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Economy

भारत में समावेशी विकास के लिए ग्रामीण ऋण को मजबूत करना

Posted On: 16 JUL 2026 11:09AM

 

भारत की ग्रामीण क्रेडिट ऋण प्रणाली ग्रामीण विकास और कृषि के विकास का मुख्य आधार है। यह कृषि, उससे जुड़े कामों, ग्रामीण उद्योगों और घरों की ज़रूरतों को पूरा करने में मदद करती है। समय के साथ, यह प्रणाली अनौपचारिक उधार से बदलकर एक विविध संस्थागत फ्रेमवर्क में बदल गई है। नाबार्ड (NABARD), वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सहकारी बैंक और लघु वित्त बैंक जैसे संस्थान ग्रामीण  क्षेत्रों में ऋण देने का काम करते हैं। हाल के सर्वे बताते हैं कि ग्रामीण आर्थिक हालात बेहतर हो रहे हैं और औपचारिक ऋण तक पहुँच बढ़ रही है। नीतिगत उपायों से किफायती और समय पर ऋण मिलना आसान हुआ है। मुख्य पहल में प्राथमिक क्षेत्र को ऋण, ज़मीनी स्तर पर ऋण के लक्ष्य और संशोधित ब्याज सब्सिडी योजना शामिल हैं। सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों ने संस्थागत सुधारों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और वित्तीय समावेशन के ज़रिए ग्रामीण ऋण का विस्तार किया है, जिससे औपचारिक ऋण तक पहुँच बेहतर हुई है और ग्रामीण आजीविका तथा आर्थिक विकास को मज़बूती मिली है।

 

भारत का ग्रामीण ऋण परिदृश्य  

भारत का ग्रामीण ऋण ईकोसिस्टम पिछले कुछ वर्षों में काफी विस्तृत हुआ है। यह कृषि, संबद्ध क्षेत्रों, ग्रामीण उद्यमों और परिवारों के लिए समय पर और किफायती वित्त (ऋण) प्रदान करता है, जिससे समावेशी ग्रामीण विकास को बढ़ावा मिलता है। यह उत्पादन और उपभोग दोनों के लिए अल्पकालिक, मध्यम अवधि और दीर्घकालिक ऋण आवश्यकताओं को पूरा करता है। आय सृजन, संपत्ति निर्माण और घरेलू लचीलेपन को सहायता प्रदान करके, ग्रामीण ऋण ग्रामीण विकास का एक प्रमुख चालक बन गया है। इसे गैर-संस्थागत स्रोतों के साथ-साथ अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (Scheduled Commercial Banks), क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs), सहकारी बैंकों और राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) सहित संस्थागत स्रोतों के एक नेटवर्क के माध्यम से वितरित किया जाता है।

इस ईकोसिस्टम के केंद्र में नाबार्ड है, जो कृषि और ग्रामीण विकास के लिए सर्वोच्च विकास वित्तीय संस्थान है। यह पुनर्वित्त सहायता, ग्रामीण अवसंरचना वित्तपोषण, संस्थागत विकास और सहकारी बैंकों तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के पर्यवेक्षण के माध्यम से ग्रामीण ऋण संरचना को मजबूत करता है। औपचारिक ग्रामीण वित्त की बढ़ती पहुंच नाबार्ड के रूरल इकनॉमिक कंडिशन्स एंड सेंटिमेंट्स सर्वे (मई 2026)' में झलकती है। लगभग 77.2% ग्रामीण परिवारों में उच्च उपभोग स्तर की सूचना दर्ज की गई, जो बढ़ती क्रय शक्ति और निरंतर मांग को दर्शाती है। औपचारिक ऋण तक पहुंच भी काफी बढ़ी है, जिसमें लगभग 51% परिवार पूरी तरह से औपचारिक स्रोतों पर निर्भर हैं और 27% से अधिक परिवार संस्थागत और गैर-संस्थागत दोनों चैनलों का उपयोग कर रहे हैं।

 

