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भारत के नये युग की अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियां
आत्मनिर्भरता की राह
Posted On:
28 OCT 2026 12:13PM
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भारत की अंतरिक्ष यात्रा 1963 में केरल के थुम्बा से लॉन्च किए गए एक साउंडिंग रॉकेट के साथ जो शुरू हुई थी, वह अब एक प्रस्तावित 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' की ओर मुखातिब हो रही है। नई अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियां इस प्रगति को गति दे रही हैं। इनमें पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (reusable launch vehicles), इलेक्ट्रिक, ग्रीन और परमाणु प्रणोदन (propulsion), और इन-ऑर्बिट सर्विसिंग सभी शामिल हैं। स्पेसडेक्स (SpaDeX) के माध्यम से, भारत कक्षा में दो अंतरिक्ष यानों की स्वायत्त डॉकिंग (autonomous docking) हासिल करने वाला दुनिया का चौथा देश भी बन गया है। ये प्रगति भारत की आत्मनिर्भरता को मजबूत करती हैं। दूसरी तरफ इस बीच, गगनयान भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान लक्ष्य को भी आगे बढ़ा रहा है।
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अंतरिक्ष विज्ञान और आज के लिए इसकी प्रासंगिकता
भारत की संगठित अंतरिक्ष गतिविधियां साल 1962 में डॉ. विक्रम ए. साराभाई के दृष्टिकोण के तहत भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (INCOSPAR) की स्थापना के साथ शुरू हुईं। पहला साउंडिंग रॉकेट 21 नवंबर 1963 को केरल के थुम्बा से लॉन्च किया गया था। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का गठन 15 अगस्त 1969 को हुआ जिसने पूर्व में गठित INCOSPAR का स्थान लिया। इसे बाद में वर्ष 1972 में अंतरिक्ष विभाग के अधीन लाया गया।
अपनी स्थापना के बाद से, ISRO ने भारत के लिए विकास-प्रथम के दर्शन का पालन किया। इसका मूल उद्देश्य था देश की जमीनी समस्याओं को हल करने के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का अधिकाधिक इस्तेमाल करना । बीते दशकों के दौरान इसरो एक लॉन्च सेवा प्रदाता से कहीं आगे बढ़ गया है और इसकी दक्षता और तकनीकी उत्कृष्टता ने एक वैश्विक मान्यता अर्जित की है। इसरो की प्रतिष्ठा महज इस सरल वादे पर टिकी है कि हर अंतरिक्ष मिशन देश के आम नागरिक की सेवा के लिए होना चाहिए।
यही दृष्टिकोण अब देश भर के दैनंदिन जीवन को आकार दे रहा है। संचार उपग्रह देश में दूरस्थ और कम सेवा वाले क्षेत्रों तक कनेक्टिविटी का विस्तार करते हैं। ये पृथ्वी के अवलोकन, डेटा कृषि, आपदा मूल्यांकन, योजना, पर्यावरण निगरानी और अन्य राष्ट्रीय आवश्यकताओं से जुड़े विभिन्न कार्यों का समर्थन करते हैं। ये मौसम उपग्रह चक्रवातों और मानसून को ट्रैक करते हैं, जिससे प्रारंभिक चेतावनियां देकर तमाम लोगों की जिंदगियां बचायी जाती हैं। मछुआरे, किसान और तटीय समुदाय अपनी आजीविका की रक्षा के लिए इन चेतावनियों पर निर्भर करते हैं। ये प्रणालियां नागरिकों को जोड़ती हैं, समुदायों की रक्षा करती हैं, शासन को मजबूत करती हैं और समावेशी, सतत विकास को गति देती हैं। इन सेवाओं के अलावा, अंतरिक्ष भारत की सीमाओं की भी रक्षा करता है और इसके भविष्य को आकार देता है। अंतरिक्ष-आधारित संचार प्रणालियां राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक आवश्यकताओं का समर्थन करती हैं।
इन ताकतों के आधार पर, उभरती प्रौद्योगिकियां नवाचार, कनेक्टिविटी और सेवा वितरण के लिए नए रास्ते खोल रही हैं। निजी उद्यम और स्टार्ट-अप भी अब इस यात्रा में शामिल हो रहे हैं। यह भारत को एक आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर और विश्व स्तर पर सम्मानित अंतरिक्ष शक्ति के रूप में स्थापित करता है।
