सूचना और प्रसारण मंत्रालय
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बचपन को आकार प्रदान करना और उसके सामाजिक-आर्थिक संदर्भ: यूनिसेफ की साझेदारी में विशेष रूप से क्यूरेटेड वर्ग में 54वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में पांच फिल्में दिखाई जा रही हैं

भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) के कार्य भागीदार, यूनिसेफ- के सहयोग से 54वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के दौरान विभिन्न महोत्सव स्थलों पर पांच उल्लेखनीय फिल्मों का संग्रह प्रदर्शित किया जा रहा है। ये फिल्में बचपन को आकार देने वाली जीवंत शक्तियों पर प्रकाश डालते हुए, इनके सामाजिक-आर्थिक संदर्भों की जांच-पड़ताल भी करती हैं।

यूनिसेफ और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) ने इस वर्ष फिल्म उद्योग और दर्शकों का ध्यान बच्चों के अधिकारों पर केंद्रित करने के उद्देश्‍य से साझेदारी की है। यह साझेदारी फिल्मों में बच्चों, किशोरों और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के चित्रण पर ध्यान आकर्षित करती है। यह साझेदारी नागरिक समाज को प्रभावित करने वाले संबंधित मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के प्रयासों का भी एक हिस्सा है।

‘‘यूनिसेफ को आईएफएफआई का दूसरे वर्ष के लिए भी एनएफडीसी का सहयोगी बनकर प्रसन्‍नता हो रही है। फिल्मों के इस क्यूरेटेड पैकेज के साथ हमें यह आशा है कि लोकप्रिय फिल्मों में बाल अधिकारों को मान्यता देने पर सकारात्मक चर्चा की जाएगी’’ यह बात यूनिसेफ, भारत के संचार एडवोकेसी एवं भागीदारी प्रमुख जाफरीन चौधरी ने कही है। उन्होंने बच्चों और उनके बारे में केन्द्रित अनुकरणीय फिल्मों को बढ़ावा देने और उन्हें शामिल करने के बारे में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के नेतृत्‍व की सराहना की। उन्होंने यह भी कहा कि आईएफएफआई यूनिसेफ के लिए फिल्म निर्माताओं, कला और संस्कृति से संबंधित लोगों, आलोचकों और दर्शकों तक बच्चों के अधिकारों के लिए व्‍यापक पहुंच प्रदान करने वाला एक सक्षम मंच है, जिसमें बच्चों और युवाओं पर हिंसा के गंभीर प्रभाव को रोकने के लिए हिंसा को सामाजिक रूप से स्वीकार न करने के बारे में ध्यान केंद्रित किया गया है।

निम्नलिखित फिल्मों को विशेष रूप से क्यूरेटेड वर्ग में शामिल किया गया है:-

दामू: राजा सेन द्वारा निर्देशित, यह राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता बंगाली फिल्म एक ऐसे अनाथ लड़के के बारे में है, जिसे एक दयावान व्यक्ति ने आश्रय दिया और उसका पालन-पोषण किया। वह उस व्‍यक्ति की पोती रंकू से दोस्ती करता है। वह एक बार, लापरवाही करते हुए रंकू को गांव में हाथी की सवारी कराने का वादा करता है। लेकिन जब ऐसा नहीं होता है, तो रंकू निराश हो जाती है। अपना वादा पूरा न होने पर दामू शर्मिंदा होता है और एक हाथी की तलाश में निकल पड़ता है। आखिर में उसकी नजर एक सर्कस पर पड़ती है लेकिन सर्कस का प्रबंधक उससे मिलने से इंकार कर देता है। दामू की निराशा तब चिंताजनक स्थिति में बदल जाती है जब उसे सर्कस को लूटने की साजिश का पता चलता है। क्या छोटा दामू सर्कस को बचा पाता है और रंकू से किए गए अपने वादे को पूरा करता है? यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।

