स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, विज्ञान एवं तकनीकी और भू विज्ञान मंत्रीडॉ. हर्षवर्धन का बयान

“कुछ राज्य सरकारों द्वारा अपनी विफलताओं से ध्यान भटकाने और लोगों में दहशत फैलाने का घृणित प्रयास"

Posted On: 07 APR 2021 6:06PM by PIB Delhi

हाल के दिनों मेंमैंने देखा है कि कोविड -19 महामारी के संदर्भ में कुछ राज्य सरकार के पदाधिकारियों द्वारा कई गैर जिम्मेदाराना बयान दिए गए हैं। चूंकि ये बयान जनता को गुमराह करने और उनमें डर फैलाने की क्षमता रखते हैंइसलिए उन्हें सीधेतौर पर रखना आवश्यक हो गया है।

ऐसे समय में जब देश कोविड-19 संक्रमण की एक नई लहर का सामना कर रहा है।मैं इस तथ्य पर ध्यान देने के लिए लोगों को सतर्क कर रहा हूं कि कई राज्य सरकारें संक्रमण रोकने के उचित कदम उठाने में विफल रही हैं। और पिछले एक साल में उन सबकों को लागू करने में भी सफल नहीं हो पाई जो देश ने महामारी से निपटने के लिए सीखा था।

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि कई राजनेताओं द्वारा इस बात की मांग करते हुए बयान दिए जा रहे हैं कि सरकार को 18 वर्ष की आयु से ऊपर के सभी लोगों के लिए टीकाकरण खोल देना चाहिए। या फिरटीकाकरण के लिए न्यूनतम आयु की पात्रता बहुत घटा देनी चाहिए। भारत सरकार टीके की मांग-आपूर्ति की स्थितिको पूरी पारदर्शिता के साथ राज्यों से साझा कर रही है। वास्तव में, टीकाकरण की रणनीति सभी राज्य सरकारों के साथ साझेदारी में व्यापक विचार-विमर्श और परामर्श के बाद तैयार की गई है। और सब कुछ कई महीनों से सार्वजनिक रुप से मौजूद है।

बहरहाल, यह दोहराने की जरूरत है कि टीकाकरण का प्राथमिक उद्देश्य सबसे जोखिम वाले लोगों में मृत्यु दर को कम करना हैऔर समाज को महामारी को मात देने में सक्षम बनाना है। उसी के अनुरुपदुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान भारत में हमारे स्वास्थ्य कर्मियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स के साथ शुरू किया गया था। एक बार जब यह एक निश्चित स्तर तक पहुंचगयातो टीकाकरण को अन्य उम्र के लोगों तक खोल दिया गया और वर्तमान में 45 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों के लिए टीकाकरण उपलब्ध है। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि सरकारी चिकित्सा सुविधाओं में टीकाकरण किसी के लिए भी पूरी तरह से मुफ्त है।

इसलिए जब तक टीकों की आपूर्ति सीमित रहती है, तब तक प्राथमिकता के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। ऐसा पूरी दुनिया में किया जा रहा है।और सभी राज्य सरकारें इसे अच्छी तरह से जानती हैं।

जब राज्य 18 साल से अधिक लोगों को सभी को वैक्सीन की आपूर्ति खोलने के लिए कहते हैं, तो हमें यह मानना ​​होगा कि उन्होंने अपने राज्य में सभी स्वास्थ्य कर्मियों, फ्रंटलाइन वर्कर्स और वरिष्ठ नागरिकों का टीकाकरण कर लिया है। लेकिन तथ्य बिल्कुल अलग हैं।

महाराष्ट्र ने केवल पहली डोज के तहत 86% स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का टीकाकरण किया है। इसी तरह दिल्ली और पंजाब में यह संख्या क्रमश: 72% और 64% है। दूसरी तरफ10 भारतीय राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों ने 90% से अधिक का टीकाकरण किया है।