विस्तार से पढ़ने के लिए क्लिक करें: भारत की अंतरिक्ष ओडिसी (India's Space Odyssey)Click To Read More in Detail: India's Space Odyssey

उभरती अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियां
जैसे-जैसे भारत अधिक आत्मनिर्भरता और अपने साहसिक लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा है, इस यात्रा को शक्ति देने के लिए प्रौद्योगिकियों की एक नई पीढ़ी आकार ले रही है। ये नवाचार अगली पीढ़ी के लॉन्च सिस्टम, इन-स्पेस संचालन, मानव अंतरिक्ष उड़ान, और उन्नत नेविगेशन और संचार तक फैले हुए हैं। ये भारत की प्रारंभिक उपलब्धियों से भविष्य के लिए तैयार अंतरिक्ष कार्यक्रम की ओर बदलाव को चिह्नित करते हैं। आगे के दशकों के लिए निर्मित, इन संबद्ध कार्यक्रमों का उद्देश्य भारत को प्रतिस्पर्धी, जुड़ा हुआ और दृढ़ता से आत्मनिर्भर बनाए रखना है।

अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यान (NGLV)
अंतरिक्ष तक अपनी पहुंच का काम अपनी लॉन्च करने की क्षमता से शुरू होती है। जो देश अपने स्वयं के रॉकेट बना और उड़ा सकता है, वह तय करता है कि वह कब, कैसे और किस कीमत पर अंतरिक्ष में पहुंचना है। भारत की लॉन्च यात्रा छोटे, एकल-उपयोग (खर्च करने योग्य) रॉकेटों से होकर अब भारी-लिफ्ट वाहनों तक पहुंच गई है, और यह अब पुन: प्रयोज्य प्रणालियों की ओर बढ़ रही है।
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भारत के पारंपरिक प्रक्षेपण यान
- PSLV (ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान): PSLV, इसरो का यह वर्कहॉर्स, अपने मिशन कॉन्फ़िगरेशन के आधार पर 600 किमी की सूर्य-तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा (SSPO) में 1,750 किलोग्राम तक और सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (Sub-GTO) में 1,425 किलोग्राम तक भार ले जा सकता है।
- GSLV (भू-तुल्यकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान): यह स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज का उपयोग करता है और 2-टन भार वर्ग तक के संचार उपग्रहों को ले जा सकता है।
- LVM3 (लॉन्च व्हीकल मार्क-3): यह भारत का भारी-लिफ्ट प्रक्षेपण यान है। यह 4-टन वर्ग के संचार उपग्रहों को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में और 10-टन वर्ग के पेलोड को लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में ले जा सकता है।
- SSLV (लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान): SSLV एक तीन चरणों वाला वाहन है जिसका लिफ्ट-ऑफ पर वजन ~120 टन है। यह 500 किमी की समतल कक्षा (planar orbit) में ~500 किलोग्राम वर्ग तक के उपग्रह लॉन्च कर सकता है।
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गौरतलब है सितंबर 2024 में,भारत के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नेक्स्ट जनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) के विकास को मंजूरी दी। इस पर ₹8,240 करोड़ के स्वीकृत परिव्यय में विकास लागत, तीन विकासात्मक उड़ानें, आवश्यक सुविधाएं, कार्यक्रम प्रबंधन और लॉन्च अभियान सभी शामिल हैं। लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) के लिए 30 टन की अधिकतम क्षमता के लिए डिज़ाइन किया गया, NGLV LVM3 की 10-टन LEO सीमा की तुलना में भारत की वर्तमान लॉन्च पेलोड क्षमता को तीन गुना कर देता है। इसके अलावा, अंतरिक्ष तक कम लागत वाली पहुंच को सुनिश्चित करने के लिए 14-टन LEO पेलोड क्षमता वाला पुन: प्रयोज्य NGLV संस्करण आंशिक रूप से विकसित किया जा रहा है। इसकी पुन: प्रयोज्य सुविधा भी अंतरिक्ष तक पहुंचने की लागत को कम करेगी।
