Infrastructure
भारत का ऊर्जा क्षेत्र:
प्रगति, सुधार और आगे की राह
Posted On:
18 MAR 2026 4:05PM
- जनवरी 2026 तक भारत की स्थापित विद्युत क्षमता 520.51 गीगावाट तक पहुँच गई है, और बिजली की कमी वित्त वर्ष 2014 के 4.2% से घटकर दिसंबर 2025 तक 0.03% रह गई है।
- ₹1.85 लाख करोड़ के निवेश से 18,374 गाँवों का विद्युतीकरण और 2.86 करोड़ घरों को बिजली कनेक्शन देना संभव हुआ।
- बकाया राशि जून 2022 के ₹1.4 लाख करोड़ से घटकर फरवरी 2026 में ₹4,109 करोड़ रह गई है, जबकि डिस्कॉम्स ने वित्त वर्ष 2025 में ₹2,701 करोड़ का लाभ दर्ज किया।
- स्मार्ट मीटरिंग की शुरुआत बिजली क्षेत्र को अधिक डिजिटल, पारदर्शी और सहभागी भविष्य के लिए तैयार कर रही है।
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बिजली आधुनिक जीवन के सबसे अदृश्य लेकिन अपरिहार्य तत्वों में से एक है। रोशनी जलती है, सिंचाई पंप चलते हैं, कारखाने संचालित होते हैं, अस्पताल काम करते हैं और डिजिटल नेटवर्क जुड़े रहते हैं। भारत जैसे विशाल और विविध देश के लिए विश्वसनीय, किफायती और सार्वभौमिक बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक तकनीकी चुनौती और शासन (गवर्नेंस) की उपलब्धि, दोनों है। पिछले एक दशक में, भारत के बिजली क्षेत्र में बड़े संरचनात्मक बदलाव हुए हैं, जो अब पर्याप्तता, विस्तारित क्षमता और बेहतर विश्वसनीयता वाले तंत्र में परिवर्तित हो चुका है। यह वर्षों के निरंतर निवेश, संस्थागत सुदृढ़ीकरण, नियामक अनुशासन और नीतिगत निरंतरता का परिणाम है।
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भारत इलेक्ट्रिसिटी समिट 2026, बिजली और विद्युत क्षेत्र को समर्पित एक प्रमुख वैश्विक सम्मेलन एवं प्रदर्शनी, 19 से 22 मार्च, 2026 तक यशोभूमि, नई दिल्ली में आयोजित किया जाएगा।
“इलेक्ट्रिफाइंग ग्रोथ। एम्पॉवरिंग सस्टेनेबिलिटी। कनेक्टिंग ग्लोबली” के विषय के तहत आयोजित यह चार दिवसीय शिखर सम्मेलन, वैश्विक ऊर्जा संक्रमण में भारत के नेतृत्व को प्रदर्शित करेगा और बिजली क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियों एवं उभरते अवसरों पर चर्चा करेगा। इस आयोजन का उद्देश्य क्षेत्र-वार संवाद को बढ़ावा देना, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना और दुनिया भर में टिकाऊ ऊर्जा प्रणालियों को आगे बढ़ाने के लिए रणनीतिक साझेदारी बनाना है।
इस शिखर सम्मेलन में भारत और दुनिया भर के नीति निर्माताओं, उद्योग जगत के नेताओं, नियामकों, निवेशकों, शिक्षाविदों, नवाचारियों और नागरिक समाज सहित हितधारकों का एक विविध समूह शामिल होगा। इसमें बिजली और स्वच्छ ऊर्जा की पूरी वैल्यू चेन को कवर करने वाले 100 से अधिक उच्च-स्तरीय सम्मेलन सत्र, विशेषज्ञों के पैनल की चर्चाएं, विषय-आधारित पवेलियन और तकनीकी प्रदर्शनियाँ होने की उम्मीद है।
500 से अधिक प्रदर्शकों (जिनमें 100 से अधिक स्टार्टअप शामिल हैं), 25,000 से अधिक आगंतुकों, 80 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों, 1,000 से अधिक प्रतिनिधियों और 300 से अधिक वक्ताओं की भागीदारी के साथ, यह शिखर सम्मेलन ज्ञान के आदान-प्रदान, सहयोग और व्यावसायिक जुड़ाव के लिए एक गतिशील मंच के रूप में कार्य करेगा।
वर्ष 2032 तक बिजली उत्पादन, पारेषण, वितरण और ऊर्जा भंडारण में ₹50 लाख करोड़ से अधिक के निवेश अवसरों के साथ, यह शिखर सम्मेलन भारत के बिजली क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने, प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने और लचीलेपन को मजबूत करने का प्रयास करता है।
