Others
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम
पारदर्शिता, संप्रभुता और लोकतांत्रिक जवाबदेही
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यूएस)
Posted On:
22 JUL 2026 5:49PM
प्रश्न: विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) क्या है?
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) किसी ‘विदेशी स्रोत’ से प्राप्त विदेशी अंशदान को स्वीकार करने और उसके उपयोग को विनियमित करता है। विदेशी अंशदान वस्तु, मुद्रा या विदेशी प्रतिभूति के रूप में हो सकता है और इसमें ऐसे योगदान से होने वाली निर्दिष्ट आय भी शामिल है।
गृह मंत्रालय द्वारा प्रशासित यह अधिनियम तीन प्रमुख कार्य करता है- यह निर्धारित करता है कि कौन विदेशी अंशदान स्वीकार कर सकता है और किन शर्तों पर, यह तय करता है कि धनराशि किस प्रकार प्राप्त, लेखाबद्ध और रिपोर्ट की जाएगी तथा यह विदेशी वित्तपोषित उन सीमित गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाता है, जो भारत की संप्रभुता, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकती हैं। इस कानून की शुरुआत वर्ष 1976 में हुई थी और समय-समय पर इसमें संशोधन कर इसे और मजबूत बनाया गया। वर्ष 2010 में नया कानून लागू किया गया, जिसमें बाद में 2016, 2018, 2020 और अब 2026 में संशोधन किए गए।
प्रश्न: क्या एफसीआरए गैर-सरकारी संगठनों (एनसजीओ) और नागरिक समाज संगठनों को विदेशी दान प्राप्त करने से रोकता है?
नहीं। एफसीआरए विदेशी दान पर कोई सामान्य प्रतिबंध नहीं लगाता। यह पात्र संगठनों को पंजीकरण या पूर्व अनुमति प्राप्त करने के बाद विदेशी अंशदान स्वीकार करने की अनुमति देता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि इस धनराशि को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार प्राप्त, उपयोग और रिपोर्ट किया जाए।
दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों, जैसे- संयुक्त राज्य अमेरिका (एफएआरए), ऑस्ट्रेलिया (एफआईटीएस), यूनाइटेड किंगडम (एफआईआरएस) और कनाडा (एफआईटीएए) ने भी विदेशी वित्तपोषण और विदेशी प्रभाव में पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाए हैं। इन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी भी प्रकार का "प्रतिबंध" नहीं माना जाता। हालांकि इन कानूनों का दायरा और कानूनी ढांचा अलग-अलग देशों में भिन्न है, लेकिन इनका साझा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सीमा-पार से आने वाला वित्तपोषण और प्रभाव पारदर्शी हो तथा आवश्यक सुरक्षा उपायों के अधीन रहे।
वर्ष 2024-25 में लगभग 16,200 संगठन सक्रिय रूप से पंजीकृत थे और उन्होंने लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान प्राप्त किया। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि यह कानून किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं है। इसे विदेशी वित्तपोषित गतिविधियों के लिए पंजीकरण और प्रकटीकरण व्यवस्था के रूप में समझा जाना चाहिए, न कि नागरिक समाज के अस्तित्व की अनुमति देने वाली व्यवस्था के रूप में।
प्रश्न: एफसीआरए के मुख्य उद्देश्य क्या हैं?
एफसीआरए कुछ मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित है-
पारदर्शिता: विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले प्रत्येक संगठन को पंजीकरण कराना होगा, धनराशि सत्यापित बैंकिंग चैनल के माध्यम से प्राप्त करनी होगी तथा प्राप्त राशि, दानदाता और उपयोग के उद्देश्य का खुलासा करना होगा।
जवाबदेही: प्राप्तकर्ताओं को प्रतिवर्ष ऑडिट की गई वार्षिक रिपोर्ट ऑनलाइन दाखिल करनी होगी।
संप्रभुता: विदेश से प्राप्त ऐसे अंशदान, जो भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं, चुनावी प्रक्रिया, सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं, उन्हें विनियमित किया जाता है।
वास्तविक कार्यों को प्रोत्साहन: शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन, आपदा राहत, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में वैध अंतरराष्ट्रीय सहयोग निर्बाध रूप से जारी रहता है।
जन विश्वास: जब नागरिकों को यह जानकारी होती है कि विदेशी वित्तपोषण पंजीकृत, सार्वजनिक और ऑडिटेड है, तो स्वैच्छिक संगठनों और उनके कार्यों पर विश्वास बढ़ता है।
प्रश्न:. पहला कानून बनने के बाद से एफसीआरए का विकास कैसे हुआ है?