NGLV राष्ट्रीय और वाणिज्यिक दोनों मिशनों को सक्षम करेगा। इनमें भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन, साथ ही चंद्र और ग्रहों के बीच की खोज (interplanetary exploration) शामिल हैं। यह लो अर्थ ऑर्बिट में संचार और पृथ्वी अवलोकन उपग्रह तारामंडल भी लॉन्च करेगा। इन मिशनों से पूरे अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र को लाभ होगा और राष्ट्र की क्षमता और सामर्थ्य को बढ़ावा मिलेगा।
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प्रमुख शब्दों को समझना
सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (SSO): एक सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (SSO) एक निकट-ध्रुवीय कक्षा है जिसमें एक उपग्रह लगभग एक ही स्थानीय सौर समय पर एक क्षेत्र के ऊपर से गुजरता है, जिससे समान रोशनी के तहत तुलना संभव हो पाती है। किसी विशेष स्थान के बार-बार अवलोकन के बीच का अंतराल उपग्रह और उसकी कक्षा के साथ बदलता रहता है।
भू-स्थिर स्थानांतरण कक्षा (GTO): GTO एक अण्डाकार मध्यवर्ती कक्षा है जिसका उपयोग उपग्रह को भूस्थैतिक कक्षा (GEO) में स्थानांतरित करने के लिए किया जाता है। इसका निम्नतम बिंदु (पेरिगी) आमतौर पर पृथ्वी से कुछ सौ किलोमीटर ऊपर होता है, जबकि इसका उच्चतम बिंदु (अपोजी) पृथ्वी की सतह से लगभग 35,786 किमी ऊपर होता है। प्रक्षेपण यान आमतौर पर उपग्रह को सीधे GEO के बजाय GTO में रखता है। अपोजी के पास, उपग्रह अपने पेरिगी को बढ़ाने और कक्षा को वृत्ताकार बनाने के लिए अपनी ऑनबोर्ड अपोजी मोटर को फायर करता है। कक्षा को पृथ्वी के भूमध्यरेखीय तल के साथ संरेखित करने के लिए अतिरिक्त युद्धाभ्यास की आवश्यकता हो सकती है। GEO में, उपग्रह भूमध्य रेखा के ऊपर पृथ्वी के घूर्णन से मेल खाने वाली अवधि के साथ परिक्रमा करता है, जो जमीन के सापेक्ष स्थिर दिखाई देता है।
क्रायोजेनिक अपर स्टेज: क्रायोजेनिक अपर स्टेज लॉन्च वाहन का अंतिम चरण है जो उपग्रहों को उनके इच्छित कक्षाओं में स्थापित करने के लिए आवश्यक उच्च दक्षता प्रदान करने के लिए इन प्रणोदकों का उपयोग करता है। GSLV पर उपयोग किए जाने वाले ISRO के स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज में तरल हाइड्रोजन (LH₂) का उपयोग ईंधन के रूप में और तरल ऑक्सीजन (LOX) का ऑक्सीडाइज़र के रूप में किया जाता है, दोनों अत्यधिक कम तापमान पर संग्रहीत होते हैं। इसने पहले की GSLV उड़ानों में उपयोग किए जाने वाले रूसी-आपूर्ति वाले चरण को बदल दिया, जिससे उन्नत प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी में भारत की आत्मनिर्भरता मजबूत हुई।
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पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (RLV)
RLV प्रौद्योगिकियां लॉन्च लागत को कम करने और परिचालन दक्षता में सुधार करने में मदद कर सकती हैं। पारंपरिक खर्च करने योग्य (एकल-उपयोग) लॉन्च वाहनों के विपरीत, पुन: प्रयोज्य प्रणालियों को बाद के मिशनों के लिए प्रमुख घटकों को पुनर्प्राप्त करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। उनके विकास के लिए नियंत्रित वायुमंडलीय पुन: प्रवेश, स्वायत्त नेविगेशन, वायुगतिकीय उड़ान और सटीक लैंडिंग की आवश्यकता होती है। ISRO ने अपने पंख वाले पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी प्रदर्शक, पुष्पक (Pushpak) का उपयोग करके स्वायत्त रनवे-लैंडिंग प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन किया है। तीन RLV लैंडिंग प्रयोग क्रमशः 2 अप्रैल 2023, 22 मार्च 2024 और 23 जून 2024 को पूरे किए गए। LEX-03 ने अधिक चुनौतीपूर्ण क्रॉस-रेंज और हवा की स्थिति के तहत स्वायत्त लैंडिंग को मान्य किया।
