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Farmer's Welfare

खेती की प्रणालियों का पुनर्निर्माण: सुदृढ़ भारत के लिए पुनर्योजी कृषि

Posted On: 23 AUG 2026 10:28AM

भारत के खेतों ने कृषि विकास को निरंतर जारी रखा है, लेकिन दीर्घकालिक उत्पादकता स्वस्थ मृदा  और सुदृढ़ इकोसिस्टम पर निर्भर करती है। ‘पुनर्योजी कृषि’ मृदा की जीवन-शक्ति को बहाल करने, जैव-विविधता को बेहतर बनाने और जलवायु संबंधी दबावों से निपटने की क्षमता को मजबूत करने का एक रास्ता प्रदान करती है।  देश भर में किसान प्राकृतिक खेती, कृषि-वानिकी, सूक्ष्म सिंचाई, एकीकृत कृषि प्रणालियों और वैज्ञानिक मृदा प्रबंधन जैसे तरीकों को अपना रहे हैं। सरकारी समर्थन ने इस बदलाव को गति प्रदान की है। मार्च 2026 तक, प्राकृतिक खेती वाले क्लस्टर 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए थे और इनमें 18.19 लाख किसान शामिल थे। मई 2026 तक, लगभग 109 लाख हेक्टेयर भूमि को ‘हर बूंद, अधिक फसल’ (पर ड्रॉप मोर क्रॉप) योजना के तहत लाया गया है। इसके अलावा, इस योजना की शुरुआत से लेकर मार्च 2026 तक 25.89 करोड़ ‘मृदा स्वास्थ्य कार्ड’ जारी किए गए हैं। ये सम्मिलित प्रयास भारतीय कृषि के लिए एक अपेक्षाकृत अधिक उत्पादक, संसाधन की दृष्टि से कुशल और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार भविष्य के निर्माण में सहायता प्रदान कर रहे हैं।

 

पुनर्योजी कृषि की अनिवार्यता

भारत की कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों ने ठोस एवं निरंतर प्रगति अर्जित की है। वित्त वर्ष 2016 से लेकर  वित्त वर्ष 2025 के दौरान, इसने 4.45 प्रतिशत की दशकीय वृद्धि दर्ज की। यह वृद्धि दर पिछले दशकों में सबसे अधिक थी। यह उपलब्धि इस क्षेत्र की मजबूती और देश भर के किसानों के निरंतर प्रयासों को दर्शाती है। फिर भी, इस गति को बनाए रखने हेतु उन पर्यावरणीय (इकोलॉजिकल) आधारों को मजबूत करना जरूरी है जो दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता को सहारा प्रदान करते हैं।

हर मौसम में, किसान नई उम्मीद और बढ़ी हुई जिम्मेदारी के साथ अपने खेतों में लौटते हैं। वर्षों की सघन खेती, रसायनों के अत्यधिक उपयोग और अनियमित बारिश के कारण कई प्रकार की मिट्टी की उपजाऊ क्षमता घट जाती है और वे कम असरदार रह जाती हैं। जो उपज पहले आसानी से मिल जाती थी, उसके लिए अब अधिक इनपुट की जरूरत होती है। वहीं लू, सूखे के दौर या अत्यधिक बारिश महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकती है। लाखों छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए, मिट्टी की गिरती सेहत का मतलब अक्सर उच्च लागत और अनिश्चित फसल होता है। नतीजतन, खेती की स्थिरता एक बहुत ही महत्वपूर्ण चिंता का विषय बन गई है।

यहीं आकर पुनर्योजी कृषि प्रासंगिक बन जाती है। मिट्टी की जीवन-शक्ति को फिर से बढ़ाकर, इकोसिस्टम के कामकाज को सुदृढ़ करके और जलवायु परिवर्तनशीलता का सामना करने की क्षमता में सुधार करके, यह मिट्टी और उत्पादकता, दोनों से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करती है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पद्धति भारत की कृषि के आधार को पुनर्जीवित करने का रास्ता दिखाती है। साथ ही, पर्यावरण के दीर्घकालिक संतुलन बनाए रखने और किसानों की समृद्धि सुनिश्चित करने में भी सहायता करती है।