भारत ने पहला विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) वर्ष 1976 में लागू किया था। वर्ष 1984 में किए गए संशोधन के तहत विदेशी धन प्राप्त करने वाले सभी गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के लिए गृह मंत्रालय में पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया। वर्तमान एफसीआरए, 2010 ने 1976 के अधिनियम का स्थान लिया और अधिक सुदृढ़ अनुपालन व्यवस्था लागू की।
2020 के संशोधन में पदाधिकारियों के लिए आधार/पासपोर्ट की अनिवार्य पहचान, विदेशी अंशदान को केवल भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई), नई दिल्ली की एक निर्धारित शाखा में प्राप्त करने की व्यवस्था, सब-ग्रांट (अन्य संस्थाओं को विदेशी धन हस्तांतरित करने) पर प्रतिबंध, प्रशासनिक खर्च की सीमा 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत करना तथा पंजीकरण निलंबन की अवधि बढ़ाने जैसे प्रावधान किए गए।
2022 के नियमों के तहत विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों से प्राप्त योगदान की सीमा 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दी गई। 2024-25 के नियमों में प्रशासनिक मद के लिए स्वीकृत लेकिन खर्च न हो सकने वाली राशि को अगले वर्ष तक आगे ले जाने की अनुमति दी गई तथा पंजीकरण के नवीनीकरण से संबंधित दस्तावेजी प्रक्रिया को और सुदृढ़ बनाया गया। इन सभी सुधारों का उद्देश्य एक ही दिशा में रहा है- अधिक पारदर्शिता, मजबूत जवाबदेही और बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था सुनिश्चित करना।
प्रश्न: व्यावहारिक रूप से एफसीआरए पंजीकरण की प्रक्रिया कैसे काम करती है?
कोई भी संगठन जो विदेशी अंशदान प्राप्त करना चाहता है, उसे या तो एफसीआरए पंजीकरण प्राप्त करना होता है जो कम से कम तीन वर्षों से कार्यरत संगठनों के लिए उपलब्ध है या किसी निर्धारित परियोजना के लिए पूर्व अनुमति लेनी होती है। दोनों ही प्रक्रियाओं में पहचान का सत्यापन, प्रस्तावित गतिविधियों का विवरण तथा पदाधिकारियों की जानकारी देना अनिवार्य होता है।
सभी विदेशी अंशदान सबसे पहले भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई), नई दिल्ली मुख्य शाखा में खोले गए एकमात्र निर्धारित एफसीआरए खाते में प्राप्त किए जाने चाहिए। इससे धनराशि के लिए एक ऑडिट योग्य एकल प्रवेश बिंदु सुनिश्चित होता है। इसके बाद इस खाते से धनराशि को वैध कार्यक्रमों और परियोजनाओं के संचालन के लिए अन्य परिचालन खातों में स्थानांतरित किया जा सकता है।
एफसीआरए पंजीकरण प्रमाणपत्र की वैधता पाँच वर्ष की होती है। इसकी अवधि समाप्त होने पर इसका नवीनीकरण कराना आवश्यक होता है, और नवीनीकरण के समय संगठन के अनुपालन की भी समीक्षा की जाती है।
प्रश्न: एफसीआरए के तहत पंजीकृत संगठनों के लिए वित्तीय अनुशासन संबंधी क्या आवश्यकताएँ हैं?