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विस्तार: क्षमता बढ़ाना और नेशनल ग्रिड को सुदृढ़ करना
जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है और जीवन स्तर में सुधार हो रहा है, घरों, उद्योगों, कृषि और सेवा क्षेत्रों में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। इस मांग को बड़े पैमाने पर पूरा करने के लिए न केवल अधिक बिजली उत्पादन की आवश्यकता है, बल्कि एक ऐसे तंत्र की भी जरूरत है जो इसे विशाल भौगोलिक क्षेत्रों तक पहुँचा सके। इस व्यापक विस्तार पर ध्यान केंद्रित करते हुए, पारंपरिक और नवीकरणीय दोनों स्रोतों से उत्पादन क्षमता में निरंतर वृद्धि की गई है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान (31 जनवरी 2026 तक), सभी स्रोतों से रिकॉर्ड 52,537 मेगावाट की उत्पादन क्षमता जोड़ी गई है। इसमें से 39,657 मेगावाट नवीकरणीय ऊर्जा से प्राप्त हुई है, जिसमें 34,955 मेगावाट सौर ऊर्जा और 4,613 मेगावाट पवन ऊर्जा शामिल है। यह एक ही वर्ष में अब तक की सबसे अधिक क्षमता वृद्धि है, जिसने वित्तीय वर्ष 2024-25 में हासिल किए गए 34,054 मेगावाट के पिछले रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है।
यह वृद्धि देश की कुल स्थापित क्षमता में 11 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी को दर्शाती है। जनवरी 2026 तक, भारत की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता 520.51 गीगावाट हो गई है। यह निरंतर वृद्धि सुनिश्चित करती है कि देश आर्थिक गति को बनाए रखते हुए बढ़ती खपत की जरूरतों को पूरा करने के लिए पूरी तरह तैयार रहे।
सिर्फ उत्पादन क्षमता बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। बिजली प्रणाली के पारेषण और रूपांतरण के आधारभूत ढांचे को मजबूत करने पर भी समान ध्यान दिया गया है। उत्पादन केंद्रों से राज्यों के लोड केंद्रों तक कुशलतापूर्वक बिजली पहुँचाने के लिए नए सब-स्टेशन, उन्नत ट्रांसफार्मर और विस्तारित उच्च-क्षमता वाले ट्रांसमिशन कॉरिडोर विकसित किए गए हैं। ये निवेश बाधाओं को कम करते हैं, ग्रिड की स्थिरता में सुधार करते हैं और राष्ट्रीय ग्रिड में विविध ऊर्जा स्रोतों के सुचारू एकीकरण को सक्षम बनाते हैं।
भारत का राष्ट्रीय ट्रांसमिशन नेटवर्क, जो दुनिया का सबसे बड़ा सिंक्रोनस नेशनल ग्रिड है, ने एक बड़ा मील का पत्थर पार कर लिया है। अब यह 5 लाख सर्किट किलोमीटर (सीकिमी) से अधिक ट्रांसमिशन लाइनों और 1,407 गीगावोल्ट एम्पीयर (जीवीए) की कुल रूपांतरण क्षमता तक पहुँच गया है। उत्पादन और नेटवर्क दोनों को एक साथ सुदृढ़ करके, भारत ने एक ऐसे बिजली क्षेत्र की नींव रखी है जो न केवल आज, बल्कि भविष्य के विकास को भी सहारा दे सकता है।
घाटे से संतुलन तक: पूरे भातर में बिजली की भरोसेमंद आपूर्ति
भारत के बिजली क्षेत्र में हो रहे बदलाव के दो सबसे स्पष्ट परिणाम सामने आए हैं: बिजली की कमी का खात्मा और हर घर तक बिजली का विस्तार। ये दोनों मिलकर कमी के प्रबंधन से निकलकर, भरोसेमंद पहुँच सुनिश्चित करने की दिशा में हुए एक बड़े बदलाव को दर्शाते हैं।
मांग-आपूर्ति के अंतर को पाटना
एक दशक पहले, बिजली की कमी आर्थिक गतिविधियों और दैनिक जीवन, दोनों के लिए एक निरंतर बाधा बनी हुई थी। बिजली कटौती से विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग), सिंचाई, स्वास्थ्य सेवाएं और घरेलू दिनचर्या बाधित होती थी। इसलिए, बढ़ती मांग और उपलब्ध आपूर्ति के बीच के अंतर को पाटना एक मुख्य प्राथमिकता थी।
