Rural Prosperity
स्वच्छता के संदेश का प्रचार, व्यवहार में बदलाव
स्वच्छ भारत मिशन की सामाजिक एवं व्यवहार परिवर्तन की संचार यात्रा
Posted On:
02 OCT 2026 2:12PM
स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) ने व्यवहार परिवर्तन को स्वच्छता के केंद्र में रखते हुए बुनियादी ढांचे के निर्माण से आगे बढ़ स्थायी व्यवहारों और सामाजिक मानदंडों की ओर रुख किया। सामाजिक एवं व्यवहार परिवर्तन संचार (एसबीसीसी) ने संचार को केवल सूचना के प्रसार तक सीमित न रखकर उसे संवाद, सहभागिता और सामूहिक कार्रवाई में परिवर्तित कर दिया है। महात्मा गांधी तथा स्वच्छता और स्वयं सेवा के उनके आदर्श एसबीएम के मार्गदर्शक सिद्धांत बन गए। सामुदायिक संस्थाओं और स्वच्छाग्रहियों जैसे जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं ने व्यक्तिगत स्वच्छता संबंधी व्यवहारों को सामुदायिक स्तर पर साझा मानदंडों में बदलने में मदद की। संचार के विभिन्न माध्यमों ने स्वच्छता के संदेशों को घरों, समुदायों, सार्वजनिक स्थानों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों तक पहुंचाने और उन्हें सुदृढ़ करने में योगदान दिया। महिलाएं और बच्चे न केवल इसके लाभार्थी बने, बल्कि स्वच्छता संबंधी व्यवहारों को अपनाने, बढ़ावा देने और बनाए रखने की दिशा में सक्रिय परिवर्तनकारी एजेंट भी बने। मजबूती, सम्मान, प्रोत्साहन और सहभागितापूर्ण निगरानी जैसे प्रयासों ने स्वच्छता को एक अभियान-आधारित गतिविधि से आगे बढ़ाकर स्थायी सामुदायिक व्यवहार में बदलने में मदद की।
स्वच्छ भारत के व्यवहारगत आधार
स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) ने स्वच्छता को व्यवहार, सहभागिता और सामूहिक जिम्मेदारी के विषय के रूप में देखा है। मिशन ने यह स्वीकार किया कि केवल बुनियादी ढांचे का निर्माण ही स्थायी स्वच्छता के परिणाम सुनिश्चित नहीं कर सकता। इसलिए एसबीएम ने अपने कार्यान्वयन दृष्टिकोण के केंद्र में व्यवहार परिवर्तन संचार को रखा। एसबीएम-जी के अंतर्गत, ध्यान केवल शौचालय निर्माण तक ही सीमित नहीं है, समुदायों को सुरक्षित और टिकाऊ स्वच्छता प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहित भी करता है। इसी प्रकार, एसबीएम-यू के अंतर्गत, ध्यान केवल अपशिष्ट प्रसंस्करण तक ही सीमित नहीं है, स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण को सार्वजनिक-आदत बनाने तथा समग्र शहरी स्वच्छता और सार्वजनिक स्वच्छता सुनिश्चित करने पर भी केंद्रित है। इसीलिए सूचना, शिक्षा एवं संचार (आईईसी) रणनीतियां, व्यवहार का सुदृढ़ीकरण और निगरानी एसबीएम की कार्यान्वयन रणनीति के अभिन्न अंग हैं। एसबीएम की यात्रा स्वच्छता परिसंपत्तियों के निर्माण से आगे बढ़कर स्वच्छता संबंधी व्यवहार को बनाए रखने की दिशा में विकसित हुई है। इस विकास ने सामाजिक एवं व्यवहार परिवर्तन संचार (एसबीसीसी) को एसबीएम के केंद्र में स्थापित किया है।
स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम)
2 अक्टूबर 2014 से आरंभ हुआ स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम), भारत के विशालतम सरकारी स्वच्छता आंदोलनों में से एक बन चुका है। यह मिशन दो हिस्सों: एसबीएम -ग्रामीण और एसबीएम -शहरी - में संचालित है। एसबीएम-जी ग्रामीण स्वच्छता, शौचालय तक पहुंच, इस्तेमाल और अपशिष्ट प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करता है। एसबीएम-यू शहरी स्वच्छता, अपशिष्ट प्रबंधन और साफ-सुथरे सार्वजनिक स्थलों पर ध्यान केंद्रित करता है। एसबीएम की उपलब्धियों के बारे में विस्तार से जानने के लिए, कृपया यहां भी पढ़ें।
सूचना से व्यवहार परिवर्तन तक
सामाजिक एवं व्यवहार परिवर्तन संचार (एसबीसीसी) सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन को बढ़ावा देने के लिए संचार का उपयोग करता है। यह ज्ञान, दृष्टिकोण, सामाजिक मानदंडों और व्यवहारों को प्रभावित करने के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों को एकीकृत करता है। इनमें पारस्परिक संचार, सामुदायिक लामबंदी और जनसंचार माध्यम शामिल हैं। साथ ही,इसमें सोशल मीडिया, मनोरंजन, पैरवी और रणनीतिक साझेदारियां भी शामिल हैं।