संगठनों को यह स्पष्ट रूप से घोषित करना होता है कि वे किस उद्देश्य से विदेशी अंशदान प्राप्त कर रहे हैं, और प्राप्त धनराशि का उपयोग केवल उन्हीं घोषित उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए।
वार्षिक विदेशी अंशदान का अधिकतम 20 प्रतिशत ही प्रशासनिक खर्चों पर व्यय किया जा सकता है। शेष 80 प्रतिशत राशि का उपयोग उन गतिविधियों और परियोजनाओं पर किया जाना अनिवार्य है, जिनके लिए यह विदेशी अंशदान प्राप्त किया गया है।
प्रत्येक पंजीकृत संगठन को फॉर्म एफसी-4 में अपनी वार्षिक विवरणी दाखिल करनी होती है। इसमें प्राप्त धनराशि का पूर्ण ऑडिटेड विवरण, दानदाताओं की पहचान, प्रत्येक दानदाता से प्राप्त राशि तथा धन के उपयोग का विस्तृत ब्यौरा शामिल होना चाहिए। ये सभी वार्षिक विवरण सरकार के ऑनलाइन एफसीआरए पोर्टल https://fcraonline.nic.in/ पर दाखिल किए जाते हैं, जिससे एक खोज योग्य और प्रतिवर्ष अद्यतन होने वाला डेटाबेस तैयार होता है।
प्रश्न: एफसीआरए के तहत विदेशी अंशदान का उपयोग किन गतिविधियों के लिए किया जा सकता है?
एफसीआरए के तहत भारतीय समाज के लगभग सभी क्षेत्रों से जुड़ी अनेक प्रकार की गतिविधियाँ विदेशी अंशदान प्राप्त करने के लिए पात्र हैं। इनमें शामिल हैं-
- शिक्षा: विद्यालय, महाविद्यालय, व्यावसायिक प्रशिक्षण, छात्रवृत्ति सहायता और वयस्क साक्षरता कार्यक्रम।
- स्वास्थ्य सेवाएँ: अस्पताल, क्लीनिक, मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयाँ, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएँ।
- ग्रामीण विकास: जलागम विकास, आजीविका सहायता, स्वच्छता और स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता।
- सामाजिक कल्याण: दिव्यांगजनों की सहायता, वृद्धजन देखभाल, बाल कल्याण तथा महिला सशक्तिकरण।
- पर्यावरण संरक्षण: प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, वनीकरण, स्वच्छ ऊर्जा और प्रदूषण नियंत्रण।
- संस्कृति एवं विरासत: सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण, लोक कलाओं का संवर्धन और संग्रहालयों का विकास।
- राहत एवं पुनर्वास: आपदा राहत, आपातकालीन सहायता तथा आपदा के बाद पुनर्वास कार्य।
- आस्था आधारित कल्याण: पूजा स्थलों का रखरखाव, धार्मिक शिक्षा और ध्यान (मेडिटेशन) कार्यक्रम।
- वैज्ञानिक अनुसंधान: अनुसंधान संस्थान, शैक्षणिक सहयोग तथा ज्ञान का प्रसार।
प्रश्न: एफसीआरए के तहत कौन विदेशी अंशदान प्राप्त नहीं कर सकता?
एफसीआरए के तहत कुछ व्यक्तियों और संस्थाओं की एक सीमित एवं निश्चित सूची है, जिन्हें किसी भी परिस्थिति में विदेशी अंशदान प्राप्त करने की अनुमति नहीं है। इस सूची में 1976 से लगभग कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसमें चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार, विधायिकाओं के सदस्य, न्यायाधीश, लोक सेवक, राजनीतिक दल एवं उनके पदाधिकारी, राजनीतिक प्रकृति के संगठन तथा समाचार पत्रों, समाचार एवं समसामयिक विषयों से जुड़े मीडिया से संबंधित निर्दिष्ट व्यक्ति या संस्थाएं शामिल हैं। इसकी पूरी वैधानिक सूची अधिनियम की धारा 3 में दी गई है।
इसका उद्देश्य स्पष्ट है: इन श्रेणियों से जुड़े व्यक्ति और संस्थाएं भारत की संवैधानिक संस्थाओं के प्रति विशेष जिम्मेदारियां निभाते हैं। ऐसे में विदेशी धन प्राप्त करना संवेदनशील विषय माना जाता है। वर्ष 2020 के संशोधन के तहत इस प्रतिबंध का दायरा बढ़ाकर "लोक सेवकों (पब्लिक सर्वेंट्स)" को भी इसमें शामिल कर दिया गया।
प्रश्न: एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 और संशोधित नियमों में क्या प्रमुख बदलाव किए गए हैं?
