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 नदी बेसिन प्रबंधन योजना: जल प्रशासन को मजबूत करना

Posted On: 17 APR 2026 12:51PM



प्रमुख बिंदु

  • आरबीएम योजना सतही और भूजल संसाधनों का टिकाऊ उपयोग, संरक्षण और विकास सुनिश्चित करने के लिए बेसिन स्तर पर योजना बनाने को बढ़ावा देती है।
  • यह योजना 2183 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत के साथ  2026–27 से 2030–31 की अवधि तक जारी रहेगी और इसे पूरी तरह सरकार द्वारा वित्तपोषित किया जाएगा।
  • यह योजना  ब्रह्मपुत्र, बराक, तीस्ता और सिंधु जैसे प्रमुख नदी बेसिनों को प्राथमिकता देती है।
  • योजना की सटीकता और भविष्य की परियोजनाओं को बेहतर बनाने के लिए जीआईएस, रिमोट सेंसिंग, LiDAR और ड्रोन आधारित सर्वेक्षण जैसे आधुनिक उपकरणों का उपयोग किया जा रहा है।

 

परिचय

जल सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक है, जो पारिस्थितिकी तंत्र, आजीविका और आर्थिक विकास में सहायता प्रदान करता है। यह कृषि, उद्योग, ऊर्जा उत्पादन और समग्र मानव कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जैसे-जैसे सामाजों की विभिन्न उद्देश्यों के लिए जल पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है, जल के कुशल और समन्वित उपयोग की आवश्यकता लगातार अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है।

नदी बेसिन प्रबंधन (आरबीएम) एक व्यापक योजना है, जिसका उद्देश्य नदी बेसिनों में जल संसाधनों का प्रबंधन, संरक्षण, सुधार और टिकाऊ उपयोग सुनिश्चित करना है। इन संसाधनों में नदियाँ, झीलें, धाराएँ, भूजल और उनसे जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र शामिल हैं। यह दृष्टिकोण जल संसाधनों की एकीकृत योजना और विकास पर जोर देता है, ताकि उनका सर्वोत्तम उपयोग किया जा सके। भारत में, जहाँ नदी प्रणालियाँ जटिल और आपस में जुड़ी हुई हैं, वहाँ बेसिन स्तर पर योजना बनाना बाढ़, कटाव, असमान जल वितरण और पारिस्थितिक क्षरण जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए अत्यंत आवश्यक हो गया है। इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, नदी बेसिन प्रबंधन (आरबीएम) योजना को व्‍यवस्थित  और वैज्ञानिक तरीके से लागू किया जा रहा है

नदी बेसिन प्रबंधन (आरबीएम) योजना का अवलोकन

आरबीएम जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग की केंद्रीय क्षेत्र योजना है। इस योजना का उद्देश्य नदी बेसिन स्तर पर जल संसाधनों की एकीकृत योजना बनाना, जांच और विकास को बढ़ावा देना है, जिसमें सतही जल और भूजल दोनों प्रणालियाँ शामिल हैं। इस योजना का क्रियान्वयन तीन प्रमुख संगठनों ब्रह्मपुत्र बोर्ड, केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) और राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (एनडब्ल्यूडीए) के माध्यम से किया जाता है और  यह योजना बेसिन मास्टर प्लान तैयार करने, परियोजनाओं के सर्वेक्षण और जांच, तथा बहुउद्देशीय परियोजनाओं की योजना बनाने जैसी गतिविधियों में सहायता करती है।

भौगोलिक दायरा और प्राथमिकता वाले क्षेत्र

आरबीएम योजना मुख्य रूप से रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तथा जल से भरपूर, लेकिन अपेक्षाकृत अविकसित क्षेत्रों पर केंद्रित है, विशेष रूप से:

पूर्वोत्‍तर क्षेत्र के नदी बेसिन।
जम्मू एवं कश्मीर/लद्दाख में सिंधु बेसिन
ब्रह्मपुत्र, बराक, तीस्ता और सिंधु जैसे प्रमुख नदी बेसिन।

इन बेसिनों को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि ये निम्नलिखित मामलों में महत्वपूर्ण हैं:

राष्ट्रीय जल सुरक्षा

सीमा पार जल प्रबंधन
बाढ़ नियंत्रण और कटाव प्रबंधन
पारिस्थितिक स्थिरता

यह योजना जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड जैसे राज्यों में मौजूद क्षमता की कमी को भी दूर करती है, जहाँ परियोजनाओं की योजना और विकास के लिए केंद्र सरकार की सहायता की आवश्यकता होती है