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इस मज़बूत संस्थागत बुनियाद पर, भारत की ग्रामीण ऋण प्रणाली पारंपरिक बैंकिंग से एक प्रौद्योगिकी समर्थित और सबको साथ लेकर चलने वाला इकोसिस्टम बन गया है। नीतिगत सुधारों, डिजिटल नवाचार और वित्तीय समावेशन के उपायों से संस्थागत वित्त तक पहुंच बेहतर हुई है, ऋण  डिलीवरी की दक्षता बढ़ी है और अनौपचारिक उधार पर निर्भरता कम हुई है। ये कोशिशें मिलकर खेती की वृद्धि को मज़बूत कर रही हैं, ग्रामीण आजीविका में सुधार कर रही हैं और एक ज़्यादा मज़बूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था बना रही हैं।

 

ग्रामीण ऋण प्रणाली का क्रमिक विकास

भारत की ग्रामीण ऋण प्रणाली अधिक औपचारिक और अलग-अलग तरह के संस्थागत फ्रेमवर्क में बदल गई है। आज़ादी के बाद, सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने संस्थागत ऋण  को मज़बूत करने के लिए खास कोशिशें कीं। ये ग्रामीण बैंकिंग को बढ़ाने और खेती के लिए वित्तीय सहायता करने के शुरुआती प्रयासों में से थे।

1955: नेशनल एग्रीकल्चरल क्रेडिट (लंबी-अवधि के संचालन) फ़ंड बनाया गया और स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की स्थापना की गई। इन कोशिशों ने ग्रामीण बैंकिंग को बढ़ाने और खेती के लिए वित्त को मज़बूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया।

1969: 14 बड़े वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इसने बैंकिंग पॉलिसी को प्राथमिक क्षेत्र, खासकर छोटे किसानों की ओर मोड़ दिया, जिससे ग्रामीण इलाकों में संस्थागत ऋण का प्रवाह बढ़ा।

1982: नाबार्ड की स्थापना हुई, जिससे ग्रामीण ऋण संरचना मज़बूत हुई। इसने 12 जुलाई 2026 को अपना 45वां स्थापना दिवस मनाया। इसने खेती और ग्रामीण विकास के लिए वित्त, विकास और देखरेख के कार्यों को एक साथ किया। नाबार्ड वित्तीय समावेशन को भी बढ़ावा देता है, ज़िला ऋण स्कीम तैयार करता है और औपचारिक वित्त तक पहुँच बढ़ाने के मकसद से सरकार की सहायता करता है।

1992: स्वयं-सहायता समूह (SHG)-बैंक लिंकेज कार्यक्रम शुरू किया गया, जिससे गांव के परिवारों के लिए औपचारिक ऋण तक पहुंच बढ़ी।

1998: किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) स्कीम ने किसानों के लिए समय पर और सस्ते क्रेडिट की उपलब्धता को बेहतर बनाया।

2014: प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY) को यूनिवर्सल बैंकिंग एक्सेस, क्रेडिट सहायता, बीमा और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के ज़रिए वित्तीय समावेशन को बढ़ाने के लिए शुरू किया गया। यह JAM (जन धन-आधार-मोबाइल) ट्रिनिटी का एक मुख्य स्तंभ है। इसने डिजिटली एनेबल्ड, पारदर्शी और लक्षित सेवा डिलीवरी के ज़रिए कल्याणकारी फायदों की डिलीवरी को बदल दिया है।

2015: MUDRA स्कीम (PMMY) को गैर-सहकारी, गैर-कृषि छोटे और सूक्ष्म उद्यमों को बिना गारंटी संस्थागत ऋण देने के लिए शुरू किया गया। यह ग्रामीण उद्यमिता और स्व-रोजगार को बढ़ावा देता है।

2022 के बाद: जन समर्थ पोर्टल, ई-केसीसी और दूसरी डिजिटल पहल ने प्रौद्योगिकी सक्षम, आसान और सबको साथ लेकर चलने वाली वित्तीय सेवा के ज़रिए गांव के लोगों को ऋण देने के तरीके को बदल दिया है।

 

ग्रामीण ऋण की संस्थागत संरचना

एक मज़बूत संस्थागत नेटवर्क भारत की ग्रामीण ऋण प्रणाली का आधार है। यह औपचारिक वित्त तक पहुंच बढ़ाने और समावेशी ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाता है।

