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भारत के विकास का आधार: आधारभूत संरचना

प्रविष्टि तिथि: 09 JUN 2026 4:41PM by PIB Delhi

पिछले एक दशक में, भारत ने परिवहन, आवास, जल, ऊर्जा, रसद और डिजिटल नेटवर्क सहित विभिन्न क्षेत्रों में ढ़ांचागत निर्माण में नई रफ्तार हासिल की है। बड़े पैमाने पर किए गए निवेशों से आवागमन में सुधार हुआ है, सेवा वितरण मजबूत हुआ है, डिजिटल पहुंच व्यापक हुई है और विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को समर्थन मिला है। प्रगति, पीएम गतिशक्ति, राष्ट्रीय रसद नीति, सागरमाला, पीएम-वानी, जल जीवन मिशन और उड़ान जैसी एकीकृत नियोजन पहलों ने एक जुड़े हुए और प्रतिस्पर्धी भारत की परिकल्पना को आकार दिया है। इन पहलों ने प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाया है और भारत को एक आधुनिक और एकीकृत अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर होने में सहयोग दिया है।

 

 

राष्ट्र निर्माण के साधन के रूप में आधारभूत संरचना

आधारभूत संरचना आज पूरे देश में रोजमर्रा की जिंदगी और अनुभवों को आकार देती है। सड़कें, रेलवे, हवाई अड्डे, डिजिटल नेटवर्क, आवास, जल आपूर्ति और स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों ने ज़रुरी सेवाओं तक पहुंच का विस्तार किया है। इन प्रणालियों ने लोगों के यात्रा करने, डिजिटल रूप से जुड़ने और आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने के तरीके को भी प्रभावित किया है। 2014 के बाद से, आधारभूत संरचना विकास तेजी से व्यापकता, एकीकरण और दीर्घकालिक क्षमता निर्माण पर केंद्रित हो गया है।

इस अवधि के दौरान एक बड़ा बदलाव आधारभूत संरचना नियोजन का एकीकरण था, जो पहले की खंडित परियोजना क्रियान्वयन की प्रथा के उलट था। सार्वजनिक पूंजीगत व्यय वित्त वर्ष 2014-15 में लगभग 2 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2026-27 में 12.2 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह सभी क्षेत्रों में दीर्घकालिक ढ़ांचागत निर्माण पर निरंतर ध्यान केंद्रित करने को दर्शाता है। सागरमाला, भारतमाला, पीएम गतिशक्ति, पीएमएवाई, जल जीवन मिशन, पीएम उज्ज्वला योजना और उड़ान जैसी प्रमुख परियोजनाओं ने अवसंरचना तक पहुंच का विस्तार किया। इन पहलों ने ढ़ांचागत विकास को घरेलू कल्याण, आर्थिक अवसर और क्षेत्रीय विकास से जोड़ा।

 

गतिशीलता और संपर्क

 

परिवहन नेटवर्क आर्थिक एकीकरण की रीढ़ की हड्डी हैं। राजमार्गों और रेल मार्गों से लेकर हवाई अड्डों, जलमार्गों और शहरी परिवहन प्रणालियों तक, परिवहन के विभिन्न साधनों में किए गए निवेश ने संपर्क को और मजबूत किया है। ये नेटवर्क मिलकर एक अधिक सुगम और एकीकृत गतिशील तंत्र का निर्माण कर रहे हैं।

 

रेलवे

भारतीय रेलवे के बुनियादी ढांचे में 2014 से व्यापक परिवर्तन हुए हैं, जिससे परिचालन में क्षमता, दक्षता, सुरक्षा और सेवा वितरण में सुधार हुआ है। बजटीय सहायता 2014-15 में लगभग ₹32,000 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2026-27 में ₹2.78 लाख करोड़ हो गई, जो लगभग नौ गुना वृद्धि है।

 

विद्युतीकरण में तेजी से प्रगति हुई है, जो 2014 से पहले लगभग 20% नेटवर्क से बढ़कर मार्च 2026 तक 99.6% हो गया। कुल 69,873 किलोमीटर मार्ग का विद्युतीकरण किया गया है, जिससे ऊर्जा दक्षता में सुधार हुआ है और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम हुई है। इस परिवर्तन से परिचालन लागत में भी कमी आई है और पर्यावरण के अनुकूल रेलवे संचालन को बढ़ावा मिला है।

भारत की स्वदेशी वंदे भारत ट्रेनें बेहतर गति, आराम और ऑनबोर्ड तकनीक प्रदान करके आधुनिक रेल यात्रा को और भी बेहतर बनाती हैं। अप्रैल 2026 तक, देश भर में 162 वंदे भारत सेवाएं परिचालन में हैं। 16 और 20 कोच वाली अधिक क्षमता वाली ट्रेनों से यात्रियों की सुविधा और आवागमन में सुधार हो रहा है। जनवरी 2026 में शुरू हुई वंदे भारत स्लीपर में पहले तीन महीनों में 119 ट्रिप में 1.21 लाख यात्रियों ने सफर किया, जिसमें 100% सीटें भरी रहीं। भारतीय रेलवे ने अमृत भारत एक्सप्रेस के ज़रिए किफायती लंबी दूरी की यात्रा को भी बढ़ावा दिया है। कुल 60 ट्रेन सेवाएं अब चालू हैं, जिससे निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए संपर्क और यात्री सुविधा में सुधार हुआ है।

भारत मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (एमएएचएसआर) कॉरिडोर के साथ अपने हाई-स्पीड रेल बुनियादी ढांचे को आगे बढ़ा रहा है, जिसका निर्माण कार्य वर्तमान में जारी है। 508 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर को 320 किमी प्रति घंटे तक की गति से चलने के लिए डिज़ाइन किया गया है और यह उन्नत रोलिंग स्टॉक, सिग्नलिंग और ट्रेन नियंत्रण प्रणालियों द्वारा समर्थित है। केंद्रीय बजट 2026-27 में देश भर में सात नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की योजनाओं की भी घोषणा की गई।

अमृत भारत स्टेशन योजना (2023) रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण और यात्री सुविधाओं में सुधार के लिए शुरू की गई थी। इस योजना के तहत, चिन्हित 1,338 स्टेशनों में से 208 स्टेशनों पर पुनर्विकास कार्य पूरा किया गया। सुरक्षा प्रणालियों और परिचालन उन्नयन ने रेलवे नेटवर्क में विश्वसनीयता को भी मजबूत किया। ट्रेनों की समयबद्धता 77% से अधिक हो गई, जिसमें 24 डिवीजनों ने 90% से अधिक समय पर चलने का प्रदर्शन हासिल किया।

भारत की स्वदेशी स्वचालित ट्रेन सुरक्षा प्रणाली कवच ​​के ज़रिए रेल सुरक्षा को और मजबूत किया गया है। यह तकनीक ट्रेनों की गति पर नज़र रखती है और टक्करों और असुरक्षित संचालन को रोकने के लिए स्वचालित रूप से ब्रेक लगाती है। कवच प्रणाली को 3,103 किलोमीटर मार्ग पर लागू किया जा चुका है, जबकि प्रमुख गलियारों में 24,427 किलोमीटर मार्ग पर इसका कार्यान्वयन जारी है।

यह प्रणाली 4,277 लोकोमोटिव पर भी स्थापित की जा चुकी है और 8,979 लोकोमोटिव पर कार्य प्रगति पर है। कवच संस्करण 4.0 को दिल्ली-मुंबई, दिल्ली-हावड़ा और प्रयागराज-कानपुर जैसे प्रमुख मार्गों पर चालू कर दिया गया है। परिणामस्वरूप, ट्रेन दुर्घटनाएं 2014-15 में 135 से घटकर 2025-26 में 16 रह गईं।

