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Energy & Environment

भारत में हरित परिवर्तन

विश्वास, विकास, जन कल्याण: बारह वर्षों का स्वर्णिम सफर

Posted On: 04 JUN 2026 12:49PM

भारत ने सुविचारित नीतिगत प्रयासों और निरंतर कार्यान्वयन के माध्यम से एक स्थायी पर्यावरणीय बदलाव हासिल किया है। पिछले बारह वर्षों के दौरान, देश ने वन और हरित क्षेत्र का विस्तार किया है; आर्द्रभूमि, मैंग्रोव और तटीय  इकोसिस्टम को पुनर्जीवित किया है; तथा 'नमामी गंगे कार्यक्रम' के माध्यम से प्रदूषण के स्तर को कम करके नदियों के पुनरुद्धार को गति दी है। इसके साथ ही बाघों, शेरों, हाथियों, गैंडों और अन्य प्रजातियों सहित वन्यजीवों की आबादी में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। ठोस अपशिष्ट प्रसंस्करण को बढ़ाकर, विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (ईपीआर) ढांचे के माध्यम से सर्कुलर इकोनॉमी की पद्धतियों को आगे बढ़ाकर, हरित कौशल एवं पर्यावरणीय जागरूकता को बढ़ावा देकर, संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीक को अपनाकर और आपदा से निपटने की क्षमता को मज़बूत करके देश ने अपनी  आंतरिक क्षमताओं में सुधार किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भारत ने अपने प्रमुख जलवायु लक्ष्यों को निर्धारित समय सीमा से कई वर्ष पहले पूरा करके और अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए), वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड (ओएसओडब्लूओजी), आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन (सीडीआरआई), मिशन लाइफ (पर्यावरण के लिए जीवनशैली) और इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (आईबीसीए) जैसे वैश्विक अभियानों का नेतृत्व करके तथा प्रमुख पर्यावरणीय शिखर सम्मेलनों की सफल मेजबानी करके अपनी वैश्विक विश्वसनीयता को सुदृढ़ किया है। यह संपूर्ण प्रयास नीतिगत महत्वाकांक्षा और व्यावहारिक परिणामों के बीच के मजबूत और सटीक सामंजस्य को प्रदर्शित करता है।

 

भारत के हरित परिवर्तन के तीन स्तंभ

पिछले बारह वर्षों में, भारत ने 'विश्वास', 'निर्माण' और 'जन कल्याण' के सिद्धांतों से प्रेरित होकर एक व्यापक पर्यावरणीय परिवर्तन की दिशा में काम किया है। सरकार ने यह पहचान लिया है कि आर्थिक विकास, सार्वजनिक कल्याण और दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुदृढ़ता के लिए पर्यावरण संरक्षण महत्वपूर्ण है। जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन, संसाधनों पर दबाव और पर्यावरण का असंतुलन बढ़ रहा है, भारत ने एक ऐसा संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है जो संरक्षण, स्थायित्व और विकास को आपस में जोड़ता है।

इस अवधि के दौरान, निरंतर नीतिगत उपायों और संस्थागत सुधारों के माध्यम से पर्यावरण नीति-निर्धारण को काफी मजबूत किया गया है। सरकार ने सर्कुलर इकोनॉमी के तौर-तरीकों को आगे बढ़ाया है, हरित कौशल और पर्यावरण के प्रति जागरूकता को बढ़ावा दिया है तथा पर्यावरण संरक्षण में अधिक जनभागीदारी को प्रोत्साहित किया है। प्रौद्योगिकी-सक्षम प्रणालियों और विज्ञान-आधारित योजना ने पारदर्शिता, निगरानी और कार्यान्वयन की प्रभावशीलता में सुधार किया है।

सामूहिक रूप से, इन प्रयासों ने भारत की पारिस्थितिक क्षमता को मजबूत किया है, सतत विकास के लिए राष्ट्रीय क्षमता का विस्तार किया है और वैश्विक विश्वसनीयता को बढ़ाया है, जो भारत के हरित परिवर्तन के तीन स्तंभों का निर्माण करते हैं। साथ मिलकर, ये स्तंभ अधिक मजबूत इकोसिस्टम, सतत विकास के लिए मजबूत संस्थागत और तकनीकी तैयारी तथा वैश्विक पर्यावरण नीति-निर्धारण  में भारत की अधिक प्रभावशाली भूमिका की ओर एक प्रणालीगत बदलाव को दर्शाते हैं। इस एकीकृत दृष्टिकोण ने न केवल घरेलू पर्यावरणीय स्थिति में सुधार किया है, बल्कि भारत को सामूहिक जलवायु कार्रवाई और सततता को आगे बढ़ाने में एक विश्वसनीय और जिम्मेदार नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित किया है।

 

स्तंभ 1: सुदृढ़ भारत के लिए पर्यावरणीय सामर्थ्य और जैव विविधता का संवर्धन

दीर्घकालिक पर्यावरणीय सुरक्षा और जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए प्रकृति की क्षमता को मजबूत करना बेहद जरूरी है। हमारे वन, नदियां, आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स), तटीय इलाके और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास न केवल हमारी आजीविका का जरिया हैं, बल्कि हमारे प्राकृतिक संसाधनों की नींव भी हैं। ये हमें जलवायु और पर्यावरणीय संकटों से सुरक्षित रखते हैं। पिछले बारह वर्षों में, भारत ने प्राकृतिक आवासों को सुधारने, जीवों के संरक्षण और बड़े स्तर पर संरक्षण कार्यों के जरिए अपनी पर्यावरणीय क्षमता को बढ़ाया है। इन प्रयासों से पर्यावरण में सुधार हो रहा है, जैव विविधता बढ़ रही है और भारत अधिक मजबूत बन रहा है।

  1. हरियाली का विस्तार: वन क्षेत्रों का नया कायाकल्प

वन भारत की सबसे मूल्यवान प्राकृतिक संपत्तियों में से हैं। ये जैव विविधता को सहारा देते हैं, जल चक्र को नियंत्रित करते हैं, कार्बन का भंडारण करते हैं और लाखों लोगों की आजीविका को बनाए रखते हैं। जलवायु संकट से निपटने की क्षमता और सतत विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को पहचानते हुए, सरकार ने हरित आवरण का विस्तार करने, पर्यावरण प्रणाली को पुनर्जीवित करने और व्यापक स्तर पर संरक्षण को मजबूत करने के लिए निरंतर प्रयास किए हैं।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का 'ग्रीन इंडिया मिशन' (जीआईएम) वनों को बचाने और प्रकृति को फिर से हरा-भरा बनाने के लिए चलाई जा रही एक प्रमुख योजना है। वर्ष 2015-16 में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य पर्यावरण को मजबूत बनाना और जलवायु परिवर्तन के खतरों से लड़ना है। मार्च 2026 तक, इसके लिए पूरे देश के राज्यों को ₹1019.26 करोड़ की धनराशि जारी की जा चुकी है।

यह मिशन वनों की गुणवत्ता सुधारने और कार्बन सोखने की क्षमता को बढ़ाने में काफी मददगार साबित हुआ है। इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (आईएसएफआर) 2023 के अनुसार, भारत का कुल वन और वृक्ष आवरण 8.27 लाख वर्ग किमी है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17 प्रतिशत है। इसमें से अकेले वन क्षेत्र 7.15 लाख वर्ग किमी (21.76 प्रतिशत) है, जबकि वृक्षों का आवरण 1.12 लाख वर्ग किमी (3.41 प्रतिशत) में फैला है। वर्तमान में भारत के वनों में 30.43 अरब टन कार्बन स्टॉक जमा है, जो जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए देश की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संपत्तियों में से एक है।

हरित आवरण को बढ़ाने के लिए अन्य प्रमुख पहल निम्नलिखित हैं:

  • प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (सीएएमपीए): वनों के पुनरुद्धार और पारिस्थितिक संरक्षण को मजबूत करने के लिए 'क्षतिपूरक वनीकरण कोष अधिनियम, 2016' के तहत इसकी स्थापना की गई है।
  • वित्तीय वर्ष 2020-21 से 2024-25 के दौरान, भारत में कैम्पा निधि के माध्यम से 3.20 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में प्रतिपूरक वनीकरण का कार्य संपन्न किया गया है। इसके साथ ही, देश भर में वन-प्रबंधन और वनीकरण प्रबंधन को तकनीक से जोड़ने के उद्देश्य से जीआईएस-आधारित निगरानी प्रणाली, डिजिटल वार्षिक कार्य योजनाएँ और 'हरित-संकल्प' जैसे आधुनिक प्लेटफॉर्म शुरू किए गए हैं।
  • राष्ट्रीय पुनर्वनीकरण और पारिस्थितिकी विकास बोर्ड वर्ष 2020 से 'नगर वन योजना' (एनवीवाय) का कार्यान्वयन कर रहा है, जिसके तहत वर्ष 2020-21 से 2026-27 की अवधि के दौरान देश में 1000 नगर वन/वाटिकाएँ विकसित करने की परिकल्पना की गई है। 
  • 31 मार्च 2026 तक, राष्ट्रीय प्राधिकरण द्वारा 626 नगर वनों/वाटिकाओं के विकास के लिए 557.62 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई है।
  • अरावली ग्रीन वॉल परियोजना: इसका उद्देश्य राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली में खराब हो चुके भू-भागों को पुनर्जीवित करना है। इस पहल के तहत 6.31 मिलियन हेक्टेयर भूमि के जीर्णोद्धार का लक्ष्य रखा गया है।
  • इस कार्यक्रम के तहत 435 नर्सरियां स्थापित की गई हैं, जिनकी कुल क्षमता 393.24 लाख पौधे तैयार करने की है। केवल वर्ष 2025 में ही लगभग 36,025 हेक्टेयर क्षेत्र को पुनर्जीवित किया गया है।

क्या आप जानते हैं?

