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Economy

व्यवसाय सुगमता: भारत के कारोबारी ढांचे को सशक्त बनाना

Posted On: 07 JUN 2026 10:55AM

  

 व्यापक सुधारों ने डिजिटल शासन, नियामकीय सरलीकरण और विश्वास-आधारित प्रशासन के माध्यम से भारत के व्यावसायिक वातावरण की कायापलट कर दी है। इसके परिणामस्वरूप, स्टार्टअप्स, एमएसएमई तथा कंपनी निगमन में सहायता प्रदान करने वाली पहलों के कारण व्यवसाय शुरू करने की प्रक्रियाएँ अधिक तेज़ और कागजरहित हो गई हैं। डिजिटल भूमि अभिलेखों, एकल-खिड़की स्वीकृति प्रणालियों तथा श्रम एवं पर्यावरण संबंधी अनुमोदनों के सरलीकरण के माध्यम से संपत्ति पंजीकरण और अनुमतियों से संबंधित प्रक्रियाओं का आधुनिकीकरण किया गया है। डिजिटल खरीद प्लेटफॉर्मों, लॉजिस्टिक्स सुधारों और एकीकृत व्यापार अवसंरचना के विकास से बाज़ार संपर्क में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। ऋण तक आसान पहुँच, सरल कर प्रणालियाँ तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने विभिन्न क्षेत्रों में व्यावसायिक संचालन को और अधिक सशक्त बनाया है। अनुपालन बोझ में कमी, गैर-अपराधिकरण तथा दिवालियापन समाधान संबंधी सुधारों ने भी अधिक सुविधा-उन्मुख नियामकीय इकोसिस्टम को बढ़ावा दिया है। इन सुधारों ने निवेशकों का भरोसा सुदृढ़ किया है, जिसके परिणामस्वरूप वैश्विक सूचकांकों में भारत की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है।

 

भारत के व्यावसायिक वातावरण में परिवर्तन

बीते वर्षों में भारत ने अपने व्यावसायिक नियामकीय वातावरण में सुधार लाने के लिए निरंतर सुधारात्मक कदम उठाए हैं। सरकार का ध्यान धीरे-धीरे अनुपालन-प्रधान व्यवस्था से हटकर सुविधा-उन्मुख इकोसिस्टम के निर्माण पर केंद्रित हुआ है। इन सुधारों का उद्देश्य विभिन्न प्रक्रियाओं में गति, पारदर्शिता तथा विश्वास-आधारित शासन को बढ़ावा देना रहा है। परिणामस्वरूप, भारत के व्यावसायिक वातावरण में निवेशकों का विश्वास बढ़ा है और व्यापार करने में सुगमता (ईओडीबी) में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

यह प्रगति विश्व बैंक द्वारा प्रकाशित डूइंग बिज़नेस रिपोर्ट 2020 जैसे वैश्विक आकलनों में भी परिलक्षित होती है। भारत की रैंकिंग वर्ष 2014 में 142वें स्थान से सुधरकर वर्ष 2019 में 63वें स्थान पर पहुँच गई, जो पाँच वर्षों में 79 स्थानों की उल्लेखनीय प्रगति को दर्शाती है।

इसके अतिरिक्त, आईएमडी विश्व प्रतिस्पर्धात्मकता रैंकिंग 2025 में किसी देश के आर्थिक प्रदर्शन, सरकारी एवं व्यावसायिक दक्षता तथा व्यवसायों के लिए अवसंरचना विकास जैसे कारकों का आकलन किया जाता है। इस रैंकिंग में भारत की स्थिति वर्ष 2021 में 43वें स्थान से सुधरकर वर्ष 2025 में 41वें स्थान पर पहुँच गई। यह भारत में अधिक सुदृढ़ व्यावसायिक वातावरण, बेहतर शासन व्यवस्था तथा डिजिटल एवं नियामकीय सुधारों में हुई प्रगति को दर्शाता है।

सार्वजनिक क्षेत्र के डिजिटल रूपांतरण का आकलन करने वाले विश्व बैंक के गवटेक मैच्योरिटी इंडेक्स में भारत को वर्ष 2020, 2022 और 2025 में ग्रुप ए में स्थान दिया गया। यह श्रेणी उन देशों का प्रतिनिधित्व करती है जो मुख्य सरकारी प्रणालियों, लोक सेवाओं की डिलीवरी, डिजिटल नागरिक सहभागिता तथा गवटेक एनेबलर्स के क्षेत्रों में उन्नत और नवोन्मेषी कार्यप्रणालियों का प्रदर्शन करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र विभिन्न देशों में डिजिटल शासन की स्थिति का आकलन करने के लिए ई-गवर्नमेंट सर्वे आयोजित करता है। भारत ने इस सर्वेक्षण में कुल मिलाकर उच्च स्कोर प्राप्त किया है। इसके अंतर्गत भारत ने ऑनलाइन सेवा सूचकांक में भी अत्यंत उच्च अंक हासिल किए हैं। इसके अलावा, भारत ने दूरसंचार अवसंरचना और मानव पूंजी सूचकांकों में भी उच्च अंक प्राप्त किए हैं। यह देश में मजबूत डिजिटल लोक सेवा डिलीवरी, विस्तारित डिजिटल अवसंरचना तथा प्रौद्योगिकी-सक्षम शासन सेवाओं तक नागरिकों की बेहतर पहुँच को दर्शाता है।

ये सुधार नियमों को सरल तथा प्रक्रियाओं को अधिक सुगम बनाने के लिए निरंतर किए गए प्रयासों का परिणाम हैं। सरकार ने व्यवसाय के पूरे जीवनचक्र के दौरान अनुपालन संबंधी बोझ को भी कम किया है। सुधारों का दायरा पंजीकरण और लॉजिस्टिक सहायता से लेकर दिवालियापन समाधान तक फैला हुआ है। यह व्यापार करने के तरीकों में बदलाव ला रहा है, जिससे भारत तथा दुनिया भर के उद्यमियों के लिए व्यवसाय करना आसान हो गया है।

 

व्यवसाय आरंभ करने संबंधी सुधारों को आगे बढ़ाना

पिछले 12 वर्षों में, सरकार ने भारत में व्यवसाय आरंभ करने और औपचारिकीकरण प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिए प्रमुख सुधार लागू किए हैं। इन उपायों ने प्रक्रियागत बाधाओं को कम किया है तथा उद्यमियों और एमएसएमई के लिए तेज़, प्रौद्योगिकी-आधारित और कागजरहित प्रणालियों को सक्षम बनाया है।

स्टार्टअप इंडिया

जनवरी 2016 में शुरू की गई स्टार्टअप इंडिया पहल का उद्देश्य उद्यमियों को समर्थन देना और एक मजबूत स्टार्टअप इकोसिस्टम का निर्माण करना है। इसका लक्ष्य भारत को नौकरी चाहने वालों के देश से बदलकर नौकरी सृजित करने वालों का देश बनाना है। इस पहल के अंतर्गत बीज निधि, निधियों का कोष, निवेशक संपर्क पोर्टल तथा क्रेडिट गारंटी योजना जैसी सहायता व्यवस्थाएँ शामिल हैं।

वर्ष 2016 में केवल 502 स्टार्टअप्स को मान्यता प्रदान की गई थी, जिनसे 308 प्रत्यक्ष रोजगार सृजित हुए। हालांकि, मार्च 2026 तक 2.23 लाख से अधिक स्टार्टअप्स को मान्यता दी जा चुकी है, जो प्रत्यक्ष रोजगार के 23.3 लाख अवसरों का सृजन कर रहे हैं। इस तीव्र वृद्धि ने रोजगार और उद्यमिता के अवसरों का विस्तार किया है। इसके अतिरिक्त, इन स्टार्टअप्स में से लगभग 48% में कम से कम एक महिला निदेशक या भागीदार शामिल है, जो बढ़ती समावेशिता को दर्शाता है।