समर्पित कार्गो अवसंरचना और मल्टीमॉडल प्रणालियों के माध्यम से माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स एकीकरण में भी सुधार हुआ है। पीएम गति शक्ति योजना के तहत, 139 टर्मिनल चालू हो गए हैं, जबकि 300 अतिरिक्त स्थानों के विकास को मंजूरी दी गई है। इन टर्मिनलों ने कार्गो हैंडलिंग दक्षता को बढ़ाया है, पारगमन में देरी को कम किया है और विभिन्न क्षेत्रों में आपूर्ति श्रृंखला संपर्क को मजबूत किया है।

प्रमुख आधारभूत संरचना परियोजनाओं ने दुर्गम भूभागों और रणनीतिक क्षेत्रों में संपर्क को मजबूत किया है।

  • चेनाब पुल (2025): चेनाब नदी से 359 मीटर ऊपर स्थित, यह विश्व का सबसे ऊंचा रेलवे मेहराब पुल है। 1,315 मीटर लंबी यह स्टील से बना पुल तेज हवाओं और भूकंपीय स्थितियों का सामना करने के लिए निर्मित है। यह पुल जम्मू और श्रीनगर के बीच संपर्क को मजबूत करता है और यात्रा के समय को कम करता है।
  • अंजी खड़ पुल (2025): अंजी खड़ पुल जम्मू और कश्मीर में भारत का पहला केबल-स्टे रेलवे पुल है। यह पुल क्षेत्र में आवागमन, पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है।
  • पंबन पुल (2025): भारत का पहला वर्टिकल-लिफ्ट रेलवे समुद्री पुल उन्नत तटीय इंजीनियरिंग के ज़रिए रामेश्वरम को मुख्य भूमि से जोड़ता है। 2.07 किमी लंबे इस पुल में निर्बाध रेलवे और समुद्री आवागमन के लिए 72.5 मीटर का वर्टिकल लिफ्ट स्पैन है।
  • बैराबी-सैरांग (2025): 51.38 किमी लंबी इस रेलवे लाइन ने चुनौतीपूर्ण पहाड़ी इलाकों से गुजरते हुए मिजोरम तक रेल संपर्क को मजबूत किया है। यह परियोजना 45 सुरंगों से होकर गुजरती है और पूर्वोत्तर के लिए एक महत्वपूर्ण अवसंरचनात्मक उपलब्धि है।

 

सड़कें और राजमार्ग

साल 2014 से भारत के सड़क नेटवर्क में कई गुना वृद्धि हुई है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों और आर्थिक गलियारों में संपर्क बेहतर हुआ है। 63.73 लाख किमी के साथ, भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क वाला देश है। राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई में 61% की वृद्धि हुई है, जो वित्त वर्ष 2014 में 91,287 किमी से बढ़कर मार्च 2026 में 1,46,566 किमी हो गई। चार लेन और उससे अधिक चौड़े राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई 2014 में 18,371 किमी से बढ़कर 45,516 किमी हो गई। देशभर में कुल 3,644 किलोमीटर लंबाई के नियंत्रित-प्रवेश उच्च गति गलियारों/एक्सप्रेसवे का संचालन शुरू किया जा चुका है। राजमार्गों, सड़कों और बाईपास के लिए नीतियों द्वारा समर्थित पहलों का फोकस उच्च गति कॉरिडोर विकास, आर्थिक नोड कनेक्टिविटी और शहरी भीड़भाड़ को कम करने पर रहा।

 

 

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) ने हर मौसम में इस्तेमाल होने वाली सड़क संरचना के माध्यम से ग्रामीण संपर्क को बदल दिया है, जिससे बाजारों, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और आर्थिक अवसरों तक पहुंच में सुधार हुआ है। इस कार्यक्रम के लिए बजटीय आवंटन 2014-15 में ₹386 करोड़ से बढ़कर 2026-27 में ₹19,000 करोड़ हो गया है। अब तक, इस कार्यक्रम के तहत 99.6% पात्र घरों को जोड़ा जा चुका है। पूरी हुई सड़कों की लंबाई 2000-2014 के दौरान 3.86 लाख किलोमीटर से बढ़कर 2014-2026 के दौरान 4.11 लाख किलोमीटर हो गई। इसी अवधि में पूरे हुए पुलों की संख्या 484 से बढ़कर 10,293 हो गई।

माल ढुलाई गलियारों और क्षेत्रीय संपर्क को मजबूत करने के लिए वर्ष 2017 में भारतमाला परियोजना को मंजूरी दी गई थी। इस योजना के तहत निर्मित आर्थिक गलियारों, सीमा सड़कों, तटीय सड़कों और एक्सप्रेसवे ने देश भर में माल ढुलाई को गति दी है। भारतमाला योजना के तहत 31 मार्च 2026 तक 22,590 किलोमीटर सड़कें पूरी हो चुकी हैं। इस योजना के अंतर्गत कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं ने दुर्गम भूभागों और रणनीतिक क्षेत्रों में आवागमन को बेहतर बनाया है।

12 वर्षों में महत्वपूर्ण परियोजनाएं:

  • ज़ेड-मोर/सोनमर्ग सुरंग (2025): 12 किलोमीटर लंबी सोनमर्ग सुरंग जम्मू और कश्मीर के हिमस्खलन और भूस्खलन संभावित हिस्सों से होकर हर मौसम में आवागमन की सुविधा प्रदान करती है। यह सुरंग लद्दाख की ओर आवागमन को सुगम बनाती है और साथ ही पर्यटन, स्थानीय आजीविका और क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ावा देती है।
  • सुदर्शन सेतु (2024): 2.32 किलोमीटर लंबा सुदर्शन सेतु गुजरात के ओखा को बेत द्वारका से जोड़ता है। इस पुल ने द्वीप तक पहुंच को बेहतर बनाया है, जिससे तीर्थयात्रा, पर्यटन और तटीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिला है।
  •  मैत्री सेतु (2021): फेनी नदी पर बना 1.9 किलोमीटर लंबा पुल त्रिपुरा को बांग्लादेश से जोड़ता है। इस परियोजना ने पूर्वोत्तर भारत के लिए रसद की दूरी कम की है, साथ ही क्षेत्रीय व्यापार और यात्री आवागमन को भी मजबूत किया।
  • अटल सुरंग (2020): 9.02 किलोमीटर लंबी अटल सुरंग 10,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित दुनिया की सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग है। यह रोहतांग दर्रे को बाईपास करते हुए मनाली और लाहौल-स्पीति के बीच हर मौसम में आवागमन की सुविधा प्रदान करती है। यह सुरंग मनाली-सरचू की दूरी को 46 किलोमीटर कम कर देती है, जिससे हिमालयी क्षेत्रों में नागरिक और रणनीतिक आवागमन में सुधार होता है।
  •  डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सुरंग (पूर्व में चेनानी-नाशरी सुरंग, 2017): 9 किलोमीटर लंबी यह सुरंग जम्मू और श्रीनगर के बीच हर मौसम में आवागमन की सुविधा प्रदान करती है। यह दुर्गम भूभाग को बाईपास करते हुए यात्रा की दूरी को 31 किलोमीटर और यात्रा समय को लगभग दो घंटे कम कर देती है। इस परियोजना से 2,000 से अधिक स्थानीय श्रमिकों को रोजगार मिला, जिनमें से लगभग 94% जम्मू और कश्मीर के थे।
  •  धोला-सादिया पुल (2017): 9.15 किलोमीटर लंबा यह पुल असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच पहला स्थायी सड़क संपर्क प्रदान करता है। यह रक्षा रसद सहित भारी वाहनों की आवाजाही को सुगम बनाता है और पूर्वोत्तर में क्षेत्रीय संपर्क को बेहतर बनाता है।