अवा की खातिर (फॉर द सैक ऑफ अवा): यह ईरानी फिल्म निर्माता मोहसिन सेराजी की पहली फीचर फिल्‍म है। यह फारसी फिल्म एक ईरानी थिएटर ग्रुप के बारे में है, जिसे उस समय पासपोर्ट समस्या का सामना करना पड़ता है, जब उनकी मुख्य अभिनेत्री, अवा के पास उसकी मिश्रित विरासत के कारण उचित दस्तावेजों की कमी पाई जाती है। अवा की मदद करने के लिए दृढ़ निश्‍चय वाला ग्रुप उसका पासपोर्ट सुरक्षित करने और विदेश में एक प्रतिष्ठित उत्सव में भाग लेने के लिए रिश्वतखोरी से लेकर मानव तस्करी सहित गैर-परंपरागत और जोखिम भरे कार्यों की एक श्रृंखला का सहारा लेता है।

गांधी एंड कंपनी: गोल्डन लोटस पुरस्‍कार प्राप्‍त – इस सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, 2023 से सम्मानित किया गया है। मनीष सैनी द्वारा निर्देशित यह गुजराती फिल्म दो शरारती लड़कों के बारे में है। ये लड़के ऐसे बुजुर्ग की तलाश में हैं जो गांधीजी की शिक्षाओं का प्रतीक हो। उनमें से एक लड़का गांधी की नकल करने का निर्णय लेता है लेकिन फिर भी अपने शरारती तरीकों पर ही कायम रहता है।

पीकॉक लैमेंट: टोक्यो आईएफएफ 2022 में सर्वश्रेष्ठ कलात्मक योगदान पुरस्कार से सम्मानित इस फिल्‍म का निर्देशन संजीव पुष्पकुमारा ने किया है। यह एक सिंहली फिल्म है जो श्रीलंका के एक युवा अमिला के बारे में है। उसे अपनी बहन इनोका की जीवन रक्षक हृदय सर्जरी कराने के लिए 15,000 डॉलर जुटाने जैसे कठिन कार्य का सामना करना पड़ रहा है। वह हताश होकर बाल तस्करी जैसे अभियान में शामिल हो जाता है। जैसे-जैसे तनाव बढ़ता है, अमिला को अपनी बहन के भविष्य को सुरक्षित करने और आपराधिक दुनिया से बचने के लिए कठिन विकल्प चुनने पड़ते हैं।

सिंगो: अलीरेजा मोहम्मदी रौजबहानी द्वारा निर्देशित, यह फारसी फिल्म शफा नाम की एक छोटी लड़की के बारे में है। इस फिल्म में दिखाया गया है कि द्वीपवासी चार हॉर्स्शू केकड़े बेचने जा रहे हैं जिन्हें एक मछुआरे ने पकड़ा था। ये केकड़े बहुत कीमती हैं। एक छोटी लड़की उन केकड़ों को बेचे जाने से बचाने का फैसला करती है। इससे उसका परिवार द्वीपवासियों के क्रोध का शिकार बन जाता है, जो उस परिवार को निष्कासित करने का निर्णय लेते हैं। अब, शफा को अपने परिवार की भलाई और केकड़ों के जीवन में से एक का चयन करना होगा।

वर्ष 1989 में, विश्व नेताओं ने यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द राइट्स ऑफ द चाइल्‍ड - बचपन पर एक अंतर्राष्ट्रीय समझौते को अपनाकर दुनिया के बच्चों के प्रति एक ऐतिहासिक प्रतिबद्धता जताई। यह इतिहास में सबसे व्यापक रूप से अनुमोदित मानवाधिकार संधि बन गई है और इसने पूरी दुनिया में बच्चों के जीवन में बदलाव लाने में मदद की है। लेकिन अभी भी प्रत्‍येक बच्चे को उसके बचपन का पूरा आनंद नहीं मिल पाता है। अभी भी, अनेक बच्‍चों का बचपन जल्‍दी ही समाप्‍त हो जाता है।  

यूनिसेफ का विश्‍वास है कि यह हमारी पीढ़ी पर निर्भर करता है कि वह ऐसी मांग करे कि सभी हितधारक बच्‍चों के अधिकारों के लिए प्रतिबद्धताओं पूरी करने और इस बारे में कार्रवाई करने के लिए एकजुट होकर कार्य करें। 54वें भारत अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में यूनिसेफ के साथ एनएफडीसी की साझेदारी इन मुद्दों पर अधिक जागरूकता पैदा करने और इस विषय पर व्यापक चर्चा कराने के प्रयासों पर जोर देती है।

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