उत्पादन और पारेषण (ट्रांसमिशन) क्षमताओं में निरंतर वृद्धि, बेहतर योजना और मजबूत ग्रिड प्रबंधन के माध्यम से यह अंतर लगातार कम हुआ है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान, भारत ने सफलतापूर्वक 242.49 गीगावाट बिजली की पीक मांग को पूरा किया। बिजली की कमी भी वित्त वर्ष 2013-14 के 4.2% की तुलना में दिसंबर 2025 तक तेजी से घटकर 0.03% रह गई, जो आपूर्ति की पर्याप्तता में एक महत्वपूर्ण सुधार को दर्शाता है।
यह प्रगति विशेष रूप से प्रमुख शहरी केंद्रों के बाहर अधिक सार्थक रही है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में अब लंबे समय तक और अधिक अनुमानित घंटों तक बिजली की आपूर्ति होती है। विश्वसनीय बिजली ने डीजल जनरेटर और पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता को भी कम किया है, जिससे लागत में कमी आई है और पर्यावरणीय परिणामों में सुधार हुआ है।
सार्वभौमिक पहुंच एक वास्तविकता के तौर पर
केवल पर्याप्त उत्पादन ही बिजली की पहुँच की गारंटी नहीं देता। बिजली को एक मजबूत और कुशल वितरण नेटवर्क के माध्यम से घरों, खेतों और उद्यमों तक पहुँचना चाहिए। इस बात को स्वीकार करते हुए, देश भर में लास्ट-माइल तक बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया। दिसंबर 2014 में शुरू की गई दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेवाई) और एकीकृत विद्युत विकास योजना (आईपीडीएस) के तहत, वितरण बुनियादी ढांचे को मजबूत और आधुनिक बनाने के लिए महत्वपूर्ण निवेश किए गए। डीडीयूजीजेवाई ने मौजूदा नेटवर्क के सुदृढ़ीकरण और विस्तार के साथ-साथ फीडरों और वितरण ट्रांसफार्मर की मीटरिंग के माध्यम से गाँवों में बुनियादी बिजली ढांचा तैयार करने पर ध्यान केंद्रित किया। आईपीडीएस ने शहरी क्षेत्रों को लक्षित किया, जिसके तहत सब-ट्रांसमिशन और वितरण नेटवर्क को अपग्रेड किया गया, वितरण ट्रांसफार्मर, फीडर और उपभोक्ताओं की मीटरिंग शुरू की गई, और सूचना प्रौद्योगिकी-सक्षम प्रणालियों जैसे एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग (ईआरपी), स्मार्ट मीटरिंग, गैस इंसुलेटेड सब-स्टेशन और रियल-टाइम डेटा एक्विजिशन सिस्टम को लागू किया गया। इन प्रयासों को प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना (सौभाग्य) द्वारा पूर्णता प्रदान की गई, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी सार्वभौमिक विद्युतीकरण पहलों में से एक माना जाता है। इसने देश के सभी गैर-विद्युतीकृत घरों को अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी और बिजली कनेक्शन प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित किया।
सामूहिक रूप से, इन पहलों में लगभग ₹1.85 लाख करोड़ का निवेश शामिल था। अक्टूबर 2017 से मार्च 2022 तक 'सौभाग्य' अवधि के दौरान 18,374 से अधिक गाँवों का विद्युतीकरण किया गया और लगभग 2.86 करोड़ घरों को बिजली के कनेक्शन दिए गए। पिछले एक दशक में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में दैनिक औसत बिजली आपूर्ति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। ग्रामीण भारत में, औसत दैनिक आपूर्ति वित्त वर्ष 2014 के 12.5 घंटे से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 22.6 घंटे हो गई, जो विश्वसनीयता और पहुँच में भारी सुधार को दर्शाती है। शहरी क्षेत्रों में भी सुधार देखा गया, जहाँ इसी अवधि के दौरान दैनिक औसत आपूर्ति 22.1 घंटे से बढ़कर 23.4 घंटे हो गई। भारत में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत भी 2024-25 में बढ़कर 1,460 किलोवाट-घंटा हो गई है, जो 2013-14 के 957 किलोवाट-घंटा की तुलना में 503 किलोवाट-घंटा (लगभग 52.6%) की वृद्धि दर्ज करती है।