 

अनुसूचित वाणिज्यिक बंक (SCB)

SCBs ने औपचारिक बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच बढ़ाकर वित्तीय समावेशन को काफी मजबूत किया है। ये शाखाओं, बिजनेस प्रतिनिधि, डिजिटल प्लेटफॉर्म और PMJDY और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) जैसी सरकारी पहल के ज़रिए बैंकिंग सेवाएं देते हैं। SCBs में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, निजी क्षेत्र के बैंक, विदेशी बैंक, पेमेंट बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक और लघु वित्त बैंक शामिल हैं।

 

SCB एक बैंक है जो RBI एक्ट, 1934 की दूसरी अनुसूची में शामिल है। ये बैंक RBI से बैंक दर पर ऋण के लिए पात्र हैं और क्लियरिंग हाउस के मेंबर हैं।

 

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वर्तमान में, देशभर में लगभग 120 अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (SCBs) बैंकिंग सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में, 2014 में 41,464 SCB शाखाएं थीं। जुलाई 2025 तक यह 35% से अधिक बढ़कर 56,193 ग्रामीण शाखाएं हो गईं, जो ग्रामीण ऋण वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

 

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRBs)

ग्रामीण क्षेत्रों में संस्थागत ऋण को मजबूत करने के उद्देश्य से क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 के तहत RRBs की स्थापना की गई थी। ये विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों, कृषि श्रमिकों, कारीगरों और छोटे उद्यमियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। अपनी स्थापना के बाद से, RRBs ने ग्रामीण विकास और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान में, 28 RRBs राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में काम कर रहे हैं, जिनका 700 जिलों में 22,000 से अधिक शाखाओं का नेटवर्क है।

 

सहकारी बैंक

सहकारी बैंकिंग प्रणाली भारत की वित्तीय प्रणाली का एक अभिन्न अंग है, जिसके अलग-अलग शहरी और ग्रामीण खंड हैं। जहाँ शहरी सहकारी बैंक एकल-स्तरीय (single-tier) प्रणाली के रूप में काम करते हैं, वहीं ग्रामीण सहकारी ऋण संस्थान एक बहु-स्तरीय (multi-tier) संरचना का पालन करते हैं। अपनी संरचना के आधार पर, विभिन्न प्रकार के सहकारी बैंक होते हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • राज्य सहकारी बैंक (StCBs),
  • जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (DCCBs),
  • प्राथमिक कृषि ऋण समितियां (PACSs),
  • राज्य सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (SCARDBs),
  • प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (PCARDBs)

इन संस्थानों ने दूरदराज के क्षेत्रों में गरीबों के बीच बैंकिंग आदतों को बढ़ावा देकर संस्थागत ऋण के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आरबीआई और नाबार्ड (NABARD) के अनुसार, सहकारी नेटवर्क में 1,458 शहरी सहकारी बैंक, 34 StCBs और 352 DCCBs शामिल हैं।

 

लघु वित्त बैंक (SFB)

केंद्रीय बजट 2014-15 के बाद लघु वित्त बैंकों (SFBs) की शुरुआत की गई थी। आरबीआई द्वारा लाइसेंस प्राप्त, SFBs का उद्देश्य सुलभ और सुरक्षित बचत सुविधाएं प्रदान करके वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना है। ये विशेष रूप से आबादी के उन वर्गों पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो बैंकिंग सेवाओं से वंचित या कम सेवा प्राप्त हैं। SFBs असंगठित क्षेत्र में छोटे व्यवसायों, छोटे और सीमांत किसानों, सूक्ष्म उद्योगों और अन्य संस्थाओं को ऋण प्रदान करते हैं। ये सेवाएं प्रौद्योगिकी-संचालित, कम लागत वाले संचालन के माध्यम से प्रदान की जाती हैं। वर्तमान में देश में 11 लघु वित्त बैंक कार्यरत हैं।