पुनर्योजी कृषि के दृष्टिकोण को समझना

पुनर्योजी कृषि खेती का एक ऐसा समग्र तरीका है, जो मृदा की सेहत को बेहतर बनाने और जैव-विविधता को बढ़ाने पर केन्द्रित है। साथ ही, इसका उद्देश्य खेती की पद्धति में दीर्घकालिक उत्पादकता एवं सुदृढ़ता सुनिश्चित करना है। स्वस्थ मृदा से अपेक्षाकृत अधिक भोजन और पोषण मिलता है, अधिक कार्बन का भंडारण होता है और जैव-विविधता को बढ़ावा मिलता है। मौजूदा स्थितियों को बनाए रखने को अपना मुख्य उद्देश्य मानने वाली सतत कृषि के उलट, पुनर्योजी कृषि का उद्देश्य स्थितियों को बेहतर बनाना होता है। मृदा की सेहत को सक्रिय रूप से बेहतर बनाकर, जैव-विविधता को बढ़ाकर और इकोसिस्टम की सुदृढ़ता को मजबूत करके, यह पद्धति एक कदम और आगे जाती है।

यह निम्नलिखित सिद्धांतों पर आधारित है:

  • मिट्टी के साथ कम से कम छेड़छाड़ करना
  • बारहमासी फसलों की सजीव जड़ों की सुरक्षा करना
  • मिट्टी पर आवरण बनाए रखना
  • पशुधन को शामिल करना
  • रासायनिक इनपुट के उपयोग को सीमित करना
  • जैव-विविधता को बढ़ाना

संक्षेप में, पुनर्योजी कृषि खेती के प्राकृतिक आधार को बहाल करके खेती के भविष्य हेतु एक व्यावहारिक और भविष्योन्मुखी रास्ता प्रदान करती है।

पुनर्योजी तरीकों से कृषि क्षेत्र की क्षमता और सुदृढ़ता को बढ़ाना

पुनर्योजी कृषि भारत में अपनाई जाने वाली खेती की विविध पद्धतियों पर आधारित है।  भले ही पुनर्योजी तरीकों का दायरा बहुत बड़ा है, फिर भी कुछ प्रमुख तरीकों को मोटे तौर पर इन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

जल एवं संसाधनों संबंधी दक्षता

ड्रिपर, स्प्रिंकलर और फॉगर जैसी सूक्ष्म-सिंचाई (माइक्रो-इरीगेशन) प्रणालियां सीधे पौधों की जड़ों तक पानी पहुंचाती हैं। इससे पानी की बर्बादी कम होती है और पानी के उपयोग की क्षमता बेहतर होती है। खेत के स्तर पर जल प्रबंधन को बेहतर बनाकर, ये प्रणालियां फसल की पैदावार बढ़ाती हैं और सूखे व पानी की कमी से निपटने की क्षमता को मजबूत करती हैं। परिणामस्वरूप, खेती की प्रणालियां जलवायु की दृष्टि से अधिक सुदृढ़ और आर्थिक रूप से व्यावहारिक बन जाती हैं।

खेती के मशीनीकरण के तहत खेती-बाड़ी के विभिन्न कार्यों को आसान एवं स्वचालित बनाने हेतु खेती की मशीनों व उपकरणों का उपयोग किया जाता है। यह पानी, ईंधन और उर्वरक जैसे जरूरी साधनों के उपयोग को बेहतर बनाने में मदद करता है, जिससे बर्बादी कम होती है और कार्बन उत्सर्जन भी घटता है। खेती-बाड़ी के कार्यों को समय पर और सही ढंग से करने में मदद करके, मशीनीकरण संसाधनों के प्रबंधन को बेहतर बनाता है, उत्पादकता को बढ़ाता है और खेती से पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को कम करने में मदद करता है