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (जिसे 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया) तथा संशोधित एफसीआरए नियम (22 जून 2026 को अधिसूचित) का उद्देश्य एफसीआरए के क्रियान्वयन में मौजूद व्यावहारिक कमियों को दूर करना और व्यवस्था को अधिक सुशासित एवं पारदर्शी बनाना है।
2026 के एफसीआरए संशोधन विधेयक में प्रस्तावित प्रमुख बदलाव:
- यदि किसी संस्था का पंजीकरण समाप्त हो जाता है, तो उसकी संपत्तियां अस्थायी रूप से सरकार के अधीन रहेंगी। यदि बाद में पंजीकरण बहाल हो जाता है, तो संपत्तियां संस्था को वापस कर दी जाएंगी। यह व्यवस्था एफसीआरए, 2010 की धारा 15 के समान है।
- यदि कोई गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) निर्धारित अवधि के भीतर अपना पंजीकरण बहाल नहीं करा पाता, तो उसकी संपत्तियां स्थायी रूप से सरकार के अधीन चली जाएंगी। (नया प्रावधान)
- नामित प्राधिकारी के किसी भी आदेश के विरुद्ध जिला न्यायाधीश के समक्ष पुनरीक्षण एवं अपील का अधिकार प्रदान किया गया है। (नया प्रावधान)
- अधिकतम कारावास की अवधि पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष कर दी गई है।
- राज्य की जांच एजेंसियों को एफसीआरए से जुड़े मामलों की जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य होगा।
2026 के संशोधित एफसीआरए नियमों में प्रमुख बदलाव:
- अब पंजीकरण प्रमाणपत्र में संस्था के कार्य का सटीक उद्देश्य तथा जिन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में वह कार्य करेगी, उनका स्पष्ट उल्लेख करना होगा। यह चयन निर्धारित अनुसूची से किया जाएगा, न कि व्यापक श्रेणी से।
- नियमों में अब अनुमत धार्मिक उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया है, जिससे सभी समुदायों के धार्मिक संगठनों को स्पष्टता मिलेगी।
- पंजीकरण नवीनीकरण के लिए संस्था को यह दिखाना होगा कि उसने पिछले दो वर्षों में कम-से-कम 10 लाख रुपये का विदेशी अंशदान (एफसी) उपयोग किया है।
- अब परियोजना-वार, गतिविधि-वार तथा अंतिम दाता का विवरण देना अनिवार्य होगा। साथ ही संस्था की वेबसाइट और सोशल मीडिया खातों की जानकारी भी वार्षिक रिपोर्ट में शामिल करनी होगी।
प्रश्न- विदेशी अंशदान से अर्जित परिसंपत्तियों के निहित होने की अवधारणा सबसे पहले कब शुरू की गई थी?
पंजीकरण रद्द होने पर विदेशी अंशदान से निर्मित या अर्जित परिसंपत्तियों के निहित होने की अवधारणा पहली बार 2010 के मूल एफसीआरए (एफसीआरए) अधिनियम में पेश की गई थी। मौजूदा अधिनियम की धारा 15 के अनुसार, एफसीआरए पंजीकरण रद्द होने पर विदेशी अंशदान से बनी परिसंपत्तियां निर्धारित प्राधिकारी में निहित होंगी। हालांकि, यदि एसोसिएशन बाद में नया पंजीकरण प्राप्त कर लेता है, तो कानून के अनुसार ऐसा विदेशी अंशदान और परिसंपत्तियां उसे वापस कर दी जाती है। वर्तमान व्यवस्था में निर्धारित प्राधिकरण संबंधित राज्य सरकार या केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन होता है।
पिछले एक दशक में लगभग 22,000 एफसीआरए पंजीकरण रद्द किए गए हैं तथा लगभग 15,000 पंजीकरण स्वतः समाप्त हो चुके हैं। इन मामलों में विदेशी अंशदान और उनसे निर्मित परिसंपत्तियों का मूल्य हजारों करोड़ रुपये है। लेकिन व्यवहारिक स्तर पर राज्यों के प्राधिकरणों को मौजूदा धारा 15 के सीमित प्रावधानों के तहत इन परिसंपत्तियों का अधिग्रहण, संरक्षण और प्रबंधन करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है।
धारा 15 के प्रावधान इसमें शामिल सभी मुद्दों का व्यापक रूप से समाधान नहीं करते हैं। मौजूदा प्रावधानों में कई सवालों के जवाब नहीं दिए गए हैं। इसके अलावा, मौजूदा व्यवस्था के तहत, ऐसी परिसंपत्तियां बिना किसी कानूनी अंतिम निर्णय के अनिश्चित काल के लिए कस्टडी (हिरासत) में रह सकती हैं। केवल इसलिए कि कोई एसोसिएशन भविष्य में किसी दूरस्थ समय पर नया पंजीकरण मांग सकता है, सरकार के लिए ऐसी परिसंपत्तियों को अनिश्चित काल तक संरक्षित और प्रबंधित करना न तो व्यावहारिक है और न ही वांछनीय।
इसी कारण प्रस्तावित संशोधनों में अस्थायी निहितीकरण, पुनर्बहाली तथा निर्धारित अवधि के भीतर पंजीकरण बहाल न होने की स्थिति में स्थायी निहितीकरण और परिसंपत्तियों के वैधानिक निस्तारण के लिए स्पष्ट और समयबद्ध व्यवस्था का प्रावधान किया गया है।
प्रश्न. 2026 के संशोधन द्वारा शुरू किए गए 'नामित प्राधिकारी' की क्या भूमिका है?