ये संस्थान सामूहिक रूप से भारत की ग्रामीण ऋण प्रणाली का मूल (कोर) हिस्सा हैं, जो औपचारिक वित्त तक व्यापक पहुंच सुनिश्चित करते हैं और समावेशी विकास का समर्थन करते हैं।

 

ग्रामीण ऋण के लिए नीतिगत फ्रेमवर्क

ग्रामीण ऋण के नीतिगत फ्रेमवर्क में विभिन्न उपाय शामिल हैं ताकि ग्रामीण विकास की पहल के लिए ऋण का प्रवाह बिना किसी बाधा के निरंतर सुनिश्चित किया जा सके।

 

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प्राथमिकता क्षेत्र ऋण ( PSL)

प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL) भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा निर्धारित एक अनिवार्य फ्रेमवर्क है। इसके तहत बैंकों को अपने कुल ऋण का एक निश्चित प्रतिशत अर्थव्यवस्था के उन महत्वपूर्ण या कम सेवा प्राप्त क्षेत्रों को आवंटित करना होता है, जिन्हें औपचारिक ऋण प्राप्त करने में कठिनाई होती है। इसका उद्देश्य ऋण का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना है।

समायोजित शुद्ध बैंक ऋण = शुद्ध बैंक ऋण + HTM श्रेणी में रखे गए गैर-SLR बॉन्ड में बैंकों द्वारा किया गया निवेश

 

यह दिशानिर्देश वाणिज्यिक बैंकों पर लागू होता है, जिनमें क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRBs), लघु वित्त बैंक (SFBs), स्थानीय क्षेत्र के बैंक (Local Area Banks) और प्राथमिक (शहरी) सहकारी बैंक (सेलरी अर्नर्स  बैंकों को छोड़कर) शामिल हैं। इन बैंकों के लिए कृषि क्षेत्र को ऋण आवंटित करना अनिवार्य है। इसके लिए उनके समायोजित शुद्ध बैंक ऋण या ऑफ-बैलेंस शीट एक्सपोज़र के क्रेडिट समतुल्य में से जो भी अधिक हो, उसका कम से कम 18% हिस्सा निर्धारित किया जाना चाहिए

इसके अंतर्गत, गैर-कॉर्पोरेट किसानों के लिए 14% और छोटे व सीमांत किसानों के लिए 10% का उप-लक्ष्य (sub-target) निर्धारित किया गया हैPSL की कमी से बने विभिन्न कोषों के माध्यम से पात्र ग्रामीण वित्तीय संस्थानों (RFIs) को रियायती पुनर्वित्त (प्रदान किया जाता है। इनमें अल्पकालिक सहकारी ग्रामीण ऋण कोष (STCRCF), अल्पकालिक RRB ऋण पुनर्वित्त कोष (STRRBF) और दीर्घकालिक ग्रामीण ऋण कोष (LTRCF) शामिल हैं।

 

जमीनी स्तर पर ऋण ( GLC)

सरकार कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के लिए वार्षिक GLC लक्ष्य निर्धारित करती है, जिसे बैंकों को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में प्राप्त करना होता है। ये लक्ष्य क्षेत्र-वार, एजेंसी-वार और ऋण श्रेणी जैसे फसल ऋण और टर्म लोन के आधार पर तय किए जाते हैं। ऋण सहायता को बढ़ाने के लिए वर्ष 2021-22 से डेयरी, मत्स्यपालन और पशुपालन जैसी संबद्ध गतिविधियों के लिए समर्पित लक्ष्य शुरू किए गए हैं।

वित्तीय वर्ष 2015 से 2024 (FY15-FY24) के दौरान, कृषि ऋण वितरण में सालाना 13% से अधिक की वृद्धि हुई, जो इस क्षेत्र को मिलने वाले बढ़ते वित्तीय सहयोग को दर्शाती है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए, GLC का लक्ष्य 32.50 लाख करोड़ रुपये रखा गया था, जिसमें पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन करने वाले किसानों के लिए 5.0 लाख करोड़ रुपये का उप-लक्ष्य शामिल था। यह वित्तीय वर्ष 2014-15 के 8 लाख करोड़ रुपये से चार गुना से भी अधिक की वृद्धि को दर्शाता है, जो प्रभावी और लक्षित ऋण नीतियों का परिणाम है।