मृदा और पोषक तत्वों का प्रबंधन

नाइट्रोजन उर्वरक प्रबंधन नाइट्रस ऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करने के साथ-साथ फसल की उत्पादकता बढ़ाने में मदद करता है। यह सही उर्वरक को चुनने और उसके उपयोग के उपयुक्त समय एवं मात्रा को बेहतर बनाने पर ध्यान केन्द्रित करता है। अन्य तरीकों में अत्यधिक दानेदार (सुपरग्रेन्युलर) यूरिया को गहराई में डालना और नाइट्रोजन की स्थिति का सटीक आकलन करने हेतु पत्तियों के रंग वाले चार्ट का उपयोग करना शामिल है। यह तरीका साइनोबैक्टीरिया और लेग्यूम इंटरक्रॉपिंग जैसे जैविक इनपुट को भी बढ़ावा देता है। कुल मिलाकर, ये उपाय नाइट्रोजन के उपयोग संबंधी दक्षता को बेहतर बनाते हैं और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करते हैं।

प्राकृतिक खेती, भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों पर आधारित एक रसायन-मुक्त कृषि पद्धति है। यह पद्धति बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र और दशपर्णी जैसे खेत में ही तैयार किए जाने वाले जैविक इनपुट पर निर्भर करती है।  इन्हें देसी पशुओं से मिलने वाली चीजों का उपयोग करके बनाया जाता है। यह पारंपरिक किस्म के बीजों के उपयोग और खेतों की मेड़ों पर पेड़ लगाने को भी बढ़ावा देता है। कीट प्रबंधन स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए तथा खेत पर ही बनाए जाने वाले वनस्पति-आधारित मिश्रणों के जरिए किया जाता है। मिट्टी की उपजाऊ क्षमता और इकोलॉजिकल संतुलन बनाए रखने हेतु किसानों को निरंतर आवरण फसल उगाने (कवर क्रॉपिंग), बहु-फसली खेती करने (मल्टी-क्रॉपिंग), मल्चिंग और मिट्टी को कम से कम छेड़ने के तरीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। विविध फसल प्रणालियों के साथ पशुधन को जोड़ने से मिट्टी की सेहत बेहतर होती है, इकोसिस्टम बहाल होता है और किसानों के लिए इनपुट लागत कम होती है।

पुनर्योजी कृषि में हरी खाद के उपयोग (ग्रीन मैन्यूरिंग), कवर क्रॉपिंग और मल्चिंग जैसे मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन पद्धतियों की अहम भूमिका होती है। ग्रीन मैन्यूरिंग की प्रक्रिया में मिट्टी में जैव पदार्थ एवं पोषक तत्वों का समावेश करने हेतु विशेष प्रकार की फसलें उगाई और उनमें मिलाई जाती हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता, संरचना और कार्बन सोखने की क्षमता को बेहतर बनाने में मदद मिलती है। कवर क्रॉपिंग का मतलब फसलों को काटने के बजाय मुख्य रूप से मिट्टी को ढकने के लिए उगाना है। यह अपरदन से बचाता है, मिट्टी में जैव कार्बन बनाए रखता है और पोषक तत्वों के चक्र में मदद करता है। मल्चिंग में मिट्टी की सतह को पत्तियों, पुआल आदि जैसे जैविक अवशेषों से ढका जाता है। यह नमी बनाए रखने और मिट्टी के तापमान को नियंत्रित करने में मदद करता है। मल्चिंग खरपतवार को भी रोकती है, लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को बढ़ावा देती है और फसल की उत्पादकता बढ़ाती है।