जब पंजीकरण समाप्त हो जाता है-चाहे वह रद्द होने, स्वेच्छा से आत्मसमर्पण करने नवीनीकरण न होने के कारण हो- परिसंपत्तियां अनंतिम रूप से नामित प्राधिकारी में निहित हो जाती हैं। यदि संगठन निर्धारित अवधि के भीतर अपना पंजीकरण सफलतापूर्वक बहाल करा लेता है, तो सभी संपत्तियां और अप्रयुक्त धनराशि पूरी तरह से वापस कर दी जाती हैं।
लेकिन यदि संस्था निर्धारित समय सीमा के भीतर अपना पंजीकरण बहाल नहीं करा पाती, तो उसकी परिसंपत्तियां स्थायी रूप से नामित प्राधिकरण में निहित हो जाती हैं। इसके बाद इन परिसंपत्तियों का उपयोग जनहित के उद्देश्यों के लिए किया जाता है। उदाहरण के तौर पर, यदि परिसंपत्ति एक विद्यालय है, तो उसे शिक्षा विभाग को तथा यदि वह अस्पताल है, तो उसे स्वास्थ्य विभाग को हस्तांतरित किया जा सकता है। वल उन मामलों में, जहां परिसंपत्तियों का प्रत्यक्ष रूप से सार्वजनिक उपयोग संभव नहीं होता, उन्हें कानून के अनुसार बेचा जाएगा और बिक्री से प्राप्त राशि भारत की समेकित निधि में जमा की जाएगी। इस प्रक्रिया से किसी भी सरकारी अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से कोई लाभ नहीं मिलेगा।
इसके अतिरिक्त, कानून में स्पष्ट रूप से यह भी प्रावधान किया गया है कि नामित प्राधिकरण किसी भी धार्मिक स्थल या उपासना स्थल के धार्मिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए बाध्य होगा। वह किसी धार्मिक संस्था का धर्म परिवर्तन, उद्देश्य परिवर्तन या उसे धर्मनिरपेक्ष में बदलाव नहीं कर सकता।
प्रश्न: प्रस्तावित विधेयक के तहत, यदि किसी संगठन का एफसीआरए पंजीकरण रद्द कर दिया जाता है, तो उसकी परिसंपत्तियों का क्या होता है?
एफसीआरए पंजीकरण रद्द होने का मतलब यह नहीं है कि सरकार द्वारा किसी संगठन की पूरी संपत्ति जब्त कर ली जाती है। प्रस्तावित FCRA संशोधन, 2026 के तहत नामित प्राधिकरण केवल उन संपत्तियों का प्रबंधन करता है, जो विदेशी अंशदान से निर्मित हुई हैं, और वह भी केवल तब, जब किसी संगठन का पंजीकरण विधिसम्मत रूप से समाप्त हो चुका हो।
इसकी प्रक्रिया यह है: पंजीकरण रद्द होने पर, परिसंपत्तियां अनंतिम रूप से नामित प्राधिकारी में निहित हो जाती हैं, यदि संगठन निर्धारित अवधि के भीतर अपना पंजीकरण बहाल करा लेता है, तो सभी संपत्तियां और अप्रयुक्त धनराशि पूरी तरह से वापस कर दी जाती हैं। केवल तभी जब पंजीकरण बहाल नहीं होता है, संपत्तियां स्थायी रूप से निहित होती हैं और तब भी, उन्हें सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए लागू किया जाता है, और कोई भी अधिकारी व्यक्तिगत रूप से लाभान्वित नहीं होता है।
पूजा स्थल सभी मामलों में कानूनन अपना धार्मिक स्वरूप बनाए रखते हैं। नामित प्राधिकारी का प्रत्येक आदेश 90 दिनों के भीतर पुनरीक्षण और जिला न्यायाधीश के समक्ष आगे की न्यायिक अपील के अधीन है।
प्रश्न: क्या एफसीआरए पंजीकरण का समाप्त/रद्द होना हमेशा किसी गलत काम (संदेह या धोखाधड़ी) की ओर इशारा करता है?
