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Social Welfare

कल्याण से महिला नेतृत्व वाले विकास तक

Posted On: 02 JUN 2026 3:35PM

साल 2014 से 2026 के बीच, भारत ने सभी क्षेत्रों और संस्थानों में 'महिला कल्याण' से आगे बढ़कर 'महिला नेतृत्व वाले विकास' पर ध्यान केंद्रित किया है। सरकार द्वारा अपनाए गए समग्र दृष्टिकोण ने स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, पोषण, आजीविका, वित्तीय समावेशन और नेतृत्व के अवसरों तक महिलाओं की पहुंच को मजबूत किया है। स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी), उद्यमिता और डिजिटल समावेशन को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों ने महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया है। स्वच्छता, आवास, स्वच्छ ईंधन और नल के स्वच्छ पानी तक बेहतर पहुंच ने गरिमा, सुरक्षा और जीवन की गुणवत्ता को मजबूत किया है। शासन, सार्वजनिक संस्थानों और निर्णय लेने में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की बढ़ती भूमिका को दर्शाती है।

भारत के विकास की गाथा के केंद्र में महिलाएं

पिछले बारह सालों में, भारत में महिलाओं के विकास में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। पहले महिलाओं को केवल सहायता और समर्थन दिया जाता था, लेकिन अब महिलाओं की भागीदारी, उनके लिए अवसर और उनके नेतृत्व को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। महिलाओं को अब महज़ लाभार्थी के रूप में नहीं देखा जाता। वे विकास और प्रगति को आकार देने में अहम भूमिका निभा रही हैं।

यह बड़ा परिवर्तन जीवन चक्र के सभी चरणों में लाए गए नए बदलावों की मदद से मुमकिन हो पाया है। ये प्रयास बालिकाओं के संरक्षण और शिक्षा से शुरू होते हैं और स्वास्थ्य, पोषण, कौशल, उद्यमिता और नेतृत्व तक जारी रहते हैं। अब जोर सतत् भागीदारी और मापने योग्य परिणामों पर है।

ये बदलाव आज सभी क्षेत्रों में दिखाई दे रहे हैं। वर्तमान में अधिक लड़कियां स्कूलों में रह रही हैं और उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। वित्तीय समावेशन ने महिलाओं की बैंकिंग और ऋण तक पहुंच का विस्तार किया है, जिससे उनकी आजीविका और आर्थिक स्वतंत्रता भी मजबूत हुई है। इसके साथ ही स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता और स्वच्छ खाना पकाने के लिए ईंधन तक बेहतर पहुंच ने गरिमा और जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया है।

महिलाएं सार्वजनिक और राजनीतिक क्षेत्रों में भी अधिक सक्रिय हो रही हैं। स्थानीय शासन, सामुदायिक संस्थानों और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ रही है।

गरिमामय जन्म: संरक्षण और प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल

जन्म के समय की देखभाल बच्चे के जीवन और माँ के स्वास्थ्य की नींव रखती है। पिछले कुछ सालों में भारत ने स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण सहायता और संस्थागत प्रसव प्रणालियों के ज़रिए मातृ एवं प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल को मजबूत किया है।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ: भारत की बेटियों को सशक्त बनाने का एक दशक

22 जनवरी 2015 को शुरू की गई यह योजना सरकार की एक पहल है। इसका मकसद घटते बाल लिंग अनुपात को संबोधित करना, भेदभावपूर्ण लिंग चयन को रोकना और बालिका के जीवन

रक्षा, संरक्षण और शिक्षा को बढ़ावा देना है।.

यह पहल संस्थागत प्रसव में सुधार, माध्यमिक शिक्षा में लड़कियों के नामांकन में वृद्धि, स्कूल छोड़ने की दर में कमी और प्रसवपूर्व देखभाल पंजीकरण को मजबूत करने पर केंद्रित है। यह सुरक्षित मासिक धर्म स्वच्छता और प्रबंधन के बारे में जागरूकता को भी बढ़ावा देती है। यह योजना बालिका सशक्तिकरण के लिए एक राष्ट्रीय आंदोलन के रुप में विकसित हो गई है, जो मानसिकता परिवर्तन और लैंगिक समानता पर केंद्रित है।

इस योजना में पीसीपीएनडीटी (गर्भाधान पूर्व और प्रसवपूर्व निदान तकनीक) अधिनियम के सख्ती से लागू करने के लिए लिंग-भेदभावपूर्ण सामाजिक मानदंडों को चुनौती देने और व्यवहार में बदलाव लाने के लिए सतत् जन जागरूकता प्रयासों के साथ एकीकृत किया गया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस-5) ने लिंग अनुपात में एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय बदलाव को दर्शाया है, जिसमें भारत की जनसंख्या में प्रति 1,000 पुरुषों पर 943 (जनगणना 2011) महिलाओं की तुलना में 1,020 महिलाएं दर्ज की गई हैं।

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (पीएमएमवीवाई)

मातृ स्वास्थ्य और शिशु देखभाल के महत्व को पहचानते हुए, पीएमएमवीवाई योजना 2017 में शुरू की गई थी। यह गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को सहायता करने वाली मातृत्व लाभ योजना है।

इस योजना के तहत, महिलाओं को पहले जीवित बच्चे के लिए दो किस्तों में ₹5,000 और दूसरे बच्चे (केवल बालिका) के लिए ₹6,000 मिलते हैं। भुगतान प्रारंभिक पंजीकरण, प्रसवपूर्व देखभाल और टीकाकरण जैसे प्रमुख स्वास्थ्य लक्ष्यों से जुड़े होते हैं।

प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण समय पर सहायता सुनिश्चित करते हैं, जिसमें गर्भपात/मृत जन्म के मामलों में नई पात्रता का प्रावधान है। यह सहायता आंशिक वेतन मुआवजे के रूप में भी कार्य करती है। इससे मातृ कल्याण में सुधार होता है, संस्थागत देखभाल को बढ़ावा मिलता है और लैंगिक समानता को आगे बढ़ाया जाता है।

प्रमुख पहुंच और कवरेज:

  • योजना की शुरुआत से अब तक नामांकित लाभार्थियों की संख्या: ₹4.92 करोड़ (30 अप्रैल, 2026 तक)
  • योजना की शुरुआत से अब तक लाभार्थियों को भुगतान की गई राशि: ₹4.28 करोड़ (30 अप्रैल, 2026 तक)
  •  कुल भुगतान राशि: ₹20,150 करोड़

राकची संगमा की सुरक्षित मातृत्व यात्रा

राकची एन. संगमा मेघालय के उत्तरी गारो हिल्स के बेलपारा गांव में रहने वाली एक गृहिणी और छोटी किसान हैं, जो बड़ी मुश्किल से अपने परिवार का भरण-पोषण कर पाती हैं। गर्भावस्था के दौरान आर्थिक तंगी और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच के कारण उनकी मुश्किलें और बढ़ गईं।

उन्होंने पीएमएमवीवाई योजना के तहत सहायता मांगी और सही समय पर उन्हें जरूरी राहत मिली। इस वित्तीय सहायता से उन्हें बिना किसी अतिरिक्त आर्थिक बोझ के पौष्टिक भोजन, नियमित प्रसवपूर्व जांच और आवश्यक चिकित्सा देखभाल मिल सकी। उचित देखभाल और निरंतर निगरानी के साथ, राकची ने एक स्वास्थ्य संस्थान में एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए)