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स्पाइस+ फॉर्म

  • वर्ष 2020 में स्पाइस+ फॉर्म की शुरुआत के साथ व्यवसाय शुरू करने और उसे औपचारिक रूप देने की प्रक्रिया अधिक सरल और सुव्यवस्थित हो गई। यह एकीकृत वेब फॉर्म 3 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों की 11 सेवाएँ प्रदान करता है। इसके साथ ही 3 राज्य सरकारों तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की सेवाएँ भी इस प्लेटफॉर्म में एकीकृत की गई हैं। इसने व्यवसाय शुरू करने से जुड़ी प्रक्रियाओं, समय और लागत में कमी की है। इस फॉर्म ने 10 आवश्यक प्रक्रियाओं को एकीकृत किया है, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
  • निगमन,
  • डीआईएन आवंटन,
  • पैन जारी करना,
  • टैन जारी करना,
  • ईएसआईसी पंजीकरण जारी करना,
  • ईपीएफओ ​​ पंजीकरण जारी करना,
  • व्यवसाय कर पंजीकरण जारी करना (महाराष्ट्र, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल),
  • बैंक अकाउंट खोलना,
  • जीएसटीआईएन का आवंटन (अगर आवेदन किया है) और
  • दिल्ली में निगमित होने वाली सभी नई कंपनियों के लिए दुकानों और प्रतिष्ठानों का पहली बार पंजीकरण।

यह कुशल प्रणाली, जिसमें रियल-टाइम डेटा सत्यापन की सुविधा है, कंपनियों के सुचारु गठन के लिए ऑनलाइन फाइलिंग प्रक्रिया को भी आसान बनाती है।

एमसीए 21 संस्करण 3

एमसीए 21 परियोजना, जो एक दूरदर्शी और एआई-आधारित पहल है, भारत के कॉरपोरेट क्षेत्र में पारदर्शिता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाती है। यह प्लेटफॉर्म कंपनियों तथा सीमित देयता भागीदारी (एलएलपी) के पंजीकरण और समावेशन से संबंधित एंड-टू-एंड सेवाओं के लिए उपयोग में लाया जाता है। एमसीए 21 संस्करण 3 को वित्त वर्ष 2021–22 में लॉन्च किया गया था और इसमें ई-जांच, ई-निर्णय और ई-परामर्श जैसी उन्नत सुविधाएँ शामिल हैं। इसके अलावा इसमें अनुपालन प्रबंधन प्रणाली और एमसीए लैब भी सम्मिलित हैं।

वर्ष 2021 से 2025 के बीच कुल लगभग 3.84 करोड़ फाइलिंग की गईं। इनमें से 3.33 करोड़ फाइलिंग को स्ट्रेट-थ्रू प्रोसेसिंग के माध्यम से स्वीकृति प्रदान की गई। इससे प्रक्रियागत समय में कमी आई है, मानवीय हस्तक्षेप न्यूनतम हुआ है, तथा व्यवसायों के लिए अनुपालन की सुगमता में सुधार हुआ है।

उद्यम पंजीकरण पोर्टल

प्रक्रियागत बाधाओं को दूर करने और एमएसएमई पंजीकरण को सरल बनाने के लिए सरकार ने आसान और प्रौद्योगिकी-आधारित पंजीकरण प्रणालियाँ शुरू कीं। उद्यम पंजीकरण पोर्टल को जुलाई 2020 में शुरू किया गया। यह एमएसएमई के लिए निःशुल्क, कागजरहित और स्व-घोषणा-आधारित प्रणाली प्रदान करता है। उद्यम पंजीकरण पोर्टल पर एमएसएमई पंजीकरण अक्टूबर 2020 में 10.02 हजार से बढ़कर 5 जून 2026 तक 858 हजार से अधिक हो गए।.

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सीबीडीटी (केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड) तथा माल और सेवा कर नेटवर्क (जीएसटी नेटवर्क) के डेटाबेस के साथ इस पोर्टल के एकीकरण के माध्यम से यह एक पूर्णतः डिजिटल, दस्तावेज़-रहित पंजीकरण अनुभव प्रदान करता है, जो प्रशासनिक बाधाओं को समाप्त करता है।

 

संपत्ति पंजीकरण को सरल बनाना

व्यवसाय आरंभ करने से संबंधित सुधारों के साथ-साथ, सरकार ने संपत्ति पंजीकरण प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिए भी कदम उठाए हैं। भारत में संपत्ति पंजीकरण पारंपरिक रूप से एक चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया रही है, जो विवादों, धोखाधड़ी और अक्षम मैनुअल प्रक्रियाओं से प्रभावित थी। हालांकि, डिजिटल परिवर्तन और राज्य-स्तरीय सुधारों ने भूमि प्रशासन में जवाबदेही और दक्षता में सुधार किया है।

(डीआईएलआरएमपी)डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम

भूमि अभिलेखों के प्रबंधन को आधुनिक बनाने और भूमि/संपत्ति विवादों की संभावना को न्यूनतम करने के लिए वर्ष 2016 में डीआईएलआरएमपी का आरंभ किया गया था। यह कार्यक्रम भूमि अभिलेखों की रखरखाव प्रणाली में सटीकता को बढ़ाता है। इसने भूमि प्रशासन को प्रभावी रूप से “इन-लाइन” से “ऑनलाइन” प्रणाली में परिवर्तित कर दिया है।

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डीआईएलआरएमपी ने हाल के वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति हासिल की है:

  • नक्शों का डिजिटलीकरण: देश के 97.37% हिस्से में भूमि अभिलेख या कैडस्ट्रल मानचित्रों का डिजिटलीकरण किया जा चुका है।
  • 19 राज्यों में नागरिक अब घर बैठे डिजिटल हस्ताक्षरित और कानूनी रूप से मान्य भूमि अभिलेख डाउनलोड कर सकते हैं, तथा 406 जिलों में बैंक ऑनलाइन गिरवी की पुष्टि कर सकते हैं, जिससे ऋण प्राप्त करने की प्रक्रिया में उल्लेखनीय तेजी आई है।
  • नक्शा (शहरी बस्तियों का राष्ट्रीय भू-स्थानिक ज्ञान-आधारित भूमि सर्वेक्षण) पायलट कार्यक्रम भी शहरी भूमि खंडों का एक व्यापक, जीआईएस-एकीकृत डेटाबेस तैयार कर रहा है। 116 शहरी स्थानीय निकायों में हवाई सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है (लक्ष्य का 87%), जिसमें लगभग 5,915 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हाई-रिज़ॉल्यूशन इमेजरी के साथ कवर किया गया है (दिसंबर 2025 तक)।
  • विशिष्ट भूमि पार्सल पहचान संख्या (यूएलपीआईएन) एक 14-अंकीय अल्फ़ान्यूमेरिक कोड है जो भौगोलिक निर्देशांकों पर आधारित है और इसे “भूमि के लिए आधार” कहा जाता है। नवंबर 2025 तक, 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 36 करोड़ से अधिक भूमि खंडों को यूएलपीआईएन को आवंटित किया जा चुका है। यह दोहराव को समाप्त करता है, बेनामी लेन-देन को रोकता है और एक एकीकृत भूमि इकोसिस्टम के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है।

राष्ट्रीय सामान्य दस्तावेज़ पंजीकरण प्रणाली (एनजीडीआरएस): एक राष्ट्र, एक पंजीकरण

एनजीडीआरएस ने संपत्ति लेन-देन को सुव्यवस्थित किया है तथा संपत्ति और दस्तावेज़ पंजीकरण के लिए एक पूर्ण उपयोगकर्ता इंटरफ़ेस प्रदान करके व्यापार करने में सुगमता को बढ़ावा दिया है। यह अनुप्रयोग नागरिकों को ऑनलाइन भूमि खरीदने की सुविधा भी प्रदान करता है। खरीदार भूमि के लिए प्रचलित सर्कल रेट की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, मौजूदा दरों के अनुसार संपत्ति का मूल्यांकन कर सकते हैं तथा भूमि के प्रकार को समझ सकते हैं।

इसे भारत के 17 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया गया है। 88.6% उप-पंजीयक कार्यालय (एसआरओ) अब राजस्व कार्यालयों के साथ एकीकृत हैं, जिससे पंजीकरण के तुरंत बाद भूमि अभिलेखों में स्वचालित नामांतरण संभव हो गया है।

 

परमिट प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना

पिछले सुधारों के पूरक के रूप में, अनुमति प्रक्रियाओं को सरल बनाने और प्रक्रियागत देरी को कम करने के लिए भी उपाय किए गए हैं। वर्ष 2014 से पहले, व्यवसायिक परमिट और लाइसेंस प्राप्त करने में अक्सर लंबी प्रक्रियाएँ, व्यापक कागजी कार्रवाई और कई नियामकीय अनुमोदनों की आवश्यकता होती थी। बीते वर्षों के दौरान, सरकार ने अनुमोदन प्रक्रियाओं को सरल और डिजिटल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण सुधार किए हैं।