पिछले वर्ष की प्रमुख सड़क परियोजनाएं

 

  • अहमदाबाद-धोलेरा एक्सप्रेसवे (गुजरात, 2026): 109 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे ने अहमदाबाद और धोलेरा के बीच संपर्क को बेहतर बनाया है। इसने यात्रा समय को कम किया, भीड़भाड़ को कम किया और धोलेरा क्षेत्र में रसद आवागमन को मजबूत किया।
  • दिल्ली-देहरादून आर्थिक कॉरिडोर (2026): 213 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर ने दिल्ली और देहरादून के बीच यात्रा का समय छह घंटे से घटाकर लगभग ढाई घंटे कर दिया है। इस परियोजना में पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र के भीतर एशिया का सबसे लंबा एलिवेटेड वन्यजीव कॉरिडोर शामिल है।
  •  द्वारका एक्सप्रेसवे का दिल्ली खंड (दिल्ली, 2025): 10.1 किलोमीटर लंबे इस खंड ने दिल्ली और एनसीआर में कनेक्टिविटी में सुधार किया और यातायात जाम को कम किया। इसमें आठ लेन की सुरंग और यशोभूमि, मेट्रो कॉरिडोर और हवाई अड्डे से सीधी कनेक्टिविटी शामिल है।
  •  शहरी विस्तार सड़क-II (दिल्ली, 2025): 76 किलोमीटर लंबी यूईआर-II को दिल्ली की तीसरी रिंग रोड के रूप में विकसित किया गया था। इसने प्रमुख कॉरिडोर पर यातायात जाम को कम किया और बहादुरगढ़ और सोनीपत से कनेक्टिविटी में सुधार किया। इस परियोजना ने एनसीआर में माल ढुलाई को भी गति दी।
  • एनएच-31 पर गंगा नदी पर बना पुल (बिहार, 2025): इस पुल ने मोकामा और बेगुसराय को जोड़ा, जिससे भारी वाहनों के लिए यात्रा की दूरी 100 किलोमीटर से अधिक कम हो गई। इसने उत्तरी और दक्षिणी बिहार के बीच संपर्क को बेहतर बनाया और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया।

नागरिक उड्डयन और क्षेत्रीय हवाई संपर्क

2014 के बाद नागरिक उड्डयन के विकास ने क्षेत्रीय हवाई संपर्क को व्यापक बनाया। 1.4 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश की मदद से परिचालनशील हवाई अड्डों की संख्या 2014 में 74 से बढ़कर 2026 में 165 हो गई। छोटे शहरों को प्रमुख शहरी केंद्रों के साथ मजबूत हवाई संपर्क की सुविधा मिली।

2016 में शुरू की गई उड़े देश का आम नागरिक योजना (उड़ान) ने व्यापक वर्गों के लिए हवाई यात्रा को किफायती और सुलभ बनाया। 2026 तक, 665 मार्ग 95 हवाई अड्डों, हेलीपोर्टों और जल हवाई अड्डों को जोड़ते हैं, जिससे 1.64 करोड़ से अधिक यात्रियों को लाभ होता है। 28,840 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ 2026 में शुरू की गई संशोधित उड़ान योजना का लक्ष्य 120 नए गंतव्यों को जोड़ना है।

प्रमुख और क्षेत्रीय स्थानों पर ग्रीनफील्ड परियोजनाओं और आधुनिक टर्मिनल सुविधाओं के माध्यम से हवाई अड्डे के बुनियादी ढांचे का विस्तार हुआ। 2014 के बाद पच्चीस नए हवाई अड्डों को मंजूरी दी गई है, जिनमें मोपा, कन्नूर, होलोंगी, नवी मुंबई और नोएडा (ज़ेवर) शामिल हैं।

डिजिटल प्रणालियों ने हवाई अड्डों पर यात्रियों के अनुभव और परिचालन दक्षता में सुधार किया है। डिजी यात्रा जैसी पहलों ने चेहरे की पहचान प्रणाली के माध्यम से निर्बाध और संपर्क रहित यात्रा को सक्षम बनाया है। मई 2026 तक, डिजी यात्रा 38 हवाई अड्डों पर कार्यरत है, जिससे 9.3 करोड़ से अधिक यात्रियों को लाभ हुआ है।

2015 में गगन के संचालन से, जो विश्व की पहली भूमध्यरेखीय उपग्रह-आधारित संवर्धन प्रणाली है, नेविगेशन सटीकता और उड़ान सुरक्षा में वृद्धि हुई है। यह बेहतर स्थान सटीकता के माध्यम से आपदा प्रतिक्रिया और खोज एवं बचाव कार्यों में भी सहायता करती है। विमानन क्षेत्र में विस्तार ने पूर्वोत्तर और द्वीपीय क्षेत्रों सहित दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंच में सुधार किया है, साथ ही पर्यटन, व्यापार और आवागमन को भी बढ़ावा दिया है।

 

मेट्रो और क्षेत्रीय तीव्र पारगमन प्रणालियाँ

मेट्रो नेटवर्क की लंबाई 2014 में 248 किमी से बढ़कर 2026 में 1,155 किमी से अधिक हो गई। भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क वाला देश है। मेट्रो कनेक्टिविटी वाले शहरों की संख्या 2014 में 5 से बढ़कर 2025 में 26 हो गई। प्रतिदिन मेट्रो यात्रियों की संख्या भी लगभग 28 लाख से बढ़कर 1.15 करोड़ से अधिक हो गई।

मेट्रो के निर्माण की रफ्तार में भी तोज़ी आई है, जो 2014 से पहले 0.68 किमी प्रति माह थी, अब बढ़कर लगभग 6 किमी प्रति माह हो गई है। मेट्रो अवसंरचना के लिए वार्षिक बजटीय सहायता 2013-14 में लगभग 5,798 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में लगभग 29,550 करोड़ रुपये हो गई। पिछले बारह वर्षों में, देश भर में मेट्रो विस्तार में लगभग 3.7 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया गया।

 

मेट्रो रेल नीति, 2017 ने व्यापक गतिशीलता योजनाओं और शहरी महानगरीय परिवहन प्राधिकरणों के माध्यम से एकीकृत शहरी गतिशीलता नियोजन को मजबूत किया। मेक इन इंडिया पहल के तहत, भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (बीईएमएल) ने मार्च 2026 तक 2,100 से अधिक मेट्रो कोचों का निर्माण किया। खरीद मानदंडों ने मेट्रो कोचों और प्रमुख प्रणालियों की स्वदेशी सोर्सिंग को बढ़ावा दिया।

शहरी परिवहन में किए गए प्रमुख नवाचारों ने शहरों में सतत् और उच्च गति वाली गतिशीलता को मजबूत किया। कोलकाता ने 2024 में हुगली नदी के नीचे भारत की पहली जलमग्न मेट्रो सुरंग का शुभारंभ किया।

इसी बीच, केरल का कोच्चि शहर भारत का पहला ऐसा शहर बन गया जिसने जल मेट्रो परियोजना शुरू की, जो शहर के आसपास के 10 द्वीपों को इलेक्ट्रिक हाइब्रिड नावों से जोड़ती है। यह अभूतपूर्व पहल निर्बाध कनेक्टिविटी सुनिश्चित करती है, जिसकी पहली नाव दिसंबर 2021 में शुरू की गई थी।