गर्भवती महिलाओं के लिए, समय पर चिकित्सा देखभाल एक सुरक्षित, स्वस्थ गर्भावस्था और गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों वाली गर्भावस्था के बीच महत्वपूर्ण अंतर ला सकती है। 2016 में शुरू किया गया पीएमएसएमए, हर महीने की 9 तारीख को सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व जांच प्रदान करके इस आवश्यकता को पूरा करता है। यह पहल विशेष रूप से दूसरी और तीसरी तिमाही की महिलाओं पर केंद्रित है। इससे उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की शीघ्र पहचान और प्रबंधन संभव हो पाता है।

मुख्य पहुंच और कवरेज:

पीएमएसएमए योजना के तहत 7.4 करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं की जांच की गई

8,812 स्वयंसेवक पंजीकृत

देशभर में 22 हजार से अधिक केंद्र पीएमएसएमए सेवाएं प्रदान कर रहे हैं

6.85 करोड़ से अधिक प्रसवपूर्व जांच की गई और 1.03 करोड़ उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पहचान की गई, जिन पर विशेष निगरानी रखी गई

पीएमएसएमए ने उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं के लिए डिजिटल ट्रैकिंग और फॉलो-अप सहायता भी शुरू की है।

इससे मातृ मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आई है और यह प्रति लाख जीवित जन्मों पर 88 (2021-2023) हो गई है, जो 2014-15 में 130 थी।)

जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई)

जननी सुरक्षा योजना राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत सशर्त नकद सहायता और सामुदायिक सहायता प्रदान करती है। यह योजना गरीब गर्भवती महिलाओं, खास तौर पर बीपीएल परिवारों और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों की महिलाओं को स्वास्थ्य सेवा केंद्रों में प्रसव के लिए प्रोत्साहित करती है, जबकि आशा कार्यकर्ता लाभार्थियों को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने में मदद करती हैं। इन प्रयासों से संस्थागत प्रसवों में वृद्धि हुई है, मातृ स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच में सुधार हुआ है और घर पर प्रसव से जुड़े जोखिम कम हुए हैं।

जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके)

2014 में, जेएसएसके को गर्भावस्था की सभी प्रसवपूर्व और प्रसवोत्तर जटिलताओं तक विस्तारित किया गया। सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में उपचार के लिए आने वाले सभी बीमार नवजात शिशुओं (एक वर्ष तक की आयु) के लिए भी इसी प्रकार के लाभ प्रदान किए गए हैं। कार्यक्रम की प्रमुख उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं:

वित्तीय वर्ष 2024-25 में जेएसएसके के लाभार्थी: 1.99 करोड़ गर्भवती महिलाएँ, 16.85 लाख बीमार शिशु

इन निवेशों का परिणाम निम्नलिखित में दिखता है:

गर्भावस्था की पहली तिमाही में प्रसवपूर्व देखभाल संबंधी जांचों की संख्या 59% (एनएफएचएस-4, 2015-16) से बढ़कर 76.2% (एनएफएचएस-6, 2023-24) हो गई।

राष्ट्रीय स्तर पर, चार या अधिक प्रसवपूर्व देखभाल (एएनसी) जांचों को पूरा करने वाली महिलाओं का हिस्सा 51% (2015-16) से बढ़कर 65.2% (2023-24) हो गया।

राष्ट्रीय स्तर पर संस्थागत प्रसवों में खासी वृद्धि हुई है, जो 79% (2015-16) से बढ़कर 90.6% (2023-24) हो गई है।

शिक्षा, कौशल और महत्वाकांक्षी विकास

वर्ष 2014 से, लड़कियों की शिक्षा बुनियादी पहुंच से आगे बढ़ गई है। अब ध्यान निरंतरता, प्रगति और विभिन्न चरणों में सार्थक परिणामों पर केंद्रित है। अब अधिक लड़कियां स्कूल में रह रही हैं, उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और ज़रुरी कौशल हासिल कर रही हैं।

यह बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में निहित है। यह नीति उन संरचनात्मक बाधाओं को दूर करती है, जो पहले लड़कियों की शैक्षिक यात्रा को सीमित करती थीं। लैंगिक समावेशन को शिक्षा प्रणाली के मूल सिद्धांत के रूप में शामिल किया गया है।

  • लैंगिक समावेशन कोष वंचित लड़कियों को लक्षित सहायता प्रदान करता है।
  • समायोजित शिक्षण उपाय ड्रॉपआउट को कम करते हैं और निरंतर भागीदारी को प्रोत्साहित करते हैं।
  • बहुविषयक विकल्प लड़कियों को विविध शैक्षणिक रुचियों को आगे बढ़ाने की अनुमति देते हैं।

स्कूल और मूलभूत शिक्षा

समग्र शिक्षा और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय

2018-19 में शुरू की गई समग्र शिक्षा, स्कूली शिक्षा के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाती है। यह पूर्व-प्राथमिक से लेकर कक्षा बारहवीं तक की शिक्षा को एक व्यापक ढांचे के तहत एकीकृत करती है। इस योजना ने पूरी स्कूल व्यवस्था में पहुंच, बुनियादी ढांचे, डिजिटल शिक्षा और छात्रों के स्कूल में बने रहने को मजबूत किया है।

लड़कियों के लिए ये सुधार विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। आस-पास के स्कूल, चालू शौचालय, सुरक्षित कक्षाएँ, प्रशिक्षित शिक्षक और आवासीय सहायता, ये सभी कारक लड़कियों की शिक्षा को प्रारंभिक वर्षों के बाद भी जारी रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।

• 2024-25 में, भारत में 14.71 लाख स्कूल, 1.01 करोड़ शिक्षक और 24.69 करोड़ छात्र थे। छात्राओं का नामांकन 2014-15 में 1.57 करोड़ (32%) से बढ़कर आज 11.93 करोड़ (48%) हो गया है।

वर्ष 2018-19 और 2025-26 के बीच, 4,073 से अधिक स्कूलों का उन्नयन किया गया। स्मार्ट क्लासरूम सहित 1.49 लाख से अधिक आईसीटी और डिजिटल शिक्षण पहलों को आगे बढ़ाया गया। कौशल शिक्षा में भी लगातार विस्तार हुआ। व्यावसायिक पाठ्यक्रम प्रदान करने वाले विद्यालयों की संख्या 9,477 से बढ़कर 25,000 हो गई, जिससे छात्रों को प्रारंभिक अनुभव प्राप्त करने में सहायता मिली।

आज स्कूलों की परिस्थितियाँ लड़कियों के लिए कहीं अधिक मददगार हैं। 2024-25 में:

99.3% स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध थी। 2014-15 में, 95.72% स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा थी।

97.3% स्कूलों में लड़कियों के शौचालय चालू थे। 2014-15 में, 92.09% स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय की सुविधा थी।

93.6% स्कूलों में बिजली थी।

89.5% स्कूलों में पुस्तकालय थे।

समय के साथ स्कूली शिक्षा की निरंतरता में भी सुधार हुआ है। प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने की दर में उल्लेखनीय कमी आई है।