नवंबर 2025 में श्रम संहिताओं के लागू होने के साथ ही, अनुमति प्रक्रियाओं को सरल बना दिया गया। व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता (ओएसएच) , 2020 ने 13 केंद्रीय श्रम कानूनों को प्रतिस्थापित करते हुए एक एकल एवं व्यापक कानून का रूप लिया। इसने अनुमति प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए निम्नलिखित परिवर्तन भी किए:

  • इलेक्ट्रॉनिक एकल पंजीकरण, एकल रिटर्न, पाँच वर्षों के लिए वैध एकल अखिल- भारतीय लाइसेंस तथा स्वतः स्वीकृति जैसी व्यवस्थाओं ने व्यापार करने में सुगमता को बढ़ावा दिया है। इन उपायों से प्रक्रियागत देरी कम हुई है, अनुपालन लागत घटी है और व्यवसाय शुरू करने एवं संचालन की गति तेज हुई है।
  • प्रतिष्ठानों के इलेक्ट्रॉनिक पंजीकरण के लिए 10 कर्मचारियों की एक समान न्यूनतम सीमा निर्धारित की गई है। यह 10 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले सभी प्रतिष्ठानों में व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण मानकों के सार्वभौमिक अनुप्रयोग को सुनिश्चित करता है।
  • किसी एक प्रतिष्ठान के लिए 6 अलग-अलग पंजीकरणों की जगह एक पंजीकरण ने ले ली है। इससे समन्वय और प्रक्रिया की पारदर्शिता को बेहतर बनाने के लिए एक केंद्रीकृत डेटाबेस तैयार होता है।
  • फैक्ट्री लाइसेंस प्राप्त करने के लिए कर्मचारियों की सीमा को बढ़ाकर 10 से 20 (विद्युत शक्ति के साथ) और 20 से 40 (विद्युत शक्ति के बिना) कर दिया गया है।
  • इसके अतिरिक्त, फैक्ट्री के निर्माण/विस्तार की अनुमति के लिए 30 दिनों की समय-सीमा निर्धारित की गई है, जिसमें स्वतः स्वीकृति का प्रावधान भी शामिल है।
  • निरीक्षक व्यवस्था के स्थान पर निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता की व्यवस्था लागू की गई है तथा एक यादृच्छिक वेब-आधारित निरीक्षण प्रणाली अपनाई गई है, जिसका उद्देश्य पारंपरिक “इंस्पेक्टर राज” को कम करना है। अब निरीक्षक अधिकतर सुविधाकर्ता के रूप में कार्य करते हैं, जो नियोक्ताओं को कानूनों, नियमों और विनियमों के अनुपालन में सहायता प्रदान करते हैं।

इसके अतिरिक्त, सरकार ने वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 तथा जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के अंतर्गत अधिसूचित एकसमान सहमति दिशानिर्देश में संशोधन किया है, ताकि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में उद्योगों के लिए सहमति प्रदान करने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जा सके।

  • एक प्रमुख संशोधन संचालन हेतु सहमति (सीटीओ) की वैधता से संबंधित है। संशोधित दिशानिर्देशों के तहत, एक बार जारी की गई सीटीओ तब तक वैध रहेगी जब तक उसे निरस्त नहीं किया जाता। इससे बार-बार नवीनीकरण की आवश्यकता समाप्त हो गई है, कागजी कार्रवाई कम हुई है, उद्योगों पर अनुपालन बोझ घटा है और औद्योगिक संचालन की निरंतरता सुनिश्चित हुई है।
  • अधिसूचित औद्योगिक एस्टेट या क्षेत्रों में स्थित सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। ऐसी इकाइयों के लिए, स्व-प्रमाणित आवेदन प्रस्तुत करने पर स्थापना की सहमति प्रदान की गई मानी जाती है, क्योंकि पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भूमि का मूल्यांकन पहले ही किया जा चुका है।
  • संशोधनों के तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 5 से 25 वर्षों की अवधि के लिए एकमुश्त संचालन सहमति शुल्क निर्धारित करने की भी अनुमति दी गई है। इससे बार-बार शुल्क संग्रह और प्रशासनिक प्रक्रिया में कमी आती है।
  • इसके साथ ही, वर्ष 2016 में उद्योगों की निरीक्षण प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने समितियों और राज्य प्रदूषण बोर्डों को समय-समय पर उद्योगों का निरीक्षण करने के निर्देश दिए। उद्योगों को प्रदूषण सूचकांक के आधार पर “रेड”, “ऑरेंज” और “ग्रीन” श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया। इनका निरीक्षण क्रमशः हर छह महीने, एक वर्ष और दो वर्ष में किया जाता है। यह पुनर्वर्गीकरण स्वच्छ और जवाबदेह नियामकीय वातावरण को समर्थन देता है तथा पूर्वानुमेय और जोखिम-आधारित अनुपालन को सक्षम बनाता है। साथ ही, रेड श्रेणी के उद्योगों को सहमति प्रदान करने की प्रक्रिया का समय 120 दिनों से घटाकर 90 दिन कर दिया गया है।

राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (एनएसडब्ल्यूएस)

एनएसडब्ल्यूएस एक एकल खिड़की डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो व्यवसाय की आवश्यकताओं के अनुसार अनुमोदनों की पहचान करने और आवेदन करने में मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह स्वीकृति मिलने में लगने वाले समय को घटाता है, सुरक्षित दस्तावेज़ भंडारण की सुविधा देता है तथा प्रश्नों के तेज़ निपटान को सक्षम बनाता है। यह प्रणाली 32 केंद्रीय विभागों और 34 राज्य सरकारों की अनुमोदन प्रक्रियाओं को एकीकृत करती है। इसके माध्यम से 686 से अधिक केंद्रीय तथा 7,498 राज्य स्तरीय अनुमोदनों तक पहुँच उपलब्ध कराई गई है। वर्ष 2021 में शुरू होने के बाद से एनएसडब्ल्यूएस ने 8,29,750 से अधिक अनुमोदन प्रदान किए हैं (20 नवंबर 2025 तक)।

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परिवेश (प्रो एक्टिव एंड रिस्पॉन्सिव फैसिलिटेशन बाय इंटरएक्टिव एंड वर्चुअस एनवायरनमेंटल सिंगल-विंडो हब) 2.0

परिवेश पोर्टल को पर्यावरण मंजूरी (ईसी), वन मंजूरी (एफसी), वन्यजीव (डब्ल्यूएल) और तटीय विनियमन क्षेत्र (सीआरजेड) से संबंधित मंजूरी की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के उद्देश्य से अगस्त 2018 में लॉन्च किया गया था। इसके परिणामस्वरूप, पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए औसत अनुमोदन समय वर्ष 2025–26 में घटकर 64 दिन रह गया, जबकि निर्धारित समय-सीमा 105 दिन थी। इसने पूर्व में जटिल रही पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया को डिजिटल और केंद्रीकृत बनाकर भारत में व्‍यापार करने में सुगमता को बढ़ावा दिया है।

समग्र रूप से, इन सुधारों ने अनुमति प्रक्रियाओं को सुचारु बनाया है और विभिन्न क्षेत्रों में व्यवसाय सुगमता में सुधार किया है।

 

बाज़ार संपर्क को सुदृढ़ करना

सरकार ने डिजिटल सार्वजनिक खरीद प्लेटफॉर्म, डिजिटल वाणिज्य नेटवर्क और एकीकृत लॉजिस्टिक्स सुधारों के माध्यम से व्यवसायों के लिए बाज़ार तक पहुँच में उल्लेखनीय सुधार किया है। देशभर में खरीदारों, विक्रेताओं, निर्माताओं और सेवा प्रदाताओं को जोड़ने के लिए कई उपाय किए गए हैं। ये पहलें एंड-टू-एंड समाधान, व्यापक बाज़ार पहुँच और अधिक दक्ष आपूर्ति श्रृंखलाएँ सुनिश्चित करती हैं, जिससे विशेष रूप से एमएसएमई और छोटे व्यवसायों को लाभ होता है।