नहीं। एफसीआरए पंजीकरण का समाप्त होना विभिन्न तरीकों से हो सकता है। नवीनीकरण न मिलने पर प्रमाण पत्र की अवधि समाप्त हो सकती है। कोई संस्था स्वयं अपना पंजीकरण समर्पित (Surrender) कर सकती है, नवीनीकरण का आवेदन अस्वीकार किया जा सकता है, या निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए वैधानिक आधारों पर कारणयुक्त आदेश के माध्यम से पंजीकरण रद्द किया जा सकता है। इसलिए, ऐसी समाप्ति को स्वचालित रूप से धोखाधड़ी या आपराधिक गतिविधियों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। कानून के अनुसार वैधानिक उपचार और संवैधानिक न्यायिक समीक्षा के विकल्प उपलब्ध रहते हैं।
2026 के संशोधन द्वारा समयावधि समाप्त होने से पहले नवीनीकृत न किए गए पंजीकरणों के लिए स्वचालित समाप्ति (धारा 14B के तहत) की शुरुआत, वास्तव में स्पष्टता लाती है और ऐसे संगठनों की कानूनी स्थिति के बारे में पहले से बनी प्रशासनिक अस्पष्टता को दूर करती है। इसके मूल स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है [नियम 10(1), 12(5) और 12(6) देखें]। पंजीकरण का नवीनीकरण न करने के सरकार के फैसले को अदालतों में चुनौती दी जा सकती है और यह पूरी तरह से न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
प्रश्न. 2026 के संशोधन में राज्य स्तर पर एफसीआर एजांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी क्यों आवश्यक की गई है?
एफसीआरए एक केंद्रीय कानून है जो विदेशी संबंधों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित है। यह दोनों विषय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत संसद के विशेष विधायी अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।
राज्य एजेंसियों द्वारा एफसीआरए जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी अनिवार्य करने से एक ही केंद्रीय ढांचे के तहत समानांतर या विरोधाभासी कार्यवाहियों को रोका जा सकता है और एक सुव्यवस्थित व सुसंगत प्रवर्तन सुनिश्चित होता है।
यह अन्य केंद्रीय कानूनों के समान प्रावधानों के अनुरूप ही है। यह राज्य के कानूनों के तहत किसी राज्य की जांच शक्तियों को सीमित नहीं करता है। यह केवल इस विशिष्ट केंद्रीय कानून के तहत जांचों में समन्वय स्थापित करता है।
प्रश्न: संचालन के उद्देश्यों और भौगोलिक क्षेत्रों के संबंध में क्या बदलाव किए गए हैं?
गतिविधियों की अधिसूचित सूची के आधार पर पंजीकरण प्रमाणपत्रों में अब उस विशिष्ट उद्देश्य या उद्देश्यों और राज्य या केंद्र शासित प्रदेश का स्पष्ट उल्लेख होगा जिसके लिए पंजीकरण प्रदान किया गया है। मौजूदा पंजीकृत संघों को फॉर्म एफसी-6F के माध्यम से यह जानकारी प्रस्तुत करने के लिए एक वर्ष का समय दिया गया है और उन्हें केवल इस उद्देश्य के लिए नया पंजीकरण लेने की आवश्यकता नहीं है।
यदि कोई संस्था भविष्य में अपने स्वीकृत उद्देश्य या कार्यक्षेत्र में कोई नया उद्देश्य या नया राज्य/केंद्रशासित प्रदेश जोड़ना अथवा बदलाव करना चाहती है, तो वह निर्धारित ऑनलाइन प्रक्रिया के माध्यम से आवेदन कर सकती है। इस बदलाव का उद्देश्य संस्थाओं को उनके अनुमोदित कार्यक्षेत्र के बारे में अधिक स्पष्टता प्रदान करना तथा गतिविधि-आधारित और क्षेत्र-आधारित निगरानी को अधिक प्रभावी बनाना है।
पहले से पंजीकृत संस्थाओं को केवल इसलिए नया आवेदन देने की आवश्यकता नहीं होगी कि अब उनके प्रमाणपत्र में उद्देश्य और राज्य/केंद्रशासित प्रदेश का उल्लेख किया जाएगा। उन्हें आवश्यक विवरण फॉर्म FC-6F के माध्यम से उपलब्ध कराने के लिए एक वर्ष की संक्रमण अवधि प्रदान की गई है।
प्रश्न: क्या एफसीआरए किसी विशेष धर्म या समुदाय को लक्षित करता है?