एसबीएम के अंतर्गत एसबीसीसी केवल सूचना के प्रसार तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य दृष्टिकोण, सामाजिक मानदंडों और दैनिक व्यवहारों को प्रभावित करना है। एसबीएम के तहत यह दृष्टिकोण पारस्परिक संचार, सामुदायिक सहभागिता, जागरूकता फैलाने और सामूहिक कार्रवाई को एक साथ जोड़ता है। इसका दीर्घकालिक उद्देश्य खुले में शौच और अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े सामाजिक मानदंडों में बदलाव लाना है। यह इस बात को स्वीकार करता है कि लोगों का व्यवहार उनके सामाजिक परिवेश से प्रभावित होता है। परिवार, पड़ोसी, सामुदायिक समूह, स्थानीय संस्थाएं और विश्वसनीय नेता किसी विशेष व्यवहार को प्रोत्साहित या हतोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए संचार सामाजिक संबंधों और सामूहिक सहभागिता के माध्यम से कार्य करता है।
महात्मा गांधी: एसबीएम के अंतर्गत एसबीसीसी के लिए नैतिक प्रेरणास्रोत
महात्मा गांधी द्वारा स्वच्छता और साफ-सफाई पर दिए गए जोर ने एसबीएम की संचार रणनीति को सशक्त आधार प्रदान किया। इस मिशन की शुरुआत 2 अक्टूबर 2014 को की गई थी, ताकि गांधी जी की 150वीं जयंती (2019) तक स्वच्छ भारत के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।

एसबीएम का लोगो महात्मा गांधी के चश्मे को दर्शाता है। इसने मिशन की ब्रांड वैल्यू बनाने और विश्व स्तर पर स्वच्छता के प्रति भावना को अभिव्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही, इसने आम लोगों को मिशन के साथ आसानी और शीघ्रता से जुड़ने में मदद की। नतीजतन, 2 अक्टूबर 2019 को ग्रामीण भारत को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) घोषित किया गया।
महात्मा गांधी ने स्वच्छता के लिए अपने अभियान की शुरुआत सत्याग्रह आंदोलन के दौरान चंपारण से की थी। उनके आदर्श गांव की परिकल्पना में उत्तम स्वच्छता व्यवस्था तथा गांव की गलियों और सड़कों को अनावश्यक धूल-मिट्टी से मुक्त रखना शामिल था। अपनी पुस्तक “आश्रम ऑब्जर्वेन्सेज़ इन एक्शन” में गांधी जी ने लिखा है कि स्वच्छता सेवा एक आवश्यक और पवित्र सेवा है। उनके सेवाग्राम आश्रम में इस कार्य के लिए बाहरी श्रमिकों पर निर्भर न रहने पर जोर दिया गया। आश्रम के सदस्य स्वयं बारी-बारी से परिसर की सफाई करते थे। आश्रम के नियमों में यह भी निर्धारित था कि आश्रमवासियों के लिए हाथ धोना और उन्हें स्वच्छ रूमाल से पोंछना आवश्यक है। एसबीएम के संचार संदेशों ने इसी विरासत से प्रेरणा लेते हुए स्वच्छता के प्रति जन-स्वामित्व की भावना विकसित करने और व्यवहार परिवर्तन में लोगों की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित किया।
इस जुड़ाव ने व्यवहार परिवर्तन आंदोलन की भाषा और प्रतीकों को भी आकार दिया। ‘स्वच्छाग्रही’ शब्द को सोच-विचार कर गांधी जी की सत्याग्रह की परंपरा से लिया गया, जिसमें नागरिकों और स्वच्छता स्वयंसेवकों को एक सामूहिक ‘स्वच्छाग्रह’ में सक्रिय भागीदार के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस प्रकार, एसबीएम ने महात्मा गांधी को केवल एक स्मरणीय ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में ही नहीं, बल्कि एक ऐसे संचार-आधार के रूप में स्थापित किया, जो स्वच्छता को सामूहिक कार्रवाई, नागरिक जिम्मेदारी और निरंतर व्यवहार परिवर्तन से जोड़ते हैं।
व्यवहार परिवर्तन को घरों की दहलीज तक पहुंचाना: व्यक्तिगत आदतों में बदलाव