डिस्कॉम्स: ऊर्जा क्षेत्र की नींव को कर रहे मजबूत
क्यों मायने रखती हैं वितरण सेवाएं
यदि उत्पादन और पारेषण बिजली प्रणाली की रीढ़ हैं, तो वितरण कंपनियाँ, जिन्हें आमतौर पर डिस्कॉम्स के रूप में जाना जाता है, इसका सार्वजनिक चेहरा हैं। वे बिजली नेटवर्क और उपभोक्ता के बीच एक इंटरफेस के रूप में कार्य करती हैं। हर घरेलू कनेक्शन, हर बिलिंग चक्र, सेवा संबंधी हर शिकायत और बिजली आपूर्ति में होने वाली हर बाधा अंततः वितरण प्रणाली से होकर ही गुजरती है। डिस्कॉम्स की स्थिति न केवल बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता निर्धारित करती है, बल्कि पूरी 'पावर वैल्यू चेन' की वित्तीय स्थिरता भी तय करती है। जब वितरण इकाइयाँ कुशलतापूर्वक कार्य करती हैं, तो उत्पादकों और पारेषण कंपनियों को भुगतान सुचारू रूप से होता है, निवेश बना रहता है और सेवा की गुणवत्ता में सुधार होता है। इसके विपरीत, जब वे दबाव का सामना करती हैं, तो इसका प्रभाव पूरी प्रणाली पर पड़ता है।
वितरण में सुधार के लिए क्या किया गया है
2021 में, लगभग ₹3.03 लाख करोड़ के कुल परिव्यय के साथ पुनरुत्थान वितरण क्षेत्र योजना (आरडीएसएस) शुरू की गई थी। इस योजना के तहत ₹2.8 लाख करोड़ मूल्य की परियोजनाओं को पहले ही मंजूरी दी जा चुकी है। यह योजना राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को डिस्कॉम्स की परिचालन दक्षता और वित्तीय स्थिरता में सुधार करने में सहायता देने के लिए शुरू की गई थी, ताकि एक विश्वसनीय और गुणवत्तापूर्ण बिजली आपूर्ति प्रदान की जा सके।
इस योजना का एक मुख्य घटक उपभोक्ताओं, वितरण ट्रांसफार्मर और फीडरों के लिए स्मार्ट मीटरिंग की शुरुआत करना है। स्मार्ट मीटर मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से उपभोक्ताओं को उनके बिजली उपयोग की लगभग रियल-टाइम जानकारी प्रदान करते हैं। ये ऐप उपयोगकर्ताओं को खपत की निगरानी करने, बजट प्रबंधित करने, आसानी से रिचार्ज करने, कम बैलेंस अलर्ट प्राप्त करने और खपत को अनुकूलित करने के लिए पुराने उपयोग डेटा को देखने की सुविधा देते हैं। 15 जनवरी 2026 तक आरडीएसएस के तहत 4.05 करोड़ स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त, राज्यों ने अपनी योजनाओं और अन्य योजनाओं के तहत भी स्मार्ट मीटर लगाए हैं। कुल मिलाकर, विभिन्न पहलों के तहत देश भर में 5.62 करोड़ स्मार्ट मीटर स्थापित किए जा चुके हैं।
पूरे क्षेत्र में वित्तीय अनुशासन की बहाली
वित्तीय अनुशासन में सुधार के लिए आरडीएसएस के समानांतर अतिरिक्त उपाय पेश किए गए हैं।
- नेशनल इलेक्ट्रिसिटी प्लान (2023–2032)
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ट्रांसफार्मर एक स्टैटिक डिवाइस है, जिसका उपयोग बिजली के पारेषण और वितरण में वोल्टेज को बढ़ाने या घटाने के लिए किया जाता है। प्राथमिक सब-स्टेशनों से उच्च वोल्टेज पर प्राप्त बिजली को वितरण कंपनियों के सब-स्टेशनों पर कम वोल्टेज में बदला जाता है। रूपांतरण क्षमता से तात्पर्य सब-स्टेशनों में स्थापित ट्रांसफार्मरों की उस कुल क्षमता से है, जो बिजली को विभिन्न वोल्टेज स्तरों के बीच परिवर्तित करती है ताकि इसे उपभोक्ताओं तक प्रसारित और वितरित किया जा सके। इसे वोल्ट-एम्पियर (वीए), मेगावोल्ट-एम्पियर (एमवीए) या गीगावोल्ट-एम्पियर (जीवीए) में मापा जाता है।