कृषि में GLC को बढ़ाने के लिए, नाबार्ड कृषि और संबद्ध क्षेत्रों को अल्पकालिक और दीर्घकालिक ऋण देने के लिए बैंकों के संसाधनों की पूर्ति हेतु उन्हें पुनर्वित्त सहायता प्रदान करता है

 

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स्वयं सहायता समूह (SHG)

नाबार्ड द्वारा स्वयं सहायता समूह-बैंक लिंकेज कार्यक्रम (SHG-BLP) की शुरुआत की गई थी। इसे ग्रामीण स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ने के लिए शुरू किया गया था, ताकि उन्हें किफायती संस्थागत ऋण और अन्य वित्तीय सेवाएं मिल सकें। यह कार्यक्रम औपचारिक वित्तीय क्षेत्र को ग्रामीण गरीब परिवारों के साथ जोड़ने के लिए एक प्रभावी मॉडल के रूप में उभरा है। इससे विशेष रूप से उन महिलाओं को लाभ हुआ है, जिन्हें क्रेडिट हिस्ट्री न होने के कारण पारंपरिक रूप से औपचारिक ऋण नहीं मिल पाता था।

इस ईकोसिस्टम को और मजबूत करने के लिए, तत्कालीन स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (SGSY) का पुनर्गठन करके 2010 में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) शुरू किया गया था। इसके बाद, 29 मार्च 2016 से NRLM का नाम बदलकर DAY-NRLM (दीनदयाल अंत्योदय योजना - राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन) कर दिया गया। इस नामकरण ने SHG-बैंक लिंकेज कार्यक्रम को और बल दिया, जिसे महिला नेतृत्व वाले SHGs के बड़े पैमाने पर प्रचार और पोषण के माध्यम से एक नई गति मिली।

DAY-NRLM एक गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम है। यह ग्रामीण गरीब परिवारों को SHGs में संगठित

क्या आप जानते हैं?

जुलाई 2025 तक 10.05 करोड़ ग्रामीण महिलाओं को 90.90 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों (SHGs) में संगठित किया जा चुका है। यह देशभर के बड़ी संख्या में जिलों और ब्लॉकों को कवर करता है।

करता है और उनकी आय बढ़ाने तथा उनके जीवन स्तर में सुधार करने में सहायता करता है। यह कार्यक्रम (दिल्ली और चंडीगढ़ को छोड़कर) पूरे देश में लागू किया जा रहा है। 10 जुलाई 2026 तक, 19.83 लाख से अधिक SHGs कार्यरत हैं और इसकी शुरुआत से लेकर अब तक 13.28 लाख-करोड़ रुपये का ऋण वितरण दर्ज किया गया है।

इस मिशन ने 'बैंक सखियों' की तैनाती के माध्यम से बैंक ऋण तक पहुंच में भी सुधार किया है। वे SHG सदस्यों को बैंक खाते खोलने, ऋण आवेदन तैयार करने व जमा करने और समय पर पुनर्भुगतान सुनिश्चित करने में सहायता करती हैं। इसने क्रेडिट लिंकेज को मजबूत करने और एनपीए (NPAs) को कम करने में मदद की है। लगभग 50,548 बैंक सखियाँ तैनात की गई हैं, जिन्होंने 2013-14 से (फरवरी 2026 तक) 12.18 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बैंक ऋण प्राप्त करने में SHGs की सहायता की है। 

 

प्राथमिक कृषि ऋण समितियां ( PACS)

PACS अल्पकालिक सहकारी ऋण संरचना की जमीनी स्तर की संस्थाएं हैं। वे ग्रामीण उधारकर्ताओं के साथ सीधे बातचीत करती हैं, ऋण प्रदान करती हैं और पुनर्भुगतान की सुविधा देती हैं। PACS कृषि इनपुट (जैसे बीज, उर्वरक) और उपज के वितरण तथा विपणन (मार्केटिंग) का कार्य भी संभालती हैं।