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स्क्रैमजेट प्रौद्योगिकी: भारत के पुन: प्रयोज्य अंतरिक्ष परिवहन को शक्ति प्रदान करना
एक स्क्रैमजेट (सुपरसोनिक कम्बशन रैमजेट) हवा में सांस लेने वाला (air-breathing) जेट इंजन है। यह केवल ईंधन ले जाता है और आसपास की हवा से ऑक्सीजन खींचता है। पारंपरिक रॉकेट ईंधन और ऑक्सीडाइज़र दोनों खींचते हैं। इसलिए एक स्क्रैमजेट हल्का होता है और समान लिफ्ट-ऑफ द्रव्यमान के लिए अधिक पेलोड प्रदान कर सकता है। यह केवल वायुमंडल के भीतर बहुत उच्च वेग पर काम करता है, इसलिए एक बूस्टर को पहले इसे तेज करना चाहिए। इसका वेग मैक (Mach) संख्या के रूप में व्यक्त किया जाता है। मैक 1 ध्वनि की गति के बराबर है। मैक 5 से ऊपर कुछ भी हाइपरसोनिक कहा जाता है। स्क्रैमजेट पुन: प्रयोज्य लॉन्च वाहनों के पूरक हो सकते हैं, जो लागत में कटौती करने के लिए प्रमुख भागों को पुनर्प्राप्त और फिर से उड़ाते हैं। वे किफायती अंतरिक्ष पहुंच के लिए एक आशाजनक मार्ग प्रदान करते हैं। भारत ने 28 अगस्त 2016 को अपने स्क्रैमजेट का उड़ान परीक्षण किया। यह मैक 6, एक हाइपरसोनिक वेग तक पहुंच गया, जिससे अपना देश इसे प्रदर्शित करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया।
22 जुलाई 2024 को, ISRO ने वायु-श्वास प्रणोदन प्रणालियों को प्रदर्शित करने और उनके प्रदर्शन का आकलन करने के लिए एक प्रायोगिक RH-560 साउंडिंग-रॉकेट उड़ान का अलग से संचालन किया।
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स्वदेशी अंतरिक्ष हार्डवेयर और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियां
कोई भी अंतरिक्ष मिशन इंजन, थ्रस्टर, ईंधन और बिजली प्रणालियों सहित महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों पर निर्भर करता है। भारत के भीतर इन प्रौद्योगिकियों को विकसित करने से विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है और दूसरी तरफ देश की स्वतंत्र रूप से अंतरिक्ष यान बनाने और संचालित करने की क्षमता मजबूत होती है। ISRO इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन और वैकल्पिक ईंधन सहित स्वदेशी प्रणोदन प्रौद्योगिकियों को आगे बढ़ा रहा है। यह भविष्य के मिशनों के लिए प्रौद्योगिकियों की भी खोज कर रहा है। ये प्रयास अंतरिक्ष में आत्मनिर्भरता के भारत के दीर्घकालिक लक्ष्य में योगदान करते हैं।
प्रगति का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र इलेक्ट्रिक प्रणोदन (electric propulsion) है, जो प्रणोदक को तेज करने और जोर उत्पन्न करने के लिए विद्युत ऊर्जा का उपयोग करता है। पारंपरिक रासायनिक प्रणोदन की तुलना में, यह बहुत कम प्रणोदक का उपयोग करके समान कक्षीय परिवर्तन प्राप्त कर सकता है। यह एक उपग्रह द्वारा ले जाए जाने वाले ईंधन को कम करता है और संचार उपकरणों और अन्य पेलोड के लिए द्रव्यमान (mass) को मुक्त करता है। 27 मार्च 2025 को, ISRO ने अपने स्वदेशी 300 mN स्टेशनरी प्लाज्मा थ्रस्टर का 1,000 घंटे का जीवन परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया। इसका विशिष्ट आवेग (specific impulse), जो प्रणोदन दक्षता का एक उपाय है। यह पारंपरिक प्रणोदन प्रणालियों की तुलना में कम से कम छह गुना बड़ा है। ISRO अपनी प्रौद्योगिकी प्रदर्शन उपग्रह (TDS-01) पर प्रौद्योगिकी को मान्य करने की योजना बना रहा है। इसका उद्देश्य भविष्य के इलेक्ट्रिक-प्रणोदन उपग्रहों का समर्थन करना है, जिसमें कक्षा बढ़ाना (orbit raising) और स्टेशन कीपिंग शामिल है।