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केन्द्रीय और राज्य पारेषण प्रणालियों के लिए राष्ट्रीय विद्युत योजना (2023–2032) को 2032 तक 458 गीगावाट की अनुमानित उच्चतम मांग को पूरा करने के लिए अंतिम रूप दे दिया गया है। इस योजना में लगभग ₹9.15 लाख करोड़ के निवेश का अनुमान है। पिछली योजना अवधि (2017-2022) के दौरान, प्रत्येक वर्ष लगभग 17,700 सीकेमी ट्रांसमिशन लाइनें और 73 जीवीए की रूपांतरण क्षमता जोड़ी गई थी। नई योजना के तहत, ट्रांसमिशन नेटवर्क जनवरी 2026 के 5 लाख सीकेएम से बढ़कर 2032 तक 6.48 लाख सीकेएम हो जाएगा। इसी अवधि के दौरान, रूपांतरण क्षमता 1,407 जीवीए से बढ़कर 2,345 जीवीए हो जाएगी, और अंतर-क्षेत्रीय स्थानांतरण क्षमता 120 गीगावाट से बढ़कर 168 गीगावाट हो जाएगी। 220 किलोवोल्ट और उससे ऊपर की पारेषण प्रणालियों को कवर करने वाली यह योजना बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने, नवीकरणीय ऊर्जा के बड़े पैमाने पर एकीकरण को सहारा देने और राष्ट्रीय ग्रिड के भीतर ग्रीन हाइड्रोजन जैसी उभरती आवश्यकताओं को समायोजित करने के लिए तैयार की गई है।
- विद्युत (संशोधन) बिल, 2026
विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2026, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की मांगों को पूरा करने के लिए भारत की बिजली प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह क्रॉस-सब्सिडी को तर्कसंगत बनाकर, लागत-प्रतिबिंबित टैरिफ को बढ़ावा देकर और औद्योगिक उपभोक्ताओं को सीधे बिजली खरीदने की अनुमति देकर मौजूदा बाजार संरचना में सुधार करना चाहता है। इसका उद्देश्य किसानों और अन्य पात्र उपभोक्ताओं के लिए सब्सिडी वाले टैरिफ को सुरक्षित रखते हुए, बिजली को अधिक किफायती, विश्वसनीय और बाजार की जरूरतों के प्रति उत्तरदायी बनाकर भारतीय मैन्युफैक्चरिंग की प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार करना है।
· विलंब भुगतान अधिभार (एलपीएस) नियम, 2022
विलंब भुगतान अधिभार (एलपीएस) नियमों की शुरुआत ने वितरण कंपनियों और बिजली उत्पादकों के बीच भुगतान तंत्र को सुव्यवस्थित किया है। पुनर्भुगतान की एक संरचित समय-सारणी बनाकर और देरी को हतोत्साहित करके, इन नियमों ने बकाया राशि को जून 2022 के ₹1.4 लाख करोड़ से घटाकर फरवरी 2026 तक ₹4,109 करोड़ कर दिया है। इस भारी कमी ने पूरी 'वैल्यू चेन' में नकदी के प्रवाह में सुधार किया है और उत्पादकों, ऋणदाताओं एवं निवेशकों के बीच विश्वास बहाल किया है।
· स्वचालित मासिक ईंधन एवं बिजली खरीद लागत समायोजन
बार-बार होने वाले वित्तीय असंतुलन को रोकने के लिए, स्वचालित मासिक ईंधन और बिजली खरीद लागत समायोजन तंत्र शुरू किया गया। ये प्रावधान विनियामक निगरानी के अधीन, वैध खरीद और नेटवर्क लागत को समय पर टैरिफ में प्रतिबिंबित करने की अनुमति देते हैं। लागत और राजस्व के बीच बेहतर तालमेल बिठाकर, यह प्रणाली नए घाटे को बढ़ने से रोकती है और वितरण इकाइयों की वित्तीय स्थिरता में सुधार करती है।