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 2024 में "एक पेड़ मां के नाम" अभियान की शुरुआत की थी, जो आज दुनिया के सबसे बड़े जन-पर्यावरण अभियानों में से एक बन गया है। इस अभियान में सरकार और समाज, दोनों ने मिलकर काम किया है। दिसंबर 2025 तक, इस अभियान के तहत कुल 262.4 करोड़ पौधे लगाए जा चुके हैं। इन पौधों की जानकारी 'मेरी लाइफ' (Meri LiFE) पोर्टल पर डिजिटल तरीके से दर्ज की गई है। इस पहल ने पर्यावरण को बचाने के काम को हमारी संस्कृति और मां के प्रति प्रेम की भावना से जोड़ दिया है, जिससे लोग बड़ी संख्या में पर्यावरण सुरक्षा के लिए आगे आए हैं।

ये उपलब्धियां पर्यावरण को फिर से जीवंत करने और वनों के स्थायी प्रबंधन के प्रति सरकार की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। भारत अपनी हरियाली और प्राकृतिक कार्बन सिंक को बढ़ाकर न केवल पर्यावरण की क्षमता को मजबूत कर रहा है, बल्कि अपने जलवायु और सतत विकास के लक्ष्यों की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

  1. नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को बहाल करना

 

जल प्रदूषण, पर्यावरण के बिगड़ते स्तर का कारण भी है और परिणाम भी। यह एक विनाशकारी चक्र तैयार करता है, जो जलीय जैव-विविधता को कम करता है, खाद्य श्रृंखला को दूषित करता है और पर्यावरण की प्राकृतिक रूप से स्वयं को साफ करने की क्षमता को कमजोर कर देता है।

इस चुनौती से निपटने के लिए, जून 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम को एक प्रमुख नदी कायाकल्प मिशन के रूप में शुरू किया गया था। यह कार्यक्रम गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के प्रदूषण को कम करने और उनके प्राकृतिक स्वास्थ्य को बहाल करने का प्रयास करता है। यह कार्यक्रम मुख्य रूप से सीवेज ट्रीटमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर, औद्योगिक अपशिष्ट नियंत्रण, रिवरफ्रंट और घाटों के विकास, जैव-विविधता संरक्षण, वनीकरण और जनभागीदारी को मजबूत करने पर केंद्रित है। इसे ₹20,000 करोड़ के शुरुआती बजट के साथ शुरू किया गया था और अब चरण-II के तहत मार्च 2026 तक ₹22,500 करोड़ के अतिरिक्त बजट के साथ इसका विस्तार किया गया है, जो नदी के दीर्घकालिक कायाकल्प और सतत जल प्रबंधन प्रयासों को और सुदृढ़ करता है।

 

महत्वपूर्ण उपलब्धियां:

  • नदी कायाकल्प: फरवरी 2026 तक, ₹43,030 करोड़ की लागत वाली 524 परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं, जिनमें से लगभग 355 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त, कार्यक्रम की शुरुआत से लेकर अब तक ₹21,340 करोड़ की राशि जारी की जा चुकी है, जो नदी पुनरुद्धार के प्रति निरंतर निवेश को दर्शाता है।
  • सीवेज उपचार और प्रदूषण नियंत्रण इंफ्रास्ट्रक्चर: प्रदूषित नदी क्षेत्रों के उपचार के लिए ₹35,698 करोड़ की लागत से कुल 218 सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं (एसटीपी) शुरू की गई हैं, जिनकी संयुक्त शोधन क्षमता 6,610 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) है। इनमें से 3,977 एमएलडी क्षमता वाले 138 एसटीपी पूरे कर लिए गए हैं और उन्हें कार्यात्मक बना दिया गया है।
  • औद्योगिक प्रदूषण स्तर: औद्योगिक बीओडी लोड वर्ष 2017 में 26 टीपीडी (टन प्रतिदिन) से घटकर 2024 में 10.75 टीपीडी रह गया है। इसी अवधि के दौरान, औद्योगिक अपशिष्ट जल का निकास 349 एमएलडी से घटकर 265.56 एमएलडी हो गया है।

 

  • गंगा बेसिन में पर्यावरण संरक्षण और वनीकरण: कार्यक्रम के तहत लगभग 33,024 हेक्टेयर क्षेत्र में वनीकरण कार्य किया गया है, जिस पर 414 करोड़ का व्यय हुआ है। इसके अतिरिक्त, कार्यक्रम के अंतर्गत 7 जैव-विविधता पार्क और 5 प्राथमिकता वाले आर्द्रभूमि स्थल विकसित करने की स्वीकृति दी गई है।
  • जैव-विविधता संरक्षण: जलीय जैव-विविधता को मजबूत करने और मछुआरों की आजीविका को सहारा देने के लिए लगभग 203 लाख इंडियन मेजर कार्प (आईएमसी) फिंगरलिंग्स छोड़ी गई हैं। सर्वेक्षणों में 22 नदियों में 3,037 घड़ियालों की गणना की गई है, जबकि गंगा डॉल्फिन सर्वेक्षण 28 नदियों में 8,507 किलोमीटर के दायरे में किया गया, जिसमें डॉल्फिन की अनुमानित संख्या 6,327 है।

 

क्या आप जानते हैं?

15 अगस्त 2020 को शुरू किया गया 'प्रोजेक्ट डॉल्फिन' ने अपनी पहली अखिल-व्यापी डॉल्फिन जनसंख्या का आकलन पूरा कर लिया है। साथ ही, इसने वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत गंगा डॉल्फिन और सिंधु डॉल्फिन को अलग-अलग प्रजातियों के रूप में मान्यता देकर उन्हें मजबूत कानूनी सुरक्षा प्रदान की है। यह पहल दुर्लभ "इरावदी डॉल्फिन" के संरक्षण का भी समर्थन करती है, जो भारत में विशेष रूप से चिल्का झील के लिए जानी जाती है। इसके अलावा, इसमें चंबल नदी में 200 किलोमीटर का 'डॉल्फिन संरक्षण क्षेत्र' बनाने और 'डिक्लेरेशन फॉर रिवर डॉल्फिन' जैसे वैश्विक प्रयासों में भागीदारी जैसे प्रस्ताव भी शामिल हैं।

 

नमामि गंगे कार्यक्रम" नदी कायाकल्प के प्रति एक समग्र और विज्ञान-आधारित दृष्टिकोण का प्रदर्शन करता है, जिसमें बुनियादी ढांचे के विकास को प्रकृति के कायाकल्प के साथ एकीकृत किया गया है। इसके मापन योग्य परिणाम प्रदूषण नियंत्रण से आगे बढ़कर संपूर्ण बेसिन की दीर्घकालिक स्थिरता की दिशा में एक निर्णायक बदलाव को दर्शाते हैं। सामूहिक रूप से, ये प्रयास गंगा के जैव-पारिस्थितिक स्वरूप को बहाल करने के साथ-साथ आजीविका और पर्यावरणीय स्थिरता को भी सुदृढ़ कर रहे हैं।

  1. पर्यावरणीय जीवन-रेखा: आर्द्रभूमि का संरक्षण

आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) पृथ्वी के सबसे उत्पादक और पर्यावरणीय रूप से महत्वपूर्ण प्राकृतिक परिवेश में से हैं। इनमें झीलें, दलदल, बाढ़ के मैदान, मैंग्रोव और तटीय लैगून शामिल हैं, जो पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आर्द्रभूमि भूजल को पुनर्भरण करती हैं, पानी की गुणवत्ता में सुधार करती हैं, बाढ़ के जोखिम को कम करती हैं, समृद्ध जैव-विविधता का समर्थन करती हैं और जलवायु के प्रति सहनक्षमता को बढ़ाती हैं। वे कृषि, मत्स्य पालन और करोड़ों लोगों की आजीविका का भी मुख्य आधार हैं।

आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) के पर्यावरणीय और आर्थिक महत्व को पहचानते हुए, भारत सरकार ने 2013 में शुरू की गई 'जलजीव पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय योजना' (एनपीसीए) के माध्यम से आर्द्रभूमि संरक्षण को सुदृढ़ किया है। यह कार्यक्रम आर्द्रभूमि के एकीकृत संरक्षण और कायाकल्प को बढ़ावा देता है, जिसका मुख्य उद्देश्य जल की गुणवत्ता, जैव-विविधता और समग्र पर्यावरणीय स्वास्थ्य में सुधार करना है। संरक्षण उपायों को और अधिक सशक्त बनाने के लिए, सरकार ने 'आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017' अधिसूचित किए। ये नियम अतिक्रमण, अनुपचारित अपशिष्टों के निर्वहन और ठोस कचरा फेंकने जैसी गतिविधियों को प्रतिबंधित करते हैं, जो देश भर में आर्द्रभूमि के संरक्षण और स्थायी प्रबंधन के लिए एक मजबूत विनियामक ढांचा प्रदान करते हैं।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान आर्द्रभूमि संरक्षण के प्रयासों का दायरा काफी बढ़ा है। अगस्त 2018 तक, एनपीसीए के अंतर्गत 24 राज्यों और 1 केंद्र शासित प्रदेश में 148 चिह्नित आर्द्रभूमि और झीलें शामिल थीं। केंद्र सरकार ने संरक्षण गतिविधियों के समर्थन के लिए ₹893.69 करोड़ जारी किए थे। वर्ष 2022 तक, कार्यक्रम का कवरेज बढ़कर 164 आर्द्रभूमि तक हो गया और संचयी निधि ₹1,066.43 करोड़ तक पहुंच गई। यह विस्तार 2023 में भी जारी रहा, जब कार्यक्रम के तहत 42 रामसर स्थलों सहित कुल 165 आर्द्रभूमि को स्वीकृति प्रदान की गई। तब तक, कुल वित्तीय आवंटन बढ़कर ₹1,088.85 करोड़ हो गया, जो आर्द्रभूमि संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन में निरंतर निवेश को दर्शाता है।

इन प्रयासों ने देश भर में आर्द्रभूमि संरक्षण, पारिस्थितिक कायाकल्प और दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता को काफी अधिक गहरा और मजबूत किया है।

 

क्या आप जानते हैं?

रामसर स्थल वे आर्द्रभूमि हैं जिन्हें 'रामसर कन्वेंशन' के तहत मान्यता प्राप्त है। यह 1971 में ईरान के रामसर शहर में आर्द्रभूमि के संरक्षण और उनके स्थायी उपयोग के लिए अपनाई गई एक अंतरराष्ट्रीय संधि है। ये आर्द्रभूमि जैव-विविधता, जल सुरक्षा, जलवायु अनुकूलन क्षमता और आजीविका के दृष्टिकोण से पर्यावरणीय रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। भारत में 2014 तक केवल 26 रामसर स्थल थे। अप्रैल 2026 तक इनकी संख्या बढ़कर 99 हो गई है, जो आर्द्रभूमि संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के प्रति भारत की दृढ़ प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

 

  1. मैंग्रोव संरक्षण: एक पर्यावरणीय अनिवार्यता

 

मैंग्रोव वन खारे पानी वाले वन-जंगल हैं, जो उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय तटीय रेखाओं के किनारे पाए जाते हैं। ये तटीय क्षेत्रों को चक्रवातों, कटाव, समुद्री तूफानों और समुद्र के बढ़ते जलस्तर से सुरक्षा प्रदान करते हैं। मैंग्रोव कार्बन को संचित करने, समुद्री जैव-विविधता को समर्थन देने और मछुआरा समुदायों की आजीविका को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

भारत ने मैंग्रोव को बढ़ावा देने और संरक्षण हेतु एक समर्पित पहल-मिष्टी (एमआईएसएचटीआई - मैंग्रोव इनिशिएटिव फॉर शोरलाइन हैबिटेट्स एंड टैंगेबल इनकम्स) के माध्यम से मैंग्रोव के कायाकल्प में तेजी लाई है, जिसके लिए ₹100 करोड़ का प्रारंभिक परिव्यय निर्धारित किया गया है।

इस पहल की सफलता भारत के मैंग्रोव आवरण क्षेत्र के निरंतर विस्तार में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। भारत का मैंग्रोव आवरण 2013 में 4,628 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 2023 में 4,992 वर्ग किलोमीटर हो गया है। यह 363 वर्ग किलोमीटर की शुद्ध वृद्धि को दर्शाता है, जिससे तटीय अनुकूलन-क्षमता और प्राकृतिक कवच और अधिक सुदृढ़ हुई है।

5. ब्लू होराइजन: भारत की 7,500 किमी लंबी समुद्री सीमा

 

तटीय प्रणालियों में समुद्र तटमुहाने, रेत के टीले, प्रवाल पारिस्थितिकी तंत्र और तटीय जल शामिल हैं। ये मत्स्य पालन, पर्यटन, व्यापार, जैव-विविधता और समुद्री आजीविका का समर्थन करते हैं। भारत की 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा आर्थिक विकास और जलवायु के प्रति अनुकूलन-क्षमता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्वस्थ तटीय पारिस्थितिकी तंत्र कटाव, समुद्री तूफानों और समुद्र के बढ़ते जलस्तर से सुरक्षा भी प्रदान करते हैं।

वर्ष 2014 से, सरकार ने राष्ट्रीय तटीय मिशन के माध्यम से तटीय संरक्षण को सुदृढ़ किया है। यह मिशन स्थायी तटीय प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन पर केंद्रित है। तटीय विनियमन क्षेत्र (सीआरजेड) अधिसूचना, 2019 के माध्यम से तटीय प्रबंधन को और अधिक सशक्त बनाया गया है। यह ढांचा विज्ञान-आधारित नियोजन को बढ़ावा देता है और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। साथ ही, यह मछुआरा और तटीय समुदायों की आजीविका को भी सुरक्षित करता है। अपडेटेड तटीय क्षेत्र प्रबंधन योजनाओं (सीजेडएमपी) ने विनियमन और निगरानी प्रणाली को और मजबूत किया है। वर्ष 2017 में, एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन परियोजना के अंतर्गत एक पायलट बीच विकास कार्यक्रम शुरू किया गया था। यह कार्यक्रम स्वच्छता, पर्यावरण प्रबंधन, सुरक्षा मानकों और स्थायी पर्यटन पर केंद्रित था। इन प्रयासों को निरंतर जारी रखने के लिए, ₹767 करोड़ के आवंटन के साथ राष्ट्रीय तटीय मिशन को 2025-31 तक के लिए विस्तारित किया गया है।

 

क्या आप जानते हैं?

'ब्लू फ्लैग  सर्टिफ़िकेशन', फाउंडेशन फॉर एनवायर्नमेंटल एजुकेशन (डेनमार्क) द्वारा प्रदान किया जाने वाला एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त इको-लेबल है। यह प्रमाणन उन तटों को प्रदान किया जाता है जो जल की गुणवत्ता, पर्यावरण प्रबंधन, सुरक्षा, स्वच्छता और स्थायी पर्यटन प्रथाओं से संबंधित 33 कठोर मानदंडों को पूरा करते हैं।

 

भारत के तटीय संरक्षण प्रयासों के उल्लेखनीय परिणाम सामने आए हैं। देश के पहले आठ तटों को वर्ष 2020 में 'ब्लू फ्लैग' प्रमाणन प्राप्त हुआ। यह संख्या 2021-22 में बढ़कर 10, 2022-23 में 12, 2024-25 में 13 और 2025-26 में 18 हो गई है। ये प्रमाणित तट सात तटीय राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों में फैले हुए हैं। यह उपलब्धि स्थायी तटीय पर्यटन, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और विश्व-स्तरीय तट प्रबंधन प्रथाओं के प्रति भारत की बढ़ती प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

 

क्या आप जानते हैं?