उन्नत मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी और अवसंरचना विस्तार के साथ, 2014 के बाद भारत की लॉजिस्टिक्स प्रतिस्पर्धात्मकता में भी सुधार हुआ है। वर्ष 2023 में भारत ने विश्व बैंक लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक में 38वाँ स्थान प्राप्त किया, जबकि 2014 में यह 54वें स्थान पर था। जीईएम, ओएनडीसी, पीएम गतिशक्ति, एनएलपी (मरीन) और एलडीबी 2.0 जैसी पहलों ने मिलकर समावेशिता, पारदर्शिता और दक्षता को बढ़ावा दिया है, जिससे व्यापार करने में सुगमता में सुधार हुआ है।

जीईएम  (सरकारी ई-मार्केटप्लेस)

जीईएम को वर्ष 2016 में डिजिटाइज करने तथा सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित और समावेशी बनाने के लिए शुरू किया गया थायह ई-मार्केटप्लेस महिला उद्यमियों, स्टार्टअप्स, सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों (एमएसई), कारीगरों, स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) तथा दिव्यांगजनों को मुख्यधारा की सरकारी खरीद प्रणाली से जोड़ता है।

जीईएम ने कुल मिलाकर 18.4 लाख करोड़ रुपये का सकल वस्तु मूल्य (जीएमवी) प्राप्त किया है, जिसमें वित्त वर्ष 2025–26 में 5 लाख करोड़ रुपये जीएमवी का आँकड़ा पार करना भी शामिल है। वित्त वर्ष 2025–26 के दौरान कुल ऑर्डरों में से 68% ऑर्डर एमएसई द्वारा निष्पादित किए गए, जो कुल जीएमवी का 47.1% हिस्सा रखते हैं। जीईएम 35,705 से अधिक स्टार्टअप्स को बाज़ार तक पहुँच प्रदान मेक इन इंडिया पहल को समर्थन देता है। इन स्टार्टअप्स ने मिलकर 51,494 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के ऑर्डर संसाधित किए।

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इसके अतिरिक्त, 2.04 लाख से अधिक महिला-नेतृत्व वाले एमएसई जीईएम पर पंजीकृत हैं, जो 79,231 रुपये करोड़ मूल्य के 42 लाख से ज़्यादा ऑर्डर (दिसंबर 2025)पूरे कर रहे हैं। जीईएम के संचालन में प्रौद्योगिकी की केंद्रीय भूमिका बनी हुई है। यह प्लेटफॉर्म आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग (एमएल) का उपयोग करता है, जिससे जवाबदेही मजबूत होती है, प्रक्रियाएँ सुव्यवस्थित होती हैं और खरीद प्रणाली में पारदर्शिता आती है एवं ईमानदारी में सुधार होता है। जीईएम ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 100% कवरेज प्राप्त कर लिया है। इसके ई-लर्निंग प्रशिक्षण पाठ्यक्रम 12 आधिकारिक भाषाओं-असमिया, बंगाली, इंग्लिश, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, मलयालम, मराठी, ओडिया, पंजाबी, तमिल और तेलुगु में उपलब्ध हैं, जो अलग-अलग उपयोगकर्ताओं की ज़रूरतों को पूरा करते हैं। जीईएम विभाजित बोली प्रक्रिया को एक स्मार्ट और सतत प्रणाली से प्रतिस्थापित कर व्यवसाय करने में सुगमता को बढ़ाता है, जो एमएसएमई के लिए प्रवेश बाधाओं को समाप्त करता है।

ओएनडीसी (ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स )

ओएनडीसी एक ऐसी पहल है, जिसका उद्देश्य डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क के माध्यम से वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान के सभी पहलुओं के लिए ओपन नेटवर्क को बढ़ावा देना है। इसे अप्रैल 2022 में डिजिटल वाणिज्य को सर्वसुलभ बनाने के लिए शुरू किया गया था। इसके अंतर्गत विक्रेता और सेवा प्रदाता 616 से अधिक शहरों में फैले हुए हैं, और इसमें 7.64 लाख से अधिक विक्रेता शामिल हैं। ओपन प्रोटोकॉल को बढ़ावा देकर और एकाधिकारवादी प्लेटफॉर्मों पर निर्भरता को कम करके, ओएनडीसी -कॉमर्स परिदृश्य में नवाचार और समावेशिता के माध्यम से व्यापार करने में सुगमता को बढ़ाता है।

पीएम गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान

भारत का लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम 2014 के बाद से एकीकृत अवसंरचना विकास, डिजिटलीकरण और संस्थागत सुधारों के माध्यम से रूपांतरित हुआ है। पहले लॉजिस्टिक्स योजना विभिन्न परिवहन माध्यमों में बंटी हुई थी, जिससे लागत बढ़ती थी और आपूर्ति श्रृंखला की उत्पादकता कम होती थी। अक्टूबर 2021 में शुरू किया गया पीएम गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान एक परिवर्तनकारी पहल है, जिसका उद्देश्य एकीकृत अवसंरचना योजना और मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना है।

  • यह 58 केंद्रीय मंत्रालयों और सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जोड़ता है, जिसमें समन्वित अवसंरचना योजना और कार्यान्वयन के लिए 3199 डेटा लेयर्स शामिल हैं।
  • यूनिफाइड जियोस्पेशियल इंटरफेस निवेश संबंधी निर्णयों और लॉजिस्टिक्स योजना को समर्थन देने के लिए 230 चयनित डेटासेट उपलब्ध कराता है।
  • फरवरी 2026 तक, नेटवर्क प्लानिंग ग्रुप ने 16.10 लाख करोड़ रुपये मूल्य की 352 परियोजनाओं का मूल्यांकन किया, जिनमें से 201 को स्वीकृति दी गई है और 167 परियोजनाएँ कार्यान्वयन के चरण में हैं।

एकीकृत परिवहन और लॉजिस्टिक्स अवसंरचना की योजना को सक्षम बनाकर यह योजना देरी को कम करती है। परिसंपत्तियों की पुनरावृत्ति से बचते हुए और बहु-माध्यमीय कनेक्टिविटी में सुधार करके यह योजना व्यापार करने में सुगमता को बढ़ाती है।

राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स पोर्टल (मरीन)

राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स पोर्टल (मरीन) एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म है जो सरकारी और व्यावसायिक सेवाओं को एकीकृत करके समुद्री लॉजिस्टिक्स संचालन को सुव्यवस्थित करता है। यह निर्यातकों, आयातकों और समुद्री लॉजिस्टिक्स सेवा प्रदाताओं के लिए एक एकल-खिड़की प्लेटफ़ॉर्म है। लॉजिस्टिक्स लागत और समय में होने वाली देरी को कम करने के लिए इसे 2023 में शुरू किया गया था। यह दस्तावेज़ों के आदान-प्रदान और वास्तविक समय में कार्गो ट्रैकिंग सहित एंड-टू-एंड डिजिटल लॉजिस्टिक्स समाधान सक्षम करता है। यह शिपिंग और कंटेनर फ्रेट सेवाओं के लिए एकीकृत इंटरफ़ेस के माध्यम से डिजिटल भुगतान की सुविधा भी प्रदान करता है, जिससे व्‍यापार करने में सुगमता को बढ़ावा मिलता है। मार्च 2023 में इसका मोबाइल ऐप लॉन्च होने के बाद से अगस्त 2024 तक, इसने भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में फैले 21,000 से अधिक उपयोगकर्ताओं का आधार बना लिया है।

लॉजिस्टिक्स डेटा बैंक (एलडीबी 2.0)

एलडीबी 2.0 सड़क, रेल और समुद्री नेटवर्क के माध्यम से रीयल-टाइम मल्टीमॉडल कार्गो ट्रैकिंग द्वारा भारत के डिजिटल लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम को सुदृढ़ बनाता है। हाई सी कंटेनर ट्रैकिंग और बाधाओं की पहचान के लिए लाइव कंटेनर हीटमैप की शुरुआत करके एलडीबी 2.0 एक पारदर्शी और डेटा-आधारित प्रणाली को बढ़ावा देता है। यह लागत को कम करता है और आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन में सुधार करता है, जिससे भारत की लॉजिस्टिक्स प्रणाली अधिक विश्वसनीय बनती है। वर्ष 2025–26 में इसने 100% आयात निर्यात कंटेनरों को ट्रैक किया और लगभग 9.5 करोड़ निर्यात-आयात कंटेनरों का प्रबंधन किया।

 