एकीकृत एवं जलवायु-अनुकूल कृषि प्रणालियां

एकीकृत कृषि प्रणाली (आईएफएस) खेती का एक ऐसा समग्र तरीका है जो विभिन्न प्रकार के कृषि कार्यों को एक ही प्रणाली में जोड़ता है। इसमें फसलें, पशुपालन, मत्स्यपालन और बागवानी, कृषि-वानिकी व मधुमक्खी पालन जैसी सहायक गतिविधियां शामिल होती हैं। यह तरीका अंतर-फसल खेती (इंटरक्रॉपिंग), फसल चक्र (क्रॉप रोटेशन), बहु-फसली खेती (मल्टी-क्रॉपिंग) और मिश्रित खेती (मिक्स्ड फार्मिंग) जैसी पद्धतियों को बढ़ावा देता है, जिनसे संसाधनों का अधिकतम उपयोग संभव होता है। इससे फसल खराब होने का जोखिम भी कम होता है, आजीविका के अवसरों में विविधता आती है और बाढ़ व सूखे जैसी चरम मौसमी स्थितियों से निपटने की क्षमता बेहतर होती है।

कृषि वानिकी में बारहमासी वृक्ष प्रणालियों को फल एवं बागानी फसलों के साथ एकीकृत किया जाता है ताकि अधिक टिकाऊ और लाभदायक कृषि प्रणाली का निर्माण हो सके। यह किसानों को अतिरिक्त आय अर्जित करने में मदद करने के साथ-साथ मिट्टी की नमी को बेहतर करता है, स्थानीय तापमान को नियंत्रित करता है और अधिक कार्बन को संग्रहित करता है।

वर्षा आधारित क्षेत्रों में, कृषि वानिकी बंजर भूमि के पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ये प्रणालियां अप्रत्याशित वर्षा के प्रभावों को कम करने, कृषि क्षमता बढ़ाने और समय के साथ ग्रीनहाउस गैसों को उत्सर्जन को घटाने में सहायक होती हैं।

जलवायु-अनुकूल कृषि (सीआरए) में बदलती जलवायु के अनुरूप कृषि प्रणालियों को मजबूत बनाने हेतु विभिन्न प्रकार तरह की रणनीतियां एवं तकनीकें शामिल हैं। इसके मुख्य घटकों में शामिल हैं:

  • पोषक तत्वों एवं उर्वरकों का संतुलित उपयोग,
  • कीटों का कारगर प्रबंधन,
  • पानी का कुशल एवं समझदारी भरा उपयोग,
  • खेत के स्तर पर मिट्टी की नमी का संरक्षण,
  • और मृदा की सेहत को सुरक्षित रखने और फसलों की पैदावार को बढ़ाने वाले जमीन तैयार करने के सही तरीके।

इसके अलावा, सीआरए में जल साझा करने वाले समूह, बीज एवं चारे की व्यवस्था, सामुदायिक नर्सरी और सामूहिक विपणन तंत्र जैसी नई बातें शामिल हैं। ये सभी तरीके और नई पहल मिलकर कृषि प्रणालियों को मजबूत बनाते हैं, जिससे वे जलवायु संबंधी कठिनाइयों एवं झटकों से बेहतर ढंग से निपट पाते हैं।

पुनर्योजी कृषि के बहुआयामी लाभ

पुनर्योजी कृषि विभिन्न प्रकार के पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक लाभ प्रदान करती है।  इससे स्वस्थ इकोसिस्टम और सुदृढ़ खेती, दोनों को ही बढ़ावा मिलता है।