वर्ष 2021 में शुरू की गई 'राष्ट्रीय समुद्री कछुआ कार्य योजना', भारत की तटरेखा के साथ समुद्री कछुओं और उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण के लिए एक समन्वित ढांचा प्रदान करती है। इन प्रयासों के हिस्से के रूप में, लगभग 7,979 कछुओं के अंडों से निकले बच्चों को सुरक्षित रूप से समुद्र में छोड़ा गया, जिसमें 96.7 प्रतिशत की प्रभावशाली 'हैचिंग सफलता दर' दर्ज की गई, जो स्वस्थ तटीय और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को दर्शाती है। यह पहल नेस्टिंग बीचेस वाले तटों के संरक्षण को बढ़ावा देती है, 'बायकैच' और जाल में फंसने जैसी समस्याओं को कम करती है तथा वैज्ञानिक निगरानी और अनुसंधान को सुदृढ़ करती है। साथ ही, यह वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत सभी पांच प्रजातियों के समुद्री कछुओं को प्राप्त कानूनी सुरक्षा को भी पूरक बनाती है। यह पहल तटीय प्रणालियों को सुदृढ़ करने और समुद्री स्थिरता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को आगे बढ़ा रही है।

 

  1. संकटग्रस्त वन्यजीव प्रजातियों हेतु एकीकृत संरक्षण रणनीति

 

भारत का वन्यजीव संरक्षण उत्कृष्ट पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और संरक्षित भू-भागों के विस्तार को दर्शाता है। प्रमुख प्रजातियों के संरक्षण हेतु चलाए जा रहे कार्यक्रम विज्ञान-आधारित और समुदाय-समर्थित सफलता को प्रदर्शित करते हैं। वन्यजीवों की स्वस्थ आबादी बेहतर प्रबंधन, निगरानी और विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्रों में आवास बहाली के प्रयासों को इंगित करती है।

 

  •  प्रोजेक्ट टाइगर: वर्ष 1973 में शुरू किया गया 'प्रोजेक्ट टाइगर', देश का प्रमुख वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम बना हुआ है। वर्ष 2014 से 2025 के बीच, इस पहल ने 'राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण' (एनटीसीए) के माध्यम से आवास सुरक्षा, वैज्ञानिक निगरानी और समुदाय-आधारित संरक्षण को मजबूत किया है। इस अवधि के दौरान, अखिल भारतीय बाघ गणना के अनुसार, बाघ अभयारण्यों की संख्या 46 से बढ़कर 58 हो गई, जबकि बाघों की आबादी 2014 के 2,226 से बढ़कर 2022 में 3,682 हो गई। वर्ष 2026 तक बाघ अभयारण्यों के अंतर्गत आने वाला क्षेत्रफल लगभग 85,000 वर्ग किलोमीटर तक विस्तारित हो गया है और दिसंबर 2023 तक 23 अभयारण्यों ने CA|TS मान्यता हासिल कर ली है। आज, भारत दुनिया के 70 प्रतिशत से अधिक जंगली बाघों का संरक्षण कर रहा है, जो वैश्विक संरक्षण नेतृत्व में भारत की अग्रणी भूमिका को रेखांकित करता है।

  • प्रोजेक्ट चीता: 17 सितंबर 2022 को शुरू किया गया 'प्रोजेक्ट चीता', दुनिया का पहला अंतरमहाद्वीपीय बड़े जंगली मांसाहारी जीव का स्थानांतरण है और भारत के घास के मैदानों के इकोसिस्टम को बहाल करने की एक ऐतिहासिक पहल है। अपनी शुरुआत के बाद से, नामीबिया (सितंबर 2022 में 8), दक्षिण अफ्रीका (फरवरी 2023 में 12) और बोत्सवाना (फरवरी 2026 में 9) से कुल 29 चीते भारत लाए गए हैं। देश में चीतों की कुल संख्या अब 57 तक पहुँच गई है, जिसमें 37 भारत में जन्मे चीते शामिल हैं, जो एक महत्वपूर्ण संरक्षण उपलब्धि को रेखांकित करता है।

  • प्रोजेक्ट लायन: अगस्त 2020 में घोषित, प्रोजेक्ट लायन गुजरात के एशियाई शेरों के परिदृश्य में आवास कायाकल्प, संरक्षित गलियारा और वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए एक दीर्घकालिक ढांचा प्रदान करता है। यह पहल एशियाई शेरों की उल्लेखनीय वृद्धि पर आधारित है। वर्ष 2015 के 523 की तुलना में 2025 में शेरों की संख्या 70 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 891 हो गई है, जबकि उनका दायरा लगभग 59 प्रतिशत तक विस्तृत हो गया है। इन संरक्षण प्रयासों ने उनके आवासों और वन्यजीव गलियारों को और अधिक सुदृढ़ किया है।

  • तेंदुआ: तेंदुए भारत के वन इकोसिस्टम में एक प्रमुख मांसाहारी जीव हैं और अक्सर बाघों के साथ सह-अस्तित्व में रहते हैं। इनके संरक्षण को केंद्र प्रायोजित योजना "वन्यजीव आवास का विकास" और प्रोजेक्ट टाइगर के तहत एकीकृत लैंडस्केप प्रबंधन के माध्यम से समर्थन दिया जाता है। 'भारत में तेंदुओं की स्थिति 2022' रिपोर्ट के अनुसार, तेंदुओं की अनुमानित संख्या 2018 के 12,852 से बढ़कर 13,874 हो गई है, जो 1.08 प्रतिशत की औसत वार्षिक वृद्धि दर को दर्शाती है। मध्य भारत और पूर्वी घाट में इनकी आबादी स्थिर है या बढ़ रही है, जबकि शिवालिक पहाड़ियों और गंगा के मैदानी इलाकों में स्थानीय स्तर पर गिरावट दर्ज की गई है। इनकी निगरानी का समन्वय 'राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण' (एनटीसीए) और 'भारतीय वन्यजीव संस्थान' (डब्ल्यूआईआई) द्वारा आवधिक राष्ट्रीय आकलन के माध्यम से किया जाता है, जिससे आवास संरक्षण, संघर्ष कम करने और बहु-उपयोग वाले लैंडस्केप में सह-अस्तित्व को मज़बूती मिलती है।.

इसके अतिरिक्त, भारत सरकार हिम तेंदुए को ऊँचे हिमालयी क्षेत्र की एक प्रमुख प्रजाति के रूप में मान्यता देती है। इनके संरक्षण को 'प्रोजेक्ट स्नो लेपर्ड' और 'राष्ट्रीय हिम तेंदुआ पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण प्राथमिकताओं' द्वारा निर्देशित किया जाता है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के सहयोग और वैश्विक पर्यावरण सुविधा (जीईएफ) की सहायता से अक्टूबर 2017 में शुरू की गई 'सिक्योर हिमालय' (आजीविका, संरक्षण, सतत उपयोग और उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली को सुरक्षित करना) परियोजना, मुख्य रूप से पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण और आजीविका के अवसरों पर केंद्रित है।

भारत में हिम तेंदुओं की प्रथम जनसंख्या गणना (2019–2023) के अंतर्गत 1,20,000 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र और संभावित आवास के 70 प्रतिशत से अधिक भाग को कवर किया गया है। इस आकलन के अनुसार, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और जम्मू-कश्मीर में कुल 718 हिम तेंदुए मौजूद हैं। दीर्घकालिक निगरानी और संरक्षण नियोजन को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए 'SPAI 2.0' (हिम तेंदुआ जनसंख्या आकलन 2.0) की शुरुआत की गई है।

 

  • प्रोजेक्ट एलीफेंट: प्रोजेक्ट एलीफेंट, जंगली एशियाई हाथियों, उनके पर्यावास और प्रवास गलियारों के संरक्षण के लिए भारत सरकार का एक प्रमुख कार्यक्रम है। भारत वर्तमान में वैश्विक जंगली एशियाई हाथी आबादी का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा संरक्षित करता है। वर्ष 2014 के बाद से, इस कार्यक्रम को 'प्रथम डीएनए-आधारित समकालिक अखिल भारतीय हाथी गणना' (2021–25) के माध्यम से और अधिक सुदृढ़ किया गया है। इसने एक मानकीकृत, विज्ञान-आधारित जनसंख्या आकलन ढांचा स्थापित किया है, जिसके अनुसार भारत में जंगली हाथियों की संख्या 22,446 आंकी गई है। वर्ष 2014 में हाथी अभयारण्यों की संख्या 26 थी, जो 2025–26 में बढ़कर 33 हो गई है, जबकि गलियारों की संख्या 88 (2010 की 'गज' रिपोर्ट) से बढ़कर 2023 में 150 हो गई है।
  • एक सींग वाला गैंडा: 'भारतीय एक-सींग वाले गैंडे के लिए राष्ट्रीय संरक्षण रणनीति 2019', आबादी के विस्तार, आनुवंशिक सुरक्षा, पर्यावास कनेक्टिविटी, स्थानांतरण और जलवायु-अनुकूल प्रबंधन के लिए एक दीर्घकालिक ढांचा प्रदान करती है। इस रणनीति के मार्गदर्शन में, वन विभागों और स्थानीय समुदायों के समन्वित प्रयासों ने 1980 के दशक के बाद से गैंडों की संख्या में लगभग 170 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है। सितंबर 2024 तक इनकी संख्या 1,500 से बढ़कर 4,000 से अधिक हो गई है, जिससे भारत 'विज्ञान-आधारित' और 'समुदाय-समर्थित' विशाल शाकाहारी वन्यजीव संरक्षण के लिए एक वैश्विक मॉडल बन गया है।.