ऋण तक आसान पहुँच को सुगम बनाना

व्यवसायों के लिए कार्यशील पूंजी का प्रबंधन करने, परिचालनों का विस्तार करने, प्रौद्योगिकी अपनाने तथा दैनिक परिचालन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ऋण तक पहुँच अत्यंत आवश्यक है। जिस प्रकार सरल पंजीकरण और लाइसेंसिंग व्यवसाय आरंभ करने को सुगम बनाते हैं, उसी प्रकार समय पर और सस्ता ऋण व्यवसायों को बढ़ने और अपने संसाधनों का बेहतर उपयोग करने में मदद करता है।

वर्ष 2014 से पहले, छोटे उद्यमियों को जटिल कागजी कार्यवाही जैसी बाधाओं का सामना करना पड़ता था या उन्हें अनौपचारिक वित्तीय स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता था। सरकारी उपायों की शुरुआत के साथ, ऋण बाजार अधिक औपचारिक हुआ और छोटे व्यवसायियों के लिए ऋण तक आसान पहुँच सुनिश्चित हुई।

ऋण गारंटी योजना

क्रेडिट गारंटी योजनाएँ एमएसएमई और स्टार्टअप्स को बिना जमानत या बिना तृतीय-पक्ष गारंटी के ऋण उपलब्ध कराकर व्यापार करने में सुगमता को बढ़ावा देती हैं। ये योजनाएँ ऋणदाताओं के लिए जोखिम को कम करती हैं, उद्यमियों के लिए वित्त तक पहुँच आसान बनाती हैं, नवाचार को प्रोत्साहन देती हैं और व्यवसायिक वातावरण अधिक सरल बनाती हैं।

  • सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी योजना (सीजीटीएमएसई) के अंतर्गत 9.34 लाख करोड़ रुपये मूल्य की कुल गारंटियाँ जिसमें 1.15 करोड़ कुल गारंटी शामिल हैं, को मंज़ूरी दी गई है (31 मार्च, 2025)।
  • आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) के तहत 3.68 लाख करोड़ रुपये से अधिक की स्वीकृति दी गई है, जिसमें से 2.43 लाख करोड़ रुपये विशेष रूप से एमएसएमई के लिए स्वीकृत किए गए हैं।

ऋण स्वीकृति प्रक्रिया को सुगम बनाकर ये योजनाएँ पूँजी तक पहुँचने में लगने वाले समय और लागत को भी कम करने में मदद करती हैं।

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई)

पीएमएमवाई को वित्तीय पहुँच में कमी को दूर करने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जिसके अंतर्गत छोटे व्यवसायों को सहायता प्रदान करने के लिए 20 लाख रुपये तक के ऋण बिना जमानत प्रदान किए जाते हैं। विशेष रूप से, 2015 में शुरू होने के बाद से इस योजना के तहत 27 मार्च 2026 तक, 40.07 लाख करोड़ रुपये के ऋण वितरित किए जा चुके हैं और 57 करोड़ से अधिक खाते खोले जा चुके हैं। इसके अलावा, 12 करोड़ से अधिक खाते नए उद्यमियों के हैं, जो उन्हें औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ने में इस योजना की महत्वपूर्ण भूमिका दर्शाते हैं। मुद्रा लेनदेन के डिजिटलीकरण ने ऋणकर्ताओं के लिए दक्षता, पारदर्शिता और ऋण तक आसान पहुँच को और अधिक सुदृढ़ किया है।

 

ऋण खातों में हिस्सेदारी

वितरित राशि का हिस्सा

महिलाएं

59.81%

37.45%

नए उद्यमी

21%

30.09%

एससी, एसटी और ओबीसी श्रेणियाँ

45.52%

31.77%

 

A graph of a financial fall

क्रेडिट मूल्यांकन मॉडल (सीएएम)

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) ने वर्ष 2025 में एमएसएमई के लिए डिजिटल फुटप्रिंट्स पर आधारित क्रेडिट मूल्यांकन मॉडल (सीएएम) लॉन्च किया। यह मॉडल डिजिटल रूप से प्राप्त और सत्यापित किए जा सकने वाले डेटा का उपयोग करके एमएसएमई के लिए स्वचालित ऋण मूल्यांकन को सक्षम बनाता है। सीएएम के अंतर्गत पीएसबी द्वारा 52,300 करोड़ रुपये से अधिक राशि के 3.96 लाख से अधिक एमएसएमई ऋण आवेदनों को स्वीकृति दी गई है। (1 अप्रैल से 21 दिसंबर 2025 के बीच)। यह मॉडल निर्णय लेने की प्रक्रिया में त्वरित निष्पादन सुनिश्चित करता है और एक उद्यम-हितैषी  ढाँचा स्थापित करता है।

टीआरईडीएस (व्यापार प्राप्य छूट प्रणाली)

टीआरईडीएस एक इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफ़ॉर्म है जो विभिन्न वित्तपोषकों के माध्यम से एमएसएमई के ट्रेड रिसीवेबल्स के वित्तपोषण/डिस्काउंटिंग को सुगम बनाता है। ये रिसीवेबल्स कॉरपोरेट्स तथा सरकारी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) सहित अन्य खरीदारों से देय हो सकते हैं। एमएसएमई की तरलता को बढ़ाने के लिए, केंद्रीय बजट 2026-27 में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के लेन-देन के निपटान के लिए टीआरईडीएस को अनिवार्य करने का प्रस्ताव रखा गया। इसके साथ ही, इनवॉइस डिस्काउंटिंग के लिए एक क्रेडिट गारंटी तंत्र भी शुरू किया गया। इसके अतिरिक्त, जीईएम को टीआरईडीएस के साथ जोड़ने से तेज़ वित्तपोषण संभव होता है। इस बीच, टीआरईडीएस प्राप्तियों को परिसंपत्ति-समर्थित प्रतिभूतियों के रूप में प्रस्तुत करने से लेनदेन निपटान को बेहतर बनाने हेतु एक द्वितीयक बाजार विकसित होता है।

 

कर अनुपालन को आसान बनाना

पिछले दशक में, भारत ने डिजिटलीकरण, सरलीकरण और संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से अपनी कर प्रणाली में परिवर्तन किया है, जिससे कर अनुपालन अधिक सहज और पारदर्शी बन गया है। माल एवं सेवा कर (जीएसटी), फेसलेस असेसमेंट और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म जैसी पहलों ने प्रक्रियागत जटिलताओं को कम किया है। इन सुधारों ने करदाताओं पर बोझ कम किया है, औपचारिक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया है तथा अधिक पूर्वानुमानित तथा व्यवसाय-अनुकूल कर वातावरण तैयार किया है।

माल और सेवा कर

जीएसटी 2017 में लागू किया गया था और इसने एक बिखरी हुई एवं जटिल अप्रत्यक्ष कर प्रणाली का स्थान लिया, जो व्यवसायों और उपभोक्ताओं दोनों पर समान बोझ डालती थी। जीएसटी से पहले कर ढाँचे में उत्पाद शुल्क, सेवा कर , वैट, सीएसटी आदि जैसे कई प्रकार के कर शामिल थे । इन प्रत्येक कर की अपनी अलग अनुपालन चुनौतियाँ और कमियाँ थीं। करों की यह बहुलता व्यवसाय करने की लागत को बढ़ाती थी और कर बाधाओं के कारण राज्यों के बीच वस्तुओं की निर्बाध आवाजाही में बाधा उत्पन्न करती थी।

इसके अलावा, सितंबर 2025 में घोषित जीएसटी सुधारों ने व्यापार करने में सुगमता को बढ़ावा दिया। इस सरल दो-स्तरीय कर संरचना की ओर यह बदलाव अनुपालन और लेन-देन लागत को कम करता है, जबकि दरों का युक्तिकरण किफ़ायतीपन को बढ़ाता है और उद्यमिता को प्रोत्साहित करता है।

A graph of a rising cost

इसका प्रभाव कर आधार के विस्तार में दिखाई देता है, जहाँ पंजीकृत करदाताओं की संख्या 2017 में लगभग 60 लाख से बढ़कर अप्रैल 2026 तक 1.64 करोड़ से अधिक हो गई है, जो अर्थव्यवस्था के अधिक गहन औपचारिकीकरण को दर्शाता है।