वित्तीय प्रावधान और अवधि

आरबीएम योजना को 2183 करोड़ रुपये के पूर्णतः वित्तपोषित अनुमानित वित्तीय परिव्यय के साथ 16वें वित्त आयोग की अवधि के दौरान 2026–27 से 2030–31 तक जारी रखने का प्रस्ताव है। पिछले चरण में 2021–22 से 2025–26 तक इस योजना के लिए कुल 1276 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया था। यह एकीकृत जल संसाधन योजना और विकास के प्रति निरंतर तथा बढ़ी हुई प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

योजना के उद्देश्य

नदी बेसिन प्रबंधन योजना को बेसिन स्तर पर जल संसाधन योजना और विकास से जुड़ी विभिन्न चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार किया गया है। इस योजना का उद्देश्य सिंचाई, जलविद्युत और बाढ़ प्रबंधन में सहायता देते हुए जल के टिकाऊ उपयोग को बढ़ावा देना है। ये उद्देश्य इस योजना के समग्र योजना निर्माण और क्रियान्वयन का मार्गदर्शन करते हैं

 

 

 

संस्थागत ढाँचा

आरबीएम  योजना में दो व्यापक घटक शामिल हैं :

ब्रह्मपुत्र बोर्ड घटक

ब्रह्मपुत्र बोर्ड पूर्वोत्‍तर क्षेत्र में बेसिन स्तर की योजना और बाढ़ प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके प्रमुख कार्यों में शामिल हैं:

सर्वेक्षण और जांच करना तथा मास्टर प्लान तैयार करना

  • समय-समय पर पूर्ण या आंशिक रूप से पुनरीक्षण करना।
  • बाढ़ नियंत्रण, तट कटाव की रोकथाम और जल निकासी में सुधार के लिए कार्य करना, साथ ही सिंचाई, जलविद्युत, नौवहन और अन्य उपयोगी उद्देश्यों हेतु जल संसाधनों के विकास और उपयोग को ध्यान में रखना।
  • जहाँ तक संभव हो, ऐसे विकास के लिए आवश्यक कार्यों और उपायों को स्पष्ट रूप से दर्शाना
  • केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित मास्टर प्लान में प्रस्तावित बाँधों और अन्य परियोजनाओं के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट और अनुमान तैयार करना

बोर्ड निम्न कार्य भी करता है:

  • महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कटाव-रोधी कार्य (जैसे माजुली द्वीप और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा) ।
  • जल निकासी के विकास की योजनाएँ
  • बाढ़ प्रवण क्षेत्रों में ऊँचे प्लेटफॉर्म का निर्माण
  • टिकाऊ  उपयोग के लिए जल संसाधनों का  विकास और प्रबंधन करना, (मूल निवासियों की जल प्रबंधन तकनीकों का वैज्ञानिक प्रसार और स्प्रिंगशेड प्रबंधन कार्य)
  • जल संसाधन प्रबंधन/विकास में क्षमता निर्माण करना (पूर्वोत्‍तर क्षेत्र के अधिकारियों और ब्रह्मपुत्र बोर्ड के अधिकारियों का एनईएचएआरआई में प्रशिक्षण) ।

जल संसाधन विकास योजना की जांच (आईडब्ल्यूआरडीएस)

आईडब्ल्यूआरडीएस घटक का क्रियान्वयन निम्न के माध्यम से किया जाता है:

केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी)

आरबीएम योजना के अंतर्गत केंद्रीय जल आयोग जल संसाधन परियोजनाओं के लिए सर्वेक्षण, जांच तथा विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने का कार्य करता है। इस योजना में निम्‍नलिखिरत में डीपीआर तैयार करने को प्राथमिकता दी जाती है:

  • सिंधु बेसिन
  • ब्रह्मपुत्र बेसिन
  • बराक बेसिन
  • तीस्ता बेसिन

परियोजनाएँ विशेष रूप से पूर्वोत्‍तर और जम्मू -कश्मीर में दूरस्थ और दुर्गम भौगोलिक क्षेत्रों में स्थित हैं, जहाँ कार्य करने के मौसम सीमित और लॉजिस्टिक्स चुनौतीपूर्ण होते हैं डीपीआर के पूर्ण होने से निम्नलिखित परिणाम अपेक्षित होते हैं:

  • सिंचाई क्षमता का विस्तार
  • जलविद्युत उत्पादन
  • बेहतर बाढ़ नियंत्रण
  • लाभान्वित क्षेत्रों का सामाजिक-आर्थिक विकास
  • राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (एनडब्ल्यूडीए)

एनडब्ल्यूडीए घटक विशेष रूप से नदियों को जोड़ने (आईएलआर) कार्यक्रम के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर जल संसाधन योजना पर केंद्रित है । इसके प्रमुख कार्यों में शामिल हैं:

  • पूर्व-संभाव्यता रिपोर्ट (पीएफआर), व्यवहार्यता रिपोर्ट (एफआर) और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करना। 
  • जल संतुलन अध्ययन संचालित करना
  • अंतर-बेसिन जल हस्तांतरण परियोजनाओं की योजना बनाना

कार्य के प्रमुख क्षेत्र

आरबीएम ढाँचे के अंतर्गत सिलसिलेवार समन्वित गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं। इन प्रयासों में बेसिन स्तर की योजना बनाना, परियोजनाओं की जांच करना, तथा बाढ़, कटाव और जल निकासी प्रणालियों के प्रबंधन के लिए हस्तक्षेप करना शामिल है।

बेसिन योजना

बेसिन योजना इस ढाँचे की नींव है और इसमें नदी बेसिन के मास्टर प्लान तैयार करना तथा समय-समय पर उन्‍हें अद्यतन करना शामिल है। ये योजनाएँ प्रत्येक बेसिन के भीतर जल संसाधनों के विकास, उपयोग और संरक्षण के लिए एक दीर्घकालिक रोडमैप प्रदान करती हैं।

सर्वेक्षण और जांच

सही और पर्याप्त जानकारी के साथ निर्णय लेने में मदद के लिए बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण और जांच का काम किया जाता है। इसमें ड्रिलिंग और ड्रिफ्टिंग ऑपरेशन, जलविज्ञान और स्थलाकृतिक सर्वेक्षण जैसी फील्ड जांच तथा मास्टर प्लान और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने के लिए आवश्यक प्राथमिक और द्वितीयक आँकड़ों का संग्रह शामिल होता है।

परियोजना विकास

परियोजना विकास बहुउद्देशीय जल संसाधन परियोजनाओं के लिए डीपीआर तैयार करने पर केंद्रित होता है। इसमें बाढ़ और कटाव प्रबंधन, जल निकासी विकास तथा परियोजनाओं का व्यवस्थित और सुचारु क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए अन्य पहलों की योजना बनाना भी शामिल है।

बाढ़ और कटाव प्रबंधन

संवेदनशील क्षेत्रों में बाढ़ और नदी तट कटाव के प्रभाव को कम करने के लिए विशेष उपाय लागू किए जाते हैं। इनमें कटाव-रोधी कार्य, बाढ़ नियंत्रण के उपाय, तथा जैव-अभियांत्रिकी हस्तक्षेप शामिल हैं, जिनका उद्देश्य समुदायों, बुनियादी ढाँचे और कृषि भूमि की सुरक्षा करना है।

जल निकासी का विकास  

जल निकासी विकास गतिविधियाँ उन क्षेत्रों में जल प्रवाह को बेहतर बनाने और जलभराव की समस्या को दूर करने के लिए की जाती हैं जहाँ जल निकासी व्यवस्था बाधित होती है। ये प्रयास भूमि की उत्पादकता बढ़ाने और ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों में बेहतर जल प्रबंधन को समर्थन देने में मदद करते हैं।

समुदाय-आधारित हस्तक्षेप

समुदाय-आधारित पहलें स्थानीय जल प्रबंधन प्रथाओं को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनमें स्थानीय और जनजातीय समुदायों के बीच बेहतर जल उपयोग को बढ़ावा देना, साथ ही स्प्रिंगशेड प्रबंधन तथा जल निकायों और बेसिन पारिस्थितिकी तंत्र का विकास करने जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं।

योजना का रणनीतिक महत्व

आरबीएम योजना उन नदी बेसिनों पर केंद्रित है, जो राष्ट्रीय जल सुरक्षा, सीमा पार नदी प्रबंधन, पूर्वोत्‍तर के बाढ़-प्रवण क्षेत्रों तथा हिमालयी नदियों की जलविद्युत क्षमता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

यह योजना उन कम विकसित राज्यों को भी समर्थन प्रदान करती है, जिनमें जल संसाधन योजना बनाने के लिए वित्तीय और तकनीकी क्षमता का अभाव होता है.