पर्यावरण संबंधी परिणाम

  • मृदा पुनर्स्थापन: पुनर्योजी पद्धतियां मृदा में जैव पदार्थों का पुनर्निर्माण करती हैं, मृदा की संरचना को बेहतर करती हैं और दीर्घकालिक मृदा उर्वरता को बढ़ाती हैं, जिससे स्थिर कृषि उत्पादकता को बढ़ावा मिलता है।
  • जैव विविधता संवर्धन: पुनर्योजी पद्धतियां परागणकों, लाभकारी कीटों और मृदा सूक्ष्मजीवों सहित विभिन्न प्रजातियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां सृजित करती हैं। इससे समग्र इकोसिस्टम के संतुलन को मजबूत करने में मदद मिलती है।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का शमन: ये प्रणालियां उत्सर्जित कार्बन की तुलना में अधिक कार्बन अवशोषित और संग्रहित करती हैं, जिससे कृषि संबंधी उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलती है।
  • जल संबंधी दक्षता: स्वस्थ मृदा जल धारण क्षमता को बढ़ाती है और अपवाह को कम करती है। इससे मृदा अपरदन और नदियों एवं झीलों में तलछट एवं प्रदूषकों के प्रवाह को सीमित किया जा सकता है, जिससे जल निकायों की रक्षा में मदद मिलती है।

आर्थिक और सामाजिक परिणाम

  • मुनाफा: स्वस्थ मृदा से सिंथेटिक उर्वरकों, कीटनाशकों और सिंचाई पर निर्भरता कम होती है। इससे खेती की लागत घटती है, पैदावार स्थिर रहती है और किसानों की शुद्ध आय बढ़ती है।
  • रोजगार सृजन: पुनर्योजी कृषि से खेती, परामर्श सेवाओं, तकनीक और इकोलॉजिकल प्रबंधन के क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित होते हैं।
  • बेहतर क्षमता: पुनर्योजी पद्धियों को अपनाने वाले किसान जलवायु में होने वाले बदलावों और बाजार के उतार-चढ़ावों से बेहतर ढंग से निपट पाते हैं।

पुनर्योजी कृषि के जरिए सतत विकास को बढ़ावा

पुनर्योजी कृषि एसडीजी 13 (जलवायु कार्रवाई) से गहराई से जुड़ी हुई है। लक्ष्य 13.1 जलवायु से जुड़े जोखिमों और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति दृढ़ता एवं  अनुकूलन क्षमता को मजबूत करने पर केन्द्रित है। चूंकि पुनर्योजी तरीके ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने में मदद करते हैं, इसलिए वे खेत के स्तर पर जलवायु से जुड़े जोखिमों को घटाने में योगदान देते हैं। नतीजतन, वे खेत के स्तर पर जलवायु के प्रति दृढ़ता को बढ़ाने और जलवायु में बढ़ते बदलावों से निपटने हेतु अनुकूलन क्षमता को मजबूत करने में मदद करते हैं।

 

लक्षित उपायों के जरिए पुनर्योजी कृषि को बढ़ावा देना

सरकार पुनर्योजी कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने हेतु विभिन्न प्रकार की योजनाएं लागू कर रही है। इनमें से कुछ प्रमुख पहलें प्राकृतिक एवं जैविक खेती, कृषि वानिकी, सूक्ष्म सिंचाई, एकीकृत कृषि प्रणाली और वैज्ञानिक मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन को समर्थन प्रदान करती हैं।

राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन

वर्ष 2024 में शुरू किया गया ‘राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (एनएमएनएफ) किसानों को धीरे-धीरे प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ने में मदद करने हेतु एक अनुकूल सहायता इकोसिस्टम का निर्माण करता है। यह योजना प्रति किसान एक एकड़ भूमि पर दो वर्षों तक प्रति वर्ष 4,000 रुपये का आउटपुट-आधारित प्रोत्साहन प्रदान करती है। किसानों को जीवामृत और बीजामृत जैसे बायो-इनपुट आसानी से मिल सकें, इसके लिए इस मिशन के तहत आवश्यकता के अनुरूप 10,000 बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर बनाए जाएंगे। इसमें प्राकृतिक खेती के क्लस्टर बनाने की योजना भी है। हर क्लस्टर में दो कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन (सीआरपी) होंगे जो किसानों को प्राकृतिक खेती के तरीकों के बारे में मार्गदर्शन करेंगे।