एसबीएम ने एसबीसीसी के सिद्धांतों को सीधे समुदाय-स्तरीय सहभागिता में रूपांतरित किया। स्वच्छता संबंधी व्यवहारों को प्रभावित करने के लिए पारस्परिक संचार (आईपीसी) एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया। एकतरफा संदेशों के विपरीत, आईपीसी संचारकर्ताओं और समुदाय के सदस्यों के बीच संवाद को संभव बनाता है। इसके माध्यम से लोगों के सरोकारों, धारणाओं और व्यवहार अपनाने में आने वाली व्यावहारिक बाधाओं के बारे में स्थानीय संदर्भों में चर्चा की जा सकती है। सरकार ने आईपीसी को सुगम बनाने के लिए फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं, स्वच्छाग्रहियों, सामुदायिक नेतृत्वकर्ताओं, स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) और मौजूदा सामाजिक नेटवर्कों का उपयोग किया। इसकी पद्धतियों में घर-घर जाकर संवाद, आमने-सामने परामर्श, छोटे समूहों में बैठकें, सहकर्मी संवाद तथा घरों, स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्थलों और धार्मिक आयोजनों में चर्चाएं शामिल रहीं।
एसबीएम-जी के अंतर्गत स्वच्छाग्रही जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले प्रमुख कार्यकर्ता और प्रेरक बन गए। उनकी भूमिका केवल शौचालय निर्माण को बढ़ावा देने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने परिवारों को सुरक्षित स्वच्छता व्यवहार अपनाने और उन्हें बनाए रखने में भी सहायता की। स्वच्छाग्रहियों ने सामुदायिक प्रेरणा एवं व्यवहार परिवर्तन, घर-घर संपर्क तथा स्वच्छता संबंधी चर्चाओं को सुगम बनाया। उन्होंने सामुदायिक लामबंदी और निगरानी समितियों को मजबूत करने में भी सहयोग दिया। ओडीएफ घोषणा के बाद भी उनकी सहभागिता जारी रही, ताकि व्यक्तियों और परिवारों के बीच स्वच्छता संबंधी व्यवहारों को लगातार सुदृढ़ बनाए रखा जा सके।
चित्र -2 : बिहार में स्वच्छाग्रहियों और एसएचजी दीदियों की बैठक
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चित्र -3: स्वच्छता के संदेश का प्रसार करने के लिए निगरानी समिति पारस्परिक संचार का उपयोग कर रही है
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निगरानी समितियों के माध्यम से पारस्परिक संचार का विस्तार सामुदायिक नेतृत्व वाली निगरानी तक भी किया गया। इन समितियों को ओडीएफ प्राप्त करने और उसकी निरंतरता बनाए रखने में सहयोग के लिए सशक्त बनाया गया। इनकी गतिविधियों में गांवों में सुबह और शाम नियमित निगरानी शामिल थी। निगरानी गतिविधियों में विशेष रूप से खुले में शौच के लिए इस्तेमाल होने वाले सामान्य स्थानों पर ध्यान दिया गया। समुदाय में निरंतर उपस्थिति और नियमित फॉलो-अप के माध्यम से इन समितियों ने स्वच्छता संबंधी संदेशों को और अधिक प्रभावी बनाया। नियमित निगरानी अभियान, ग्राम सभाएं और रात्रि चौपाल ओडीएफ व्यवहार को निरंतर बनाए रखने में सहायक रहे। सामुदायिक निगरानी के दौरान जमीनी स्तर पर निगरानी को प्रभावी बनाने के लिए स्वच्छाग्रहियों को टॉर्च और सीटी सहित एक टूलकिट भी उपलब्ध कराई गई।
इस प्रकार, इस दृष्टिकोण ने स्वच्छता को व्यक्तिगत व्यवहार से साझा सामुदायिक मानदंड में परिवर्तित कर दिया। व्यवहार परिवर्तन को पुख्ता बनाने और उसे बरकरार रखने में समुदाय स्वयं सक्रिय भागीदार बन गया।
व्यक्तिगत संवाद से सामूहिक कार्रवाई तक
पारस्परिक संचार ने परिवार और समुदाय के स्तर पर संवाद के अवसर प्रदान किए। सामुदायिक लामबंदी ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए लोगों को एक साथ लाकर स्वच्छता संबंधी साझा चिंताओं पर चर्चा करने और सामूहिक समाधान तलाशने का अवसर दिया। एसबीएम के अंतर्गत, इसने समुदायों को उनकी दैनिक स्वच्छता प्रथाओं को प्रभावित करने वाले निर्णयों में भागीदारी के लिए मंच प्रदान किए। ग्राम सभाओं, चौपालों, सामुदायिक बैठकों और अन्य स्थानीय मंचों ने स्वच्छता संबंधी मुद्दों पर संवाद संभव बनाया और समुदायों को साझा प्राथमिकताओं के बारे में सर्वसम्मति कायम करने में सहायता की।