जीएसटी को इसके डिजिटल ढाँचे, जीएसटीएन प्लेटफ़ॉर्म का भी समर्थन प्राप्त है। यह एक करोड़ से अधिक करदाताओं के लिए एक समन्वित इंटरफ़ेस प्रदान करता है, जिससे B2B इलेक्ट्रॉनिक इनवॉइसिंग सुगमता से संभव होती है। अप्रैल 2026 तक इस पोर्टल के माध्यम से 107.64 लाख करोड़ रुपये से अधिक के भुगतानों की प्रोसेसिंग की जा चुकी है। यह स्वचालित इकोसिस्टम एक सुव्यवस्थित और तकनीक-आधारित वित्तीय ढाँचे को बढ़ावा देता है।

फेसलेस असेसमेंट

पुरानी और पारंपरिक मैनुअल मूल्यांकन पद्धतियों को बदलने के उद्देश्य से 2019 में ई-असेसमेंट योजना शुरू की गई। इस योजना का उद्देश्य कर प्रशासन प्रणाली में अवांछनीय प्रथाओं को रोकना था। इसने करदाता और कर अधिकारियों के बीच भौतिक संपर्क को समाप्त कर दिया। यह मूल्यांकन बड़े पैमाने पर उत्पादन से होने वाले संभावित लाभों यानी इकॉनोमी ऑफ स्केल और कार्यात्मक विशेषज्ञता के माध्यम से संसाधनों के अधिकतम उपयोग को सक्षम बनाती है।

नया आयकर ई-फाइलिंग पोर्टल

आयकर विभाग ने जून 2021 में नया ई-फाइलिंग पोर्टल लॉन्च किया। इसका उद्देश्य करदाताओं को अधिक सुविधा और आधुनिक एवं सहज अनुभव प्रदान करना है। यह पोर्टल आयकर रिटर्न के त्वरित प्रसंस्करण को सक्षम बनाता है, जिससे रिफंड तेजी से प्राप्त होते हैं। यह सभी कार्यों और लंबित कार्यवाहियों के लिए एक एकीकृत डैशबोर्ड प्रदान करता है। प्री-फिल्ड डेटा के साथ निशुल्क आईटीआर तैयारी उपकरण कार्य को आसान बनाते हैं। बेहतर सहायता प्रणाली में एफएक्यू, ट्यूटोरियल्स तथा चैटबॉट या कॉल सेंटर सहायता शामिल है। इस पोर्टल में नेट बैंकिंग, यूपीआई, क्रेडिट कार्ड तथा आरटीजीएस/एनईएफटी सहित कई डिजिटल भुगतान विकल्प भी उपलब्ध हैं।

ई-वे बिल 

-वे बिल प्रणाली ने वस्तुओं के परिवहन के लिए कई राज्य-स्तरीय परमिटों के स्थान पर एक एकीकृत इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज़ की व्यवस्था कर भारत में लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव किया है। इस सुधार ने स्थिर सीमा जांच चौकियों को हटाने में सहायता की है, जिससे परिवहन समय में उल्लेखनीय कमी आई है और कर अनुपालन में सुधार हुआ है। जुलाई 2018–मार्च 2019 के दौरान 15.74 करोड़ ई-वे बिल जारी किए गए थे, जो वित्त वर्ष 2025–2026 में बढ़कर 188.27 करोड़ हो गए। यह मजबूत डिजिटल व्यापार और लॉजिस्टिक्स एकीकरण को दर्शाता है

 

अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दक्षता बढ़ाना

भारत ने लक्षित सुधारों और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स के माध्यम से सीमा-पार व्यापार में परिवर्तन किया है। चूँकि व्यापार व्यवसाय के जीवनचक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, यह कंपनियों को वैश्विक बाज़ारों तक पहुँच कायम करने, अपने परिचालनों का विस्तार करने और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में सक्षम बनाता है।

केंद्रीय बजट 2026–27 में घोषित सीमा शुल्क एकीकृत प्रणाली (सीआईएस) जैसे उपाय व्यवसाय करने में सुगमता को और मजबूत करते हैं। अतिरिक्त कदमों में अनिवासियों को न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) से छूट और शुल्क स्थगन अवधि का विस्तार शामिल है। इन सभी सुधारों ने मिलकर प्रक्रियाओं को सरल बनाया है, लेन-देन लागत को कम किया है, और भारत में व्यवसायों के लिए एक अधिक प्रभावी व्यापारिक वातावरण तैयार किया है।

निर्यात केंद्र के रूप में जिले (डीईएच) पहल

निर्यात केंद्र के रूप में जिले (डीईएच) पहल का उद्देश्य जमीनी स्तर पर निर्यात, विनिर्माण और रोजगार को बढ़ावा देना है। निर्यात संवर्धन और बाधाओं के समाधान के लिए सभी 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में राज्य/ज़िला निर्यात संवर्धन समितियाँ (एसईपीसी) स्थापित की गई हैं। 590 जिलों के लिए जिला निर्यात कार्य योजना (डीईएपी) के मसौदे तैयार किए गए हैं, जिनमें से 249 को औपचारिक रूप से अधिसूचित किया जा चुका है। जागरूकता बढ़ाने और निर्यातकों की समस्याओं के समाधान के लिए आउटरीच कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। यह पहल स्थानीय निर्यातकों और निर्माताओं को अपने व्यवसाय का विस्तार करने तथा वैश्विक बाजारों तक पहुँचने में सहायता प्रदान करती है। यह क्षमता निर्माण, नए निर्यातकों के सृजन और उत्पादों एवं सेवाओं के लिए नए बाजारों की पहचान में भी मदद करती है।

निर्यात संवर्धन मिशन

निर्यात संवर्धन मिशन (ईपीएम) एक प्रमुख पहल है, जिसका उद्देश्य निर्यात संबंधी इकोसिस्टम के विभिन्न हिस्सों को समन्वित रूप से सहायता प्रदान करना है। यह व्यापार वित्त, मानक अनुपालन, लॉजिस्टिक्स, विदेशी वेयरहाउसिंग तथा बाजार विकास में भी सहायता प्रदान करता है।

नवंबर 2025 में अनुमोदित यह मिशन विभिन्न निर्यात-सहायता उपायों को एकल, एकीकृत और डिजिटल-आधारित ढाँचे के तहत लाता है। इसे दो एकीकृत उप-योजनाओं : निर्यात प्रोत्साहन और निर्यात दिशा के माध्यम से लागू किया जाता है । निर्यात प्रोत्साहन वित्तीय साधनों और व्यापार वित्त सहायता पर ध्‍यान केंद्रित करता है, जबकि निर्यात दिशा गैर-वित्तीय, बाजार पहुँच और इकोसिस्‍टम से जुड़े साधनों पर गौर करता है। कुल मिलाकर, ईपीएम का उद्देश्य भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना और वैश्विक स्तर पर उसकी उपस्थिति का विस्तार करना है।

आइसगेट (भारतीय सीमा शुल्क इलेक्ट्रॉनिक गेटवे)

आइसगेट भारतीय सीमा शुल्क और व्यापार समुदाय के बीच सभी इलेक्ट्रॉनिक संपर्क के लिए एक केंद्रीकृत मंच के रूप में कार्य करता है। यह ई-फाइलिंग, ऑनलाइन संशोधन प्रस्तुत करने, ऑनलाइन शुल्क भुगतान और प्रश्नों के समाधान जैसी कई सेवाएँ प्रदान करता है। यह व्यापारियों के लिए एकीकृत माल और सेवा कर (आईजीएसटी) रिफंड प्रोसेसिंग भी उपलब्ध कराता है। यह गेटवे अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के लिए सीमा-पार व्यापार में सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित बनाकर व्यापार करना सुगम बनाता है। बिल ऑफ एंट्री की फाइलिंग अप्रैल 2019 में लगभग 4 लाख से बढ़कर मार्च 2026 में 5.89 लाख हो गई, जो डिजिटल कस्टम्स प्रोसेसिंग और व्यापार गतिविधि में वृद्धि को दर्शाता है।