05 मार्च 2026 तक, देश भर में 18,786 क्लस्टर बनाए गए हैं। ये क्लस्टर 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हैं और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने हेतु 18.19 लाख किसानों को इसमें शामिल किया गया है। इसके अलावा, कृषि विज्ञान केन्द्रों (केवीके)/कृषि विश्वविद्यालयों (एयू)/स्थानीय प्राकृतिक खेती संस्थानों में 33,676 सीआरपी को प्रशिक्षित किया गया है।

परंपरागत कृषि विकास योजना

वर्ष  2015 में शुरू की गई ‘परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) भारत की जैविक खेती की पहल का एक अहम आधार बन गई है। यह योजना किसानों को पर्यावरण के अनुकूल तरीके अपनाने, जैविक प्रमाणन हासिल करने और ऐसे बाजारों तक पहुंचने के लिए एक व्यवस्थित ढांचा देती है जहां टिकाऊ उत्पादन के लिए बेहतर दाम मिलते हैं। इस योजना के तहत, जैविक खेती करने वाले किसानों को तीन वर्षों में प्रति हेक्टेयर 31,500 रुपये की सहायता प्रदान की जाती है।

31 अक्टूबर 2025 तक, पीकेवीवाई के तहत इसकी शुरुआत से लेकर अब तक कुल 16.90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया है।

हर बूंद, अधिक फसल

‘हर बूंद, अधिक फसल’ [पर ड्रॉप मोर क्रॉप (पीडीएमसी)] योजना 2015-16 से पूरे देश में लागू की जा रही है। यह सूक्ष्म-सिंचाई प्रणाली, विशेषकर ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई के जरिए खेत में पानी के उपयोग की क्षमता को बेहतर बनाने में मदद करती है। ड्रिप सिंचाई में पाइप और एमिटर के ज़रिए पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है, जिससे पानी की बर्बादी कम होती है। स्प्रिंकलर सिंचाई में पाइप और नोज़ल के जरिए खेत में पानी का छिड़काव किया जाता है, जिससे पूरे खेत में समान मात्रा में पानी पहुंचता है।

पीडीएमसी के तहत, सरकार इन प्रणालियों को लगाने हेतु छोटे और सीमांत किसानों को 55 प्रतिशत  और अन्य किसानों को 45 प्रतिशत आर्थिक सहायता देती है। इसके अलावा, कुछ राज्य अपने बजट से किसानों को अतिरिक्त सब्सिडी भी देते हैं।

वर्ष 2015-16 से लागू, इस योजना के तहत मई 2026 तक लगभग 109 लाख हेक्टेयर ज़मीन को कवर किया गया है। इसके लिए कुल 26,325 करोड़ रुपये की केन्द्रीय सहायता जारी की गई है, जिससे पानी के उपयोग से संबंधित दक्षता उल्लेखनीय रूप से बेहतर हुई है।

वर्षा आधारित क्षेत्र विकास कार्यक्रम

वर्ष 2014-15 से लागू वर्षा आधारित क्षेत्र विकास (आरएडी) कार्यक्रम, इलाके के आधार पर क्लस्टर दृष्टिकोण के जरिए एकीकृत कृषि प्रणाली (आईएफएस) को बढ़ावा देता है। यह कार्यक्रम मल्टी-क्रॉपिंग, क्रॉप रोटेशन, इंटर-क्रॉपिंग और मिक्स्ड क्रॉपिंग जैसे तरीकों को बढ़ावा देता है। खेती से होने वाली आय को बढ़ाने, आजीविका को सृदृढ़ करने और मौसम की चरम स्थितियों का सामना करने की क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से, इन तरीकों को बागवानी, पशुपालन, मछली पालन और मधुमक्खी पालन जैसी सहायक गतिविधियों के साथ जोड़ा जाता है।