इस मज़बूत व्यवस्था में, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी), आवासीय शिक्षा की ज़रुरत वाली लड़कियों को लक्षित सहायता प्रदान करते हैं। ये समग्र शिक्षा ढांचे का हिस्सा हैं और विशेष रूप से शैक्षिक रूप से पिछड़े हिस्सों में सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अन्य की लड़कियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। कक्षा VI से XII तक की शिक्षा प्रदान करने वाले ये आवासीय विद्यालय छात्राओं को प्राथमिक से लेकर उच्च माध्यमिक शिक्षा तक सीखने और आगे बढ़ने के लिए एक सहायक वातावरण प्रदान करते हैं।

केजीबीवी का व्यापक दायरा और विस्तार बेहद महत्वपूर्ण है:

कार्यरत केजीबीवी की संख्या 2022 में 4,996 से बढ़कर 2026 में 5,316 हो गई।

नामांकन 2020-21 में 6.07 लाख से बढ़कर 2025-26 में 7.58 लाख हो गया।

आवासीय विद्यालय से सिविल सेवा तक (उत्तर प्रदेश)

उत्तर प्रदेश के अमरोहा में कुमारी निधि ने कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय से अपनी शिक्षा की शुरुआत की। कई अन्य लड़कियों की तरह, उनका परिवार भी सीमित अवसरों वाला था। निरंतर सहयोग और एक केंद्रित शैक्षणिक वातावरण की वजह से उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और 2023 में यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करते हुए 39वीं रैंक हासिल की। ​​आज वे उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (एसडीएम) के पद पर कार्यरत हैं। उनकी कामयाबी की यह यात्रा दिखाती है कि शिक्षा तक पहुंच और निरंतर सहयोग मिलने पर क्या कुछ मुमकिन हो सकता है।

विद्यालय के मैदान से विश्व मंच तक (उत्तर प्रदेश)

उन्नाव के केजीबीवी-गंज मुरादाबाद में अर्चना निषाद ने खेल में अपनी प्रतिभा को कम उम्र में ही पहचान लिया था। स्कूल स्तर पर भागीदारी से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे एक गंभीर खेल में तब्दील हो गया। उन्होंने 2023 में क्रिकेट अंडर-19 महिला विश्व कप विजेता टीम में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनका यह सफर दर्शाता है कि सही समय पर मिलने वाला प्रोत्साहन कक्षा से परे भी कई रास्ते खोल सकता है।

छात्रवृत्तियाँ और वित्तीय सहायता

जैसे-जैसे अधिक लड़कियाँ स्कूली शिक्षा पूरी कर रही हैं, उच्च शिक्षा को सुलभ बनाए रखने के लिए वित्तीय सहायता महत्वपूर्ण हो जाती है। छात्रवृत्ति की सुविधाएं युवा महिलाओं को परिवारों पर अतिरिक्त दबाव डाले बिना अपनी शिक्षा जारी रखने में मदद कर रही हैं।

कॉलेज और विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए केंद्रीय क्षेत्र छात्रवृत्ति आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की मेधावी छात्राओं की मदद करती है। लगभग 50% छात्रवृत्तियाँ लड़कियों के लिए आरक्षित हैं। स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए राष्ट्रीय छात्रवृत्ति, जो 2023-24 में शुरू की गई थी, चयनित छात्रों को प्रति वर्ष ₹1.5 लाख की वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जिसमें प्रतिवर्ष 3,000 महिलाएँ शामिल हैं।

एआईसीटीई प्रगति छात्रवृत्ति तकनीकी शिक्षा में अवसरों का और विस्तार कर रही है। 2014-15 से, इसने डिप्लोमा और डिग्री पाठ्यक्रमों में प्रतिवर्ष 10,000 छात्रवृत्तियाँ प्रदान की हैं। 2024-25 तक, इस योजना के तहत लगभग 36 हजार छात्राओं को लाभ मिला।

इस निरंतर समर्थन का प्रभाव परिणामों में दिखाई देता है। 2014-15 और 2022-23 के बीच, 12 लाख से अधिक महिलाओं ने उच्च शिक्षा में दाखिला लिया।

इन निरंतर प्रयासों का फल नतीजों में भी दिखता है। साल 2014-15 और 2022-23 के बीच 12 लाख से ज्यादा महिलाओं ने उच्च शिक्षा के लिए नामांकन दाखिल किया है।

विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (स्टेम) और उच्च शिक्षा में महिलाएं

लंबे समय तक, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में करियर कई लड़कियों के लिए दूर की कौड़ी जैसा लगता था। महिलाओं के लिए अवसरों का विस्तार करने का अर्थ है स्टेम क्षेत्रों में उनके लिए प्रवेश के रास्ते खोलना।

विज्ञान ज्योति योजना कक्षा 9 से 12 तक की छात्राओं को मार्गदर्शन, प्रयोगशाला अनुभव, कार्यशालाओं और निर्देशित सहायता के माध्यम से विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (एसटीईएम) विषयों की पढ़ाई करने में सहायता प्रदान करती है। दिसंबर 2019 में इसकी शुरुआत के बाद से, यह योजना 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 300 जिलों में 1.12 लाख से अधिक छात्राओं तक पहुंच चुकी है।

प्रमुख संस्थानों में प्रवेश की सुविधा में भी सुधार हुआ है। आईआईटी और एनआईटी में अतिरिक्त सीटों के कारण महिलाओं की भागीदारी 10% से कम से बढ़कर 20% से अधिक हो गई है। 2024-25 में यूजीसी नेट-जेआरएफ के एसटीईएम विषयों के स्कॉलर्स में 53% से अधिक महिलाएं थीं।

कौशल और डिजिटल समावेशन

2014 से, विस्तारित कौशल विकास पहलों और बढ़ते स्टार्टअप इकोसिस्टम के चलते, अधिक महिलाएं उभरते क्षेत्रों में प्रवेश कर रही हैं।

कौशल और रोजगार क्षमता: प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई)

शिक्षा ने महिलाओं के लिए अवसरों का विस्तार किया है, लेकिन इन अवसरों को आजीविका में बदलना प्रासंगिक कौशल और उद्योग के अनुभव पर निर्भर करता है। वर्ष 2015 में शुरू की गई प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) ने रोजगार और उद्यमिता से जुड़े अल्पकालिक, उद्योग-अनुकूल प्रशिक्षण प्रदान करके इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पीएमकेवीवाई के लाभार्थियों में लगभग 45% महिलाएं हैं।

कार्यक्रम का विभिन्न चरणों में निरंतर विस्तार हुआ है:

पीएमकेवीवाई 1.0: 19 लाख से अधिक उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया गया

पीएमकेवीवाई 2.0: 1.10 करोड़ से अधिक उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया गया

पीएमकेवीवाई 3.0: करीब 7.35 लाख उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया गया

पीएमकेवीवाई 4.0 का वर्तमान चरण व्यावहारिक और भविष्य के लिए तैयार कौशल पर केंद्रित है। प्रशिक्षण में कार्यस्थल पर अनुभव शामिल है और इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन, हरित ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उभरते क्षेत्रों को शामिल किया गया है। पिछले तीन वर्षों में ही, पीएमकेवीवाई 4.0 के तहत 27 लाख से अधिक उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया गया है, जिनमें से 18.79 लाख को प्रमाणित किया गया है।