सामुदायिक लामबंदी ने स्वच्छता से जुड़े संवाद में विभिन्न समूहों को भी शामिल किया। सामुदायिक नेतृत्वकर्ता, पंचायती राज संस्थाएं, स्वयंसेवक, धार्मिक नेतृत्वकर्ता और महिला समूह स्थानीय स्तर पर चर्चाओं और कार्यक्रमों को सुगम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते थे। इस दृष्टिकोण ने व्यक्तिगत व्यवहार को सामूहिक जिम्मेदारी से जोड़ा। सुरक्षित स्वच्छता व्यवहार अपनाने वाला परिवार व्यापक सामुदायिक प्रयास का हिस्सा बन गया। सामुदायिक चर्चाओं ने स्थानीय सरकारों की पहचान करने, अनुभव साझा करने और वांछित स्वच्छता व्यवहारों पर सामूहिक सहमति बनाने के अवसर प्रदान किए। यह दृष्टिकोण चलो चंपारण, स्वच्छ शक्ति, स्वच्छ सुंदर शौचालय, स्वच्छता ही सेवा, स्वच्छ सुंदर सामुदायिक शौचालय, स्वच्छ भारत दिवस, स्वच्छता महोत्सव और स्वच्छता पखवाड़ा जैसे अभियानों में भी दिखाई दिया। इन अभियानों ने स्वच्छता और साफ-सफाई के लिए सामूहिक सहभागिता के मंच उपलब्ध कराए।

चित्र 4 : असम में स्थानीय भाषा में स्वच्छता के संदेश प्रसारित करती वॉल पेंटिंग
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मिड-मीडिया और आउटडोर संचार के माध्यम से सामुदायिक लामबंदी को और अधिक प्रभावी बनाया गया। इन माध्यमों ने स्वच्छता संबंधी संदेशों को व्यक्तिगत संवाद से आगे बढ़ाकर उन स्थानों तक पहुंचाया, जहां समुदाय नियमित रूप से एकत्रित होते थे। कठपुतली शो, मैजिक शो, नाटक और नुक्कड़ नाटक स्थानीय एवं पारंपरिक मिड-मीडिया माध्यमों के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। वहीं, आउटडोर मीडिया स्वच्छता संबंधी संदेशों को पहुंचाने के लिए सार्वजनिक स्थानों, जैसे बिलबोर्ड और अधिकृत सार्वजनिक दीवारों पर वॉल पेंटिंग्स का उपयोग करता है। स्थानीय पहचान को प्रतिबिंबित करने और शहरों के सौंदर्यीकरण में सहायता देते हुए स्वच्छता के संदेशों को संप्रेषित करने के लिए वॉल पेंटिंग्स और ग्रैफिटी कला का विशेष रूप से उपयोग किया गया है। इन माध्यमों का महत्व केवल संदेशों की दृश्यता बढ़ाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस बात में भी है कि वे स्वच्छता को लोगों के दैनिक सामाजिक परिवेश का हिस्सा बनाते हैं। किसी सामुदायिक कार्यक्रम, नुक्कड़ प्रस्तुति या सार्वजनिक आयोजन के दौरान सामने आने वाला स्वच्छता संदेश, परिवारों और स्थानीय समूहों के बीच चल रहे संवाद को और प्रभावी बना सकता है।

चित्र -5: स्वच्छता ऐप एंड्रॉयड और आईओएस यूजर्स के लिए उपलब्ध है
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एसबीएम-यू के अंतर्गत नागरिकों तक अधिकतम पहुंच सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल माध्यमों का उपयोग प्रमुख रहा है। उदाहरण के लिए, 3,300 से अधिक शहरों के 67,000 से अधिक सार्वजनिक शौचालय ब्लॉकों की जानकारी गूगल मैप्स पर अपलोड की गई। इससे सभी वर्गों के नागरिकों के लिए स्वच्छता सुविधाओं तक पहुंच और उनकी उपलब्धता की जानकारी प्राप्त करना अधिक आसान हुआ। स्वच्छता ऐप ने नागरिकों के लिए शिकायत निवारण का वन-स्टॉप डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म उपलब्ध कराया है। इसके माध्यम से नागरिक स्वच्छता से जुड़े विभिन्न पहलुओं के संबंध में अपनी शिकायतें दर्ज कर सकते हैं।
जनसंचार माध्यमों ने इस संदेश को और अधिक प्रभावी बनाया। इन माध्यमों में टेलीविजन, रेडियो, प्रिंट और ऑनलाइन मीडिया चैनल शामिल रहे। सामुदायिक रेडियो के माध्यम से स्वच्छता से जुड़ी चर्चाएं, अनुभव-कथाएं, कहानियां और जनहित संदेश प्रसारित किए गए। ट्विटर, फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म प्रमुख स्वच्छता संदेशों को प्रसारित करने तथा वर्चुअल नेटवर्क और समुदायों के निर्माण में सहायक सिद्ध हुए। मोबाइल टेलीफोन सेवाओं ने बल्क एसएमएस, व्हाट्सऐप और पॉडकास्ट का उपयोग कर जागरूकता और स्वच्छता संबंधी संदेशों का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार किया।

चित्र 6: एसएचएस 2026 अभियान के दौरान एक सोशल मीडिया पोस्ट