भारत का संरक्षण मॉडल, प्रजाति संवर्धन को परिदृश्य-स्तरीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रबंधन के साथ एकीकृत करता है। निरंतर नीतिगत समर्थन और डेटा-आधारित निगरानी दीर्घकालिक जैव विविधता लचीलेपन को सुनिश्चित करते हैं। ये प्रयास भारत को वन्यजीव संरक्षण परिणामों में एक वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करते हैं।

स्तंभ 2: सतत परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय क्षमता का विस्तार

पर्यावरणीय प्रगति का आधार उसे बनाए रखने और उसके विस्तार की क्षमता पर निर्भर करता है। पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करने के लिए मजबूत संस्थान, वैज्ञानिक ज्ञान, कुशल नागरिक और आधुनिक प्रणालियाँ अनिवार्य हैं। पिछले बारह वर्षों में, भारत ने सुधारों, नवाचार और प्रौद्योगिकी-संचालित प्रबंधन के माध्यम से अपनी इस क्षमता को सशक्त किया है। देश ने अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों, ग्रीन स्किल्स, अनुसंधान क्षमताओं और आपदा तैयारियों का विस्तार किया है। ये सभी प्रयास मिलकर सतत विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर रहे हैं।

 

  1. ठोस अपशिष्ट प्रबंधन: एक संकट को अवसर में परिवर्तित करना

वर्ष 2014 में भारत एक गंभीर ठोस अपशिष्ट संकट का सामना कर रहा था। शहर अपशिष्ट के बोझ से दबे हुए थे, डंपसाइट्स भर चुके थे और मुश्किल से 17 प्रतिशत कचरे का ही वैज्ञानिक रूप से प्रसंस्करण हो पा रहा था। बारह वर्षों के अंतराल में यह परिदृश्य पूरी तरह से बदल चुका है। मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी, बायो-मेथेनेशन संयंत्रों और वेस्ट-टू-एनर्जी इकाइयों के बढ़ते नेटवर्क के कारण, ठोस अपशिष्ट प्रसंस्करण क्षमता 2014 के 17 प्रतिशत से बढ़कर 2024 तक 77 प्रतिशत से अधिक हो गई है। आज भारत के शहरी क्षेत्रों में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले 1,59,109 टन नगरपालिका ठोस अपशिष्ट में से 1,29,206 टन कचरे का प्रसंस्करण किया जा रहा है।  

सरकार ने साथ ही साथ भारत के उस विषाक्त बोझ पर भी ध्यान केंद्रित किया, जो दशकों से जमा हुए हजारों अवैज्ञानिक डंपसाइट्स (कूड़े के ढेर) के रूप में मौजूद थी। बायोमाइनिंग और बायोरिमेडिएशन के माध्यम से, 29 राज्यों के 1,048 शहरों में 1,138 डंपसाइट्स को पूरी तरह से ठीक कर दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप 877 लाख मीट्रिक टन पुराने कचरे को हटाया गया है और 7,646 एकड़ भूमि को पुनः प्राप्त किया गया है। इस मिशन को पूर्ण करने के उद्देश्य से, नवंबर 2025 में 'डंपसाइट रिमेडिएशन एक्सेलेरेटर प्रोग्राम' (डीआरएपी) की शुरुआत की गई, जिसका लक्ष्य अक्टूबर 2026 तक भारत को जीरो डंपसाइट वाला राष्ट्र बनाना है।

विनियामक मोर्चे पर, 'ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026' ने 2016 के नियमों का स्थान ले लिया है। ये नए नियम अपशिष्ट के चार-स्तरीय स्रोत पृथक्करण को अनिवार्य बनाते हैं: गीला, सूखा, सैनिटरी और  विशिष्ट श्रेणी अपशिष्ट तथा अपशिष्ट प्रबंधन के सभी चरणों की ऑनलाइन ट्रैकिंग को परिचालन में लाते हैं। यह स्वीकार करते हुए कि थोक अपशिष्ट उत्पन्न करने वाले कुल ठोस कचरे का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा हैं, इन नियमों में विस्तारित थोक अपशिष्ट उत्पादक दायित्व (ईबीडब्ल्यूजीआर) को पेश किया गया है, जो बड़े प्रतिष्ठानों को उनके कचरे के लिए सीधे तौर पर जवाबदेह बनाता है। सीमेंट संयंत्रों सहित विभिन्न उद्योगों के लिए अब ठोस ईंधन के स्थान पर 'रिफ्यूज्ड डिराइव्ड फ्यूल' (आरडीएफ) का उपयोग करना अनिवार्य है, जिसके तहत प्रतिस्थापन दर को छह वर्षों में 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत किया जाएगा, जिससे कचरे को ऊर्जा संसाधन में परिवर्तित किया जा सके। ये प्रयास भारत के लैंडफिल पर निर्भरता से 'संसाधन-कुशल' और 'अपशिष्ट-से-संसाधन अर्थव्यवस्था' की ओर एक निर्णायक बदलाव को चिह्नित करते हैं।

 

  1. सर्कुलर इकॉनमी की ओर: ईआरपी के माध्यम से एक पूर्ण चक्र

सर्कुलर इकॉनमी उत्पादन और उपभोग का एक ऐसा मॉडल है जो कचरे के सीधे निपटान के बजाय उसके दोबारा इस्तेमाल, रीसाइक्लिंग, मरम्मत और संसाधनों की रिकवरी को बढ़ावा देता है। इसका मकसद प्रदूषण को कम करना, प्राकृतिक संसाधनों को बचाना और सामग्री की कुल दक्षता को बढ़ाना है। एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (ईपीआर) एक ऐसी नीतिगत पहल है जिसके तहत उत्पादकों को उनके उत्पादों के इस्तेमाल के बाद उनके पर्यावरण के अनुकूल प्रबंधन के लिए ज़िम्मेदार बनाया जाता है। इसमें कचरे को इकट्ठा करना, उसकी रीसाइक्लिंग, दोबारा इस्तेमाल और सुरक्षित निपटान शामिल है, जिससे उत्पाद के पूरे जीवनचक्र में जवाबदेही सुनिश्चित होती है।

भारत सरकार ने कई तरह के कचरे को शामिल करते हुए, अलग-अलग सेक्टर के लिए कचरा प्रबंधन नियमों के जरिए सर्कुलर इकॉनमी के फ्रेमवर्क को मज़बूत किया है। इनमें प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम, ई-कचरा (प्रबंधन) नियम, बैटरी कचरा प्रबंधन नियम, बेकार टायरों के लिए ईपीआर फ्रेमवर्क, इस्तेमाल किए हुए तेल के लिए ईपीआर सिस्टम, बेकार हो चुके वाहनों (ईएलवी) का फ्रेमवर्क, निर्माण और तोड़फोड़ से निकले कचरे के नियम, और अलौह स्क्रैप धातुओं के लिए ईपीआर शामिल हैं। ये नियम उत्पादकों की जवाबदेही तय करते हैं और सभी सेक्टरों में व्यवस्थित रीसाइक्लिंग सिस्टम को बढ़ावा देते हैं।

मार्च 2026 तक, भारत ने अपने रीसाइक्लिंग इकोसिस्टम का काफी विस्तार किया है। अलग-अलग तरह के कचरे के लिए 4,574 रजिस्टर्ड रीसाइक्लर मौजूद हैं। कुल 417.57 लाख एमटी कचरे को प्रोसेस किया गया है, जिसमें से 341.93 लाख एमटी कचरा ईपीआर सर्टिफिकेट जारी करने के दायरे में आता है। कैटेगरी के हिसाब से रीसाइक्लिंग का प्रदर्शन इस प्रकार है: प्लास्टिक कचरा: 196.97 लाख एमटी (2,986 रीसाइक्लर), बैटरी कचरा: 69.37 लाख एमटी (520 रीसाइक्लर), टायर कचरा: 122.29 लाख एमटी (579 रीसाइक्लर), ई-कचरा: 28.75 लाख एमटी (386 रीसाइक्लर), और इस्तेमाल किया हुआ तेल: 0.19 लाख एमटी (103 रीसाइक्लर)।

भारत का सर्कुलर इकॉनमी की ओर परिवर्तन, सतत संसाधन प्रबंधन और पर्यावरणीय बोझ में कमी के प्रति एक स्पष्ट झुकाव को प्रदर्शित करता है। ईआरपी (विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व) के विस्तार ने विभिन्न क्षेत्रों में जवाबदेही और पुनर्चक्रण क्षमता को सुदृढ़ किया है। ये घटनाक्रम अपशिष्ट प्रबंधन में भारत की बढ़ती संस्थागत परिपक्वता को दर्शाते हैं। सामूहिक रूप से, ये प्रयास एक संसाधन-कुशल और पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार अर्थव्यवस्था की ओर एक निर्णायक कदम हैं।

 

