स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय

डॉ. हर्ष वर्धन ने संयुक्त राष्ट्र एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्यों को संबोधित किया

सभी हितधारकों के सहयोग एवं समर्थन से हम 2025 तक टीबी को समाप्त करने के अपने दृढ़ संकल्प को पूरा कर पायेंगे: डॉ. हर्ष वर्धन

"लापता टीबी रोगियों की संख्या में व्यापक कमी होते हुए 2016 में 1 मिलियन से घटकर 2019 में 0.5 मिलियन से भी कम रह गई है"

"2019 में 66,000 से अधिक दवा प्रतिरोधी टीबी रोगियों की पहचान की गयी"

Posted On: 23 SEP 2020 8:01PM by PIB Delhi

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन ने आज आभासी संवाद के माध्यम से विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्य देशों के मंत्रियों तथा संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों एवं सहयोगी संस्थानों के प्रमुखों एवं प्रतिनिधियों को संबोधित किया। उन्होंने, खासकर कोविड-19 संकट के संदर्भ में, बहुपक्षीय कार्रवाई को मजबूत करने और टीबी को समाप्त करने की दिशा में भारत की भूमिका एवं योगदान पर बात की।

भारत की भूमिका पर जोर देते हुए, डॉ. वर्धन ने कहा, भारत में, हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के मार्गदर्शन में भारत ने सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) से पांच साल पहले ही,  2025 तक, तपेदिक को समाप्त करने को उच्च प्राथमिकता दी है।" उन्होंने आगे कहा, "तपेदिक  अति प्राचीन काल से अस्तित्व में है और यह एक प्रमुख वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बना हुआ है। पिछले दशक में हुई प्रगति के बावजूद, टीबी दुनिया भर में एक प्रमुख संक्रामक घातक बीमारी बनी हुई है।

टीबी के उन्मूलन की दिशा में भारत के प्रयासों की सराहना करते हुए, डॉ. हर्ष वर्धन ने कहा, आनुषांगिक संसाधनों द्वारा समर्थित साहसिक एवं नवीन नीतियों के साथ भारत ने टीबी को समाप्त करने की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। हमने लापता टीबी रोगियों की संख्या को 2016 में एक मिलियन से घटाकर 2019 में 0.5 मिलियन से भी कम कर दिया है, जबकि इस वर्ष के दौरान 2.4 मिलियन मामलों को अधिसूचित किया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इन अधिसूचनाओं में एक तिहाई निजी क्षेत्र द्वारा दर्ज की गयी। देश के प्रत्येक जिले में तीव्र आणविक निदान को बढ़ाने के साथ, हम 2019 में 66,000 से अधिक दवा प्रतिरोधी टीबी रोगियों की पहचान करने में समर्थ रहे।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने कोविड-19 महामारी, जिसने "हमारे जीवन में कई तरीकों से नाटकीय बदलाव लाया है" के बारे में भी बात की। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य पर सार्वजनिक चर्चा अब किस तरह से विमर्श के केंद्र में आ गई है। आज जनता के बीच स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी है। उन्होंने कहा कि कोविड-19 और इसकी अत्यधिक संक्रामक प्रकृति ने दुनिया भर में स्वास्थ्य संबंधी जोखिम के बारे में एक व्यापक धारणा बनाई है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने कोविड-19 संकट के संदर्भ में टीबी को समाप्त करने की दिशा में भारत की भूमिका एवं योगदान और देश में कोविड-19 को रोकने तथा प्रबंधित करने की दिशा में भारत द्वारा उठाए गए बहुपक्षीय कदमों के बारे में विस्तार से चर्चा की। डॉ. वर्धन ने कहा, मैं कहना चाहूंगा कि कोविड-19 महामारी ने हमें अपने मूल सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों को संरचनात्मक रूप से फिर से संगठित करने का अवसर दिया है। टीबी रोगियों को दवाएं उनके घर पहुंचाने, टेली-परामर्श, आगे बढ़कर की जाने वाली गतिविधियों के माध्यम से टीबी की सक्रिय जांच आदि जैसे नवाचार, लॉकडाउन के दौरान कई रोगियों के लिए एक वरदान साबित हुए हैं। हम यह भी महसूस कर रहे हैं कि मात्र रोगी केंद्रित देखभाल के दृष्टिकोण से आगे बढ़ते हुए स्वास्थ्य प्रणाली को सामुदाय केंद्रित स्वास्थ्य दृष्टिकोण के इर्द-गिर्द मजबूत करने की जरूरत है। इस प्रक्रिया में, सामाजिक एवं पर्यावरण संबंधी निर्धारक तत्वों पर भी ध्यान देने की भी जरूरत है। रोग की निगरानी एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य नियमों पर अमल सख्त होगा और यह व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं रहेगा।

उन्होंने आगे कहा, "हम सभी जानते हैं कि इस महामारी की शुरुआत से लॉकडाउन की अवधि के दौरान टीबी के मामलों को खोजने के प्रयासों को झटका लगा है। लेकिन जैसे ही लॉकडाउन उठाया गया, टीबी के मामलों की संख्या बढ़ने लगी है। दरअसल, हम पूर्ण लॉकडाउन के दौरान अप्रैल के महीने में ऐतिहासिक रूप से सबसे कम संख्या पर पहुंच गए, लेकिन निरंतर प्रयासों के माध्यम से हमने मई में इसमें 43% की वृद्धि की और जून में 25% की एक और वृद्धि दर्ज की। जैसे - जैसे हम धीरे-धीरे देश को अनलॉक करते जायेंगे, हम वापस पूरी गति में आ जायेंगे। लॉकडाउन के प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से हम राज्यों को कोविड-19 से जुड़े प्रयासों के साथ टीबी के मामलों की खोज को भी सुनिश्चित करने के लिए निरंतर सलाह जारी कर रहे हैं। हमने टीबी और कोविड ​​रोगियों के बीच द्वि-दिशात्मक स्क्रीनिंग शुरू की है, और आईएलआई और एसएआरआई मामलों में टीबी के लिए स्क्रीनिंग की शुरुआत की है।

डॉ. हर्ष वर्धन ने बताया कि गरीबी क्षय रोग का एक शक्तिशाली निर्धारक तत्व है और पोषण में कमी टीबी रोग के बढ़ने के खतरे का एक महत्वपूर्ण कारक है। उन्होंने कहा, इससे निपटने के उद्देश्य से पोषण संबंधी सहायता के लिए हम प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के माध्यम से नकद सहायता प्रदान कर रहे हैं और अप्रैल 2018 से 7.9 बिलियन रूपए (लगभग 110 मिलियन अमरीकी डॉलर) 3 मिलियन से अधिक लाभार्थियों के बीच वितरित किये गये हैं। टीबी की सस्ती एवं गुणवत्तापूर्ण देखभाल हमारी सरकार की प्राथमिकता है।''

डॉ. हर्ष वर्धन ने टीबी उन्मूलन के प्रति भारत सरकार की प्रतिबद्धता को फिर से दोहराया और इस बात के लिए आश्वस्त किया कि सरकार ने इस एजेंडे को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। उन्होंने प्रतिभागियों को सूचित किया कि जनता का विश्वास बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा विभिन्न कदम उठाए गए हैं ताकि वे इसे 'नागरिक आंदोलन' बनाने के लिए पूरे उत्साह के साथ इसमें शामिल हों। उन्होंने कहा, सामुदायिक जुड़ाव एक महामारी से लड़ने की पहचान है और हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि ऐसा संभव हो।

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