जबकि दूसरी डोज के आधार पर देखा जाय तो महाराष्ट्र ने केवल 41% स्वास्थ्य कर्मचारियों का टीकाकरण किया है। इसी तरह दिल्ली और पंजाब ने क्रमश: 41% और 27% लोगों का टीकाकरण किया है। जबकि 12 राज्य / केन्द्र शासित प्रदेश ऐसे हैं जिन्होंने 60% से अधिक का टीकाकरण किया है।

फ्रंटलाइन वर्कर्स को पहली डोज देने के मामले में महाराष्ट्र ने केवल 73 फीसदी का टीकाकरण किया है। इसी तरह दिल्ली और पंजाब ने क्रमश: 71% और 65%का टीकाकरण किया है। वहीं 5 राज्य / केन्द्र शासित प्रदेश हैं ने 85% से अधिक लोगों का टीकाकरण किया है।

वहीं फ्रंटलाइन वर्कर्स को दूसरी डोज देने के मामले में महाराष्ट्र ने 41%का टीकाकरण किया है। इसी तरह दिल्ली और पंजाब के लिए ये संख्या क्रमश: 22% और 20% है। जबकि 6 राज्य / केन्द्र शासित प्रदेश ऐसे हैं जिन्होंने 45% से अधिक लोगों का टीकाकरण किया है।

जब वरिष्ठ नागरिकों की बात आती है, तो महाराष्ट्र ने सिर्फ 25% का टीकाकरण किया है, दिल्ली ने 30% और पंजाब ने केवल 13% टीकाकरण किया है। इसी तरह 4 राज्य / केंद्र शासित प्रदेश हैं जो पहले ही 50% से अधिक टीकाकरण कर चुके हैं।

क्या यह स्पष्ट नहीं है कि ये राज्यटीकाकरण के लक्ष्य पीछे रहने की वजह से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं?इस तरह के सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दे का राजनीतिकरण कुछ राजनीतिक नेताओं के लिए एक घातक प्रयास है। खैर उनसे बेहतर कौन इसे जानता होगा।

खास तौर से महाराष्ट्र में मैंने देखा है कि वहां के जनप्रतिनिधियों ने टीकों की कमी के बारे में कई बयान दिए हैं। यह कुछ भी नहीं है, केवल महामारी के प्रसार को नियंत्रित करने में बार-बार विफल रही महाराष्ट्र सरकार की ध्यान भटकाने की कोशिश है। महाराष्ट्र सरकार की जिम्मेदारी निभाने में असमर्थता समझ से परे है। लोगों में दहशत फैलाने के लिए इस तरह के बयान देना मूर्खता ही है। वैक्सीन आपूर्ति की वास्तविक समय पर निगरानी की जा रही है, और राज्य सरकारों को इसके बारे में नियमित रूप से अवगत कराया जा रहा है। टीका की कमी के आरोप पूरी तरह से निराधार हैं।

पिछले साल भर में,भारत के स्वास्थ्य मंत्री के रूप मेंमैं वायरस से लड़ने में महाराष्ट्र सरकार कीअव्यवस्था और पूरी तरह से लचर रवैये का गवाह रहा हूं। राज्य सरकार के इस रवैये ने पूरे देश में वायरस से लड़ने के प्रयासों को मुश्किल बना दिया है।

केंद्र सरकार नेनियमित रूप से महाराष्ट्र की राज्य सरकार की काउंसलिंग की,उन्हें सभी संसाधन उपलब्ध कराए और केंद्रीय टीमों को मदद के लिए भी भेजा। हालांकि, राज्य सरकार के हिस्से के प्रयासों की कमी अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है और अब वह सभी को डरा रही

आज, महाराष्ट्र में केवल देश में सबसे अधिक मामले और मौतें होती हैं, बल्कि दुनिया में सबसे अधिक परीक्षण सकारात्मकता दर भी है! उनका परीक्षण भी मानकों के आधार पर नहीं है और कान्टैक्ट ट्रेसिंग भी कई सारे सवाल खड़ी कर रही है।