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स्वच्छ टॉक्स एसबीएम-यू के अंतर्गत डिजिटल सहभागिता का एक उदाहरण है। यह सहकर्मी-आधारित सीख पर केंद्रित वेबिनार श्रृंखला है, जिसका उद्देश्य स्वच्छता से जुड़े जमीनी अनुभवों और श्रेष्ठ प्रथाओं को साझा करना है। ऐसे डिजिटल मंचों ने स्वच्छता संबंधी संवाद को पारंपरिक विषयों से आगे बढ़ाकर प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन और सर्कुलर अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने जैसे व्यापक मुद्दों तक विस्तारित करने में मदद की है।
आईपीसी से सामुदायिक लामबंदी तक की यात्रा व्यवहार परिवर्तन की इकाई में आए बदलाव को दर्शाती है। यह प्रगति एसबीएम के अंतर्गत एसबीसीसी दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। संचार तब समाप्त नहीं होता जब कोई संदेश किसी व्यक्ति तक पहुंच जाता है, बल्कि उसका महत्व तब और बढ़ जाता है जब लोग उस संदेश के बारे में चर्चा करते हैं, उसे अपने स्थानीय संदर्भ के अनुरूप अपनाते हैं और सामूहिक कार्रवाई में भाग लेते हैं। इस प्रक्रिया में सहभागिता स्वयं संचार का एक रूप बन जाती है।
एसबीसीसी के लिए प्रसिद्ध हस्तियों द्वारा प्रचार और लोकप्रिय संस्कृति का उपयोग
स्वच्छ भारत मिशन ने अपने एसबीसीसी के प्रयासों को मजबूती प्रदान करने के लिए प्रसिद्ध हस्तियों की व्यापक पहुंच का भी उपयोग किया। वर्ष 2016 में अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर एसबीएम-जी के लिए राष्ट्रीय श्रव्य- दृश्य अभियानों में शामिल हुए। इन अभियानों का उद्देश्य संचार को अधिक जन केंद्रित बनाना तथा व्यवहार परिवर्तन और नागरिक सहभागिता को बढ़ावा देना था।

चित्र 7: शौचालय के उपयोग को प्रचारित करने के लिए मशहूर हस्तियों का प्रमोशन
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इन दोनों ने जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं तथा स्वच्छता चैम्पियनों को प्रोत्साहित करने के लिए स्वच्छ भारत से जुड़े कार्यक्रमों में भी भाग लिया ।इसके बाद, वर्ष 2017 में अमिताभ बच्चन ने ‘दरवाज़ा बंद’ अभियान का नेतृत्व किया। इस अभियान का उद्देश्य उन लोगों के बीच शौचालय के उपयोग को बढ़ावा देना था, जिनके घरों में शौचालय उपलब्ध होने के बावजूद वे खुले में शौच की प्रथा जारी रखे हुए थे। अभियान में अनुष्का शर्मा भी शामिल रहीं, जिन्होंने महिलाओं को अपने गांवों में स्वच्छता से जुड़े मुद्दों के समाधान में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित किया। इस अभियान ने जमीनी स्तर पर चल रहे आईईसी प्रयासों और स्वच्छाग्रहियों द्वारा किए जा रहे पारस्परिक संचार को मजबूत बनाने में जनसंचार माध्यमों का उपयोग किया।
सिनेमा भी स्वच्छता से जुड़े सामाजिक मानदंडों का उल्लेख करने का प्रभावी माध्यम बन गया। अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर अभिनीत ‘टॉयलेट – एक प्रेम कथा’ ने स्वच्छता और शौचालय के उपयोग को मुख्यधारा की लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बनाया। वर्ष 2018 में अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर ट्विन-पिट शौचालय तकनीक को प्रचारित करने वाले एसबीएम – जी के एक अभियान में शामिल हुए। राज्य और जिला स्तर की एसबीएम – जी टीमों द्वारा इस फिल्म को गांवों में गैर-व्यावसायिक प्रदर्शन के लिए भी उपलब्ध कराया गया। अभियान में शौचालय की पिट खाली करने से जुड़ी नकारात्मक धारणाओं को दूर करने तथा शौचालय के निरंतर उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए प्रसिद्ध हस्तियों के प्रभाव का उपयोग किया गया। विद्या बालन ने “जहां सोच, वहां शौचालय” संदेश को प्रचारित करने वाले एक वीडियो में भाग लिया। इसमें शौचालय के उपयोग से होने वाले स्वास्थ्य लाभों पर जोर दिया गया और ग्रामीण परिवारों में महिलाओं के नेतृत्व में शौचालय निर्माण की पहल को प्रोत्साहित किया गया। इस प्रकार, लोकप्रिय मीडिया ने एसबीसीसी को और अधिक मजबूत बनाने में भूमिका निभाई और स्वच्छता संबंधी संदेशों को सरकारी अभियानों से आगे बढ़ाकर टेलीविजन, सिनेमा और व्यापक सार्वजनिक विमर्श तक पहुंचाया।