ये सहकारी ऋण प्रणाली का आधार बनाती हैं। वे उधारकर्ताओं और उच्च वित्तीय संस्थानों (जिनमें SCBs और RBI/NABARD शामिल हैं) के बीच अंतिम कड़ी के रूप में भी कार्य करती हैं।

  • 2023 में, सरकार ने 5 वर्षों में सभी पंचायतों में 2 लाख नई बहुउद्देशीय PACS, डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियां स्थापित करने की योजना को मंजूरी दी थी।
  • 20 जनवरी 2026 तक कीजानकारी के अनुसार, अब तक 32,836 नई समितियां पंजीकृत की जा चुकी हैं और 15,793 डेयरी व मत्स्य सहकारी समितियों को मजबूत किया गया है।
  • डिजिटलीकरण के माध्यम से PACS को आधुनिक बनाने के प्रयास भी जारी हैं। स्वीकृत 79,630 PACS में से 10 मार्च 2026 तक 61,842 PACS को कॉमन ERP-आधारित राष्ट्रीय सॉफ्टवेयर पर सफलतापूर्वक माइग्रेट कर दिया गया है।

 

संशोधित ब्याज सबवेन्शन योजना (MISS)

MISS एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना (Central Sector Scheme) है जो किसानों को KCC के माध्यम से सस्ती ब्याज दरों पर अल्पकालिक ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित करती है। इस योजना के तहत, किसानों को 7% के रियायती ब्याज पर अल्पकालिक ऋण मिलता है, जिसमें ऋण देने वाले संस्थानों को 1.5% की छूट दी जाती है। जो किसान समय पर ऋण चुकाते हैं, वे 3% तक के अतिरिक्त प्रोत्साहन (प्रॉम्प्ट रिपेमेंट इंसेंटिव) के पात्र होते हैं, जिससे उनके लिए प्रभावी ब्याज दर घटकर केवल 4% रह जाती है।

केंद्रीय बजट 2025-26 में MISS को मजबूत करने के लिए कई उपायों की घोषणा की गई:

  • KCC के माध्यम से लिए जाने वाले ऋणों के लिए MISS के तहत ऋण सीमा को 3 लाख से बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दिया गया।
  • मत्स्यपालन और संबद्ध गतिविधियों के लिए ऋण सीमा 2 लाख से बढ़ाकर 5 लाख रुपये की गई।
  • जनवरी 2025 से, बिना किसी गारंटी के मिलने वाले अल्पकालिक कृषि ऋण की सीमा 1.6 लाख से बढ़ाकर 2 लाख रुपये प्रति उधारकर्ता कर दी गई।

इस उपाय का उद्देश्य बढ़ती इनपुट लागत और मुद्रास्फीति के बीच किसानों के लिए वित्तीय पहुंच को बढ़ाना है। यह उन्हें बिना किसी गारंटी के अपनी परिचालन और विकासात्मक जरूरतों को पूरा करने में सक्षम बनाता है।

 

पीएम धन धान्य कृषि योजना (PM-DDKY)

जुलाई 2025 में स्वीकृत PM-DDKY का उद्देश्य कृषि क्षेत्र में कम प्रदर्शन करने वाले 100 जिलों में विकास को गति देना है। यह 11 मंत्रालयों की 36 केंद्रीय योजनाओं के संतृप्ति-आधारित साझा प्रयासों को अपनाती है। इस योजना का एक प्रमुख उद्देश्य किसानों के लिए अल्पकालिक और दीर्घकालिक कृषि ऋण तक पहुंच बढ़ाना है। यह योजना कृषि उत्पादकता में सुधार और फसल विविधीकरण (क्रॉप डाइवर्सिफिकेशन) को बढ़ावा देने पर भी ध्यान केंद्रित करती है। यह टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करती है और पानी की विश्वसनीय पहुंच के लिए सिंचाई अवसंरचना को मजबूत करती है। इसका अगला लक्ष्य पंचायत और ब्लॉक स्तर पर फसल कटाई के बाद के भंडारण की क्षमता को बढ़ाना है। योजना के प्रभावी नियोजन, कार्यान्वयन और निगरानी के लिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर समितियों का गठन किया जा रहा है।