आरएडी के तहत, एक या उससे अधिक निकटवर्ती गांवों में लगभग 20 हेक्टेयर के क्लस्टर विकसित किए जाते हैं। यह तरीका अलग-अलग योजनाओं के तालमेल को बढ़ावा देता है, समुदाय की भागीदारी को प्रोत्साहित करता है और सफल मॉडलों को बड़े पैमाने पर अपनाने में मदद करता है। आईएफएस को अपनाने के लिए किसानों को प्रति परिवार 30,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है। प्रशिक्षण और क्षमता-विकास से संबंधित गतिविधियों के लिए हर क्लस्टर को अतिरिक्त 10,000 रुपये दिए जाते हैं।

शुरुआत से ही, आईएफएस को अपनाने हेतु राज्यों को 2251.98 करोड़ रुपये की केन्द्रीय सहायता दी गई है। इस योजना के तहत 9.53 लाख हेक्टेयर भूमि को शामिल किया गया और 15.73 लाख किसानों को लाभ मिला (दिसंबर 2025 तक)।

कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके) स्थान-विशेष के अनुरूप आईएफएस मॉडल के संबंध में प्रदर्शन और प्रशिक्षण  देकर इस कार्यक्रम को और आगे बढ़ाते हैं। वर्ष 2024-25 के दौरान, केवीके ने 4,416 प्रदर्शन दिए और विभिन्न आईएफएस मॉडल पर 96,013 किसानों को प्रशिक्षण प्रदान किया।

वित्त वर्ष 202526 में, आरएडी को लागू करने हेतु राज्यों/केन्द्र - शासित प्रदेशों को 343.86 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जिसके तहत 96,013 किसानों को प्रशिक्षण प्राप्त हुआ।

कृषि-वानिकी पर उप-मिशन

पूर्व के कृषि-वानिकी पर उप-मिशन (एसएमएएफ) को 2023-24 से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (पीएम-आरकेवीवाई) के तहत कृषि-वानिकी घटक के तौर पर पुनर्गठित किया गया। यह किसानों को गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री (क्यूपीएम) उपलब्ध कराने हेतु कृषि-वानिकी नर्सरी स्थापित करने में सहायता करता है। इस योजना के घटक में शामिल हैं:

  • नई नर्सरी बनाना,
  • मौजूदा नर्सरी में पौधे तैयार करना,
  • टिश्यू कल्चर इकाई स्थापित करना,
  • स्किल डेवलपमेंट और जागरूकता,
  • अनुसंधान एवं विकास,
  • निगरानी और मूल्यांकन,
  • विशिष्ट तकनीकी गतिविधियां,
  • खेती के क्षेत्र में स्वैच्छिक कार्बन बाजार के लिए परियोजना बनाना, और
  • स्थानीय पहल।

यह सरकारी एजेंसियों को शत-प्रतिशत सहायता और निजी लाभार्थियों को 50 प्रतिशत बैक-एंडेड क्रेडिट-लिंक्ड सहायता प्रदान करता है

वर्ष 2025-26 के दौरान, 31 अक्टूबर 2025 तक, 27 राज्यों/केन्द्र- शासित प्रदेशों को 78.31 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई। कुल 135 नई नर्सरियां बनाई गईं। 614 मौजूदा नर्सरियों में पौधे तैयार किए गए। इन नर्सरियों में लगभग 176.59 लाख पौधे उगाए गए, जिनसे लगभग 25,693 किसानों को लाभ हुआ।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना

वर्ष 2015 में शुरू की गई मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (एसएचसी) के तहत किसानों को उनकी हर भूमि के लिए वैज्ञानिक जांच से तैयार की गई, प्लॉट-वार मिट्टी की जांच रिपोर्ट दी जाती है। यह कार्ड मिट्टी की सेहत का आकलन 12 मुख्य पैमानों के आधार पर करता है, जिनमें वृहद् पोषक तत्व (मैक्रोन्यूट्रिएंट्स), सूक्ष्म पोषक तत्व (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) और मिट्टी के अहम गुण शामिल हैं।