  1. शिक्षा, जागरूकता एवं हरित कौशल विकास के माध्यम से क्षमता विकास

भारत जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता की हानि और भूमि क्षरण जैसी बढ़ती पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। पर्यावरणीय जागरूकता और ग्रीन स्किल्स को सुदृढ़ करने के लिए, सरकार ने शिक्षा, प्रशिक्षण और सामुदायिक भागीदारी पर केंद्रित कई पहलें कार्यान्वित की हैं।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 'पर्यावरण शिक्षा, जागरूकता और प्रशिक्षण' (ईईएटी) योजना ने 'नेशनल ग्रीन कॉर्प्स' (एनजीसी), 'नेशनल नेचर कैंपिंग प्रोग्राम' (एनएनसीपी) और 'क्षमता विकास कार्यक्रम' (सीबीपी) जैसे कार्यक्रमों को सहायता प्रदान की। 21 राज्यों और 1 केंद्र शासित प्रदेश में लागू इस योजना ने 1 लाख से अधिक इको-क्लबों को बढ़ावा दिया और पर्यावरण अभियानों तथा जागरूकता गतिविधियों के माध्यम से लगभग 5.5 लाख छात्रों को जोड़ा।

इसके अलावा पर्यावरण शिक्षा, जागरूकता, अनुसंधान और कौशल विकास (ईईएआरएसडी) योजना पर्यावरण के प्रति जागरूकता , सतत प्रथाओं और हरित कार्यबल के विकास को बढ़ावा देती है। इसके कार्यक्रमों के तहत, 1.34 करोड़ से अधिक छात्रों ने पर्यावरण शिक्षा की पहलों में भाग लिया, 23 राज्यों में 1.14 लाख इको-क्लब पंजीकृत किए गए, और 4 लाख से अधिक छात्रों ने इको-रचनात्मकता और नवाचार हैकाथॉन के माध्यम से अपने अभिनव विचार प्रस्तुत किए।

  1. वन्यजीव विज्ञान को सुदृढ़ करने एवं साक्ष्य-आधारित संरक्षण हेतु अनुसंधान एवं उन्नत सुविधाएँ:

दिसंबर 2024 में, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वन्यजीव आनुवंशिकी और फॉरेंसिक अनुसंधान को सुदृढ़ करने के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून में 'नेक्स्ट जनरेशन डीएनए सीक्वेंसिंग' सुविधा का उद्घाटन किया। यह सुविधा जनसंख्या अध्ययन, प्रजातियों की पहचान और वन्यजीव अपराध के मामलों में साक्ष्य के लिए हाई-थ्रूपुट आनुवंशिक विश्लेषण को सक्षम बनाती है। राष्ट्रीय वन्यजीव डेटा केंद्र ने 'राष्ट्रीय वन्यजीव सूचना प्रणाली' (एनडब्ल्यूआईएस) को उन्नत किया है, जिसमें संरक्षण योजना और निगरानी के लिए संरक्षित क्षेत्रों, प्रजातियों, आवासों और जैव-भौगोलिक क्षेत्रों के डेटा को एकीकृत किया गया है। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (बीएसआई) और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई) की डिजिटलीकरण पहल, समर्पित डेटाबेस और पोर्टलों के माध्यम से हर्बेरियम और प्राणी संग्रहों को ऑनलाइन सुलभ बना रही है, जिससे भारत के जैव-विविधता ज्ञान का आधार विस्तृत हो रहा है।

  1. अवैध शिकार-रोधी प्रणालियों और प्रवर्तन को सशक्त बनाने हेतु वन्यजीव अपराध नियंत्रण में तकनीकी उपाय:

वर्ष 2014 से, तकनीक-आधारित निगरानी ने अवैध शिकार-रोधी प्रयासों को पूरी तरह बदल दिया है। हॉक (HAWK) जैसे एआई-आधारित सिस्टम कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में भी वास्तविक समय की निगरानी और पूर्वानुमानित विश्लेषण के माध्यम से त्वरित कार्रवाई में बड़ी सहायता प्रदान कर रहे हैं। 'गज सूचना' जैसे मोबाइल प्लेटफॉर्म ने वन्यजीव मामलों में ट्रेसेबिलिटी, रिकॉर्ड-कीपिंग और फॉरेंसिक सहायता को और अधिक प्रभावी बनाया है। वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (डब्ल्यूसीसीबी) ने उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में (2019–2023 के दौरान) 166 संयुक्त अभियानों के माध्यम से कानून लागू करने को सुदृढ़ किया है, जिससे 375 गिरफ्तारियाँ संभव हुई हैं। इसके अतिरिक्त, डब्ल्यूसीसीबी ने राष्ट्रव्यापी स्तर पर संयुक्त वन्यजीव अपराध विरोधी अभियान चलाए हैं और खुफिया अलर्ट जारी किए हैं। साथ ही, सीमा-पार वन्यजीव तस्करी से निपटने के लिए इंटरपोल, सावेन (SAWEN) और साइट्स के साथ सहयोग को और अधिक विस्तार दिया गया है।

  1. आपदाओं के प्रति राष्ट्रीय क्षमता को सशक्त बनाना

भारत ने तैयारी, नियंत्रण, त्वरित प्रतिक्रिया, रिकवरी और क्षमता निर्माण को समाहित करने वाले एक व्यापक दृष्टिकोण के माध्यम से आपदाओं का सामना करने के लिए अपनी राष्ट्रीय क्षमता को काफी मजबूत किया है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (एनडीएमपी) को 2016 में लॉन्च किया गया था और सरकार के सभी स्तरों पर आपदा जोखिम न्यूनीकरण प्रयासों को संरेखित करने के लिए 2019 में इसे संशोधित किया गया। सरकार ने 38 आपदा-विशिष्ट दिशानिर्देश भी जारी किए हैं और उन्नत जोखिम मूल्यांकन उपकरण विकसित किए हैं, जिनमें 'डायनामिक कंपोजिट रिस्क एटलस', बाढ़ जोखिम एटलस और हिमालयी क्षेत्र में 28,000 हिमनद झीलों का डेटाबेस शामिल है। इन पहलों ने वैज्ञानिक नियोजन को बढ़ावा दिया है और जलवायु तथा आपदा-संबंधी जोखिमों के प्रति तैयारियों को और अधिक प्रभावी बनाया है।

तकनीक-संचालित पूर्व चेतावनी प्रणालियों ने देश भर में आपदा से निपटने की क्षमता को और अधिक सशक्त बनाया है। 'कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल' (सीएपी)-आधारित एकीकृत अलर्ट प्रणाली कई मंचों के माध्यम से भू-लक्षित चेतावनियाँ प्रदान करती है और अब तक 4,500 करोड़ से अधिक अलर्ट संदेश प्रसारित कर चुकी है। 'दामिनी', 'मौसम' और 'मेघदूत' जैसे मोबाइल एप्लिकेशन, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की उन्नत पूर्वानुमान प्रणालियों के साथ मिलकर, समय पर मौसम और आपदा संबंधी अलर्ट उपलब्ध कराते हैं। राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ), सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रमों और 'आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए भारतीय विश्वविद्यालयों और संस्थानों के नेटवर्क' (जिसमें 330 से अधिक संस्थान शामिल हैं) के माध्यम से क्षमता निर्माण के प्रयासों को और सुदृढ़ किया गया है। सामूहिक रूप से, इन उपायों ने पर्यावरणीय और जलवायु-प्रेरित आपदाओं का पूर्वानुमान लगाने, उनका सामना करने और उन पर त्वरित प्रतिक्रिया देने की भारत की क्षमता को काफी मजबूत किया है।

हरित क्रेडिट कार्यक्रम (जीसीपी): पारिस्थितिकीय पुनरुद्धार को सशक्त बनाना

ग्रीन क्रेडिट नियम, 2023 के तहत शुरू किया गया 'हरित क्रेडिट कार्यक्रम' (जीसीपी) पर्यावरण को बेहतर बनाने और विकास को सतत बनाने की दिशा में एक नई और बेहतरीन पहल है। यह कार्यक्रम लोगों, समुदायों और कंपनियों को स्वेच्छा से पर्यावरण सुधारने के काम करने के लिए प्रेरित करता है। इससे पेड़ लगाने, प्रकृति को फिर से हरा-भरा बनाने और पर्यावरण के अनुकूल काम करने में सबकी भागीदारी बढ़ रही है। लाइफ (LiFE) आंदोलन के साथ जुड़कर, इसका लक्ष्य हरियाली बढ़ाना, हवा से कार्बन को सोखना, खराब पड़ी जमीन को फिर से उपजाऊ बनाना और पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव को कम करना है। पर्यावरण के लिए किए गए अच्छे कामों को मापने और उन्हें इनाम देने के लिए यह कार्यक्रम एक पारदर्शी सिस्टम बनाता है, जिससे संस्थाओं और आम लोगों की क्षमता बढ़ती है। मार्च 2026 तक, 12 राज्यों में 4,391 हेक्टेयर खराब हो चुकी वन भूमि को फिर से हरा-भरा करने के लिए चुना गया है। इससे न केवल जैव-विविधता बढ़ेगी, बल्कि पर्यावरण भी लंबे समय तक सुरक्षित और मजबूत बना रहेगा।