युवा महिलाओं के लिए लक्षित कौशल विकास: नव्या

नव्या (युवा किशोरियों के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण के माध्यम से आकांक्षाओं का पोषण) पीएमकेवीवाई 4.0 के तहत 16-18 वर्ष की आयु की लड़कियों पर केंद्रित है। 2025 में शुरू किया गया यह कार्यक्रम युवा महिलाओं को डिजिटल मार्केटिंग, साइबर सुरक्षा, एआई-आधारित सेवाओं और पर्यावरण के अनुकूल नौकरियों से परिचित कराता है। यह जीवन कौशल और वित्तीय साक्षरता विकसित करने में भी मदद करता है।

यह पहल 19 राज्यों के 27 आकांक्षी और उत्तर-पूर्वी जिलों में लागू की जा रही है, जिसका लक्ष्य 3,850 लड़कियों को प्रशिक्षित करना है।

दिसंबर 2025 तक:

• 1,295 लड़कियां नामांकित

• 671 लड़कियों को प्रशिक्षित किया गया

स्वास्थ्य, पोषण और गरिमापूर्ण कल्याण

महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए जीवनचक्र-आधारित दृष्टिकोण के तहत, भारत मानसिक स्वास्थ्य सहित किफायती स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच का विस्तार कर रहा है और पोषण संबंधी सहायता को मजबूत कर रहा है। इसके अलावा, स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन जैसे उपायों के ज़रिए महिलाओं के दैनिक जीवन में भी गरिमा को बढ़ावा दिया जा रहा है। ये प्रयास महिलाओं और उनके परिवारों के लिए एक स्वस्थ और अधिक न्यायसंगत समाज के निर्माण की व्यापक प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

आयुष्मान भारत

2018 में शुरू की गई सरकार की प्रमुख योजना आयुष्मान भारत ने पूरे भारत में महिलाओं की किफायती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में उल्लेखनीय सुधार किया है। इस व्यापक योजना के चार घटक मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि लोगों को प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्तर पर गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त हों।

आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजेएवाई) नकदी रहित माध्यमिक और तृतीयक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करती है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर वित्तीय बोझ कम होता है। फरवरी 2026 तक, एबी-पीएमजेएवाई के तहत देशभर में 43.52 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड जारी किए गए थे। इनमें से लगभग 49% या 21 करोड़ महिलाएं हैं।

इस योजना के अंतर्गत कुल 36,229 अस्पतालों को सूचीबद्ध किया गया है, जिनमें से 19,483 सरकारी और 16,746 निजी अस्पताल हैं। अधिकृत अस्पताल प्रवेशों में से लगभग 48% महिला लाभार्थी हैं। अब तक, योजना के तहत 4.97 करोड़ से अधिक महिलाओं को अधिकृत अस्पताल प्रवेश मिल चुका है।

आयुष्मान आरोग्य मंदिर (एएएम) ग्रामीण, शहरी और जनजातीय क्षेत्रों में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं, जो लोगों को उनके निवास स्थान के निकट व्यापक, सार्वभौमिक और निःशुल्क सेवाएं प्रदान करते हैं। देश भर में 1.84 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर कार्यरत हैं (27 फरवरी, 2026 तक) ।

ये केंद्र महिलाओं के लिए मातृ स्वास्थ्य देखभाल, गैर-संक्रामक रोग स्क्रीनिंग, प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल और निवारक स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं प्रदान करते हैं।

प्रधानमंत्री-आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (पीएम-एबीएचआईएम) जमीनी स्तर से लेकर जिला स्तर तक स्वास्थ्य से जुड़े ढ़ांचे को मजबूत करने के मकसद से भारत के सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक है। इसका उद्देश्य प्रत्येक जिले में आयुष्मान आरोग्य मंदिर, ब्लॉक और जिला जन स्वास्थ्य इकाइयाँ और प्रयोगशालाएँ तथा गहन चिकित्सा अस्पताल ब्लॉक स्थापित करना और उनका उन्नयन करना है।

इससे कम सुविधा प्राप्त क्षेत्रों में महिलाओं के लिए समय पर स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच में सुधार होता है। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) देश भर में एक एकीकृत डिजिटल स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का निर्माण करता है। यह रोगियों को आभा खातों के ज़रिए अपने चिकित्सा रिकॉर्ड को सुरक्षित रूप से डिजिटल रूप से संग्रहित करने और उन तक पहुँचने में सक्षम बनाता है। यह दूरस्थ चिकित्सकों से रोगियों को जोड़कर टेली-परामर्श की सुविधा भी प्रदान करता है। देशभर में 95 करोड़ से अधिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड डिजिटल रूप से लिंक किए गए हैं। इन खातों में महिलाओं की हिस्सेदारी 49.75% है। डिजिटल स्वास्थ्य प्रणाली विशेष रूप से महिलाओं को स्वास्थ्य रिकॉर्ड की सहजता और आसान पहुँच के माध्यम से लाभ पहुँचाती है।

सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0

प्रारंभिक पोषण और देखभाल, माताओं और बच्चों दोनों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य और सीखने के परिणामों को निर्धारित करते हैं। सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0, 0-6 वर्ष के बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए एकीकृत पोषण, स्वास्थ्य और प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल सेवाओं के ज़रिए इस सहायता प्रणाली को मजबूत बनाते हैं।

कार्यक्रम आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से पूरक पोषण, पूर्व-विद्यालय शिक्षा, टीकाकरण, स्वास्थ्य जांच और रेफरल सेवाएं प्रदान करते हैं। जमीनी स्तर पर सेवाओं को मजबूत करने के लिए, बुनियादी ढांचे और अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं में बड़ा निवेश किया गया है।

प्रमुख हस्तक्षेपों में शामिल हैं:

  • 1.03 लाख आंगनवाड़ी केंद्रों को उन्नत बुनियादी ढांचे, ऑडियो-विजुअल एड्स और स्मार्ट लर्निंग टूल्स से लैस सक्षम आंगनवाड़ी में परिवर्तित किया गया है।
  • 10.58 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को पोषण और प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ईसीसीई) का प्रशिक्षण दिया गया है।
  • मातृ पोषण, शिशु आहार और गंभीर तीव्र कुपोषण (एसएएम) एवं मध्यम तीव्र कुपोषण (एमएएम) के उपचार पर विशेष ध्यान दिया गया है।
  • आहार विविधता, प्रोटीन, स्वस्थ वसा और सूक्ष्म पोषक तत्वों को बढ़ावा देने वाले संशोधित पोषण मानदंड लागू किए गए हैं।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप खेल आधारित प्रारंभिक शिक्षा को बढ़ावा देने वाली 'पोषण भी पढ़ाई भी' पहल लागू की गई है।
  • आंगनवाड़ी केंद्रों में डिजिटल शिक्षण सामग्री और ईसीसी संसाधनों का उपयोग बढ़ाया गया है।

इंद्रधनुष मिशन

दिसंबर 2014 में शुरू किया गया इंद्रधनुष मिशन, उच्च जोखिम वाले जिलों और शहरी क्षेत्रों में लक्षित अभियानों के ज़रिए उन लोगों तक टीकाकरण पहुंचाने का लक्ष्य रखता है, जिनका टीकाकरण नहीं हुआ है या आंशिक रूप से हुआ है।