ईसीओओ (उन्नत मूल प्रमाणपत्र) 2.0 प्रणाली

ईसीओओ 2.0 प्रणाली एक डिजिटल उन्नयन है, जो निर्यातकों के लिए प्रमाणन प्रक्रिया को सरल बनाती है। इसमें एकल आयात-निर्यात कोड के अंतर्गत मल्टी-यूज़र एक्सेस जैसी उपयोगकर्ता-अनुकूल विशेषताएँ शामिल हैं। इस प्रणाली में आधार-आधारित ई-हस्ताक्षर और मुक्त व्यापार समझौता संसाधनों के लिए एक एकीकृत डैशबोर्ड भी उपलब्ध है। ये सुविधाएँ व्यापार की निरंतर प्रभावशीलता सुनिश्चित करती हैं। “इन-लियूमूल प्रमाण पत्र के लिए आसान ऑनलाइन आवेदन की सुविधा देकर यह प्रणाली निर्यातकों को सुधार का अनुरोध करने की अनुमति देती है। इस व्यापार सुविधा पहल ने प्रमाणन प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया है और निर्यातकों के लिए टर्नअराउंड समय में सुधार किया है। इस प्लेटफ़ॉर्म ने प्रतिदिन 7,000 से अधिक ईसीओओ प्रोसेस किए, जिनमें प्राथमिकता प्राप्त और गैर-प्राथमिकता प्राप्त दोनों प्रकार के प्रमाण पत्र शामिल हैं, और इसने 125 जारी करने वाली एजेंसियों को जोड़ा (जनवरी 2025)

ट्रेड कनेक्ट ई-प्लेटफ़ॉर्म

ट्रेड कनेक्ट ई-प्लेटफ़ॉर्म एमएसएमई सहित सभी निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार से संबंधित व्यापक जानकारी और सेवाएँ प्रदान करता है, जिससे उन्हें वैश्विक बाज़ारों तक आसान पहुँच मिलती है। यह विदेशों में स्थित भारतीय मिशनों की सहायता से वैश्विक खरीदारों और भारतीय निर्यातकों के बीच सीधे संपर्क सक्षम बनाता है। वर्तमान में इस प्लेटफ़ॉर्म पर 20 लाख से अधिक पंजीकृत उपयोगकर्ता हैं और 35 लाख से अधिक मूल प्रमाण पत्र जारी किए जा चुके हैं (5 जून, 2026 तक)।

 

डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का विस्तार

डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने पिछले दशक में भुगतान, सत्यापन और दस्तावेज़ प्रबंधन से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों का समाधान किया है। पहले व्यवसायों को लेन-देन में देरी और भौतिक दस्तावेज़ों पर निर्भरता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता था। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स ने तेज़ भुगतान, सुगम ऑनबोर्डिंग और सत्यापित डिजिटल रिकॉर्ड्स तक सुरक्षित पहुँच को संभव बनाया है। इन पहलों ने भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में डिजिटल शासन को और अधिक सुदृढ़ किया है।

यूपीआई (एकीकृत भुगतान इंटरफ़ेस)

यूपीआई 2016 में शुरू की गई एक रीयल-टाइम भुगतान प्रणाली है। यह व्यवसायों के लिए परिवर्तनकारी साबित हुई है, क्योंकि यह तुरंत, कम लागत वाली और सहज डिजिटल लेन-देन को सक्षम बनाती है। इसने नकदी प्रवाह में उल्लेखनीय सुधार किया है, ग्राहकों तक पहुँच का विस्तार किया है और पूरे भारत में व्यवसायों के विकास को समर्थन दिया है। यूपीआई कई बैंक खातों को एक ही ऐप में जोड़ती है और विभिन्न सुविधाओं का समर्थन करती है। इनमें फंड ट्रांसफर, व्यापारी भुगतान और पीयर-टू-पीयर भुगतान अनुरोध शामिल हैं, जो डिजिटल लेन-देन को तेज़ और सुविधाजनक बनाते हैं। यह सुरक्षित और त्वरित भुगतान प्रदान करती है, गोपनीयता सुनिश्चित करती है तथा क्यूआर कोड की सुविधा देती है।  

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यह प्रणाली 713 बैंकों को एक ही प्लेटफ़ॉर्म पर जोड़ती है, जिससे लोग बिना इस बात की चिंता किए कि वे कौन सा बैंक इस्तेमाल करते हैं, आसानी से भुगतान कर सकते हैं।। वर्तमान में इस प्रणाली का उपयोग लगभग 540.27 मिलियन व्यक्ति और 100 मिलियन व्यापारी कर रहे हैं। एक दशक के संचालन के दौरान, यूपीआई ने असाधारण पैमाना और गति प्रदर्शित की है। वार्षिक लेन-देन की संख्या वित्त वर्ष 2016–17 में  मात्र 2 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2025–26 में 24,162 करोड़ से अधिक हो गई है। यह लेन-देन की मात्रा में लगभग 12,000 गुना वृद्धि को दर्शाता है। साथ ही, लेन-देन का मूल्य वित्त वर्ष 2016–17 में 0.07 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025–26 में लगभग 314 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। यह लेन-देन मूल्य में 4,000 से अधिक गुना वृद्धि को दर्शाता है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भी लेन-देन की मात्रा के आधार पर यूपीआई को दुनिया की सबसे बड़ी रीयल-टाइम भुगतान प्रणाली के रूप में मान्यता दी है। यह भारत की विस्तारणीय, समावेशी और नवाचारपूर्ण डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के निर्माण में नेतृत्वकारी भूमिका को रेखांकित करता है।

सीकेवाईसी (सेंट्रल नो योर कस्टमर)

सीकेवाईसी रजिस्ट्री वित्तीय क्षेत्र में ग्राहकों के केवाईसी रिकॉर्ड का एक केंद्रीकृत भंडार है। यह समान केवाईसी मानकों को लागू करने और विभिन्न क्षेत्रों में केवाईसी रिकॉर्ड की अंतर-उपयोगिता को सक्षम बनाती है। यह रजिस्ट्री विभिन्न वित्तीय संस्थानों के साथ बार-बार केवाईसी दस्तावेज़ जमा करने और सत्यापन की आवश्यकता को कम करती है। यह ग्राहक ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया को सरल बनाती है और पूरे क्षेत्र में वित्तीय सेवाओं तक पहुँच को आसान बनाती है।

एंटिटी लॉकर

एंटिटी लॉकर एक डिजिटल लॉकर है जिसे जनवरी 2025 में संस्थाओं के उपयोग के लिए शुरू किया गया था। यह डिजिटल दस्तावेज़ों और प्रमाणपत्रों को संग्रहित, साझा और सत्यापित करने के लिए संगठनों को सुरक्षित, क्लाउड-आधारित प्लेटफ़ॉर्म प्रदान करके सशक्त बनाता है। यह एक सुरक्षित डिजिटल दस्तावेज़ वॉलेट के माध्यम से प्रामाणिक डिजिटल दस्तावेज़ों तक पहुँच प्रदान करता है। यह प्लेटफ़ॉर्म व्यवसायों और संस्थानों के लिए सुरक्षित और सुव्यवस्थित दस्तावेज़ प्रबंधन सुनिश्चित करता है। एक वर्ष के भीतर, एंटिटी लॉकर पर पंजीकृत संस्थाओं की संख्या फरवरी 2025 में 38 हजार से बढ़कर दिसंबर 2025 में 40 हजार से अधिक हो गई।

विश्वास-आधारित शासन ढाँचा बनाना

नियामक उपायों ने विभिन्न क्षेत्रों और राज्यों में जटिल नियमों से लेकर अनुपालन में कमी तक प्रशासनिक बोझ को कम किया है। इन सुधारों ने व्यवसायों के लिए नियामक अंतःक्रियाओं में विश्वास-आधारित शासन को बढ़ावा दिया है। इन उपायों ने व्यवसाय के जीवनचक्र के विभिन्न चरणों को भी मजबूत किया है, जिससे अधिक तेज़ और सुचारु व्यावसायिक संचालन संभव हुआ है।

जन विश्वास अधिनियम

जन विश्वास (प्रावधानों का संशोधन) अधिनियम, 2023 ने 42 अधिनियमों के अंतर्गत 183 प्रावधानों का गैर-अपराधीकरण किया, जिससे छोटे और तकनीकी अपराधों के लिए आपराधिक दायित्व को कम किया गया। इन प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए, जन विश्वास (प्रावधानों का संशोधन) अधिनियम, 2026 को 7 अप्रैल 2026 से लागू किया गया। यह अधिनियम विश्वास-आधारित और अनुपातिक नियमन पर आधारित प्रशासनिक ढाँचे को भी आगे बढ़ाता है।

इस अधिनियम के परिणामस्वरूप:

• 717 प्रावधानों का गैर-अपराधीकरण

• 23 मंत्रालयों द्वारा प्रशासित 79 केंद्रीय अधिनियमों के 784 प्रावधानों में संशोधन