इलेक्ट्रिक प्रणोदन के साथ, ISRO पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने और प्रणोदन दक्षता में सुधार करने के लिए वैकल्पिक प्रणोदक विकसित कर रहा है, अर्थात हरित प्रणोदन (Green Propulsion)। इसका एक उदाहरण इस्रोसीन (ISROSENE) है, जो एक रॉकेट-ग्रेड केरोसिन है। लिक्विड ऑक्सीजन-केरोसिन प्रोपेलेंट सेमीक्रायोजेनिक रॉकेट-इंजन अनुप्रयोगों के लिए विकसित किए जा रहे हैं।
हरित प्रणोदन में हासिल प्रगति ISRO के अपने विकास कार्यक्रमों से भी आगे फैली हुई है। DRDO के प्रौद्योगिकी विकास कोष के तहत, बेंगलुरु स्थित बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस (Bellatrix Aerospace) ने माइक्रोसैटेलाइट एटीट्यूड कंट्रोल और ऑर्बिट कीपिंग के लिए 1 एन-क्लास ग्रीन मोनोप्रोपेलेंट थ्रस्टर विकसित किया है। इसकी इन-ऑर्बिट कार्यक्षमता का प्रदर्शन जनवरी 2024 में PSLV-C58 पर लॉन्च किए गए एक पेलोड पर किया गया था।
ये सभी घटनाक्रम स्वदेशी इलेक्ट्रिक और हरित प्रणोदन प्रौद्योगिकियों में भारत की प्रगति को दर्शाते हैं। निरंतर परीक्षण और सत्यापन से भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों में व्यापक उपयोग के लिए उनकी तत्परता निर्धारित करने में मदद मिलेगी।
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रेडियोआइसोटोप हीटिंग और पावर प्रौद्योगिकियां
ISRO और परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) रेडियोआइसोटोप हीटर यूनिट्स (RHU), जो गर्मी की आपूर्ति करते हैं, और रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर (RTG), जो रेडियोआइसोटोप गर्मी को विद्युत शक्ति में परिवर्तित करते हैं, एक दूसरे की आवश्यकताओं पर सहयोग कर रहे हैं। ISRO संभावित भविष्य के चंद्रयान और मंगल मिशनों के लिए RHU और RTG आवश्यकताओं पर DAE के साथ सहयोग कर रहा है।
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इन-स्पेस संचालन और मानव अंतरिक्ष उड़ान
इन-स्पेस संचालन वह गतिविधिय है जो अंतरिक्ष यान अपनी कक्षा में पहुंचने के बाद करते हैं, जैसे कि मिलन (rendezvous), डॉकिंग और अनडॉकिंग। उपग्रह का प्रक्षेपण तो केवल पहला कदम है: अंतरिक्ष स्टेशन, एक चालक दल की उड़ान या चंद्र नमूना वापसी (lunar sample return) जैसे जटिल मिशन इस बात पर निर्भर करते हैं कि अंतरिक्ष यान अपने लॉन्च के बाद क्या कर सकते हैं। इन-स्पेस डॉकिंग तकनीको की तब आवश्यक होती है जब सामान्य मिशन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कई रॉकेट लॉन्च की आवश्यकता होती है, और यह चंद्रमा से नमूना वापसी और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण और संचालन जैसी महत्वाकांक्षाओं को रेखांकित करती है।
ISRO के स्पेसडेक्स (SpaDeX) मिशन ने पहले 16 जनवरी 2025 को अपने दो उपग्रहों को डॉक किया और बाद में इसकी अनडॉकिंग का प्रदर्शन किया। 20 अप्रैल 2025 को 15 मीटर की अंतर-उपग्रह दूरी से पूर्ण स्वायत्तता के साथ दूसरी डॉकिंग पूरी की गई। डॉक किए गए उपग्रहों के बीच द्विदिशीय (Bidirectional) बिजली हस्तांतरण का प्रदर्शन 21 अप्रैल 2025 को किया गया था। इस प्रकार भारत संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन के बाद अंतरिक्ष डॉकिंग का प्रदर्शन करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया। यह उपलब्धि भविष्य के मिशनों के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकियों को भी आगे बढ़ाती है।
अगली पीढ़ी के नेविगेशन और संचार ।
सैटेलाइट नेविगेशन और संचार प्रणालियां पूरे भारत में आवश्यक सेवाओं का समर्थन करती हैं। नेविगेशन उपग्रह पोजिशनिंग, नेविगेशन और समय की जानकारी प्रदान करते हैं, जबकि संचार उपग्रह टेलीविजन, टेलीफोन, ब्रॉडबैंड और अन्य डेटा संकेतों को रिले करते हैं। साथ में, ये प्रणालियां परिवहन, वित्तीय सेवाओं, दूरसंचार, आपदा प्रबंधन और राष्ट्रीय सुरक्षा का समर्थन करती हैं। भारत ISRO के स्वदेशी NavIC नेविगेशन सिस्टम और संचार उपग्रहों के माध्यम से इन क्षमताओं को मजबूत कर रहा है।