महिलाएं और बच्चे: स्वच्छता को आकार देना और अनुभव करना
स्वच्छता सहभागिता के नए अवसरों का सृजन करते हुए रोजमर्रा के अनुभवों को भी परिवर्तित कर सकती है। महिलाओं के संदर्भ में सुरक्षा, सुविधा और स्वाभिमान इस बदलाव के तीन महत्वपूर्ण आयाम हैं। सुरक्षा, सुविधा और आत्मसम्मान स्वच्छता को महिलाओं के दैनिक जीवन और अनुभवों से जोड़ते हैं। यह प्रभाव महिलाओं द्वारा साझा किए गए अनुभवों में परिलक्षित होता है। जल शक्ति मंत्रालय के सहयोग से किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 93 प्रतिशत महिलाओं को अब शौच के दौरान किसी व्यक्ति द्वारा चोट पहुंचाए जाने या जानवरों से नुकसान पहुंचने का डर नहीं सताता। 91 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि प्रतिदिन उनके एक घंटे तक के समय की बचत होती है और उन्हें एक किलोमीटर तक की दूरी तय नहीं करनी पड़ती। वहीं, 93 प्रतिशत महिलाओं ने यह भी बताया कि स्वच्छता संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उन्हें अब भोजन या पानी के सेवन को सीमित नहीं करना पड़ता।
दिलचस्प बात तो यह है कि बिहार में लोग शौचालयों को ‘इज्जतघर’ कहने लगे हैं, जो उन्हें महिलाओं के सम्मान से जोड़ता है। इस प्रकार, शौचालयों का निर्माण एक महत्वपूर्ण सामाजिक असंतुलन को दूर करने में सहायक रहा है। यह आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण का कारण बनता जा रहा है। महिलाओं ने सामुदायिक कार्यकर्ताओं के रूप में स्वच्छता के क्षेत्र में योगदान दिया है। महिला समूह और स्वयं सहायता समूह उन सामुदायिक नेटवर्कों का हिस्सा हैं, जिनके माध्यम से स्वच्छता संबंधी संदेश लोगों तक पहुंचाए जा सकते हैं। यह स्वच्छता संबंधी संचार को मौजूदा सामुदायिक संस्थाओं और सामाजिक नेटवर्कों से जोड़ता है।

चित्र 8: स्कूल बच्चों को स्वच्छता के बारे में शिक्षित कर रहे हैं
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बच्चे स्वच्छता संबंधी संचार और दैनिक व्यवहार के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करते हैं। स्कूल ऐसे स्थान बन सकते हैं, जहां स्वच्छता संबंधी व्यवहारों के बारे में चर्चा की जाती है, प्रदर्शन किया जाता है और उन्हें लगातार मजबूत किया जाता है। एसबीएम विद्यार्थियों की पहचार सहभागी और परिवर्तन के एजेंट के रूप में करता है। एसबीएम के अंतर्गत पाठ्यक्रम में स्वच्छता का समावेश, जागरूकता अभियान, श्रमदान, मोबाइल-वैन के माध्यम से शिक्षा और अपशिष्ट प्रबंधन सुविधाओं का भ्रमण सहित स्कूल-आधारित दृष्टिकोणों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। संचार भी ऐसे प्रारूपों के जरिए बच्चों तक पहुंचाया गया, जो सीखने को सहभागिता और मनोरंजन के साथ जोड़ते हैं। इनमें शैक्षिक वीडियो, फ्लिपचार्ट और छोटे समूहों में सहभागिता के लिए अन्य सामग्री शामिल हैं। इसके साथ ही, स्वच्छता संबंधी संदेशों के प्रसार के लिए कठपुतली शो, मैजिक शो, नाटक और नुक्कड़ नाटक जैसे स्थानीय एवं पारंपरिक माध्यमों को भी महत्व दिया गया।
महिलाएं और बच्चे मिलकर स्वच्छता संबंधी व्यवहार परिवर्तन की दोतरफा प्रकृति को दर्शाते हैं। वे बेहतर स्वच्छता से होने वाले लाभों का अनुभव करने के साथ ही साथ परिवारों, स्कूलों और समुदायों के माध्यम से स्वच्छता व्यवहारों के प्रसार में भी योगदान देते हैं। महिला समूह सामुदायिक नेटवर्क को मजबूत करने में भूमिका निभा सकते हैं, जबकि बच्चे स्वच्छता संबंधी संदेशों को घरों और दैनिक सामाजिक व्यवहारों तक पहुंचा सकते हैं। इस प्रकार, स्वच्छता केवल बुनियादी ढांचे या व्यक्तिगत व्यवहार का ही विषय नहीं रह जाती, बल्कि यह एक साझा सामुदायिक व्यवहार बन जाती है, जिसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निरंतर बनाए रखा जा सकता है।
पुरस्कारों एवं सम्मान के माध्यम से वांछित स्वच्छता व्यवहार को प्रभावपूर्ण बनाना