यह कार्यक्रम सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के तहत नियमित टीकाकरण को और सुदृढ़ करता है, जिससे कई जानलेवा बीमारियों से सुरक्षा मिलती है। यू-विन जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म लाभार्थियों और टीकाकरण की स्थिति की वास्तविक समय में निगरानी करने में सक्षम बनाते हैं। 18 मार्च 2026 तक, 11.87 करोड़ से अधिक बच्चों और 3.96 करोड़ गर्भवती महिलाओं ने पोर्टल पर पंजीकरण कराया है। 5.46 करोड़ बच्चों और 1.32 करोड़ गर्भवती महिलाओं को टीके से रोकी जा सकने वाली बीमारियों के लिए टीका लगाया जा चुका है। इसके अलावा, 17 फरवरी 2026 तक 8.73 करोड़ महिलाओं की गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की जांच की जा चुकी है।

वित्तीय समावेशन और आर्थिक सशक्तिकरण

पिछले 12 वर्षों में, सरकार ने यह मानते हुए कि वित्त तक पहुंच एक मूलभूत अधिकार है, महिलाओं के वित्तीय समावेशन और सशक्तिकरण को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया है विभिन्न आर्थिक पहलों के ज़रिए महिलाओं की बैंक खातों, ऋण, बचत और उद्यमशीलता सहायता तक पहुंच बढ़ी है, जिससे लाखों महिलाएं औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जुड़ पाई हैं।

सुकन्या समृद्धि योजना

सुकन्या समृद्धि योजना ने बेटी के भविष्य के लिए बचत को अधिक व्यवस्थित और सुरक्षित बनाया है। सरकार ने इस योजना को 2015 में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के तहत शुरू किया था। परिवार डाकघरों और अधिकृत बैंकों में 10 वर्ष तक की लड़कियों के लिए खाते खोल सकते हैं।

जमा राशि 250 रुपए से शुरू होती है और इस पर 8.2% वार्षिक ब्याज मिलता है, साथ ही धारा 80C के तहत कर-मुक्त रिटर्न भी मिलता है। उच्च शिक्षा और विवाह के लिए आंशिक निकासी की भी अनुमति है।

पिछले कुछ वर्षों में, इस योजना में खातों और जमा दोनों में मजबूत वृद्धि देखी गई है। यह औपचारिक बचत उपायों के माध्यम से लड़कियों की शिक्षा और भविष्य के लिए बढ़ती वित्तीय योजना को दर्शाता है।

डीएवाई-एनआरएलएम (स्वयं सहायता समूह-एसएचजी व्यवस्था)

ग्रामीण क्षेत्रों में, महिलाओं को अक्सर औपचारिक ऋण, बाज़ार और वित्तीय निर्णय लेने की क्षमता तक पहुँच का अभाव रहता था। स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) ने सामूहिक बचत, ऋण तक पहुँच और सहकर्मी सहयोग के माध्यम से इस समस्या को दूर करने में मदद की।

पिछले एक दशक में, दीनदयाल अंत्योदय योजना - राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) ने इस मॉडल को महिलाओं के नेतृत्व वाली आर्थिक भागीदारी के लिए एक राष्ट्रव्यापी मंच के रूप में विस्तारित किया है। यह कार्यक्रम अब देशभर के 7,627 ब्लॉकों को कवर करता है और इसने 1.51 करोड़ सामुदायिक कैडर सदस्यों का विकास किया है।

(डीएवाई-एनआरएलएम) के इस विस्तार के साथ-साथ वित्तीय समावेशन में भी वृद्धि हुई है। स्वयं सहायता समूहों ने ₹12.18 लाख करोड़ से अधिक का बैंक ऋण प्राप्त किया है। 50,548 से अधिक प्रशिक्षित बैंक सखियाँ महिलाओं को बैंकिंग सेवाओं, लेन-देन और ऋण तक पहुँच में सहायता प्रदान करती हैं।

कृषि सखियों और पशु सखियों जैसे सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों के ज़रिए आजीविका सहायता का विस्तार भी हुआ है, जो कृषि और पशुपालन गतिविधियों में सहयोग प्रदान करते हैं। साथ ही, ग्राम उद्यमिता कार्यक्रम (एसवीईपी) के तहत 5.88 लाख से अधिक उद्यमों को सहायता प्रदान की गई है। इससे महिलाओं को अधिक स्थायी आय सृजन गतिविधियों की ओर बढ़ने में मदद मिली है।

कर्नाटक में स्थानीय बाज़ार, वास्तविक आय

कर्नाटक के गडग जिले में महिला उत्पादकों को एक आम समस्या का सामना करना पड़ रहा था। वे उत्पाद तो बना सकती थीं, लेकिन उन्हें बेचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी और बिचौलियों के कारण उन्हें मुनाफा गंवाना पड़ता था। अपने स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के संघ के माध्यम से, 32 स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने एक साथ मिलकर एक साप्ताहिक ग्राम बाज़ार स्थापित किया। अब 80 से अधिक व्यापारी नियमित रूप से इसमें भाग लेते हैं, जिससे खरीद-बिक्री के लिए एक स्थिर स्थानीय मंच तैयार हो गया है।

इसके परिणाम साफ हैं। साप्ताहिक कारोबार ₹80,000 से अधिक हो गया है और कुल लेनदेन ₹30 लाख से अधिक हो गया है।

गुजरात में प्रशिक्षण से आजीविका

गुजरात के कच्छ जिले में, स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने संगठित प्रशिक्षण और सामूहिक प्रयासों के ज़रिए अनियमित, कम वेतन वाली नौकरियों से आगे बढ़कर आत्मनिर्भरता हासिल की। ​​कौशल विकास पहलों ने उन्हें स्थानीय स्तर पर आय सृजित करने वाली गतिविधियों में शामिल होने में सक्षम बनाया। समूह में काम करने से निरंतरता सुनिश्चित हुई, उत्पादन, बिक्री और आय समय के साथ अधिक स्थिर हो गई।

यह बदलाव धीरे-धीरे लेकिन लगातार हुआ। घरेलू आय में सुधार हुआ, अनिश्चित नौकरियों पर निर्भरता कम हुई और महिलाएं अपने परिवारों की आर्थिक स्थिति में लगातार योगदान देने लगीं। इससे भी ज़रुरी बात यह है कि यह बदलाव सामूहिक था। आजीविका व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि साझा प्रयासों और सहयोग से बनी।

लखपति दीदी योजना

पिछले एक दशक में, महिला नेतृत्व वाले स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) ग्रामीण आर्थिक भागीदारी के लिए एक प्रमुख शक्ति बन गए हैं। लखपति दीदी पहल का मकसद महिलाओं को कम से कम 1 लाख रुपये की स्थायी वार्षिक आय प्राप्त करने में सहायता करना है।

इसी आधार पर, यह पहल अब 34 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों, 757 जिलों, 7,193 ब्लॉकों, 2.56 लाख पंचायतों और 5.94 लाख गांवों तक फैली हुई है। इस व्यापक उपस्थिति को 10.07 करोड़ सदस्यों वाले 93.85 लाख एसएचजी के मजबूत नेटवर्क का समर्थन प्राप्त है। सरकार ने 6 करोड़ लखपति दीदियों के सृजन का लक्ष्य रखा है।
इन समूहों ने बचत, ऋण, आजीविका और सामुदायिक सहायता तक पहुंच का विस्तार किया है, जिससे महिलाएं स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं और घरेलू निर्णय लेने में अधिक सक्रिय रूप से भाग ले सकें।