शुरुआत से लेकर मई 2026 तक के क्रमशः बढ़ते आउटपुट के आधार पर, शीर्ष प्रदर्शन करने वाले जिले हैं:

  • बांका, बिहार
  • महोबा, उत्तर प्रदेश
  • चराईदेव, असम
  • किशनगंज, बिहार
  • टीकमगढ़, मध्य प्रदेश

 

ग्रामीण वित्तीय समावेशन मजबूत करना

वित्तीय समावेशन भारत के ग्रामीण ऋण ईकोसिस्टम को मजबूत करने का एक मुख्य स्तंभ है। सरकार ने ग्रामीण ऋण और वित्तीय समावेशन को मजबूत करने के लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाया है।

 

किसान क्रेडिट कार्ड (KCC)

KCC योजना को बैंकिंग प्रणाली से पर्याप्त और समय पर ऋण सहायता प्रदान करने के लिए एक अभिनव ऋण तंत्र के रूप में पेश किया गया था। यह एटीएम-सक्षम डेबिट कार्ड और वन-टाइम डॉक्यूमेंटेशन (एक बार दस्तावेज़ीकरण) जैसी सुविधाएँ प्रदान करता है। इसमें लागत वृद्धि के लिए इन-बिल्ट प्रावधान और स्वीकृत सीमा के भीतर कई बार पैसे निकालने की सुविधा भी शामिल है।

KCC के तहत किसानों को कृषि संबंधी आवश्यकताओं की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए ऋण प्रदान किया जाता है, जिसमें शामिल हैं:

  • अल्पकालिक फसल खेती (शॉर्ट-टर्म क्रॉप कल्टीवेशन)
  • फसल कटाई के बाद के कार्य
  • विपणन से संबंधित खर्च
  • घरेलू उपभोग की ज़रूरतें
  • कृषि फार्म के रखरखाव के लिए कार्यशील पूंजी
  • संबद्ध और गैर-कृषि गतिविधियों के लिए निवेश ऋण।

8 जुलाई 2026 तक, वाणिज्यिक बैंकों के तहत कुल KCC आवेदन लगभग 739 लाख और RRBs के तहत 365 लाख से अधिक हैं। सहकारी बैंकों के पास सबसे अधिक आवेदन हैं, जिनकी संख्या 1178 लाख से अधिक है।

 

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इस योजना के दायरे का विस्तार उन व्यक्तिगत और संयुक्त उधारकर्ताओं को शामिल करने के लिए किया गया है जो खुद खेती करने वाले मालिक किरायेदार किसान (टेनेंट फार्मर), मौखिक पट्टेदार और बटाईदार हैं। यह किसानों के स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और संयुक्त देयता समूहों (JLGs) को भी कवर करता है। वर्ष 2019 में इस योजना का विस्तार डेयरी, मत्स्यपालन और पशुपालन जैसे संबद्ध क्षेत्रों तक भी कर दिया गया था।

नाबार्ड ने क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) और ग्रामीण सहकारी बैंकों (RCBs) के लिए ई-केसीसी (e-KCC) पोर्टल भी शुरू किया है, जिससे ऋण आवेदन प्रक्रिया का शुरू से अंत तक डिजिटलीकरण संभव हो गया है। इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से किसान बैंक शाखाओं में जाए बिना भी आवेदन जमा कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, e-KCC सुविधा किसानों को पास के सामान्य सेवा केंद्रों (CSCs) के माध्यम से भी फसल ऋण के लिए आवेदन करने की अनुमति देती है। यह त्वरित प्रोसेसिंग की सुविधा देता है, जिससे लगभग 2 दिनों के कम समय में ऋण स्वीकृत हो जाता है।

सरकार, आरबीआई, नाबार्ड और बैंक किसानों के बीच KCC के लाभों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम आयोजित करते हैं। इन्हें वित्तीय साक्षरता केंद्रों (CFLs) और वित्तीय साक्षरता शिविरों (FLCs) के माध्यम से प्रदान किया जाता है। इसके अलावा, आरबीआई देशभर में जनता के बीच वित्तीय शिक्षा का प्रसार करने के लिए हर साल वित्तीय साक्षरता सप्ताह (FLW) का आयोजन करता है।