यह अधिनियम पुराने और अनावश्यक प्रावधानों को हटाते हुए 1000 से अधिक अपराधों का युक्तिकरण करता है, जिससे समग्र नियामक व्यावसायिक वातावरण में सुधार होता है।

विनियामक अनुपालन बोझ

 गैर-अपराधीकरण सुधारों के अतिरिक्त, सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों और राज्यों में कई पूरक उपाय भी शुरू किए हैं।

इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981, भारतीय वन अधिनियम, 1927 तथा जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के आपराधिक प्रावधानों का गैर अपराधीकरण किया गया है। इन सुधारों के माध्यम से छोटे अपराधों का युक्तिकरण किया गया है, ताकि जीवन और व्यवसाय करने की सुगमता के लिए विश्वास-आधारित शासन को और सुदृढ़ किया जा सके।
  • राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में नियमों को सरल बनाने के लिए जनवरी 2025 में अनुपालन में कमी और विनियमन हटाने पर कार्य बल का गठन किया गया था। इसने पाँच क्षेत्रों में प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की, जिनमें भूमि उपयोग, निर्माण, श्रम, उपयोगिताएँ, अनुमतियाँ और समग्र प्राथमिकताएँ शामिल हैं। ये क्षेत्र देशभर में व्यवसायों को प्रभावित करने वाली नियामक अंतःक्रियाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मार्च 2025 से, इस कार्य बल द्वारा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में तीन दौर के दौरे किए गए हैं। इन दौरों का उद्देश्य अंतर-एजेंसी समन्वय को बढ़ाना, राज्यों के साथ मिलकर समस्याओं का समाधान करना और नियामक सुधारों के लिए वास्तविक समय में सीख प्राप्त करना रहा है।
  • अनुपालन भार कम करने के प्रयास के तहत, अब तक 47,000 से अधिक अनुपालनों को कम किया गया है। इसमें 16,108 सरल किए गए अनुपालन, 22,287 डिजिटलीकृत अनुपालन, 4,458 गैर-अपराधीकरण अनुपालन और 4,270 अनावश्यक अनुपालनों को हटाया जाना शामिल है (नवंबर 2025 तक)।
  • भारतीय रिज़र्व बैंक ने भी 9,000 से अधिक परिपत्रों और दिशानिर्देशों को 238 कार्य-विशिष्ट मास्टर डायरेक्शनों में समेकित किया है। यह विभिन्न श्रेणियों के विनियमित संस्थाओं के लिए हैं। नियामकीय स्पष्टता और व्यवसाय करने की सुगमता में सुधार के लिए इस पहल के अंतर्गत 9,446 परिपत्रों को निरस्त, समेकित या अप्रचलित माना जा रहा है।  

व्यापार सुधार कार्य योजना (बीआरएपी) और जिला सुधार

मजबूत डिजिटल अवसंरचना के समर्थन से, सरकार ने ईओडीबी सुधारों को बीआरएपी के माध्यम से और सुदृढ़ किया है। बीआरएपी 2015 से, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पारदर्शिता को बढ़ावा देने, नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाने और सेवा प्रदायगी को बेहतर करने का कार्य कर रहा है। बीआरएपी में विभिन्न सुधार क्षेत्रों में नियामकीय प्रक्रियाओं, नीतियों, प्रथाओं और प्रक्रियाओं में सुधारों के लिए मूल्यांकन के बाद की गई सिफारिशें शामिल होती हैं। इन सुधार क्षेत्रों में सूचना तक पहुँच और पारदर्शिता से जुड़े साधन, एकल खिड़की, पर्यावरणीय पंजीकरण से जुड़े साधन, बिजली कनेक्शन प्राप्त करना, भूमि की उपलब्धता, निर्माण परमिट से जुड़े साधन, निरीक्षण सुधार, श्रम नियमन, ऑनलाइन कर और रिटर्न फाइलिंग, तथा वाणिज्यिक विवाद समाधान जैसे पहलू शामिल हैं, जो एक सामान्य व्यवसाय के जीवनचक्र के विभिन्न चरणों को कवर करते हैं। बीआरएपी के 7 संस्करण पूरे हो चुके हैं, और इसका 8वाँ संस्करण नवंबर 2025 में औपचारिक रूप से शुरू किया गया।

जमीनी स्तर पर सुधारों को और गहरा करने के लिए, डीपीआईआईटी ने जिला व्यवसाय सुधार कार्य योजना (डी- बीआरएपी) भी शुरू की है। यह जिला स्तर पर व्यवसाय करने की सुगमता को मजबूत करती है। इसे अंतिम छोर तक सेवा प्रदायगी को सुदृढ़ करने, सेवा गुणवत्ता में सुधार लाने और जिलों को मजबूत संस्थागत एवं डिजिटल अवसंरचना से सुसज्जित कर क्षेत्रीय विकास को गति देने के लिए तैयार किया गया है। ये सुधार जिला कलेक्टरेट, विकास प्राधिकरणों और शहरी स्थानीय निकायों में लागू किए जाते हैं। यह प्रणाली नियामकीय अनुमोदनों, निरीक्षणों और व्यवसाय सुविधा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।  

दिवालियापन संबंधी चिंताओं का समाधान

दिवालियापन और दिवालिया संहिता , 2016 के लागू होने से पहले, व्यवसायों को ऋण समाधान और वसूली के लिए कई कानूनी ढाँचों पर निर्भर रहना पड़ता था। यह बिखरी हुई प्रणाली अक्सर समन्वय को जटिल और समय लेने वाली बना देती थी। इस संहिता ने मौजूदा कानूनों को एक एकीकृत दिवालियापन समाधान ढाँचे में समेकित किया। वित्तीय संकट के समाधान के लिए इसमें ऋणदाता-आधारित और समयबद्ध व्यवस्था को शामिल किया गया।

बाद के संशोधनों ने निर्णय लेने की प्रक्रिया में ऋणदाताओं की भूमिका को और मजबूत किया तथा समाधान प्रक्रिया की समय-सीमाओं में संशोधन किया। इसके साथ ही कंपनियों के देनदारों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करने वाले प्रावधान और दिवाला समाधान व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए अन्य कदम भी उठाए गए।

इसके अलावा, प्रक्रियात्मक दक्षता को सुदृढ़ करने के लिए दिवालियापन और दिवालिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2026 लागू किया गया। इस संशोधन में अधिक स्पष्ट परिभाषाएँ प्रस्तुत की गईं। इसमें निर्णायक प्राधिकरणों के लिए आवेदन स्वीकार या अस्वीकार करने हेतु 14 दिनों की समय-सीमा निर्धारित की गई। इस संशोधन ने एक निश्चित चरण के बाद मामलों की वापसी पर भी प्रतिबंध लगाया। अतिरिक्त प्रावधानों ने ऋणदाताओं की भागीदारी को मजबूत किया और दिवालियापन प्रक्रिया के दौरान सूचना तक पहुँच में सुधार किया। साथ ही, समग्र दिवालियापन समाधान प्रणाली की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए अन्य उपाय भी शामिल किए गए। इन सुधारों ने भारत की दिवालियापन प्रणाली को और सुदृढ़ किया है, जिससे समाधान प्रक्रियाएँ व्यवसायों और ऋणदाताओं दोनों के लिए अधिक तेज़ और पूर्वानुमेय बन गई हैं।

व्यवसाय-अनुकूल व्यवस्था को बढ़ावा देना  

पिछले वर्षों में, भारत ने अधिक पारदर्शी और सुविधा-आधारित व्यवसायिक वातावरण बनाने के लिए व्यापक सुधार किए हैं। इन उपायों ने नियमों को सरल बनाया है, डिजिटल शासन को सुदृढ़ किया है, बाज़ार तक पहुँच को बेहतर किया है और व्यवसाय के पूरे जीवनचक्र में अनुपालन भार को कम किया है। भारत का आज का व्यापार करने में सुगमता ढाँचा डिजिटल अवसंरचना, नीतिगत सुधारों और विश्वास-आधारित शासन की संयुक्त शक्ति को दर्शाता है। इन सभी सुधारों ने मिलकर निवेशकों का विश्वास बढ़ाया है, उद्यमिता को प्रोत्साहित किया है और वैश्विक स्तर पर एक प्रतिस्पर्धी व्यवसायिक गंतव्य के रूप में भारत की स्थिति को मजबूत किया है।

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पीआईबी शोध

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