प्रधानमंत्री जन धन योजना

बैंक खाता खोलना हमेशा सुनिश्चित नहीं था, खासकर महिलाओं के लिए। बचत अक्सर औपचारिक प्रणालियों से बाहर, नकद में रखी जाती थी और बुनियादी वित्तीय सेवाएं पहुंच से बाहर रहती थीं। प्रधानमंत्री जन धन योजना ने बैंकिंग को सरल, सुलभ और सार्वभौमिक बनाकर इसे बदल दिया।

2014 में शुरू की गई यह योजना शून्य-बैलेंस खाते खोलने और परिवारों को औपचारिक बैंकिंग से जोड़ने पर केंद्रित है। समय के साथ, यह वित्तीय समावेशन की नींव बन गई है, जिससे बचत, ऋण, बीमा और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण तक पहुंच संभव हो पाई है।

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई)

कई महिला उद्यमियों के लिए, औपचारिक ऋण तक पहुंच बना पाना अक्सर व्यवसाय शुरू करने या विस्तार करने में सबसे बड़ी बाधा होती थी। 2015 में शुरू की गई प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई) इस कमी को दूर करती है। सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए बिना गारंटी वाले ऋणों के माध्यम से, यह शिशु, किशोर, तरुण और तरुण प्लस जैसी श्रेणियों में फैली हुई है। यह वर्गीकरण उद्यमों के विकास के विभिन्न चरणों और वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करता है।

कुल स्वीकृत ऋण 2015-16 में ₹ 3.49 करोड़ से बढ़कर मार्च 2026 तक ₹ 57.79 करोड़ हो गए। कुल स्वीकृत राशि 2015-16 में ₹ 1.37 लाख करोड़ से बढ़कर मार्च 2026 तक ₹ 40.07 लाख करोड़ हो गई।

पिछले कुछ वर्षों में, यह योजना महिला नेतृत्व वाले उद्यमशीलता के एक प्रमुख प्रेरक के रूप में उभरी है।

प्रधानमंत्री पीएम स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि (स्वनिधि) योजना

महामारी ने कई शहरी महिला स्ट्रीट वेंडर्स की आय को बाधित किया और उनके छोटे व्यवसायों को खतरे में डाल दिया। पीएम स्वानिधि योजना जून 2020 में शुरू की गई थी, ताकि कार्यशील पूंजी सहायता के ज़रिए उनके व्यवसायों को दोबारा शुरू करने और उसे स्थिर करने में मदद मिल सके। यह योजना स्ट्रीट वेंडर्स को बिना किसी गारंटी के कार्यशील पूंजी ऋण और औपचारिक वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

योजना के तहत पहली किश्त में ₹15,000 तक का ऋण दिया जाता है, जिसके बाद समय पर पुनर्भुगतान करने पर ₹25,000 और ₹50,000 तक के उच्च ऋण की पात्रता भी मिलती है। विक्रेताओं को 7% ब्याज सब्सिडी, डिजिटल कैशबैक प्रोत्साहन और यूपीआई से जुड़े रुपे क्रेडिट कार्ड भी मिलते हैं।

पिछले छह वर्षों में, 1.15 करोड़ से अधिक ऋण स्वीकृत किए गए हैं, जिससे लगभग 74.9 लाख स्ट्रीट वेंडर्स को लाभ मिला है। इस योजना के लाभार्थियों में 46% महिलाएं हैं।

स्टैंड-अप इंडिया

अप्रैल 2016 में शुरू की गई स्टैंड-अप इंडिया योजना महिलाओं को नए उद्यम स्थापित करने के लिए औपचारिक ऋण उपलब्ध कराती है। यह योजना उन्हें छोटे व्यवसायों से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में बड़े, सुनियोजित व्यवसायों तक पहुंचने में सहायता करती है। महिलाएं 10 लाख रुपये से लेकर 1 करोड़ रुपये तक का ऋण प्राप्त कर सकती हैं। ऋण चुकाने की अवधि सात साल तक है, जिसमें ऋण स्थगन अवधि भी शामिल है। इससे स्वतंत्र व्यवसाय शुरू करना या उसका विस्तार करना आसान हो जाता है।

स्टैंड-अप इंडिया पोर्टल महिलाओं को आवेदन संबंधी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण संपर्क और परामर्श सेवाएं भी प्रदान करता है। इस योजना के तहत महिला नेतृत्व वाले उद्यमों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। यह योजना मार्च 2025 तक परिचालन में रही, तब तक इसने 2.05 लाख से अधिक महिला उद्यमियों को सहायता प्रदान की थी। इस अवधि के दौरान, महिला खातों की संख्या 2018 में 55 हजार से बढ़कर 2024 में 1.90 लाख हो गई। साथ ही, स्वीकृत राशि 12 करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 44 करोड़ रुपये हो गई।

नमो ड्रोन दीदी योजना

नमो ड्रोन दीदी योजना के ज़रिए आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकी तक पहुंच अब महिलाओं के हाथों में है। नवंबर 2023 में शुरू की गई यह योजना स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) की महिलाओं को उन्नत उपकरण सीधे उपलब्ध कराती है।

महिलाओं को उर्वरक और कीटनाशक छिड़काव जैसी गतिविधियों के लिए ड्रोन चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इससे आय का एक नया स्रोत बनता है और साथ ही कृषि कार्यों में दक्षता भी बढ़ती है।

सरकार ने 2023-24 से 2025-26 की अवधि के लिए ₹1,261 करोड़ के परिव्यय के साथ इस योजना को मंजूरी दी। इसका मकसद महिला स्वयं सहायता समूहों को 15,000 ड्रोन उपलब्ध कराना और महिला नेतृत्व वाले कृषि सेवा प्रदाताओं का एक नेटवर्क तैयार करना है। 2023-24 में स्वयं सहायता समूहों की ड्रोन दीदियों को 1094 ड्रोन वितरित किए गए। सभी चयनित महिलाओं को नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) द्वारा अधिकृत रिमोट पायलट प्रशिक्षण संगठनों में प्रशिक्षित किया गया है। यह कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका में एक बड़ा बदलाव दर्शाता है।

वुमनिया (जीईएम)

महिला उद्यमियों, विशेषकर स्वयं सहायता समूहों या लघु उद्यमों से जुड़ी महिलाओं के लिए बाजार तक पहुंच अक्सर सीमित रही है। वुमनिया पहल सरकारी ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) के माध्यम से महिलाओं को सीधे सरकारी खरीद से जोड़कर इस समस्या का समाधान करती है।

2019 में शुरू की गई इस पहल के तहत महिलाओं के लिए हस्तशिल्प, हथकरघा और गृह सज्जा जैसे उत्पादों को सूचीबद्ध करने और बेचने के लिए एक समर्पित डिजिटल इंटरफ़ेस बनाया गया है। इन वस्तुओं को भारत में कहीं भी केंद्रीय मंत्रालयों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा सीधे खरीदा जा सकता है। यह बिचौलियों को हटाकर औपचारिक बाजारों में प्रत्यक्ष भागीदारी को सक्षम बनाता है।

भागीदारी का पैमाना और विस्तार योजना की व्यापक स्वीकृति को दर्शाता है:

  • जीईएम पर 2.1 लाख से अधिक महिला-नेतृत्व वाले उद्यम पंजीकृत हैं
  • वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग 13.7 लाख ऑर्डर प्राप्त हुए
  • महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों को ₹28,000 करोड़ से अधिक मूल्य के अनुबंध दिए गए, जो वित्त वर्ष 2024-25 की तुलना में 27.60% की वृद्धि दर्शाता है