संरचनात्मक सुधारों के साथ-साथ, बिजली क्षेत्र को अधिक पारदर्शी, कुशल और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के अनुकूल बनाने के लिए कई नीतिगत उपाय किए गए हैं। विद्युत (ग्रीन एनर्जी ओपन एक्सेस के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना) नियम 100 किलोवाट से अधिक लोड वाले उपभोक्ताओं के लिए समयबद्ध मंजूरी, और समान व उचित शुल्क के साथ 'ग्रीन ओपन एक्सेस' प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त, ग्रिड में नवीकरणीय ऊर्जा के अधिक एकीकरण की सुविधा के लिए अन्य ढांचे, जैसे नवीकरणीय उपभोग दायित्व, अंतर-राज्य पारेषण शुल्क की छूट, और ऊर्जा भंडारण की तैनाती को बढ़ावा देने वाली नीतियों को भी अधिसूचित किया गया है। इसके अलावा, ईंधन और बिजली खरीद समायोजन अधिभार के मासिक स्वचालित पास-थ्रू की शुरुआत बिजली खरीद लागत की समय पर वसूली सुनिश्चित करती है।
बदलाव के संकेत:मापने योग्य सुधार
इन सुधारों का प्रभाव अब मापने योग्य वित्तीय और परिचालन परिणामों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
- एक ऐतिहासिक घटनाक्रम में, भारत की बिजली वितरण इकाइयों ने वित्त वर्ष 2025 में ₹2,701 करोड़ का सकारात्मक शुद्ध लाभ दर्ज किया है, जबकि वित्त वर्ष 2014 में ₹67,962 करोड़ का घाटा हुआ था।
- सकल तकनीकी और वाणिज्यिक (एटी एंड सी) हानियाँ, जो तकनीकी अक्षमताओं और वाणिज्यिक लीकेज के कारण होने वाली ऊर्जा की हानि को दर्शाती हैं, वित्त वर्ष 2014 के 22.62 प्रतिशत से घटकर वित्त वर्ष 2025 में 15.04 प्रतिशत रह गई हैं।
- आपूर्ति की औसत लागत (एसीएस) और प्राप्त औसत राजस्व (एआरआर) के बीच का अंतर, जो इस बात का प्रमुख संकेतक है कि क्या वितरण इकाइयाँ अपनी लागत वसूल कर पा रही हैं, वित्त वर्ष 2025 में ₹0.78 प्रति यूनिट से तेजी से घटकर ₹0.06 प्रति यूनिट रह गया है।
ये सुधार बेहतर लागत वसूली, बेहतर बिलिंग दक्षता और उन्नत परिचालन प्रबंधन को दर्शाते हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ये निरंतर वित्तीय तनाव से स्थिरता के मार्ग की ओर एक संरचनात्मक बदलाव का संकेत देते हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण में तेजी लाना
देश का नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार एक नीति-संचालित बदलाव के रूप में विकसित हुआ है, जिसकी पहचान बड़े पैमाने, गति, विनिर्माण में वृद्धि और वैश्विक जुड़ाव से है। अंतर्राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा एजेंसी (आईआरईएनए) नवीकरणीय ऊर्जा सांख्यिकी 2025 के अनुसार, कुल स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में भारत विश्व स्तर पर चौथे स्थान पर है।
सौर ऊर्जा इस विस्तार में सबसे आगे रही है। स्थापित सौर क्षमता 2014 के 3 गीगावाट से तेजी से बढ़कर जनवरी 2026 में 140 गीगावाट हो गई है। पवन ऊर्जा ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिसकी कुल स्थापित क्षमता 54.65 गीगावाट तक पहुँच गई है।
एक निर्णायक मील का पत्थर 29 जुलाई 2025 को हासिल किया गया, जब भारत ने बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की अब तक की सबसे अधिक हिस्सेदारी दर्ज की। उस दिन, देश की 203 गीगावाट की कुल बिजली मांग का 51.5 प्रतिशत हिस्सा नवीकरणीय स्रोतों से पूरा किया गया। पहली बार, भारत की दैनिक बिजली मांग का आधे से अधिक हिस्सा अक्षय स्रोतों के माध्यम से पूरा किया गया, जो देश के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण का एक महत्वपूर्ण संकेत है। उस दिन के बिजली उत्पादन मिक्स में शामिल थे:
- सौर: 44.50 गीगावाट
- पवन: 29.89 गीगावाट
- हाइड्रो: 30.29 गीगावाट