दिल्ली-मेरठ कॉरिडोर पर नमो भारत रैपिड रेल (2025) ने उन्नत ईटीसीएस हाइब्रिड लेवल-III सिग्नलिंग तकनीक को अपनाया है, जिससे गति, सुरक्षा और परिचालन दक्षता में सुधार हुआ है।

पत्तन, जहाजरानी और समुद्री संपर्क

आज समुद्री परिवहन भारत के व्यापार का लगभग 95% (मात्रा के हिसाब से) और 70% (मूल्य के हिसाब से) संभालता है, जो इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है। 2014 से बंदरगाह अवसंरचना में उल्लेखनीय मजबूती आई है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में क्षमता, दक्षता और व्यापार सुगमता में वृद्धि हुई है। प्रमुख बंदरगाहों की क्षमता 2014 में 873 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष (एमएमटीपीए) से बढ़कर 2026 में 1,726 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष (एमएमटीपीए) हो गई है, जो लगभग दोगुनी है। माल ढुलाई 581 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) से बढ़कर 915 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) हो गई है, जबकि जहाजों का टर्नअराउंड समय 94 घंटे से घटकर 48.8 घंटे हो गया है।

 

क्षमता विस्तार और दक्षता में वृद्धि के साथ-साथ परिचालन और वित्तीय प्रदर्शन में भी सुधार हुआ है। वार्षिक शुद्ध सरप्लस 2014 में ₹1,805 करोड़ से बढ़कर 2026 में ₹10,910 करोड़ हो गया। इसी अवधि में परिचालन अनुपात 65% से सुधरकर 41% हो गया, जो मजबूत वित्तीय स्थिरता को दर्शाता है। इन लाभों ने बंदरगाहों को घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए कुशल प्रवेश द्वार के रूप में मजबूत किया है।

 

2015 में शुरू किए गए सागरमाला परियोजना ने बंदरगाहों को औद्योगिक समूहों और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क से एकीकृत करके बंदरगाह-आधारित विकास को गति दी है। इसने बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण, अंतिम-मील कनेक्टिविटी और तटीय आर्थिक क्षेत्रों के विकास में सहयोग दिया है। मार्च 2026 तक, ₹5,356.75 करोड़ की 78 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं, जिससे कनेक्टिविटी में सुधार हुआ है और तटीय आजीविका को समर्थन मिला है।

 

शिपिंग बुनियादी ढांचे और समुद्री क्षमता का भी विस्तार हुआ है, जिससे भारत की समुद्री उपस्थिति और लॉजिस्टिक्स क्षमताएं मजबूत हुई हैं। भारतीय ध्वज वाले जहाजों की संख्या 2014 में 1,250 से बढ़कर 2026 में 1,593 हो गई, जबकि सकल टन भार 10.5 एमजीटी से बढ़कर 14.2 एमजीटी हो गया। तटीय शिपिंग कार्गो 74 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर 215.29 मिलियन मीट्रिक टन हो गया, जो तटीय मार्गों के बढ़ते उपयोग को दर्शाता है। नाविकों की संख्या 1.27 लाख से बढ़कर 3.20 लाख हो गई, जिससे समुद्री रोजगार और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत हुई है।

अंतर्देशीय जलमार्ग माल और यात्री परिवहन के लिए एक कुशल और टिकाऊ साधन के रूप में उभरे हैं। भारत ने अपने राष्ट्रीय जलमार्गों के नेटवर्क का विस्तार 2014 में 5 से बढ़ाकर 2026 तक 111 कर दिया है, जो 23 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में 20,187 किमी तक फैला हुआ है। मार्च 2026 तक, 32 जलमार्ग चालू हैं, जिससे अंतर्देशीय जल परिवहन संपर्क मजबूत हुआ है। माल ढुलाई 29 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर 218 मिलियन मीट्रिक टन हो गई है, जो परिवहन के तरीके में महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है। फेरी और रो-पैक्स  द्वारा यात्रियों की आवाजाही 10.55 करोड़ तक पहुंच गई है, जिससे नदी और तटीय क्षेत्रों में संपर्क में सुधार हुआ है।

जल मार्ग विकास परियोजना (जेएमवीपी) ने राष्ट्रीय जलमार्ग-1 पर वाराणसी और हल्दिया के बीच जलमार्ग विकास और बहुआयामी टर्मिनलों के माध्यम से अंतर्देशीय जलमार्ग पर नौवहन को मज़बूत किया। इस परियोजना से माल ढुलाई में भी सुधार हुआ, जो 2014-15 में 5.05 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर 2024-25 में 16.38 मिलियन मीट्रिक टन हो गई। अर्थ गंगा (जेएमवीपी-II) के तहत, सामुदायिक जेट्टी और स्थानीय रसद प्रणालियों ने गंगा गलियारे के साथ आजीविका और आर्थिक गतिविधियों को समर्थन दिया। अप्रैल 2026 तक, एनडब्ल्यू -1 पर 66 सामुदायिक घाट चालू थे, जो स्थानीय आजीविका का समर्थन कर रहे थे और प्रतिदिन लगभग 1.22 लाख उपयोगकर्ताओं को सेवा प्रदान कर रहे थे।

बड़े पैमाने पर समुद्री आधारभूत संरचना परियोजनाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में दीर्घकालिक बंदरगाह क्षमता और रसद प्रतिस्पर्धा को मजबूत किया। वधवन डीप ड्राफ्ट पोर्ट, टूना टेकरा कंटेनर टर्मिनल और कोचीन में अंतरराष्ट्रीय जहाज मरम्मत सुविधा (आईएसआरएफ) जैसी परियोजनाओं ने कंटेनर हैंडलिंग और समुद्री विनिर्माण क्षमता को मजबूत किया। भारत ने दिसंबर 2025 में वाराणसी में अपना पहला हाइड्रोजन ईंधन सेल पोत भी चालू किया, जिससे स्वच्छ और टिकाऊ अंतर्देशीय जल परिवहन को समर्थन मिला।

समुद्री आधारभूत संरचना के विस्तार ने तटीय और नदीय क्षेत्रों में पर्यटन और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया। समुद्री क्रूज यात्रियों की संख्या 2014 में 1.10 लाख से बढ़कर 2026 में 4.62 लाख हो गई। इसी के साथ, रिवर क्रूज मार्गों की संख्या 3 से बढ़कर 17 हो गई। लाइटहाउस पर्यटन और फेरी कनेक्टिविटी परियोजनाओं ने भी कई क्षेत्रों में स्थानीय आजीविका, पर्यटन और तटीय पहुंच को मजबूत किया।

 

औद्योगिक एवं विनिर्माण आधारभूत संरचना

औद्योगिक पार्क और विनिर्माण क्लस्टर निवेश आकर्षित करने और औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मई 2026 तक, भारत के औद्योगिक भूमि बैंक में 4,220 औद्योगिक पार्क सूचीबद्ध हैं, जो लगभग 6.98 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हैं। लगभग 1.33 लाख हेक्टेयर भूमि अभी भी उपलब्ध है, जो भविष्य में औद्योगिक विस्तार और निवेश को सक्षम बनाएगी।

औद्योगिक पार्क तेजी से प्लग-एंड-प्ले अवसंरचना की ओर अग्रसर हो रहे हैं, जिससे स्थापना करने में समय कम हो रहा है और व्यापार करने में सुगमता बढ़ रही है। मई 2026 तक, देश भर में लगभग 272 प्लग-एंड-प्ले औद्योगिक पार्क कार्यरत हैं। राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास कार्यक्रम के तहत 20 अन्य औद्योगिक स्मार्ट शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों का विकास किया जा रहा है। मार्च 2026 में स्वीकृत भव्य (बिल्डिंग हब फॉर एडवांस्ड एंड वाइब्रेंट योजना फॉर एक्सेलरेशन) योजना के तहत देश भर में 100 नए प्लग-एंड-प्ले औद्योगिक पार्कों के विकास की परिकल्पना की गई है।

