप के माध्यम से बढ़ाना चाहते थे ताकि दर्शकों को आकर्षित किया जा सके और एक बड़ी बातचीत को बढ़ावा दिया जा सके।" यह फिल्म इस साल प्रतिष्ठित गोल्डन पीकॉक पुरस्कार के लिए भी प्रतिस्पर्धा कर रही है।

महाराष्ट्र के तड़ोबा टाइगर रिजर्व की खतरनाक पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म मानवता और प्रकृति के बीच नाजुक संतुलन को उजागर करने के लिए पर्यावरण विषय के साथ एक सस्पेंस थ्रिलर का उपयोग करती है। केन्द्रीय चरित्र के रूप में जंगल की भूमिका पर चर्चा करते हुए महाजन ने कहा, "इसे महाराष्ट्र के चन्द्रपुर में तड़ोबा टाइगर रिजर्व के एक वास्तविक जंगल में शूट किया गया, जो फिल्म की सेटिंग को प्रामाणिकता प्रदान करता है। जंगल के चारों ओर बाघ थे और एक बड़े दल के साथ एक खतरनाक इलाके में शूटिंग करना था, इसलिए प्रामाणिकता प्रदान करने के साथ-साथ, वहां शूटिंग करना सबसे कठिन चुनौती भी थी। हमने जंगल को इस तरह से दर्शाया है ताकि यह कहानी का एक अभिन्न अंग बन जाए।"

महाजन ने फिल्म निर्माण के दौरान एक अनूठी चुनौती पर प्रकाश डाला: "हम बाघ को केवल एक दृश्य में दिखा सकते थे, फिर भी हमें उसकी उपस्थिति का निरंतर एहसास दिलाना था। ध्वनि डिजाइन और दृश्य तत्वों के माध्यम से, हमने तनाव और रहस्य का माहौल बनाया।"

महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में मानव-वन्यजीव संघर्षों पर दो साल के गहन शोध से प्रेरणा लेते हुए, यह फिल्म वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है। रावसाहब बिना किसी पूर्वाग्रह के इस मुद्दे पर कई दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। महाजन ने बताया, "हमारा लक्ष्य इस विषय को वास्तविक और वस्तुनिष्ठ तरीके से चित्रित करना था, जिसमें सह-अस्तित्व और मानव और प्रकृति के बीच संतुलित संबंध की आवश्यकता पर जोर दिया गया हो।"

आईएफएफआई में आज प्रदर्शित एक और फिल्म ‘श्रीकांत’ संभलने के सामर्थ्य और उम्मीद की यात्रा है। दृष्टिबाधित उद्योगपति और बोलंट इंडस्ट्रीज के संस्थापक श्रीकांत बोला के जीवन पर आधारित यह हिन्दी फिल्म मानवीय भावना और दृढ़ संकल्प का एक प्रेरक प्रमाण है। तुषार हीरानंदानी द्वारा निर्देशित और निधि हीरानंदानी द्वारा निर्मित इस फिल्म में हास्य और नाटक के तत्वों को मिलाकर सामाजिक सीमाओं के खिलाफ श्रीकांत के संघर्ष और जीत को दर्शाया गया है। यह फिल्म इस साल आईएफएफआई में प्रतिष्ठित आईसीएफटी यूनेस्को गांधी पदक के लिए भी प्रतिस्पर्धा कर रही है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए निधि हीरानंदानी ने फिल्म को दृढ़ता की एक सार्वभौमिक कहानी बताया। “श्रीकांत में एक ऐसे व्यक्ति की लड़ाई को दिखाया गया है जो समाज की बाधाओं को तोड़कर समान व्यक्ति के रूप में दिखना और एक प्रामाणिक जीवन जीना चाहता है। महामारी की चुनौतियों से बाहर निकलते हुए, हमें लगा कि एक ऐसी कहानी बताना महत्वपूर्ण है जो आशा और विश्वास वापस लाए।”

‘सांड की आंख’ जैसी फिल्मों के लिए मशहूर निर्देशक तुषार हीरानंदानी ने आईएफएफआई में वापसी को लेकर अपनी खुशी जाहिर की। “श्रीकांत की कहानी न केवल दिव्यांगों के लिए बल्कि अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश कर रहे हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा का स्रोत है। हमने उन्हें एक भरोसेमंद व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है, यहां तक ​​कि उनके संघर्ष और असफलताओं के क्षणों को भी दिखाया है, जो कहानी में प्रामाणिकता जोड़ता है।”

श्रीकांत को लचीलेपन और दृढ़ संकल्प के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हुए, यह फिल्म दृष्टिबाधित व्यक्तियों के बारे में पूर्वाग्रहों को चुनौती देती है। तुषार हीरानंदानी ने कहा, "यह केवल दिव्यांगता के बारे में नहीं बल्कि मानवता की अदम्य भावना के बारे में एक फिल्म है।"

रावसाहब और श्रीकांत दोनों ही महत्वपूर्ण सामाजिक और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को लेकर कहानी कहने की शक्ति दिखाते हैं और बदलाव के लिए प्रेरित करते हैं। आईएफएफआई में उनका गर्मजोशी से स्वागत देश के उभरते सिनेमाई परिदृश्य को उजागर करता है।

प्रेस कान्फ्रेंस यहां देखें

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