यह उपलब्धि न केवल विस्तारित क्षमता को दर्शाती है, बल्कि राष्ट्रीय ग्रिड में नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ते एकीकरण को भी उजागर करती है, जो भारत को एक अधिक टिकाऊ और विविध बिजली भविष्य की राह पर मजबूती से खड़ा करती है। फरवरी 2024 में शुरू की गई पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना का लक्ष्य वित्त वर्ष 2026-27 तक 1 करोड़ आवासीय घरों में रूफटॉप सोलर सिस्टम स्थापित करना है, जिसमें वितरित नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए ₹75,021 करोड़ का कुल परिव्यय रखा गया है। फरवरी 2026 तक, इस योजना के तहत रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन से 31.04 लाख घर लाभान्वित हो चुके हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा के तीव्र विस्तार और बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए, सरकार ने देश की सबसे बड़ी पारेषण उपयोगिता, पावरग्रिड को निवेश के अधिकारों में वृद्धि की है। संशोधित मंजूरी के तहत, प्रत्येक सहायक कंपनी में स्वीकार्य इक्विटी निवेश की सीमा को ₹5,000 करोड़ से बढ़ाकर ₹7,500 करोड़ कर दिया गया है, जबकि कंपनी की नेट वर्थ से जुड़ी समग्र सीमा को यथावत रखा गया है।
यह बढ़ा हुआ वित्तीय लचीलापन पावरग्रिड को 'अल्ट्रा हाई वोल्टेज अल्टरनेटिंग करंट' और 'हाई वोल्टेज डायरेक्ट करंट' सिस्टम जैसी बड़ी और पूंजी-प्रधान पारेषण परियोजनाओं को शुरू करने में सक्षम बनाएगी। पारेषण के आधारभूत ढांचे को मजबूत करके और प्रमुख परियोजनाओं के लिए प्रतिस्पर्धी बोली में भागीदारी में सुधार करके, यह कदम नवीकरणीय ऊर्जा की कुशल निकासी में सहायता करता है और राष्ट्रीय ग्रिड में गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता के विस्तार के व्यापक लक्ष्य में योगदान देता है।
निष्कर्ष: शांति व निरंतरता के साथ प्रगति को शक्ति प्रदान करना
भारत का बिजली क्षेत्र आज किसी एक पहल के प्रभाव के बजाय वर्षों के सुधारों के संचयी परिणाम को दर्शाता है। उत्पादन क्षमता में विस्तार बढ़ती मांग के अनुरूप रहा है, बिजली लगभग हर घर तक पहुँच गई है, और सभी क्षेत्रों में इसकी विश्वसनीयता में सुधार हुआ है। साथ ही, बुनियादी ढांचे में निवेश, विनियामक अनुशासन और प्रदर्शन-आधारित सुधारों के समन्वय के माध्यम से वितरण क्षेत्र की लंबे समय से चली आ रही वित्तीय और परिचालन चुनौतियों का समाधान किया जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह क्षेत्र एक ऐसे भविष्य के लिए तैयार हो रहा है जिसमें उपभोक्ता अधिक सक्रिय भूमिका निभाएंगे। डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा, स्मार्ट नेटवर्क और नई बाजार व्यवस्थाएं इस बात को नया आकार दे रही हैं कि बिजली का उत्पादन, उपभोग और मूल्यांकन कैसे किया जाता है। जैसे-जैसे ये बदलाव अपनी जड़ें जमा रहे हैं, बिजली विकास, समावेशन और अवसर के एक शांत लेकिन अनिवार्य संवाहक के रूप में बनी हुई है।
ऊर्जा मंत्रालय
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वित्त मंत्रालय
https://www.indiabudget.gov.in/economicsurvey/doc/eschapter/echap09.pdf
आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2232104®=3&lang=2
प्रेस इन्फार्मेशन ब्यूरो
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2233832®=3&lang=2
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2192895®=3&lang=2
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पीआईबी रिसर्च
पीके/केसी/एसके
(Explainer ID: 157882)
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