स्वच्छता को बनाए रखने के लिए केवल प्रारंभिक जागरूकता और सामुदायिक लामबंदी पर्याप्त नहीं है। एसबीएम का दृष्टिकोण प्रमाणीकरण, मान्यता, प्रेरक उपाय और सामुदायिक प्रोत्साहनों को एक साथ जोड़ता है। ये तंत्र सहभागिता बनाए रखने और लोगों को वांछित स्वच्छता संबंधी व्यवहारों को लगातार अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने में सहायक हैं।
शहरों और गांवों को दिए जाने वाले प्रमाणीकरण प्रोटोकॉल स्वच्छता और साफ सफाई से जुड़े परिणामों के लिए स्पष्ट मानक निर्धारित करते हैं। एसबीएम के अंतर्गत ओडीएफ, ओडीएफ+, ओडीएफ++, वॉटर+ और स्टार रेटिंग प्रोटोकॉल ने नागरिकों की सहभागिता के साथ इन परिणामों को मानकीकृत करने में सहायता की। ओडीएफ प्रोटोकॉल शौचालय तक सभी नागरिकों की पहुंच सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करता है। ओडीएफ+ इस दायरे को कार्यशील और उपयोग योग्य सामुदायिक एवं सार्वजनिक शौचालयों तक विस्तारित करता है। इनका उचित संचालन और रखरखाव शौचालयों के निरंतर उपयोग को बढ़ावा देता है और खुले में शौच की ओर दोबारा लौटने की संभावना को कम करने में मदद करता है। ओडीएफ ++ मानव मल-कीचड़ (या फीकल स्लज) के सुरक्षित संग्रहण, निकासी, परिवहन और प्रसंस्करण पर ध्यान केंद्रित करता है। इसका उद्देश्य अनुपचारित फीकल स्लज को खुले नालों, जल निकायों या खेतों में पहुंचने से रोकना है। वॉटर+ का दायरा फोकस को अनुपचारित ब्लैक वाटर और ग्रे वाटर तक विस्तारित करता है। यह उपचारित अपशिष्ट जल के एक हिस्से के पुनः उपयोग को भी बढ़ावा देता है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए, शहर के अपशिष्ट प्रबंधन की स्थिति के आकलन के लिए अपशिष्ट मुक्त शहरों की स्टार रेटिंग प्रोटोकॉल एक समग्र मानक प्रदान करता है। इसके मानकों में अपशिष्ट का घर-घर से संग्रहण और स्रोत पर अपशिष्ट का पृथक्करण शामिल है। इनमें अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रसंस्करण और पुराने अपशिष्ट स्थलों का सुधार भी शामिल है। इस प्रकार, ये सभी प्रोटोकॉल मिलकर ऐसे मानक तैयार करते हैं, जिनके आधार पर स्वच्छता संबंधी परिणामों का आकलन किया जा सकता है।
सम्मान से समुदाय में सकारात्मक व्यवहार दिखता है, जो सहभागिता को और मजबूत बना सकता है। एसबीएम के अंतर्गत उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले कार्यकर्ताओं, सहकर्मी नेतृत्वकर्ताओं और स्थानीय स्वच्छता चैंपियनों को सहकर्मी-मान्यता तथा सरकार की ओर से प्रशंसा-पत्र प्रदान किए जाते हैं। सम्मान दूसरों के लिए अनुकरणीय उदाहरण भी प्रस्तुत कर सकते हैं, जिससे वे ऐसे सकारात्मक व्यवहारों को अपनाने के लिए प्रेरित हों। इस प्रकार, यह दृष्टिकोण व्यक्तिगत योगदान को सामूहिक पहचान और सामुदायिक सहभागिता से जोड़ता है।
प्रोत्साहनों को स्थानीय स्तर पर स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ी विशिष्ट चुनौतियों के अनुरूप भी तैयार किया जा सकता है। ‘स्वच्छता क्रॉनिकल्स’ में जम्मू-कश्मीर की पंचायत हलका हिल्लर का एक उदाहरण दर्ज है। इस पहल के अंतर्गत समुदायों को प्लास्टिक अपशिष्ट एकत्र करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु “पॉलिथीन दो सोना पाओ” अभियान शुरू किया गया। इस अभियान में युवाओं और महिलाओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इसका उद्देश्य स्थानीय क्षेत्रों को पॉलीथिन अपशिष्ट से मुक्त बनाना था। निर्धारित मात्रा में एकत्र किए गए प्लास्टिक अपशिष्ट के बदले सोने के दो सिक्के देने की पेशकश की गई। इस पहल ने जागरूकता, सामुदायिक सहभागिता और प्रोत्साहन को एक साथ जोड़कर लोगों को कार्रवाई के लिए प्रेरित किया।

चित्र 9: “पॉलिथीन दो सोना पाओ” अभियान का एक विजेता
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अभियान के अंतर्गत घरों में कपड़े के थैले उपलब्ध कराने और सामुदायिक श्रमदान अभियान आयोजित करने जैसी गतिविधियां भी शामिल रहीं।