आरबीएम योजना के अंतर्गत प्रगति और प्रमुख उपलब्धियाँ (2021–26)

समय के साथ, नदी बेसिन प्रबंधन ढाँचे के अंतर्गत निरंतर किए गए प्रयासों के परिणाम जमीनी स्तर पर स्पष्ट दिखने लगे हैं। बेहतर बेसिन अध्ययन से लेकर बाढ़ और कटाव नियंत्रण उपायों में सुधार तक, ये उपलब्धियाँ निरंतर संस्थागत और तकनीकी प्रगति को दर्शाती हैं।

  • बेसिन योजना और मास्टर प्लान
  • ब्रह्मपुत्र और बराक बेसिनों की प्रमुख नदी प्रणालियों के लिए नदी बेसिन मास्टर प्लान तैयार और अद्यतन करना।
  • एकीकृत जल संसाधन योजना और बाढ़ प्रबंधन रणनीतियों को समर्थन देने हेतु बेसिन-स्तरीय अध्ययन करना।
  •  ब्रह्मपुत्र नदी के कारण बाढ़ और कटाव से माजुली द्वीप को पर्याप्‍त सुरक्षा प्रदान करना।

 

सुमोइमारी, माजुली, असम में नदी तट को मजबूत करने का कार्य संपन्‍न होने के बाद की स्थिति

  • परियोजनाओं का सर्वेक्षण और जांच

पूर्वोत्‍तर क्षेत्र और हिमालयी क्षेत्रों में स्थित नदी बेसिनों में व्यापक सर्वेक्षण और जांच कार्य किए गए।

क्षेत्रीय जांचों में स्थलाकृतिक सर्वेक्षण, भूवैज्ञानिक जांच, और जलविज्ञान आँकड़ों का संग्रह शामिल रहा।

ये अध्ययन भविष्य की सिंचाई, जलविद्युत और बहुउद्देशीय परियोजनाओं की योजना बनाने का आधार बनते हैं।

  • डीपीआर की तैयारी (सीडब्ल्यूसी घटक)
  • ब्रह्मपुत्र बेसिन, बराक बेसिन, तीस्ता बेसिन और सिंधु बेसिन (जम्मू-कश्मीर/लद्दाख) में विविध जल संसाधन परियोजनाओं के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार की गईं।
  • सिंचाई, जलविद्युत और बाढ़ नियंत्रण में भविष्य के निवेश को सक्षम बनाते हुए दूरस्थ और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में परियोजनाओं के लिए डीपीआर तैयार की गईं।
  • एनडब्ल्यूडीए (नदियों को जोड़ने का कार्य) के तहत प्रगति
  • राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी ने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के अंतर्गत नदियों को जोड़ने की 30 परियोजनाओं की पहचान करके महत्वपूर्ण तकनीकी प्रगति हासिल की है। सभी चिन्हित लिंक परियोजनाओं के लिए पूर्व-संभाव्यता रिपोर्ट पूरी की जा चुकी हैं।
  • इनमें से 26 परियोजनाओं की व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार की जा चुकी है तथा 15 लिंक परियोजनाओं के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट भी पूर्ण की गई हैं, जिनमें बिहार की कोसीमेची अंतःराज्यीय लिंक परियोजना शामिल है। ये अध्ययन नदी घाटियों के बीच जल स्थानांतरण और दीर्घकालिक जल सुरक्षा योजना में सहायता प्रदान करते हैं। 
  • बाढ़ एवं कटाव प्रबंधन (ब्रह्मपुत्र बोर्ड)
  • पूर्वोत्‍तर के संवेदनशील क्षेत्रों में कटाव-रोधी और बाढ़ प्रबंधन कार्यों का कार्यान्वयन किया गया।
  • ब्रह्मपुत्र नदी के अन्य कटाव-प्रवण क्षेत्रों के साथ-साथ माजुली द्वीप (असम) जैसे महत्‍वपूर्ण स्‍थानों पर सुरक्षा कार्य किए गए।
  • बाढ़ के दौरान आश्रय प्रदान करने के लिए ऊँचे प्लेटफॉर्म का निर्माण।
  • जल निकासी बाधित क्षेत्रों में जल निकासी विकास योजनाओं का क्रियान्वयन किया गया।