नहीं। यह अधिनियम धर्म, समुदाय या विचारधारा की परवाह किए बिना सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है। सभी धर्मों के संगठनों द्वारा धार्मिक शिक्षा, पूजा स्थलों का रखरखाव और धर्मार्थ कार्य सहित आस्था-आधारित कल्याणकारी गतिविधियां विदेशी फंडिंग के लिए पात्र बनी हुई हैं।
2026 के नियमों में वास्तव में अनुमेय (स्वीकृत) धार्मिक उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया है, जिससे सभी समुदायों के धर्म-आधारित संगठनों को विदेशी फंडिंग के लिए पात्र गतिविधियों के बारे में अधिक स्पष्टता मिलती है।
2026 के संशोधन द्वारा धर्म परिवर्तन पर लगाया गया प्रतिबंध सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होता है और यह एफसीआरए के इस पुराने सिद्धांत के अनुरूप है कि विदेशी अंशदान का उपयोग धर्मांतरण-उन्मुख गतिविधियों के माध्यम से भारत के सामाजिक और जनसांख्यिकीय ढांचे को बदलने के लिए नहीं किया जाना चाहिए [धारा 12(4)(a)(ii) देखें]।
प्रश्न: 2026 में एफसीआरए नवीनीकरण के लिए न्यूनतम उपयोग की क्या नई शर्त लागू की गई है?
2026 के एफसीआरए संशोधन नियमों के तहत, एफसीआरए पंजीकरण का नवीनीकरण कराने वाले एनजीओ को यह साबित करना होगा कि उन्होंने पिछले दो वर्षों की अवधि में विदेशी अंशदान में से कम से कम 10 लाख रुपये का उपयोग किया है। यह आवश्यकता यह सुनिश्चित करती है कि सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण वास्तव में चालू और कार्यशील संगठनों के पास ही हों। यह निष्क्रिय संस्थाओं को पंजीकरण बनाए रखने और बिना किसी घोषित गतिविधि के विदेशी धन प्राप्त करने की कानूनी क्षमता रखने से रोकता है। [धारा 12(4)(b) और 14(1)(e) देखें]
मंत्रालय के अनुमान के अनुसार, भारत में कार्यरत सभी गैर-सरकारी संगठनों में एफसीआरए-पंजीकृत संस्थाओं की संख्या 1 प्रतिशत से भी कम है। इसलिए यह कानून समूचे नागरिक समाज पर नहीं, बल्कि विदेशी वित्तपोषित एक विशेष वर्ग पर लागू होता है।
प्रश्न: क्या विदेशी अंशदान के विनियमन के मामले में भारत अपवाद है? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एफसीआरए की तुलना कैसी है?