इस प्रकार, स्वच्छता के अंतर्गत व्यवहार का सुदृढ़ीकरण कई स्तरों पर कार्य करता है। प्रोटोकॉल मानक निर्धारित करते हैं, व्यवहार को प्रोत्साहित करने वाले संकेत वांछित कार्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं, सम्मान निरंतर सहभागिता को प्रोत्साहित करते हैं, जबकि सामुदायिक प्रोत्साहन स्थानीय स्वामित्व की भावना को मजबूत कर सकते हैं। ये सभी तंत्र मिलकर स्वच्छता को अभियान-आधारित गतिविधि से आगे बढ़ाकर एक स्थायी व्यवहारिक प्रथा में बदलने में सहायता करते हैं।
स्वच्छता बनाए रखने के लिए व्यवहार की निगरानी
स्वच्छता को बनाए रखने के लिए ऐसे तंत्र आवश्यक हैं, जो प्रगति का आकलन कर सकें और उन क्षेत्रों की पहचान कर सकें जहां आगे कार्रवाई की आवश्यकता है। इसलिए, निगरानी केवल बुनियादी ढांचे के आकलन तक ही सीमित न रहकर नागरिक सहभागिता, स्थानीय स्तर पर आकलन और निरंतर सुधार के अवसर भी प्रदान करती है।
स्वच्छ सर्वेक्षण विश्व का सबसे बड़ा शहरी स्वच्छता सर्वेक्षण बनकर उभरा है। यह स्वच्छता और साफ-सफाई से जुड़े विभिन्न मानकों के आधार पर शहरों और राज्यों का मूल्यांकन करता है। समय के साथ यह एसबीएम-यू के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण शासन उपकरण के रूप में भी विकसित हुआ है। स्वच्छ सर्वेक्षण शहरों और राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करते हुए प्रेरक तंत्र के रूप में कार्य करता है। इससे स्थानीय प्रशासन को अपने स्वच्छता संबंधी प्रदर्शन में सुधार करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। सर्वेक्षण के माध्यम से नागरिक सहभागिता में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 2016 में पहले चरण के दौरान लगभग एक लाख नागरिकों ने अपनी प्रतिक्रिया दी थी, जो वर्ष 2021 में छठे चरण के दौरान बढ़कर लगभग पांच करोड़ नागरिकों तक पहुंच गई। इस प्रकार, स्वच्छ सर्वेक्षण केवल स्वच्छता परिणामों के आकलन तक सीमित नहीं है। यह नागरिकों, स्थानीय सरकारों और स्वच्छता प्रणालियों के बीच एक व्यवस्थित संवाद एवं सहभागिता का माध्यम भी तैयार करता है।
सामुदायिक स्तर पर निगरानी व्यवहार परिवर्तन की स्थिरता बनाए रखने में भी सहायक होती है। एसबीएम-जी के दिशा-निर्देशों में ओडीएफ घोषित होने के बाद भी निगरानी समितियों, सामुदायिक नेतृत्वकर्ताओं और पंचायत प्रतिनिधियों की निरंतर सहभागिता का प्रावधान किया गया है।
स्वच्छता की निरंतर यात्रा
स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) की यात्रा स्वच्छता संबंधी प्रथाओं और संचार के दृष्टिकोण—दोनों में क्रमिक विकास को दर्शाती है। प्रारंभिक चरण में जागरूकता फैलाने और घरों में शौचालय निर्माण की मांग उत्पन्न करने पर जोर दिया गया। इसके बाद शौचालयों के नियमित उपयोग को प्रोत्साहित करने और खुले में शौच की प्रथा को समाप्त करने के प्रयास किए गए। इन उपलब्धियों को सुदृढ़ करने के साथ ही ध्यान ओडीएफ की स्थिति को बनाए रखने तथा ठोस और तरल अपशिष्ट के बेहतर प्रबंधन की ओर विस्तारित किया गया। इन बदलती प्राथमिकताओं के साथ संचार का स्वरूप जागरूकता फैलाने से बढ़कर गहन सहभागिता और सामूहिक भागीदारी तक विकसित हुआ।
समग्र रूप से, ये अनुभव-सूचना से सहभागिता तक, सहभागिता से भागीदारी तक और भागीदारी से स्थायी सामुदायिक स्वामित्व तक एक निरंतर यात्रा को दर्शाते हैं। एसबीएम के अंतर्गत संचार, स्वच्छता के व्यापक तंत्र का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है, जो लोगों को बुनियादी ढांचे, संस्थाओं और सामूहिक कार्रवाई से जोड़ता है। इसका व्यापक उद्देश्य केवल स्वच्छता का संदेश पहुंचाना ही नहीं, बल्कि इसे एक सतत व्यवहार के रूप में विकसित करना है, जो समुदाय के दैनिक जीवन में गहराई से जुड़ा हो।
संदर्भ
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स्वच्छता के संदेश का प्रचार, व्यवहार में बदलाव
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