विभिन्न क्षेत्रों में समन्वित अवसंरचना नियोजन और कार्यान्वयन के माध्यम से औद्योगिक गलियारा विकास में तेजी आई है। परिवहन, रसद और उपयोगिताओं को एकीकृत करने वाले बीस औद्योगिक स्मार्ट शहरों को सात गलियारों में मंजूरी दी गई है। ये केंद्र कुशल विनिर्माण को सक्षम बनाते हैं, रसद लागत को कम करते हैं और आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण को मजबूत करते हैं।

प्रमुख उद्योगों और मूल्य श्रृंखलाओं को समर्थन देने के लिए क्षेत्र-विशिष्ट विनिर्माण तंत्र विकसित किए गए हैं। विनिर्माण अवसंरचना और औद्योगिक तंत्र को मजबूत करने के लिए केंद्रीय बजट 2026-27 में तीन रासायनिक पार्क, सात पीएम मित्र पार्क, एमएसएमई क्लस्टर और 10,000 करोड़ रुपये के बायोफार्मा शक्ति कार्यक्रम का प्रस्ताव रखा गया था। ये पहलें कुशल उत्पादन के लिए साझा उपयोगिताएँ, परीक्षण सुविधाएँ और लॉजिस्टिक्स प्रणालियाँ प्रदान करती हैं।

डिजिटल प्लेटफॉर्म ने निवेशकों और उद्यमों के लिए औद्योगिक आधारभूत संरचना में पारदर्शिता और पहुँच को बेहतर बनाया है। भारतीय औद्योगिक भूमि बैंक (आईआईएलबी) विभिन्न क्षेत्रों में औद्योगिक भूमि और अवसंरचना का जीआईएस-आधारित मानचित्रण प्रदान करता है। यह भूमि की उपलब्धता और कनेक्टिविटी पर वास्तविक समय में डेटा प्रदान करके सूचित निवेश निर्णय लेने में सक्षम बनाता है।

अवसंरचना-आधारित औद्योगिक विकास ने विनिर्माण गंतव्य के रूप में भारत की स्थिति को मजबूत किया है और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ एकीकरण को बेहतर बनाया है। इसने द्वितीय और तृतीय स्तर के शहरों में निवेश, रोजगार सृजन और विनिर्माण गतिविधि के विस्तार को समर्थन दिया है।

लॉजिस्टिक्स और राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता

एकीकृत आधारभूत संरचना नियोजन, डिजिटलीकरण और नियामक सुधारों के माध्यम से लॉजिस्टिक्स पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। 2014 से पहले, परिवहन के विभिन्न साधनों और एजेंसियों में लॉजिस्टिक्स नियोजन बिखरा हुआ था, जिससे परिवहन में देरी और आपूर्ति श्रृंखला की लागत बढ़ जाती थी। पिछले बारह वर्षों में, सरकार ने माल ढुलाई में सुधार और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने के लिए बहुआयामी और प्रौद्योगिकी-आधारित दृष्टिकोण अपनाया है।

अक्टूबर 2021 में प्रधानमंत्री गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के शुभारंभ ने एकीकृत आधारभूत संरचना नियोजन और बहुआयामी कनेक्टिविटी की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव को चिह्नित किया। जून 2026 तक जीआईएस-आधारित इस प्लेटफॉर्म ने 3,202 से अधिक डेटा लेयर्स का उपयोग करते हुए 58 मंत्रालयों और विभागों को एकीकृत किया। इसने अंतिम-मील कनेक्टिविटी को मजबूत करते हुए मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय में सुधार किया।

सितंबर 2022 में शुरू की गई राष्ट्रीय रसद नीति का उद्देश्य सभी क्षेत्रों में रसद दक्षता में सुधार करना और आपूर्ति श्रृंखला लागत को कम करना था। विश्व बैंक रसद प्रदर्शन सूचकांक में भारत की रैंक 2014 में 54 से सुधरकर 2023 में 38 हो गई। भारत का लक्ष्य 2030 तक शीर्ष 25 देशों में शामिल होना है।

एनएलपी को यूएलआईपी, लॉजिस्टिक्स डेटा बैंक और एनईटीसी फास्टैग जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का समर्थन प्राप्त है, जो कार्गो दृश्यता, सूचना साझाकरण और रसद दक्षता में सुधार करते हैं।

  • यूनिफाइड लॉजिस्टिक्स इंटरफेस प्लेटफॉर्म (यूएलआईपी), 2022: एक डिजिटल प्लेटफॉर्म जो कई मंत्रालयों और विभागों से लॉजिस्टिक्स संबंधी डेटा को एक ही इंटरफेस पर एकीकृत करता है। यह वास्तविक समय में सूचनाओं का साझाकरण, शिपमेंट ट्रैकिंग और अनुमानित आगमन समय (ईटीए) को सक्षम बनाता है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला नियोजन में सुधार और लॉजिस्टिक्स लागत में कमी लाने में मदद मिलती है। मार्च 2025 तक, यूएलआईपी ने 100 करोड़ से अधिक एपीआई लेनदेन दर्ज किए थे।
  • लॉजिस्टिक्स डेटा बैंक (एलडीबी), 2016: यह एक प्रौद्योगिकी-आधारित प्रणाली है, जो बंदरगाहों, टर्मिनलों और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में ईएक्सआईएम कंटेनरों की आवाजाही की संपूर्ण दृश्यता प्रदान करती है। अक्टूबर 2024 तक, एलडीबी ने 75 मिलियन से अधिक एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट (ईएक्सआईएम) कंटेनरों को ट्रैक किया था, जिससे पारदर्शिता और वास्तविक समय में कार्गो निगरानी में सुधार हुआ।
  • नेटसी फास्टैग, 2016: एक इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह प्रणाली, जो राष्ट्रीय राजमार्गों पर माल और यात्री वाहनों की सुगम टोल भुगतान और तेज आवाजाही को सक्षम बनाती है। दिसंबर 2025 तक, 11.86 करोड़ फास्टैग जारी किए जा चुके थे, और राजमार्ग टोल संग्रह का 98% से अधिक हिस्सा फास्टैग-आधारित इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन के माध्यम से हुआ था।

सरकार का परियोजनाओं के त्वरित क्रियान्वयन और समन्वित अवसंरचना वितरण पर जोर प्रगति (सक्रिय शासन और समयबद्ध कार्यान्वयन) जैसे प्लेटफार्मों के माध्यम से परिलक्षित होता है। 2015 में शुरू किए गए इस प्लेटफार्म ने प्रमुख परियोजनाओं में देरी, लागत में वृद्धि और समन्वय संबंधी चुनौतियों का समाधान किया। प्रगति के तहत, 85 लाख करोड़ रुपये से अधिक की 382 परियोजनाओं की समीक्षा की गई है, जबकि 2,958 पहचाने गए मुद्दों का समाधान किया गया है।

इन सुधारों ने रसद दक्षता में सुधार किया, आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत किया और भारत को एक एकीकृत विनिर्माण और रसद केंद्र के रूप में उभरने में सहयोग दिया।