भारतीय नक्षत्र के साथ नेविगेशन (NavIC) दरअसल भारत की स्वतंत्र क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली है, जिसे ISRO द्वारा विकसित और अनुरक्षित किया गया है। यह पूरे भारत में और भारतीय मुख्य भूमि से 1,500 किलोमीटर दूर तक की स्थिति, नेविगेशन और समय सेवाएं प्रदान करता है।नागरिक उपयोगकर्ताओं के लिए एक मानक पोजिशनिंग सेवा और अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए एक एन्क्रिप्टेड प्रतिबंधित सेवा प्रदान करता है। ये क्षमताएं भूतल, हवाई और समुद्री नेविगेशन, सर्वेक्षण, वाहन ट्रैकिंग और सटीक समय का समर्थन करती हैं। NavIC स्थलीय नेटवर्क कवरेज से परे काम करने वाले मछुआरों के लिए आपातकालीन चेतावनी संदेशों का भी समर्थन करता है। संगत उपकरणों और अनुप्रयोगों में इसका एकीकरण नागरिक और रणनीतिक क्षेत्रों में इसके उपयोग का और विस्तार कर सकता है।
इसके अतिरिक्त, भारत के संचार उपग्रह प्रसारण, ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी और सुरक्षित संचार का समर्थन करते हैं। GSAT-24, जिसे 23 जून 2022 को 03:20 IST (22 जून स्थानीय समय) पर कौरू, फ्रेंच गुयाना से एरियन-5 पर लॉन्च किया गया था, को भारत में डायरेक्ट-टू-होम (DTH) टेलीविजन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए साकार किया गया था। इस क्षमता के आधार पर, 19 नवंबर 2024 को GSAT-N2 (GSAT-20) लॉन्च किया गया था। इस उच्च-थ्रूपुट उपग्रह की क्षमता लगभग 48 Gbps है और इसे दूरस्थ द्वीप क्षेत्रों सहित पूरे भारत में ब्रॉडबैंड और इन-फ्लाइट कनेक्टिविटी का समर्थन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
संचार उपग्रह भारत की रक्षा आवश्यकताओं को भी पूरा करते हैं। CMS-03, जिसे GSAT-7R के रूप में भी जाना जाता है, 2 नवंबर 2025 को लॉन्च किया गया था। यह भारतीय नौसेना के लिए एक समर्पित संचार उपग्रह है। ये उपग्रह भारत के अंतरिक्ष-आधारित संचार बुनियादी ढांचे को मजबूत करते हैं और नागरिक संपर्क, समुद्री संचालन और राष्ट्रीय सुरक्षा का समर्थन करते हैं।
उन्नत पृथ्वी अवलोकन उपग्रह
पृथ्वी अवलोकन उपग्रह अंतरिक्ष से भूमि, महासागरों, बर्फ से ढके क्षेत्रों और वायुमंडल की निगरानी करते हैं। उनका डेटा देश की कृषि, आपदा प्रबंधन, जल संसाधन योजना, जलवायु अनुसंधान और राष्ट्रीय सुरक्षा के कार्य में सहायता करती है। दिसंबर 2020 और दिसंबर 2025 के बीच, ISRO ने 22 उपग्रह लॉन्च किए, जिनमें सात पृथ्वी अवलोकन उपग्रह शामिल हैं। ये उपग्रह प्राकृतिक संसाधनों की निगरानी, पर्यावरणीय परिवर्तनों पर नज़र रखने और सूचित योजना का समर्थन करने के लिए चित्र और डेटा प्रदान करते हैं। भारत रडार इमेजिंग और हाइपरस्पेक्ट्रल अवलोकन (hyperspectral observation) सहित उन्नत प्रौद्योगिकियों के माध्यम से इन क्षमताओं को मजबूत करना जारी रखता है।
पृथ्वी अवलोकन में एक बड़ी प्रगति NASA-ISRO सिंथेटिक एपर्चर रडार (NISAR) मिशन है। इसे 30 जुलाई 2025 को श्रीहरिकोटा से GSLV-F16 पर लॉन्च किया गया था। यह दो रडार आवृत्तियों का एक साथ उपयोग करने वाला पहला उपग्रह मिशन है: NASA का एल-बैंड और ISRO का एस-बैंड। रडार बादलों के पार और अंधेरे में डेटा एकत्र कर सकता है, जिससे दिन और रात दोनों समय लगभग सभी मौसम स्थितियों में अवलोकन करना संभव होता है। NISAR को हर 12 दिनों पर पृथ्वी की भूमि और बर्फ से ढकी सतहों का निरीक्षण करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसका डेटा वैज्ञानिकों को जमीन के विरूपण (ground deformation), ग्लेशियर की गति, वनस्पति परिवर्तन, मिट्टी की नमी और प्राकृतिक खतरों की निगरानी करने में मदद कर सकता है। ये अवलोकन तटीय निगरानी और आपदा प्रतिक्रिया का भी समर्थन कर सकते हैं।