स्वास्थ्य कर्मियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स का टीकाकरण करने के मामले में महाराष्ट्र सरकार का प्रदर्शन भी बहुत अच्छा नहीं है। यह देखना चौंकाने वाला है कि राज्य सरकार कैसे लोगों को अपनी निजी वसूली के लिए लोगों को संस्थागत क्वारंटीन से बचा रही है। और महाराष्ट्र के लोगों को खतरे में डाल रही है। कुल मिलाकर, राज्य एक संकट से दूसरे संकट के बीच फंसा है लेकिनऐसा लगता है जैसे राज्य नेतृत्व खुशी से पहियों पर सो रहा है

महाराष्ट्र सरकार को महामारी नियंत्रित करने के लिए और बहुत कुछ करने की आवश्यकता है और केंद्र सरकार उनकी हर संभव मदद करेगी। लेकिन राजनीति खेलने और झूठ फैलाने के लिए अपनी सारी ऊर्जाओं पर ध्यान केंद्रित करने से महाराष्ट्र के लोगों का भला होने वाला नहीं है।

इसी तरह, हमने छत्तीसगढ़ के नेताओं द्वारा नियमित टिप्पणियां देखी हैं जिनका उद्देश्य टीकाकरण पर गलत सूचना और डर फैलाना है। मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहूंगा कि राज्य सरकारें अपने राजनीतिक ढांचे पर जोर देने की जगह स्वास्थ्य ढांचे पर जोर दे तो ज्यादा बेहतर होगा।

छत्तीसगढ़ में पिछले 2-3 हफ्तों में असामयिक रूप से मौतों की संख्या अधिक हुई है। वह अभी भी रैपिड एंटीजन टेस्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। जो एक समझदारी वाली रणनीति नहीं है।

राज्य सरकार ने वास्तव में कोवैक्सिन का उपयोग करने से इनकार कर दिया, बावजूद इसके कि भारत के ड्रग कंट्रोलर द्वारा आपातकालीन इस्तेमाल (ईयूए) की मंजूरी दी गई थी। इतना ही नहीं, अपने कार्यों सेराज्य सरकार के नेताओं ने टीके के प्रति हिचक को भी बढ़ावा दिया। शायद ऐसा करने वाली वह दुनिया में एकमात्र सरकार होगी।

कई अन्य राज्यों को भी अपने स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों पर ध्यान देने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, कर्नाटक, राजस्थान और गुजरात में परीक्षण की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता है। पंजाब मेंजरूरतमंद लोगों को अस्पताल में भर्ती होने वालों की शीघ्र पहचान करके उच्च मृत्यु दर में सुधार करने की जरूरत है मास्क पहनना और सामाजिक दूरी का पालन बड़ी संख्या में राज्यों में सुस्त है। आज बहुत कुछ ऐसा करने की जरूरत है। और हमें यह सब तेजी से और बड़े पैमाने पर करना चाहिए।

मैं अब बोलने के लिए विवश हूं क्योंकि मेरी चुप्पी को कमजोरी नहीं माना जाना चाहिए। राजनीति खेलना आसान है, लेकिन शासन और स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में सुधार ही असली परीक्षा है।

मैं फिर से सभी राज्यों को जोर देना चाहूंगा कि केंद्र सरकार उनकी मदद के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है। भारत के पास प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और कड़ी मेहनत करने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के होने का अनूठा फायदा है। हम सभी को इस महामारी को हराने के लिए कड़ी मेहनत और एक साथ काम करने की आवश्यकता है। आइए हम अपने फायदे परध्यान देकर, अपने महत्वपूर्ण सार्वजनिक कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित करें। हम भारत के नागरिकों के ऋणी है और इससे कम कुछ नहीं है।

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