जल अवसंरचना और जल सुरक्षा

पेयजल की उपलब्धता, सिंचाई, नदी पुनर्जीवन और संरक्षण प्रणालियों में बड़े पैमाने पर निवेश के माध्यम से जल अवसंरचना का विस्तार हुआ है। पहले, लाखों ग्रामीण परिवारों को नल के पानी की सुनिश्चित उपलब्धता नहीं थी, जबकि खंडित संस्थागत संरचनाओं ने एकीकृत जल प्रबंधन को सीमित कर दिया था। 2019 में जल शक्ति मंत्रालय के गठन से पेयजल, स्वच्छता और जल संसाधन प्रबंधन को एक एकीकृत ढांचे के अंतर्गत लाया गया।

2019 में शुरू किए गए जल जीवन मिशन ने घरों में नल कनेक्शन के माध्यम से ग्रामीण पेयजल की उपलब्धता में परिवर्तन किया। इस मिशन की शुरुआत के समय, केवल 3.23 करोड़ ग्रामीण परिवारों, यानी लगभग 17% परिवारों के पास ही नल के पानी का कनेक्शन था। जून 2026 तक, लगभग 15.86 करोड़ परिवारों को नल के पानी का कनेक्शन मिल चुका था, जिससे 81.94% कवरेज हासिल हुआ। इस मिशन को 2028 तक बढ़ा दिया गया है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में सभी को नल के पानी की सुविधा उपलब्ध कराना है।

 

 

घरों में नल के पानी की उपलब्धता बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमसाध्य कार्य कम हुआ और स्वास्थ्य एवं आजीविका में सुधार हुआ। स्वच्छ जल की उपलब्धता से विशेष रूप से महिलाओं और परिवारों का जीवन बेहतर हुआ, क्योंकि पानी लाने में लगने वाला समय कम हो गया।

सरकार ने प्रमुख राष्ट्रीय कार्यक्रमों और नदी-जोड़ने की पहलों के माध्यम से सिंचाई एवं जल संरक्षण अवसंरचना का भी विस्तार किया:

  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, 2015 (पीएमकेएसवाई): कृषि क्षेत्रों में सिंचाई की उपलब्धता और जल उपयोग दक्षता में सुधार।
  • नमामि गंगे कार्यक्रम, 2014: नदी पुनर्जीवन, सीवरेज आधारभूत संरचना और प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियों को सुदृढ़ किया।
  •  केन-बेतवा लिंक परियोजना, 2021: भारत की पहली नदी-जोड़ने की परियोजना कार्यान्वयन के अधीन है, जिससे सूखाग्रस्त बुंदेलखंड क्षेत्रों को लाभ मिल रहा है।
  •  प्रौद्योगिकी आधारित शासन की वजह से 2014 के बाद बाढ़ पूर्वानुमान, बांध सुरक्षा और जल विज्ञान निगरानी प्रणालियों में भी मजबूती आई है। फ्लडवॉच इंडिया ऐप, बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021 और डिजिटल निगरानी प्लेटफार्मों ने तैयारी, जलाशय प्रबंधन और साक्ष्य-आधारित जल शासन में सुधार किया है।

आवास और घरेलू अवसंरचना

2014 के बाद आवास विकास में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में किफायती आवास, गरिमा और बुनियादी सेवाओं तक पहुंच पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है। सरकारी कार्यक्रम आवास से जुड़े हैं, स्वच्छता, बिजली, पेयजल और स्वच्छ खाना पकाने की सुविधा प्रदान करते हैं, जिससे लाखों परिवारों का कल्याण सुनिश्चित होता है।

वर्ष 2015 में शुरू की गई प्रधानमंत्री आवास योजना - शहरी (पीएमएवाई-यू) के चलते "सभी के लिए आवास" के विजन के तहत किफायती आवास तक पहुंच में क्रांतिकारी बदलाव आया। सितंबर 2024 में शुरू की गई पीएमएवाई-यू 2.0 का लक्ष्य 2028-29 तक एक करोड़ अतिरिक्त पात्र शहरी लाभार्थियों को सहायता प्रदान करना है। इस कार्यक्रम के तहत मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए किफायती आवास सहायता हेतु लगभग ₹8.77 लाख करोड़ आवंटित किए गए हैं।

पीएमएवाई-यू के तहत स्वीकृत 125.31 लाख घरों में से मई 2026 तक लगभग 98.10 लाख घरों का निर्माण किया गया था यह 2005-2014 के दौरान निर्मित 8.04 लाख घरों की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाता है। इस कार्यक्रम ने लाभार्थी-नेतृत्व वाली निर्माण परियोजनाओं, किफायती आवास साझेदारी, मौजूदा झुग्गी-झोपड़ी पुनर्विकास और आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए ब्याज सब्सिडी जैसी सुविधाओं का समर्थन किया।

पीएमएवाई-यू की क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी योजना (सीएलएसएस) के तहत ₹59,318 करोड़ से अधिक की ब्याज सब्सिडी वितरित की गई, जिससे शहरी परिवारों के लिए आवास की सामर्थ्य में सुधार हुआ। आवास वितरण को जेजेएम, सौभाग्य, एसबीएम और पीएमएवाई जैसी योजनाओं के साथ एकीकृत किया गया, जिससे आवश्यक घरेलू सेवाओं तक पहुंच में सुधार हुआ। पीएमएवाई-यू 2.0 के तहत लगभग 96% घर महिलाओं को आवंटित किए गए, जिससे स्वामित्व अधिकारों और वित्तीय समावेशन को मजबूती मिली।

ग्रामीण क्षेत्रों में सभी के लिए आवास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमएवाई-जी) 2016 में शुरू की गई थी। इस योजना का उद्देश्य मार्च 2029 तक 4.95 करोड़ पात्र ग्रामीण परिवारों को बुनियादी सुविधाओं से युक्त घर उपलब्ध कराना है। 2024 में, 2024-25 से 2028-29 की अवधि के लिए इस कार्यक्रम के तहत अतिरिक्त 2 करोड़ घरों के निर्माण को मंजूरी दी गई थी। जून 2026 तक, 3.91 करोड़ घरों को मंजूरी दी जा चुकी है और 3.06 करोड़ घर पूरे हो चुके हैं, जिससे पूरे ग्रामीण भारत में आवास सुरक्षा और जीवन स्तर में सुधार हुआ है। लाभार्थियों में लगभग 75% महिलाएं हैं, जो ग्रामीण परिवारों में संपत्ति के स्वामित्व और वित्तीय सुरक्षा को बढ़ाने में योगदान दे रही हैं।

2019 में शुरू किया गया स्वामिह (किफायती और मध्यम आय आवास के लिए विशेष विंडो) फंड, मध्यम और निम्न-मध्यम आय वर्ग के गृहस्वामियों के लिए रुके हुए आवासीय परियोजनाओं को पूरा करने में सहायता करता है। 15,531 करोड़ रुपये के कोष से समर्थित इस फंड ने 63,000 से अधिक घरों का निर्माण किया है, जिससे लगभग 2.52 लाख लोगों को लाभ हुआ है। यह फंड 1,01,443 से अधिक घरों के पोर्टफोलियो को कवर करता है और इसने आवास क्षेत्र में खरीदारों का विश्वास पुनर्जीवित करने में मदद की है।

अटल मिशन फॉर रिजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (अमृत) और अमृत 2.0 के माध्यम से शहरी अवसंरचना विकास में तेजी आई है। 2015 में शुरू किए गए इस मिशन का उद्देश्य शहरों में जल आपूर्ति, सीवरेज नेटवर्क, वर्षा जल निकासी, हरित क्षेत्रों और गैर-मोटर चालित परिवहन को मजबूत करना है। 2015 और 2026 के बीच, अमृत और अमृत 2.0 के तहत लगभग 2.79 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जबकि 2015 से पहले जेएनएनयूआरएम के तहत 62,983 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी। इस कार्यक्रम के तहत अमृत, अमृत 2.0 और अभिसरण पहलों के माध्यम से लगभग 2.53 करोड़ नल के पानी के कनेक्शन प्रदान किए गए हैं और 7,943 से अधिक शहरी आधारभूत संरचना परियोजनाएं पहले ही पूरी हो चुकी हैं।