रडार पृथ्वी की सतह में परिवर्तन को प्रकट करता है, जबकि हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग विभिन्न सामग्रियों और सतह की विशेषताओं को पहचानने में मदद करता है। ISRO ने 29 नवंबर 2018 को हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट (HysIS) लॉन्च किया। यह दृश्यमान, निकट-अवरक्त और शॉर्टवेव-इन्फ्रारेड तरंग दैर्ध्य में पृथ्वी की सतह का अवलोकन करता है। प्रकाश के कई संकीर्ण बैंडों में जानकारी रिकॉर्ड करके, HysIS उन विशेषताओं को अलग कर सकता है जिन्हें सामान्य इमेजिंग आसानी से नहीं पहचान सकती है। इसका डेटा कृषि, वानिकी, मिट्टी और भूवैज्ञानिक अध्ययन, तटीय क्षेत्रों और अंतर्देशीय जल में अनुप्रयोगों का समर्थन करता है।
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क्या आप जानते हैं? HysIS को आठ देशों के 30 विदेशी उपग्रहों के साथ प्रक्षेपित किया गया था। इनमें एक माइक्रो-सैटेलाइट और 29 नैनो-सैटेलाइट शामिल थे। भाग लेने वाले देशों में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, कोलंबिया, फिनलैंड, मलेशिया, नीदरलैंड, स्पेन और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल थे। इनमें से 23 उपग्रह संयुक्त राज्य अमेरिका के थे। इस प्रक्षेपण ने अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के लिए एक साथ कई उपग्रहों को स्थापित करने की PSLV की क्षमता को भी प्रदर्शित किया।
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आगे की राह: 44 बिलियन अमेरिकी डॉलर की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का निर्माण
भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अपने वैज्ञानिक और रणनीतिक लक्ष्यों के साथ-साथ आर्थिक विकास, निजी निवेश और औद्योगिक क्षमता में तेजी से योगदान दे रहा है। अंतरिक्ष विभाग के अनुसार, भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को अगले 2033 तक 44 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य है। उभरती प्रौद्योगिकियां जैसे पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान, वायु-श्वास प्रणोदन, इलेक्ट्रिक प्रणोदन और इन-स्पेस डॉकिंग गतिविधिया इस स्तर तक पहुंचाने में मदद करेंगी ।
यह तकनीकी गति पहले से ही देश में अनेक आर्थिक अवसर पैदा कर रही है। न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) ने भारतीय उद्योग को ISRO द्वारा विकसित 83 प्रौद्योगिकियों को हस्तांतरित करने के लिए 118 प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके परिणामस्वरूप, निवेशकों का विश्वास भी बढ़ रहा है। भारतीय अंतरिक्ष स्टार्ट-अप में संचयी निवेश 31 मार्च 2026 तक लगभग 618.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है। यह निवेश इस कारोबार को और कई गुना बढ़ाएगा।
ये सभी घटनाक्रम इस बात को दिखाते हैं कि भारत की उभरती अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियां न केवल राष्ट्रीय क्षमता को आगे बढ़ा रही हैं बल्कि आने वाले वर्षों के लिए एक मजबूत, उद्यम-नेतृत्व वाली अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का भी निर्माण कर रही हैं।
संदर्भ (References):
अंतरिक्ष विभाग (Department of Space)
इसरो (ISRO)
पीडीएफ में देखने के लिए यहाँ क्लिक करें
पीआईबी रिसर्च (PIB Research)
पीके/केसी/आरटी/एमएम
(Explainer ID: 160596)
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