 

स्पर नं. 2, सलमारा बेसामारा क्षेत्र, माजुली, असम

  • समुदाय उन्मुख हस्तक्षेप
  • पूर्वोत्‍तर के पर्वतीय क्षेत्रों में स्प्रिंगशेड प्रबंधन और जल निकायों के विकास का कार्यान्वयन किया गया।
  • ग्रामीण और जनजातीय समुदायों में जल उपलब्धता बढ़ाने और स्थानीय जल प्रबंधन प्रथाओं में सुधार लाने के लिए पहलें की गईं, साथ ही सर्वोत्तम स्थानीय पारंपरिक प्रथाओं को वैज्ञानिक सुधार के साथ लोकप्रिय बनाना।
  • तकनीकी क्षमता मजबूत करना
  • सर्वेक्षण और योजना बनाने में भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) और रिमोट सेंसिंग, लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग (LiDAR) और ड्रोन आधारित सर्वेक्षण, तथा उन्नत जलविज्ञान मॉडलिंग उपकरणों जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाना।
  • डीपीआर तैयार करने और बेसिन अध्ययन में सटीकता और कार्यक्षमता में सुधार
  • विशेष श्रेणी और सीमावर्ती राज्यों को सहायता

पूर्वोत्‍तर राज्यों, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और सिक्किम को लक्षित तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान की गई।

इन क्षेत्रों को क्षमता की सीमाओं के बावजूद जल संसाधन योजना बनाने में सक्षम बनाया गया।

  • निरंतर परिणामों की प्रकृति
  • इस योजना ने बेसिन योजना निर्माण, डीपीआर तैयार करने और बाढ़ प्रबंधन कार्यों जैसी दीर्घकालिक गतिविधियों की निरंतरता को सफलतापूर्वक बनाए रखा
  • राज्यों और केंद्रीय एजेंसियों द्वारा कार्यान्वयन के लिए जल संसाधन संबंधी भविष्य की परियोजनाओं की पाइपलाइन स्थापित की।

स्‍पष्‍ट परिणाम और विकास संबंधी लाभ

नदी बेसिन प्रबंधन (आरबीएम) योजना ने प्रमुख नदी बेसिनों में जल संसाधन योजना और अवसंरचना विकास में स्‍पष्‍ट रूप से देखे जा सकने वाले सुधार किए हैं। ये परिणाम योजना के टिकाऊ जल प्रबंधन और क्षेत्रीय सामाजिक-आर्थिक विकास में योगदान को दर्शाते हैं।

निष्‍कर्ष

नदी बेसिन प्रबंधन (आरबीएम) ढाँचा भारत की नदी प्रणालियों को समन्वित और दूरदर्शी तरीके से प्रबंधित करने की क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। वैज्ञानिक आकलनों, अवसंरचना की तैयारी और संस्थागत सहयोग को बढ़ावा देकर इस पहल ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अधिक मजबूत जल प्रणालियों की नींव रखी है। इसका निरंतर कार्यान्वयन जलवायु परिवर्तनशीलता, जनसंख्या वृद्धि और विभिन्न क्षेत्रों में जल की बढ़ती मांग जैसी उभरती चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। साथ ही, टिकाऊ तकनीकी सहायता और लक्षित निवेश कमजोर और दूरस्थ क्षेत्रों को बाढ़ सुरक्षा, जल भंडारण और संसाधन उपयोग के लिए अधिक मजबूत प्रणालियाँ विकसित करने में मदद करेंगे। दीर्घकाल में, नदी बेसिन प्रबंधन की सफलता केवल भौतिक अवसंरचना पर ही नहीं, बल्कि संस्थानों के बीच निरंतर समन्वय, आधुनिक तकनीकों के उपयोग और सामुदायिक भागीदारी पर भी निर्भर करेगी। साथ मिलकर, ये प्रयास देश भर में बेहतर जल सुरक्षा, अधिक क्षेत्रीय स्थिरता और संतुलित सामाजिक-आर्थिक विकास में योगदान देते हैं। 

संदर्भ

जल शक्ति मंत्रालय

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पीआईबी शोध

पीके/केसी/आरके

(Explainer ID: 158232) आगंतुक पटल : 120
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