कुल मिलाकर, इन सभी पहलों ने भारत में दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता और मजबूती की नींव को और सुदृढ़ किया है। सर्कुलर इकोनॉमी के उपायों और ग्रीन स्किल विकास से लेकर वैज्ञानिक संरक्षण और आपदा तैयारी तक, भारत ने एक हरित और अधिक लचीले भविष्य के निर्माण के लिए आवश्यक संस्थागत और सामाजिक क्षमता विकसित कर ली है।

स्तंभ 3: नेतृत्व और कूटनीति द्वारा विश्वसनीयता को सशक्त बनाना

पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कोई भी देश अकेले नहीं कर सकता। वैश्विक प्रगति के लिए विश्वसनीय नेतृत्व, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और साझा ज़िम्मेदारी की आवश्यकता होती है। 'साझा लेकिन अलग-अलग ज़िम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं' के सिद्धांत से निर्देशित होकर, भारत ने विकास लक्ष्यों का समर्थन करते हुए जलवायु कार्रवाई को आगे बढ़ाया है। पिछले बारह वर्षों में, भारत जलवायु न्याय, सतत विकास और ज़िम्मेदार विकास के लिए एक अग्रणी आवाज के रूप में उभरा है। जलवायु नेतृत्व, अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों और बहुपक्षीय जुड़ाव के माध्यम से, भारत ने वैश्विक पर्यावरणीय गवर्नेंस में अपना प्रभाव मजबूत किया है। इन प्रयासों ने सामूहिक जलवायु कार्रवाई और स्थिरता को आगे बढ़ाने में एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में भारत की साख को बढ़ाया है।

राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान

राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) के क्रमिक चक्रों के माध्यम से, भारत ने उत्सर्जन तीव्रता में कमी, गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता और कार्बन सिंक निर्माण के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं को निरंतर बढ़ाया है, जो जलवायु नेतृत्व के प्रति भारत के महत्वाकांक्षी और कार्य-उन्मुख दृष्टिकोण को दर्शाता है।

भारत ने 2005 के स्तर से उत्सर्जन तीव्रता को 33–35 प्रतिशत तक कम करने का अपना लक्ष्य निर्धारित समय से 11 वर्ष पूर्व ही प्राप्त कर लिया है, और अब यह कमी 36 प्रतिशत से भी अधिक हो चुकी है। वर्ष 2030 तक 40 प्रतिशत गैर-जीवाश्म विद्युत क्षमता हासिल करने का लक्ष्य भी नौ वर्ष पहले ही पूरा कर लिया गया था, और फरवरी 2026 तक देश की कुल स्थापित विद्युत क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी 52.57 प्रतिशत हो गई है। इसके अतिरिक्त, भारत ने 2.29 बिलियन टन CO समतुल्य का अतिरिक्त कार्बन सिंक भी तैयार कर लिया है, जो उसके दीर्घकालिक जलवायु लक्ष्यों की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति को दर्शाता है।

एनडीसी 1.0 (2015), एनडीसी 2.0 (2022) और एनडीसी 3.0 (2026) के माध्यम से, भारत ने 2030 और 2035 के लिए अपनी महत्वाकांक्षाओं को निरंतर बढ़ाया है। यह भारत की सुदृढ़ कार्यान्वयन क्षमता, स्वच्छ ऊर्जा के त्वरित प्रसार और जलवायु कार्रवाई के साथ-साथ सतत विकास के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।[1]

 

क्या आप जानते हैं?

राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी), जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के पेरिस समझौते के अंतर्गत देशों द्वारा प्रस्तुत की गई जलवायु कार्रवाई संबंधी प्रतिबद्धताएँ हैं। ये उत्सर्जन कम करने, स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार करने, जलवायु-सहनीयता को सुदृढ़ करने और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के लिए एक रोडमैप प्रदान करते हैं। एनडीसी पर्यावरणीय स्थिरता और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए एक प्रमुख नीतिगत साधन के रूप में कार्य करते हैं।

विश्व सतत विकास शिखर सम्मेलन (डब्ल्यूएसडीएस), 2024

 

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यह शिखर सम्मेलन जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता की हानि और संसाधनों के दोहन जैसी वैश्विक चुनौतियों पर केंद्रित था, जिसमें स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन, जलवायु न्याय और सतत विकास पर विशेष बल दिया गया।

इस शिखर सम्मेलन में भारत के उस दृष्टिकोण को प्रदर्शित किया गया, जिसके तहत नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार, प्रकृति-आधारित समाधानों और समावेशी जलवायु कार्रवाई के माध्यम से आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जाता है। इसने भारत की नीतिगत नवाचारों, जलवायु प्रतिबद्धताओं और जन-केंद्रित विकास मॉडल को रेखांकित करते हुए, स्थिरता के क्षेत्र में एक वैश्विक अग्रणी के रूप में भारत की स्थिति को और अधिक सुदृढ़ किया। डब्ल्यूएसडीएस 2024 के माध्यम से, भारत ने अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सूत्रधार के रूप में और एक सतत एवं सुदृढ़ भविष्य को आकार देने में एक विश्वसनीय आवाज़ के रूप में अपनी भूमिका को और अधिक सशक्त बनाया।

अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए), 2015

 अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) को भारत और फ्रांस द्वारा पेरिस में आयोजित COP21 जलवायु शिखर सम्मेलन में संयुक्त रूप से शुरू किया गया था। इसकी परिकल्पना सौर-संसाधन संपन्न देशों के बीच सौर ऊर्जा के लिए एक संधि-आधारित अंतर-सरकारी संगठन के रूप में की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य समन्वित अनुसंधान, किफायती वित्तपोषण और सौर प्रौद्योगिकियों के बड़े पैमाने पर प्रसार पर ध्यान केंद्रित करना है। आज, इस गठबंधन में 112 सदस्य देश शामिल हैं, जो इसकी बढ़ती वैश्विक पहुंच और प्रभाव को दर्शाता है।

आईएसए ने जलवायु कार्रवाई और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में भारत को एक 'ग्लोबल एजेंडा-सेटर' (वैश्विक एजेंडा निर्धारित करने वाला) के रूप में स्थापित करके इसकी अंतर्राष्ट्रीय विश्वसनीयता को काफी बढ़ाया है। इसने समावेशी और जलवायु-सक्षम विकास के पक्षधर के रूप में भारत की छवि को मजबूत किया है और वैश्विक पर्यावरणीय कूटनीति में इसके नेतृत्व को सुदृढ़ किया है।

वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड (OSOWOG) पहल, 2018

वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड (OSOWOG) पहल को 2018 में भारत द्वारा प्रस्तावित किया गया था, जिसका उद्देश्य नवीकरणीय ऊर्जा के अन्य देशों के साथ आदान-प्रदान के लिए एक ढांचा तैयार करना है। वर्ष 2021 में, भारत और यूनाइटेड किंगडम ने COP26 के दौरान संयुक्त रूप से 'ग्रीन ग्रिड्स इनिशिएटिव–OSOWOG' की शुरुआत की। इस पहल ने स्वच्छ ऊर्जा के लिए सहयोग और जलवायु समाधानों में देश को एक अग्रणी के रूप में स्थापित करके भारत की वैश्विक विश्वसनीयता को और मजबूत किया है। इसने अंतर्राष्ट्रीय जलवायु साझेदारियों को आकार देने और वैश्विक स्तर पर परस्पर जुड़े नवीकरणीय ऊर्जा भविष्य के साझा दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की भारत की क्षमता को प्रदर्शित किया है।

मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (यूएनसीसीडी) का 14वाँ पक्षकार सम्मेलन (COP14), 2019

 

 यह सम्मेलन 'दिल्ली घोषणापत्र' को अपनाए जाने के साथ संपन्न हुआ, जिसने 2030 तक 'भूमि क्षरण तटस्थता' प्राप्त करने की दिशा में वैश्विक प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया। शिखर सम्मेलन ने भूमि संरक्षण एवं पुनर्स्थापन, सूखा-प्रबंधन, सतत भूमि प्रबंधन और पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर जोर दिया, साथ ही जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता और मरुस्थलीकरण पर तीन रियो सम्मेलनों के बीच बेहतर समन्वय को बढ़ावा दिया।

COP14 की सफलतापूर्वक मेजबानी करके और महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दों पर आम सहमति बनाकर, भारत ने वैश्विक पर्यावरणीय प्रबंधन में एक अग्रणी आवाज के रूप में अपनी स्थिति को और सुदृढ़ किया है। इस सम्मेलन ने भूमि पुनरुद्धार कूटनीति में भारत की विश्वसनीयता को बढ़ाया और सतत विकास तथा पारिस्थितिकीय मजबूती के लिए बहुपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देने में इसकी बढ़ती भूमिका को प्रदर्शित किया।

 