ऊर्जा सुरक्षा और सार्वभौमिक विद्युतीकरण

घरों और उद्योगों को बिजली प्रदान करने से लेकर परिवहन नेटवर्क को सुचारू रूप से चलाने तक, ऊर्जा परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनी हुई है। सरकार ने बिजली की उपलब्धता, नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन, ट्रांसमिशन संबंधित आधारभूत संरचना और ऊर्जा दक्षता पर केंद्रित बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया। इन उपायों से दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देते हुए घरेलू कल्याण को मजबूत किया गया।

 

भारत के विद्युत क्षेत्र में 2014 के बाद विश्वसनीयता, बिजली की उपलब्धता और वित्तीय प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार हुआ। बिजली की कमी 2014 में 4.2% से घटकर 2025-26 में 0.03% हो गई। इसी अवधि के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में औसत बिजली उपलब्धता 12.5 घंटे से बढ़कर 22.6 घंटे प्रतिदिन हो गई। डिस्कॉम के वित्त में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ, जो वित्त वर्ष 2013-14 में ₹67,962 करोड़ के घाटे से वित्त वर्ष 2024-25 में ₹2,701 करोड़ के लाभ में परिवर्तित हो गया।

 

भारत की स्थापित विद्युत क्षमता मार्च 2026 तक 532.74 गीगावाट तक पहुंच गई, जबकि 2014 में यह 248 गीगावाट थी। भारत ने COP21 के अपने लक्ष्य को भी लगभग एक दशक पहले ही हासिल कर लिया, जिसके तहत उसे अपनी 40 प्रतिशत विद्युत क्षमता गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त करनी थी।

 

2014 के बाद भारत दुनिया के अग्रणी नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादकों में से एक बनकर उभरा:

  • वैश्विक स्तर पर तीसरी सबसे बड़ी स्वच्छ ऊर्जा क्षमता
  • वैश्विक स्तर पर चौथी सबसे बड़ी स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता

2024 में शुरू की गई प्रधानमंत्री सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना ने सब्सिडी और वित्तीय सहायता के माध्यम से घरों में रूफटॉप सोलर पैनल लगाने को गति दी। इस कार्यक्रम का उद्देश्य एक करोड़ घरों को रूफटॉप सोलर सिस्टम उपलब्ध कराना और साथ ही घरेलू बिजली खर्च को कम करना है।

स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन में अपशिष्ट-से-ऊर्जा पहल भी शामिल थी। गोबरधन योजना (2018) जैव अपघटनीय अपशिष्ट को बायोगैस और जैविक खाद में परिवर्तित करने को बढ़ावा देती है। यह योजना स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन, ग्रामीण स्वच्छता और चक्रीय अर्थव्यवस्था प्रथाओं का समर्थन करती है। मार्च 2026 तक देश भर में 5 घन मीटर और उससे अधिक क्षमता वाले 1,014 से अधिक गोबरधन संयंत्र कार्यरत हैं।

2017 में शुरू की गई सौभाग्य योजना ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में घरेलू विद्युतीकरण को रफ्तार दी। इस कार्यक्रम के तहत लगभग 2.86 करोड़ घरों में विद्युतीकरण किया गया, जिससे लगभग सभी घरों में बिजली की पहुंच सुनिश्चित हुई।

भारत ने फ्रांस के साथ संयुक्त रूप से स्थापित अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) के माध्यम से स्वच्छ ऊर्जा सहयोग में अपने वैश्विक नेतृत्व को मजबूत किया है। इस गठबंधन में 125 सदस्य देश शामिल हैं, जो सौर ऊर्जा के उपयोग और सतत् विकास पर वैश्विक सहयोग का समर्थन करते हैं। जी20 की अध्यक्षता के दौरान, भारत ने स्वच्छ ईंधन और ऊर्जा परिवर्तन पर वैश्विक सहयोग को आगे बढ़ाया, जिसमें वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन (जीबीए) का शुभारंभ भी शामिल है। 1 जून 2026 तक, जीबीए का विस्तार 33 देशों और 14 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों तक हो चुका है, जो सतत् ईंधन पर भारत के नेतृत्व में वैश्विक विश्वास को दर्शाता है।

स्वच्छ खाना पकाने की सुविधा और एलपीजी अवसंरचना

2014 के बाद बड़े पैमाने पर द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) अवसंरचना विकास और लक्षित कल्याणकारी पहलों के माध्यम से स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन तक पहुंच में सुधार हुआ है। मुख्य ध्यान सामर्थ्य, घरेलू ऊर्जा पहुंच, ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच और आपूर्ति सुरक्षा पर रहा। एलपीजी की व्यापक पहुंच ने विशेष रूप से ग्रामीण परिवारों में, पारंपरिक जैव ईंधन पर निर्भरता को कम किया।

देश भर में एलपीजी की पहुंच 2014 में 55.9% से बढ़कर 2026 में 107.2% हो गई। यह वृद्धि देश भर में एलपीजी की व्यापक पहुंच, वितरण और मजबूत आपूर्ति नेटवर्क को दर्शाती है। वर्ष 2014 से 2026 तक एलपीजी उपभोक्ताओं की संख्या 14.51 करोड़ से बढ़कर 33.39 करोड़ हो गई। वहीं, एलपीजी की खपत लगभग दोगुनी होकर वित्त वर्ष 2014-15 में 17.6 मिलियन मीट्रिक टन से वित्त वर्ष 2025-26 में 34 मिलियन मीट्रिक टन हो गई। एलपीजी वितरकों और बॉटलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भी इसकी पहुंच में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई), 2016 ने गरीब परिवारों में स्वच्छ खाना पकाने की सुविधा बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पीएमयूवाई लाभार्थियों को वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान लगभग 49.21 करोड़ सिलेंडर रिफिल किए गए, जिनका औसत प्रतिदिन लगभग 15.9 लाख सिलेंडर रहा। सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान पीएमयूवाई के तहत अतिरिक्त 25 लाख एलपीजी कनेक्शन जारी करने को भी मंजूरी दी, ताकि सभी को पर्याप्त संख्या में एलपीजी कनेक्शन मिल सकें।

पीएमयूवाई लाभार्थियों के बीच खपत के पैटर्न में भी लगातार सुधार हुआ है, जो स्वच्छ भोजन को व्यापक रूप से अपनाने को दर्शाता है। औसत वार्षिक रिफिल खपत वित्त वर्ष 2021-22 में 3.68 रिफिल से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 4.71 रिफिल हो गई है।

 

 

सरकार ने एलपीजी प्रणालियों में पारदर्शिता, सब्सिडी लक्ष्यीकरण और आपूर्ति सुरक्षा को भी मजबूत किया। आधार-आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और डेटाबेस एकीकरण पहलों से लाभार्थी सत्यापन और सब्सिडी वितरण में सुधार हुआ।

 