वुमानिया एक मजबूत तंत्र के रूप में विकसित हुआ है, जिसने जीईएम के कुल ऑर्डर मूल्य का 5.6% हिस्सा हासिल किया है, जो अनिवार्य 3% खरीद लक्ष्य से अधिक है।

स्वयं सहायता उद्यमी केंद्र (शी-मार्ट)

ऋण और कौशल तक पहुंच होने के बावजूद, कई ग्रामीण महिलाओं को अपने उत्पादों को बेचने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित शी-मार्ट योजना, स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) व्यवस्था के तहत महिलाओं के लिए समर्पित खुदरा स्थान बनाकर इस समस्या का समाधान करती है।

ये सामुदायिक स्वामित्व वाले आउटलेट हैं, जिनका प्रबंधन स्वयं सहायता समूह संघों द्वारा किया जाएगा। ये महिलाओं को सीधे उपभोक्ताओं को बेचने, अपने उत्पादों की दृश्यता बढ़ाने और बिचौलियों पर निर्भरता कम करने की सुविधा प्रदान करते हैं।

सरकार ने इस पहल के माध्यम से 1 करोड़ महिलाओं को लाभान्वित करने का लक्ष्य रखा है। यह पहल महिलाओं को लघु आजीविका गतिविधियों से स्थायी उद्यमों के स्वामित्व और प्रबंधन की ओर अग्रसर होने में सक्षम बनाती है।

सुरक्षा, गरिमा और जीवन स्तर

2014 से, सरकार ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें सुरक्षा और गरिमा को रोजमर्रा के जीवन की गुणवत्ता से जोड़ा गया है। संस्थागत समर्थन को मजबूत करने के साथ-साथ आवास, स्वच्छता, स्वच्छ जल और अन्य आवश्यक सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

इन उपायों से सुरक्षा में सुधार हुआ है, रोजमर्रा की कठिनाइयाँ कम हुई हैं और महिलाओं के लिए, विशेष रूप से कमजोर और वंचित समुदायों में, अधिक अनुकूल परिस्थितियाँ बनी हैं।

मिशन शक्ति: एक समन्वित ढांचा

अप्रैल 2022 से कार्यान्वित मिशन शक्ति, देश भर में महिलाओं की सुरक्षा, संरक्षण और सशक्तिकरण सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्थाओं को मजबूत कर रहा है। यह अपने दो क्षेत्रों - संबल (सुरक्षा) और सामर्थ्य (सशक्तिकरण) के माध्यम से तत्काल सहायता को दीर्घकालिक क्षमता निर्माण के साथ जोड़ता है। संबल के अंतर्गत प्रमुख घटक हैं:

वन स्टॉप सेंटर (ओएससी)

महिला हेल्पलाइन (181)

नारी अदालत

सामर्थ्य के अंतर्गत कुछ प्रमुख घटक हैं:

शक्ति सदन

सखी निवास

राष्ट्रीय क्रेच योजना (पालना)

महिलाओं के पोषण और ज्ञान-आधारित उन्नति, अंतिम-छोर तक डिलीवरी और क्षमता प्राप्ति के लिए सहायक कार्रवाई (संकल्प: एचईडब्ल्यू (महिला सशक्तिकरण केंद्र))

फ्रंटलाइन सहायता को मजबूत करना:

देशभर में 973 से अधिक वन स्टॉप सेंटर कार्यरत हैं

14.49 लाख से अधिक महिलाओं को चिकित्सा, कानूनी, परामर्श और आश्रय सहायता प्रदान की गई है

• 24×7 सहायता प्रदान करने वाली महिला हेल्पलाइन (181) के माध्यम से 3 करोड़ से अधिक महिलाओं को सहायता प्रदान की गई है

त्वरित प्रतिक्रिया के लिए आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली (112) के साथ एकीकृत

न्याय तक पहुंच में सुधार और पुलिस व्यवस्था:

भारत भर के पुलिस स्टेशनों में 15,000 से अधिक महिला सहायता डेस्क, पहुंच और विश्वास में सुधार ला रही हैं

आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली (112) तत्काल, प्रौद्योगिकी-आधारित सहायता सुनिश्चित करती है

सामुदायिक और डिजिटल हस्तक्षेप:

ग्राम पंचायत स्तर पर नारी अदालतें, मध्यस्थता के ज़रिए स्थानीय विवादों का समाधान करती हैं

शी-बॉक्स पोर्टल, कार्यस्थल पर उत्पीड़न की ऑनलाइन रिपोर्टिंग को सक्षम बनाता है

डिजिटल प्लेटफॉर्म, शिकायत निवारण को तेज और अधिक सुलभ बनाते हैं

ये सभी हस्तक्षेप मिलकर एक उत्तरदायी सहायता प्रणाली का निर्माण कर रहे हैं, जिससे समय पर सहायता, संस्थानों में अधिक विश्वास और महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित हो रहा है।

स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम)

स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) सुरक्षित स्वच्छता तक पहुंच में क्रांतिकारी बदलाव लाया है, जिससे महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मान में खासा सुधार हुआ है। अक्टूबर 2014 में शुरू किया गया यह मिशन ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में खुले में शौच को समाप्त करने और अपशिष्ट प्रबंधन को मजबूत करने पर केंद्रित है।

प्रमुख उपलब्धियां:

अक्टूबर 2019 में राष्ट्रव्यापी खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) का दर्जा सफलतापूर्वक प्राप्त किया गया।

स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) के तहत 6.3 लाख से अधिक सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण किया गया।

स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत 2.7 लाख से अधिक सामुदायिक स्वच्छता परिसरों का निर्माण किया गया।

लगभग 16 करोड़ परिवारों को स्वच्छ नल के पानी की सुविधा मिली, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक महिला और प्रत्येक परिवार के स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा मिला।

12 करोड़ से अधिक व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों का निर्माण किया गया।

5 लाख से अधिक गांवों को ओडीएफ प्लस (मॉडल) घोषित किया गया। एक ओडीएफ प्लस गांव वह गांव है, जो खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) स्थिति बनाए रखता है, ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन सुनिश्चित करता है और देखने में स्वच्छ दिखता है।

5.3 लाख से अधिक गांवों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की व्यवस्था है और 5.4 लाख गांवों में तरल अपशिष्ट प्रबंधन की व्यवस्था है।

प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई)

प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) का उद्देश्य पात्र ग्रामीण और शहरी परिवारों को बुनियादी सुविधाओं से युक्त पक्के मकान उपलब्ध कराकर "सभी के लिए आवास" सुनिश्चित करना है। प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी (पीएमएवाई-यू) 2015 में शुरू की गई थी। इसके बाद 2016 में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमएवाई-जी) शुरू की गई।

पीएमएवाई-ग्रामीण योजना के तहत, मार्च 2026 तक, 4.15 करोड़ मकान आवंटित किए जा चुके हैं, 3.90 करोड़ मकान स्वीकृत किए गए हैं और 2.99 करोड़ मकान पूरे हो चुके हैं। इन सभी परियोजनाओं के लिए 4.03 लाख करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय सहायता प्रदान की गई है।

प्रमुख उपलब्धियां:

पीएमएवाई-यू 2.0 के अंतर्गत 96% घर महिलाओं को आवंटित किए गए

कुल स्वीकृत घर – 125.31 लाख

कुल चालू घर – 119.35 लाख

कुल पूर्ण घर – 98.10 लाख

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई)