आपदा-सुरक्षित अवसंरचना गठबंधन (सीडीआरआई), 2019

सीडीआरआई को भारत ने 2019 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु कार्रवाई शिखर सम्मेलन के दौरान लॉन्च किया था, ताकि जलवायु और आपदा जोखिमों के प्रति बुनियादी ढांचे की मजबूती को बढ़ावा दिया जा सके। 2022 में, भारत ने सीडीआरआई को एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन का दर्जा देकर और इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थापित करके इस पहल को और मजबूत किया। इस पहल ने आपदा जोखिम कम करने और जलवायु मजबूती के क्षेत्र में नेतृत्व का प्रदर्शन करके भारत की वैश्विक विश्वसनीयता को बढ़ाया। इसने भारत को दुनिया भर में मजबूत और सतत बुनियादी ढांचे की दिशा में काम करने वाली सरकारों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और विशेषज्ञों के एक प्रमुख संयोजक के रूप में स्थापित किया।

 

प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर कन्वेंशन (सीएमएस) का 13वां पक्षकारों का सम्मेलन (COP-13), गांधीनगर 2020

गांधीनगर में वर्ष 2020 में आयोजित 'प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर कन्वेंशन' (सीएमएस) के 13वें पक्षकारों के सम्मेलन (COP-13) की मेजबानी ने भारत के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों की विश्वसनीयता को काफी सुदृढ़ किया है। भारत में आयोजित यह पहला सीएमएस COP-13 था, जिसने स्थलीय, एवियन (पक्षी) और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में प्रवासी प्रजातियों पर वार्ता का नेतृत्व करने की भारत की क्षमता में अंतरराष्ट्रीय विश्वास को प्रदर्शित किया। COP की अध्यक्षता संभालने के साथ ही, भारत केवल एक 'रेंज कंट्री' (प्रजातियों के विचरण वाले देश) और कार्यान्वयनकर्ता की भूमिका से ऊपर उठकर, प्रवासी वन्यजीवों, फ्लाईवे (प्रवास मार्गों) और सीमा-पार आवासों पर वैश्विक चर्चा में 'मानक-निर्धारक' और 'एजेंडा-आकार देने वाले' के रूप में उभरा है।

 

मिशन LiFE (पर्यावरण के लिए जीवनशैली), 2022

मिशन LiFE (पर्यावरण के लिए जीवनशैली) को संयुक्त राष्ट्र महासचिव की उपस्थिति में लॉन्च किया गया था। मिशन LiFE प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध उपभोग से सचेत उपयोग की ओर बदलाव को बढ़ावा देता है, और पर्यावरण संरक्षण के लिए व्यवहार परिवर्तन को प्रोत्साहित करता है। यह मिशन COP26 (2021) में भारत द्वारा दिए गए वैश्विक आह्वान पर आधारित है और COP27 शर्म अल-शेख कार्यान्वयन योजना (2022) में भी इसका स्पष्ट प्रभाव देखने को मिला, जिसमें जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सतत जीवनशैली और उपभोग के पैटर्न के महत्व को मान्यता दी गई थी। मिशन LiFE ने जीवनशैली-आधारित जलवायु कार्रवाई में भारत को एक वैश्विक अग्रणी के रूप में स्थापित करके इसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति को सुदृढ़ किया है। इसने भारत के प्रभाव को प्रौद्योगिकी और वित्त से आगे बढ़ाकर जन-केंद्रित स्थिरता के क्षेत्र तक विस्तारित किया है।

जी20 न्यू दिल्ली लीडर्स डिक्लेरेशन (ग्रीन डेवलपमेंट पैक्ट), 2023

 यह समझौता 9 सितंबर 2023 को भारत की जी20 अध्यक्षता के दौरान अपनाया गया था। इसने जलवायु कार्रवाई, सतत विकास और समावेशी हरित विकास में तेजी लाने के लिए एक मजबूत वैश्विक सहमति बनाई। इस घोषणा ने 'पेरिस समझौते' के प्रति प्रतिबद्धताओं को और मजबूत किया, नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्यों का विस्तार किया और सतत जीवनशैली, जलवायु वित्त, जैव विविधता संरक्षण व सर्कुलर इकोनॉमी के दृष्टिकोण पर जोर दिया। इसने विकसित और विकासशील देशों के बीच एक आम सहमति बनाने वाले देश के रूप में भारत को स्थापित करके, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख को और बढ़ाया है।

इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (आईबीसीए), 2023

 

इस पहल का उद्देश्य सात बिग कैट प्रजातियों - बाघ, शेर, तेंदुआ, हिम तेंदुआ, चीता, जगुआर और प्यूमा का संरक्षण करना है। आईबीसीए औपचारिक रूप से 23 जनवरी 2025 को एक संधि-आधारित अंतर-सरकारी संगठन बन गया। वर्तमान में, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के 26 सदस्य देश इस गठबंधन का हिस्सा हैं, जो बिग कैट संरक्षण के लिए वैश्विक सहयोग को मजबूत करने हेतु मिलकर काम कर रहे हैं।

G20

 यह पहल दुनिया की सबसे बड़ी जंगली बाघों की आबादी को बनाए रखने और एशियाई शेरों व अन्य महत्वपूर्ण प्रजातियों के दीर्घकालिक संरक्षण में भारत के शानदार रिकॉर्ड पर आधारित है। ये सभी प्रयास भारत को न केवल अपने देश में वन्यजीव संरक्षण का पालन करने वाला, बल्कि विश्व स्तर पर 'बिग कैट' संरक्षण के लिए एक संयोजक और एजेंडा निर्धारित करने वाले देश के रूप में भी स्थापित करते हैं।

इस शिखर सम्मेलन में भारत ने अपने घरेलू कार्यक्रमों को अन्य देशों के लिए एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। बाघों, हाथियों, गोडावण, समुद्री कछुओं और डॉल्फिन के लिए चलाई जा रही प्रमुख योजनाओं को 'सामुदायिक भागीदारी' और 'लैंडस्केप-स्तरीय योजना' के साथ प्रजाति संरक्षण को जोड़ने के व्यावहारिक मॉडल के रूप में पेश किया गया। भारत की अध्यक्षता के दौरान गांधीनगर से जुड़ी घोषणाओं और ठोस कार्रवाइयों को अपनाए जाने ने यह साबित किया कि देश अपने जमीनी अनुभव को बहुपक्षीय प्रतिबद्धताओं में बदल सकता है। इसने जैव विविधता से समृद्ध विकासशील देशों और व्यापक वैश्विक समुदाय के बीच एक विश्वसनीय सेतु के रूप में भारत की छवि को और मजबूत किया है।

विकसित भारत का लक्ष्य: सतत विकास के पथ पर अग्रसर

पिछले बारह वर्षों में, भारत ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच के संबंधों को एक नई परिभाषा दी है। सतत विकास अब नीति-निर्माण के हाशिये से निकलकर राष्ट्रीय योजना के केंद्र में आ गई है, जो वन, जल संसाधन, जैव विविधता, अपशिष्ट प्रबंधन और जलवायु कार्रवाई से संबंधित निर्णयों को दिशा दे रही है। बड़े पैमाने पर संरक्षण कार्यों, मजबूत संस्थानों, तकनीकी नवाचार और वैश्विक नेतृत्व के माध्यम से, भारत ने दीर्घकालिक पर्यावरणीय सुरक्षा और सतत विकास के लिए एक सशक्त आधार तैयार किया है।

भारत का ग्रीन ट्रांसफॉर्मेशन मूलतः 'विश्वास', 'निर्माण' और 'जन कल्याण' की एक गाथा है। यह उस विश्वास को दर्शाता है कि यदि सतत प्रयासों और सामूहिक भागीदारी का साथ मिले, तो प्रकृति में पुनर्जीवित होने की असीम क्षमता है। यह भविष्य के लिए मजबूत पर्यावरण संपदा, आधुनिक पर्यावरणीय संस्थानों और मजबूत प्रणालियों के माध्यम से निर्माण को साकार करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह करोड़ों नागरिकों को स्वच्छ वातावरण, सुरक्षित आजीविका, बेहतर जलवायु सुरक्षा और जीवन की उच्च गुणवत्ता प्रदान करके जन कल्याण को आगे बढ़ाता है।

जैसे-जैसे भारत 'विकसित भारत' बनने की ओर अग्रसर हो रहा है, ये सभी सिद्धांत भारत की पर्यावरणीय यात्रा को निरंतर नई दिशा प्रदान करते रहेंगे। ये सभी मिलकर भारत और विश्व के लिए एक पर्यावरण-अनुकूल, अधिक सशक्त और अधिक सतत भविष्य का निर्माण कर रहे हैं।

संदर्भ

 

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय

 

जल शक्ति मंत्रालय

 

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय

 

कैबिनेट

 

 

पत्र सूचना कार्यालय

 

भारतीय संसद

 

विदेश मंत्रालय

 

 

प्रधानमंत्री कार्यालय

 

 

अन्य

 

पीआईबी रिसर्च

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