डिजिटल कनेक्टिविटी और सार्वजनिक डिजिटल आधारभूत संरचना

पिछले एक दशक में, डिजिटल भुगतान से लेकर ऑनलाइन सार्वजनिक सेवाओं तक, डिजिटल आधारभूत संरचना रोजमर्रा की जिंदगी का अभिन्न अंग बन गई है। अब शहरी और ग्रामीण भारत में जनसंख्या-स्तरीय डिजिटल आधारशिला बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इसने वित्तीय समावेशन, शासन वितरण, डिजिटल वाणिज्य, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और नागरिक सेवाओं को बढ़ावा दिया है।

भारत का टेली-घनत्व, जो प्रति 100 लोगों पर टेलीफोन कनेक्शनों की संख्या को मापता है, 2014 में 75.23% से बढ़कर 2025 में 86.23% हो गया। इसी अवधि में, इंटरनेट कनेक्शन लगभग चार गुना बढ़कर 25.15 करोड़ से 100.29 करोड़ हो गए।

ब्रॉडबैंड कनेक्शन 2014 में 6.1 करोड़ से बढ़कर 2025 में 99.56 करोड़ हो गए, जो डिजिटल पहुंच में वृद्धि (+1,532.13) को दर्शाता है। प्रति उपयोगकर्ता औसत मासिक डेटा खपत 2014 में 61.66 एमबी से बढ़कर 2025 में 24.01 जीबी हो गई (लगभग 399 गुना वृद्धि)। अब लगभग 85.5% भारतीय घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन है।

2020 में शुरू किए गए पीएम-वानी (वाई-फाई एक्सेस नेटवर्क इंटरफेस) फ्रेमवर्क ने विकेंद्रीकृत सार्वजनिक वाई-फाई हॉटस्पॉट के माध्यम से किफायती सार्वजनिक इंटरनेट पहुंच का विस्तार किया। जून 2026 तक, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 4.10 लाख से अधिक वाई-फाई हॉटस्पॉट कार्यरत हैं।

 

 

2022 में 5G सेवाओं के शुभारंभ के बाद अगली पीढ़ी के दूरसंचार अवसंरचना के विस्तार में तेजी आई। 2026 तक, लगभग 85% आबादी को कवर करते हुए 99.9% जिलों में 5G सेवाएं उपलब्ध थीं। दूरसंचार सेवा प्रदाताओं ने देश भर में 5.08 लाख से अधिक 5G बेस ट्रांससीवर स्टेशन (बीटीएस) स्थापित किए। भारत 5G स्मार्टफोन के लिए विश्व का दूसरा सबसे बड़ा बाजार बनकर उभरा। साथ ही, भारतनेट और राष्ट्रीय ब्रॉडबैंड मिशन जैसी पहलों ने ग्रामीण ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी और सार्वजनिक वाई-फाई पहुंच को मजबूत किया।

जनधन, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी (JAM Trinity) पर आधारित अंतरसंचालनीय प्लेटफार्मों के ज़रिए भारत का डिजिटल सार्वजनिक आधारभूत संरचना तंत्र भी तेजी से विस्तारित हुआ। आधार-आधारित डिजिटल पहचान प्रणालियों ने प्रमाणीकरण और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण संरचना को मजबूत किया, जबकि जनधन खातों ने वित्तीय समावेशन को और गहरा किया। आधार खाता बनवाने वालों की संख्या 2014 में 63.22 करोड़ से बढ़कर मार्च 2026 तक 144 करोड़ से अधिक हो गई। जन-धन खातों की संख्या 2015 में 14.72 करोड़ से बढ़कर 2026 में 57.71 करोड़ हो गई।

यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) दुनिया की सबसे बड़ी रियल-टाइम भुगतान प्रणालियों में से एक बनकर उभरा है। अकेले मार्च 2026 में, यूपीआई ने ₹29.53 लाख करोड़ से अधिक मूल्य के लगभग 2,264 करोड़ लेनदेन संसाधित किए। यूपीआई आधारित डिजिटल भुगतान अब आठ देशों में चालू हैं। इनमें संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, फ्रांस, मॉरीशस और कतर शामिल हैं। इस विस्तार ने भारत की वैश्विक डिजिटल भुगतान उपस्थिति को मजबूत किया है।

 

नागरिक-केंद्रित डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने शासन, दस्तावेज़ीकरण, स्वास्थ्य सेवा और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच में सुधार किया है:

 

  • 68.91 करोड़ से अधिक पंजीकृत उपयोगकर्ताओं और 967 करोड़ से अधिक जारी किए गए डिजिटल दस्तावेजों के साथ डिजीलॉकर, प्रमाणपत्रों, पहचान दस्तावेजों और सरकारी अभिलेखों तक सुरक्षित पहुंच सक्षम बनाता है।
  • 10.93 करोड़ उपयोगकर्ताओं के साथ उमंग (नए युग के शासन के लिए एकीकृत मोबाइल एप्लिकेशन) एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म के ज़रिए हजारों सरकारी सेवाओं तक पहुंच प्रदान करता है।
  •  कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी), जो 2014 में 0.83 लाख केंद्रों से बढ़कर अप्रैल 2026 तक 5.01 लाख से अधिक कार्यरत केंद्र बन गए हैं, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में नागरिक सेवाओं की डिजिटल पहुंच और वितरण में सुधार करते हैं।
  • ई-हॉस्पिटल प्लेटफॉर्म 4,100 अस्पतालों को जोड़ता है और 55 करोड़ से अधिक लेनदेन की सुविधा प्रदान करता है, जिससे डिजिटल स्वास्थ्य सेवा वितरण और रोगियों की पहुंच मजबूत होती है।
  • पीएम ई-विद्या पहल डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्मों को एकीकृत करती है, जिससे राष्ट्रव्यापी शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित होती है।
  • दीक्षा (डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर फॉर नॉलेज शेयरिंग), जिसके 2 करोड़ से अधिक पंजीकृत उपयोगकर्ता हैं, एक एकीकृत, एआई-सक्षम डिजिटल शिक्षा मंच के रूप में कार्य करता है। सभी राज्य/केंद्र शासित प्रदेश इससे जुड़े हुए हैं और इसमें 7,497 उन्नत पाठ्पुस्तकें और 3.74 लाख से अधिक ई-सामग्री संसाधन उपलब्ध हैं।
  • स्वयं (स्टडी वेब्स ऑफ एक्टिव लर्निंग फॉर यंग एस्पायरिंग माइंड्स), जिसके 6.1 करोड़ से अधिक नामांकन और 280 से अधिक स्वंय प्रभा डीटीएच चैनल हैं, 24x7 शैक्षिक सामग्री प्रदान करता है।

डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास ने डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजनाओं जैसी पहलों के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स और दूरसंचार विनिर्माण को भी मजबूत किया है।

 

विकसित भारत की नींव का निर्माण

पिछले बारह वर्षों में भारत के आधारभूत संरचना विकास ने विभिन्न क्षेत्रों में विकास की गति और पैमाने को नया रूप दिया है। राजमार्ग, रेलवे, बंदरगाह और हवाई अड्डे लोगों, वस्तुओं और सेवाओं की सुगम आवाजाही में सहायक साबित हो रहे हैं। शहरी और ग्रामीण अवसंरचना का प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक सेवा वितरण के साथ गहरा एकीकरण हुआ है। बड़े पैमाने पर निवेश से देश भर में नए आर्थिक गलियारे, विनिर्माण केंद्र, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और डिजिटल व्यवस्था का निर्माण हुआ है। ये आधारशिलाएं भारत के विकसित भारत 2047 तक के सफर में लगातार सहयोग प्रदान कर रही हैं।

संदर्भ

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शिक्षा मंत्रालय

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मिज़ोरम राज्य

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वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन

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भारत के विकास का आधार: आधारभूत संरचना

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पीआईबी शोध

पीके/केसी/एनएस


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