हर 2 वर्ष में जारी होने वाला मृदा स्वास्थ्य कार्ड किसानों को उनकी मिट्टी में पोषक तत्वों की स्थिति और भौतिक-रासायनिक गुणों को समझने में मदद करता है। यह रासायनिक उर्वरकों, जैव-उर्वरकों, जैविक खाद और मिट्टी के उपचार के सही उपयोग के बारे में फसल-विशेष के आधार पर सलाह देता है।

13 मार्च 2026 तक, इस योजना की शुरुआत से अब तक कुल 25.89 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए जा चुके हैं। संतुलित मात्रा में उर्वरक के उपयोग को बढ़ावा देने हेतु लगभग 7.17 लाख प्रदर्शन आयोजित किए गए हैं। ये प्रदर्शन कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए) और कृषि विज्ञान केन्द्रों (केवीके) की सलाह और सहयोग से आयोजित किए गए थे। इसके अलावा, जमीनी स्तर पर मिट्टी की सेहत से जुड़ी सलाहों को लोगों तक पहुंचाने में मदद के लिए 70,002 कृषि सखियों को प्रशिक्षित किया गया है।

अत्यंत सुदृढ़ भविष्य की ओर कदम

पुनर्योजी कृषि धीरे-धीरे भारतीय कृषि के भविष्य को नया आकार दे रही है। यह मिट्टी के स्वास्थ्य को बहाल करने के साथ-साथ सुदृढ़ता और संसाधन संबंधी दक्षता को बेहतर बना रही है। प्राकृतिक खेती, कृषि वानिकी, सूक्ष्म सिंचाई और एकीकृत खेती जैसी पद्धतियां संसाधन की दृष्टि से कुशल कृषि प्रणालियों में योगदान दे रही हैं।

सरकार की विभिन्न पहलों से किसानों को इन पद्धतियों को बड़े पैमाने पर अपनाने में मदद मिल रही है। जैसे-जैसे अधिक संख्या में किसान पुनर्योजी कृषि पद्धतियों को अपनाएंगे, कृषि पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ और आर्थिक रूप से लाभदायक बन सकेगी। यह यात्रा स्वस्थ मिट्टी से शुरू होती है और अधिक सुदृढ़ खेतों एवं सुरक्षित आजीविका की ओर ले जाती है।

संदर्भ

वित्त मंत्रालय

https://www.indiabudget.gov.in/economicsurvey/doc/echapter.pdf \

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय

https://www.pib.gov.in/PressReleaseDetail.aspx?PRID=2197692&reg=6&lang=1

https://naturalfarming.dac.gov.in/NaturalFarming/Concept

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2244625&reg=3&lang=2

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https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2201000&reg=3&lang=1

https://agriwelfare.gov.in/Documents/AR_Eng_2024_25.pdf

https://agriwelfare.gov.in/Documents/DAFW_AnnualReport_2025_26_En.pdf

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2239789&reg=3&lang=2

इलेक्ट्रानिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय

https://climate-resilience.vikaspedia.in/viewcontent/climate-resilience/agriculture/what-is-climate-resilient-agriculture?lgn=en

विश्व आर्थिक मंच

https://www.weforum.org/stories/2022/10/what-is-regenerative-agriculture/

संयुक्त राष्ट्र संघ

https://www.fao.org/family-farming/d%09etail/en/c/1512632/

https://sdgs.un.org/goals/goal13#targets_and_indicators

तमिलनाडु सरकार

https://agritech.tnau.ac.in/agriculture/agri_irrigationmgt_microirrigation.html

ओडिशा सरकार

https://agri.odisha.gov.in/sites/default/files/2025-03/RAD%20Operational%20Guidelines%20%28Revised%29.pdf

पीआईबी बैकग्राउंडर्स

https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?NoteId=155019&ModuleId=3&reg=3&lang=2

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2175205&reg=3&lang=2

https://www.pib.gov.in/FaqDetails.aspx?id=155374&NoteId=155374&ModuleId=4&reg=3&lang=2

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2221117&reg=3&lang=2

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पीआईबी शोध

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