मई 2016 में शुरू की गई यह योजना गरीब परिवारों की महिलाओं को बिना जमा राशि के एलपीजी कनेक्शन प्रदान करती है, जिससे स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन को अपनाने को बढ़ावा मिलता है। इसका मकसद घर के अंदर वायु प्रदूषण को कम करना और महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा और जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार करना है। पिछले एक दशक में, इस योजना ने देश भर में लाखों लोगों के जीवन को बदला है। यह योजना आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में एलपीजी के लगातार इस्तेमाल के लिए रिफिल सहायता और लक्षित सब्सिडी भी प्रदान करती है।

पीएमयूवाई के तहत जारी किए गए कुल एलपीजी कनेक्शन (14 मई 2026 तक): 10.55 करोड़

पीएमयूवाई के तहत अतिरिक्त 25 लाख एलपीजी कनेक्शन के लक्ष्य के अंतर्गत 22.42 लाख कनेक्शन जारी किए जा चुके हैं (4 मई 2026 तक)।

जल जीवन मिशन (जेजेएम)

अगस्त 2019 में शुरू किए गए जल जीवन मिशन ने घरों में नल के पानी के सुचारू कनेक्शन (हर घर जल) सुनिश्चित करके महिलाओं के दैनिक जीवन में काफी सुधार किया है। पारंपरिक रूप से, पानी लाने की जिम्मेदारी महिलाओं और लड़कियों पर ही रही है, जिसके लिए उन्हें अक्सर लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी और प्रतिदिन कई घंटे समर्पित करने पड़ते थे।

लगभग 15.84 करोड़ परिवारों को नल का स्वच्छ पानी मिला, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक महिला और प्रत्येक परिवार के स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा मिला। जेजेएम ने इस शारीरिक श्रम को कम किया है, जिससे महिलाओं को शिक्षा, आय सृजन गतिविधियों और देखभाल के लिए समय मिल सका। इस मिशन को 2028 तक बढ़ाया गया है, जिसका लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों में 100% नल के पानी के कनेक्शन उपलब्ध कराना है।

लंबी पैदल यात्रा से स्थायी परिवर्तन तक: नल के पानी के ज़रिए लक्ष्मी मुर्मू की गरिमापूर्ण यात्रा

पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाके की लक्ष्मी मुर्मू की सफलता की कहानी महिलाओं के जीवन पर मिशन के परिवर्तनकारी प्रभाव को दर्शाती है। पहले, लक्ष्मी को पानी लाने के लिए रोज़ाना लंबा सफर तय करना पड़ता था। यह एक शारीरिक रूप से कठिन और समय लेने वाला काम था, जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा और आय अर्जित करने वाली गतिविधियों में उनकी क्षमता सीमित हो गई। मिशन के तहत कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन (एफएचटीसी) उपलब्ध कराए जाने से अब उनके परिवार को सुरक्षित पेयजल मिल रहा है। इससे उनकी दैनिक मेहनत काफी कम हो गई है, उनके स्वास्थ्य और खुशहाली में भी सुधार हुआ है और उन्हें उत्पादक कार्यों के लिए समय मिल गया है। इस पहल ने यह दिखाया है कि पानी जैसी बुनियादी सेवाओं तक पहुंच किस प्रकार सार्थक सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

भागीदारी, प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की क्षमता

पिछले एक दशक में, शासन और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी में लगातार वृद्धि हुई है। यह बदलाव न केवल मतदान के तरीकों में, बल्कि विभिन्न संस्थानों में नेतृत्व, प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की भूमिकाओं में भी साफ तौर पर दिखाई दिया।

2024 में, 47 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाताओं में महिलाओं की हिस्सेदारी कुल मतदाताओं का 48.62% थी। उनका मतदान प्रतिशत 65.78% रहा, जो पुरुषों से थोड़ा अधिक था। चुनावी उम्मीदवारों के रूप में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी और 2024 में लगभग 10% हो गई।

विधानमंडलों में भी महिलाओं की उपस्थिति समय के साथ अधिक स्पष्ट होती गई है। 2024 में, 75 महिलाएं लोकसभा के लिए चुनी गईं। राज्यसभा सदस्यों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 17% थी।

सबसे बड़ा परिवर्तन जमीनी स्तर पर हुआ। आज, पंचायती राज संस्थाओं में 14.5 लाख से अधिक महिलाएं निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में कार्यरत हैं, जो कुल का लगभग 46% है। उनके नेतृत्व ने पेयजल, स्वच्छता, पोषण, स्कूलों और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने को मजबूत किया है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 इस दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम था। इस अधिनियम ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण प्रदान किया। इससे विधायी निकायों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए एक मजबूत ढांचा तैयार हुआ है।

सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया कि राष्ट्रीय संस्थानों में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़े। 2025 में, 17 महिला कैडेटों के पहले बैच ने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी से स्नातक की उपाधि प्राप्त की, जो सशस्त्र बलों में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। उनकी नियुक्ति 2022 में महिलाओं के एनडीए में शामिल होने के बाद से आए एक बड़े बदलाव का आधार बनी। 2026 की शुरुआत तक, कुल 158 महिला कैडेट अकादमी में शामिल हो चुकी थीं।

ये सभी बदलाव एक व्यापक बदलाव को दर्शाते हैं। महिलाएं भागीदारी से प्रतिनिधित्व और नेतृत्व की ओर बढ़ी हैं, जिससे शासन अधिक समावेशी और रोजमर्रा की वास्तविकताओं का अधिक प्रतिनिधित्व करने वाला बन गया है।

नारी शक्ति विकसित भारत की नींव के रूप में

पिछले 12 वर्षों में, महिला सशक्तिकरण पर सरकार द्वारा दिए गए निरंतर ध्यान की वजह से सामाजिक कल्याण को एक बुनियादी सुरक्षा सुविधा से नेतृत्व, गरिमा और अवसरों को बढ़ावा देने वाले मंच में बदल दिया गया है।

जैसे जैसे भारत 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, इस यात्रा में महिलाओं की भूमिका और अहम होती जा रही है। सभी क्षेत्रों में महिलाएं कामगारों, उद्यमियों, किसानों, नवप्रवर्तकों और नेताओं के रूप में योगदान दे रही हैं। उनकी भागीदारी स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत कर रही है, परिवारों की मजबूती बढ़ा रही है और सामुदायिक निर्णयों को प्रभावित कर रही है।

सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि महिलाओं को शिक्षा, आय और निर्णय लेने का अधिकार मिले, जिसका प्रभाव उनके परिवारों, समुदायों और आने वाली पीढ़ियों तक फैले।

उद्यमिता से लेकर जमीनी स्तर के शासन तक, घर से लेकर कार्यालयों के बोर्डरूम तक, नारी शक्ति अधिक ताकत, स्वतंत्रता और अटूट उद्देश्य की भावना के साथ आगे बढ़ रही है। विकसित भारत न केवल इस देश की महिलाओं की सेवा करेगा, बल्कि इसका नेतृत्व भी वे ही करेंगी।

संदर्भ

Press Information Bureau

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1999713&reg=3&lang=2#:~:text=The%20Female%20enrolment%20has%20increased,32%25)%20in%202014%2D15

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https://pmsvanidhi.mohua.gov.in/

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