भारत इस मामले में कोई अपवाद नहीं है। विदेशी अंशदान और विदेशी प्रभाव का विनियमन दुनिया के प्रमुख लोकतांत्रिक देशों में एक स्थापित और सामान्य व्यवस्था है।
अमेरिका 1938 से फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (एफएआरए) चला रहा है। ऑस्ट्रेलिया ने 2018 में अपनी फॉरेन इन्फ्लुएंस ट्रांसपेरेंसी स्कीम लागू की। नेशनल सिक्योरिटी एक्ट 2023 के तहत यूनाइटेड किंगडम की फॉरेन इन्फ्लुएंस रजिस्ट्रेशन स्कीम जुलाई 2025 में लागू हुई। कनाडा ने 2024 में अपना फॉरेन इन्फ्लुएंस ट्रांसपेरेंसी एंड अकाउंटेबिलिटी एक्ट लागू किया। यूरोपीय संघ अब सभी 27 सदस्य देशों के लिए इसी तरह का एक निर्देश तैयार कर रहा है।
यह सभी उदाहरण एक समान लोकतांत्रिक सिद्धांत को दर्शाते हैं: यदि विदेशी वित्तपोषण, विदेशी निर्देश या विदेशी प्रभाव किसी देश की घरेलू संस्थाओं और सार्वजनिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है, तो उसे वैध रूप से प्रकटीकरण, जवाबदेही और प्रभावी प्रवर्तन संबंधी सुरक्षा उपायों के अधीन रखा जा सकता है।
प्रश्न: क्या वैश्विक रुझान अधिक या कम विदेशी प्रभाव विनियमन की ओर बढ़ रहा है?
वैश्विक रुझान की दिशा स्पष्ट रूप से अधिक विदेशी-प्रभाव विनियमन की ओर है, न कि कि उसे कम करने की। उल्लेखनीय है कि यह रुझान उन्हीं वर्षों में और तेज हुआ है, जब एफसीआरए की आलोचना की जाती रही है। यूनाइटेड किंगडम की विदेशी प्रभाव पंजीकरण योजना जुलाई 2025 से प्रभावी हुई। कनाडा ने 2024 में विदेशी प्रभाव रजिस्ट्री संबंधी कानून बनाया, जिसका कार्यान्वयन अभी भी जारी है।
यूरोपीय संघ (ईयू) का प्रस्ताव यूरोबारोमीटर सर्वेक्षण के बाद आया, जिसमें 81 प्रतिशत यूरोपीय नागरिकों ने गुप्त विदेशी हस्तक्षेप को एक गंभीर समस्या बताया। कनाडा के अपने कानून की प्रस्तावना में "कनाडा और उसके सहयोगियों के बीच एक बढ़ती सहमति दर्ज की गई है कि संप्रभु राज्यों के मामलों में विदेशी हस्तक्षेप को कम करने के लिए विदेशी प्रभाव रजिस्ट्रियां एक आवश्यक उपकरण हैं।"
इस मॉडल की शुरुआत करने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी 2025 में अपने 87 वर्ष पुराने एफएआरए को पहले की तुलना में अधिक सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए हैं। भारत भी 1976 से इसी प्रकार का एक तुलनीय कानूनी ढांचा बनाए हुए है।
प्रश्न: 2026 का संशोधन रिपोर्टिंग और दाता पारदर्शिता को किस प्रकार मजबूत बनाता है?
2026 के संशोधन वार्षिक खुलासों की गुणवत्ता और विस्तार में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। वार्षिक रिटर्न में अब वार्षिक रिटर्न में केवल कुल व्यय का विवरण ही नहीं, बल्कि परियोजना-वार (Project-wise) और गतिविधि-वार (Activity-wise) उपयोग का विवरण भी देना होगा। साथ ही संगठन की वेबसाइट और सोशल मीडिया हैंडल की जानकारी भी अनिवार्य रूप से देनी होगी।
इसके अतिरिक्त, यदि विदेशी अंशदान किसी मध्यस्थ संस्था के माध्यम से प्राप्त होता है, तब भी अंतिम वास्तविक विदेशी दाता की पूरी पहचान उजागर करना अनिवार्य होगा। यह प्रावधान उस कमी को दूर करता है, जिसमें धन भेजने वाली तत्काल संस्था तो ज्ञात होती थी, लेकिन बहु-स्तरीय माध्यमों के कारण मूल विदेशी स्रोत छिपा रह जाता था। इन उन्नत रिपोर्टिंग प्रावधानों से विदेशी अंशदान की उसके मूल स्रोत से लेकर उसके वास्तविक उपयोग तक पूरी ट्रेसबिलिटी सुनिश्चित होगी।
विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता अच्छा काम करने में बाधा नहीं है। यह वह नींव है जिस पर उस काम में विश्वास पैदा होता है।
संदर्भ:
पीआईबी शोध
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम
*****
पीके / केसी / केजे
(Explainer ID: 159309)
आगंतुक पटल : 126
Provide suggestions / comments