 

प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY)

PMJDY वंचित समुदायों के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह प्रति परिवार कम से कम एक बुनियादी बचत खाता प्रदान करके सार्वभौमिक बैंकिंग पहुंच सुनिश्चित करती है। इसके अलावा, यह ऋण, बीमा और पेंशन तक पहुंच प्रदान करती है। यह योजना ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों को कवर करती है और खाताधारकों को रुपे (RuPay) डेबिट कार्ड देती है। यह सरकारी लाभों को सीधे बैंक खातों में स्थानांतरित करने की अनुमति देकर प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के विस्तार का समर्थन करती है। इसके अतिरिक्त, यह KCC जैसे साधनों को रुपे प्लेटफॉर्म से जोड़ती है। जन-धन-आधार-मोबाइल (JAM) ट्रिनिटी के एक हिस्से के रूप में, यह सब्सिडी और कल्याणकारी लाभों के वितरण के लिए एक मजबूत तंत्र प्रदान करती है।

24 जून 2026 तक की स्थिति के अनुसार, 58.63 करोड़ से अधिक जन-धन खाते खोले जा चुके हैं, जिनमें जमा राशि 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई है। इनमें से 32.68 करोड़ खाते (55.7%) महिलाओं के हैं, और 45.62 करोड़ खाते (77.8%) ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हैं।

 

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जन समर्थ पोर्टल

जून 2022 में लॉन्च किया गया जन समर्थ पोर्टल, KCC सहित सरकार प्रायोजित ऋण और सब्सिडी योजनाओं को जोड़ने के लिए एक वन-स्टॉप डिजिटल प्लेटफॉर्म है। इस पोर्टल का उद्देश्य सरकारी योजनाओं की पहुंच का विस्तार करना और ऋण वितरण को आसान बनाना है। यह लाभार्थियों, वित्तीय संस्थानों और सरकारी एजेंसियों को आसान पहुंच प्रदान करता है। यह पोर्टल सरल डिजिटल प्रक्रियाओं के माध्यम से लाभार्थियों को उपयुक्त योजनाओं की जानकारी देकर समावेशी विकास को भी बढ़ावा देता है। यह सभी जुड़ी हुई योजनाओं की शुरू से अंत तक कवरेज सुनिश्चित करता है।

 

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जन धन दर्शक ऐप

जन धन दर्शक ऐप नागरिकों को देशभर में बैंक शाखाओं, एटीएम, बैंक मित्रों और सामान्य सेवा केंद्रों (CSCs) सहित बैंकिंग सेवा केंद्रों का पता लगाने में सक्षम बनाता है। यह सरकार को गांवों में बैंकिंग पहुंच की निगरानी करने में भी मदद करता है।

  • 6 मार्च 2025 तक की स्थिति के अनुसार, 99.92% गांवों में 5 किलोमीटर के दायरे में एक बैंकिंग आउटलेट उपलब्ध था।
  • इसके अतिरिक्त, दादरा और नगर हवेली के गांवों ने पूर्ण कवरेज हासिल कर लिया है।

 

आगे का समावेशी विकास

समय के साथ, भारत की ग्रामीण ऋण प्रणाली अनौपचारिक ढांचे से बदलकर एक विविध, संस्थान द्वारा निर्देशित और नीति-संचालित फ्रेमवर्क में परिवर्तित हो गई है। संस्थाओं और लक्षित नीतियों के सहयोग से, इस प्रणाली ने कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में समय पर और किफायती ऋण प्रदान करके ग्रामीण समृद्धि को मजबूत किया है।

बढ़ते डिजिटलीकरण, बेहतर संस्थागत पहुंच और वित्तीय समावेशन के साथ, ग्रामीण ऋण ईकोसिस्टम अधिक सुलभ और कुशल बनता जा रहा है। यह देश में समावेशी ग्रामीण विकास और दीर्घकालिक आर्थिक विकास में योगदान दे रहा है।

 

संदर्भ

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पीआईबी अनुसंधान

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