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Energy & Environment

विश्व वन्यजीव दिवस 2026

औषधीय और सुगंधित पौधे: स्वास्थ्य, विरासत और आजीविका का संरक्षण

Posted On: 03 MAR 2026 1:59PM

मुख्य बिंदु

  • विश्व वन्यजीव दिवस (डब्ल्यूडब्ल्यूडी) 3 मार्च को सीआईटीईएस (वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर समझौते) को स्वीकार करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।
  • डब्ल्यूडब्ल्यूडी 2026 का विषय "औषधीय और सुगंधित पौधे: स्वास्थ्य, विरासत और आजीविका का संरक्षण" है, जो स्वास्थ्य और आजीविका के लिए पादप संबंधी संसाधनों के महत्व पर प्रकाश डालता है।
  • लगभग 15,000 औषधीय पौधों की प्रजातियों के साथ भारत जैव विविधता से समृद्ध 17 विशाल देशों में से एक है। इनमें से 8,000 का उपयोग भारतीय औषधियों में किया जाता है जिससे यह औषधीय और सुगंधित पौधों के लिए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक बन गया है।
  • राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, नई दिल्ली की ओर से संरक्षित 9,361 औषधीय और सुगंधित पौधों के साथ भारत प्राकृतिक पर्यावास और उससे बाहर विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण के प्रयासों के माध्यम से सक्रिय रूप से औषधीय और सुगंधित पौधों को नष्ट होने से बचाने में लगा हुआ है।

 

परिचय

 

विश्व में प्रति वर्ष 3 मार्च को विश्व वन्यजीव दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र की ओर से वन्य जीवों और वनस्पतियों के सम्मान और लोगों तथा पृथ्वी के लिए उनके महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए घोषित यह दिन वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर समझौते (सीआईटीईस) को स्वीकार करने का प्रतीक है जो यह सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक प्रतिबद्धता को मजबूत करता है कि वन्यजीवों से संबंधित व्यापार से प्रजातियों के अस्तित्व को खतरा नहीं है। यह दिवस इस बात को रेखांकित करता है कि वन्यजीव न केवल प्रकृति की सुंदरता का हिस्सा हैं बल्कि खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, आजीविका, जलवायु परिवर्तन से निपटने की सामर्थ्य और सतत विकास का एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। ऐसे समय में जब जैव विविधता को वन्यजीवों के निवास स्थान के विनाश, अत्यधिक शोषण, अवैध व्यापार और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ रहा है तब विश्व वन्यजीव दिवस वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए जैविक संसाधनों के संरक्षण और स्थायी रूप से उपयोग करने के लिए एक वैश्विक आह्वान है।

विश्व वन्यजीव दिवस 2026 का विषय - औषधीय और सुगंधित पौधे: स्वास्थ्य, विरासत और आजीविका का संरक्षण - दवाइयों के लिए उपयोग में लाए जाने वाले पौधों के महत्व, सांस्कृतिक परंपराओं को बचाने में उनकी भूमिका और स्थानीय समुदायों को उनसे होने वाली आय पर बल देता है। संपूर्ण विश्व में विकासशील के 70-95% लोग आधारभूत स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पारंपरिक औषधियों पर निर्भर करते हैं जिसमें से अधिकतर पौधों से मिलने वाले संसाधनों से प्राप्त होती हैं। औषधीय और सुगंधित पौधे पारंपरिक औषधीय प्रणाली की नींव हैं और आधुनिक दवा निर्माण उद्योग में भी अहम योगदान देते हैं। स्वास्थ्य के लिए उपयोग के अतिरिक्त ये पौधे परागण के लिए कीट और पक्षियों की सहायता करके, मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाकर और जैव विविधता को बढ़ाकर पारिस्थितिकी तंत्र को मज़बूत करते हैं। इसलिए उनका संरक्षण विशेष रूप से भारत जैसे से भरपूर देशों के लिए वैश्विक प्राथमिकता का विषय है।

भारत में औषधीय और सुगंधित पौधों की समृद्ध जैव विविधता

वन्यजीव दिवस 2026 का विषय भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत जैव विविधता से समृद्ध विश्व के 17 विशाल देशों में से एक है और विश्व की जैव-विविधता का 7% भाग इसी देश में है। यहां 15 कृषि-जलवायु क्षेत्र, 45,000 विभिन्न पौधों की प्रजातियां हैं जिनमें से 15,000 औषधीय पौधे हैं। इनमें से लगभग 8,000 प्रजातियों का उपयोग भारतीय चिकित्सा प्रणालियों और लोक चिकित्सा प्रणालियों में किया जाता है।  भारत के लगभग 70% औषधीय और सुगंधित पौधे (एमएपी) पश्चिमी और पूर्वी घाट, हिमालय और अरावली क्षेत्र के उष्णकटिबंधीय जंगलों में पाए जाते हैं।

भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण ने 5,250 से अधिक पौधों की प्रजातियों की पहचान की है और विभिन्न रोगों के संबंध में उपयोग के लिए 9,567 से अधिक लोक दावों का प्रलेखण किया है। भारत इस समृद्ध विरासत की रक्षा के लिए कड़े कदम उठा रहा है। राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (एनएमपीबी) की ओर से औषधीय पौधों के संरक्षण और सतत प्रबंधन के लिए समर्पित योजना चलाई जा रही है। इसके अंतर्गत किसानों को प्रशिक्षण, अनुसंधान और विपणन में सहायता प्रदान की जाती है। ये प्रयास औषधीय पौधों की अपनी समृद्ध विरासत की सुरक्षा के लिए भारत की मजबूत और अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

संरक्षण तंत्र

 

भारत ने औषधीय और सुगंधित पौधों की अपनी समृद्ध विरासत को बचाने के लिए मजबूत और कई स्तरों वाला तरीका अपनाया है।

प्राकृतिक पर्यावासों में (इन-सीटू) संरक्षण

प्राकृतिक पर्यावासों में यथास्थान (इन-सीटू) संरक्षण का अर्थ है पौधों और जानवरों को उनकी उत्पत्ति के प्राकृतिक स्थलों पर सुरक्षित रखना। यह कार्य राष्ट्रीय उद्यानों, बायोस्फीयर रिजर्व और जीन अभयारण्यों के माध्यम से किया जाता है। औषधीय पौधों के लिए इस तरह के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण औषधीय पादप संरक्षण क्षेत्र पहल (एमपीसीए) है। एमपीसीए एक नामित स्थल है जिसका उद्देश्य औषधीय पौधों की प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवासों में संरक्षित करना है। वर्तमान में भारत में 108 एमपीसीए साइट हैं जो यथास्थान (इन-सीटू) संरक्षण तकनीकों का उपयोग करके जैविक और सांस्कृतिक विविधता के साथ-साथ स्वदेशी स्वास्थ्य परंपराओं को लागू करने के लिए उपयुक्त मॉडल का प्रतिनिधित्व करते हैं।

 

प्राकृतिक पर्यावास से बाहर (एक्स-सीटू) संरक्षण

एक्स-सीटू संरक्षण का अर्थ है अपने प्राकृतिक आवासों के बाहर नियंत्रित परिस्थितियों में पौधों के आनुवंशिक संसाधनों की सुरक्षा करना ताकि दीर्घकालिक रूप से संरक्षण और जंगलों में संभावित रूप से उन्हें पुन: लगाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके। भारत में, इसके अंतर्गत राष्ट्रीय बीज जीन बैंक, राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीपीजीआर), नई दिल्ली में 9,361 औषधीय और सुगंधित पौधों (एमएपी) का संरक्षण शामिल है। इन एक्स-सीटू विधियों का उपयोग खराब बीजों की उत्पत्ति या वानस्पतिक प्रसार वाली प्रजातियों के लिए किया जाता है। साथ में, वे भविष्य में उपयोग के लिए औषधीय पौधों की विविधता को सुरक्षित करने में मदद करते हैं।

 

प्रमुख सरकारी योजनाएं और पहल

 

सरकार ने देश भर में औषधीय पौधों के संरक्षण, खेती और सतत उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कई प्रमुख योजनाएं और पहल शुरू की हैं।

 

राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम)

राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम) आयुष मंत्रालय की प्रमुख योजना है जिसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के माध्यम से लागू किया गया है। यह फसलों की विविधता में सहायता करने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि प्रणालियों के साथ जोड़कर औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देता है। यह मिशन गुणवत्ता में सुधार और मूल्य वर्धित आयुष उत्पादों के संबंध में सहयोग के लिए अच्छी कृषि और संग्रह के तौर-तरीकों (जीएसीपी) का पालन करते हुए खेती को प्रोत्साहित करता है।

एनएएम आयुर्वेदिक, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी (एएसयू एंड एच) दवाओं के गुणवत्ता नियंत्रण को भी मजबूत करता है, उनके लिए कच्चे माल की स्थायी उपलब्धता सुनिश्चित करता है और एक औषधीय पौधों के मजबूत क्षेत्र को विकसित करने के लिए अनुसंधान, प्रसंस्करण और विपणन में सार्वजनिक-निजी सहयोग को बढ़ावा देता है।

औषधि वनस्पति मित्र कार्यक्रम (एवीएमपी)

यह कार्यक्रम औषधीय पौधों के संरक्षण, खेती और विपणन में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए व्यक्तियों, समुदायों और संस्थानों की पहचान करता है और उन्हें पुरस्कृत करता है। यह अधिक लोगों को औषधीय पौधों को बचाने में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करता है।

औषधीय पौधों के संरक्षण, विकास और सतत प्रबंधन के लिए केंद्रीय क्षेत्र की योजना

यह योजना भारत सरकार की ओर से एनएमपीबी के माध्यम से औषधीय पादप संरक्षण और विकास क्षेत्रों (एमपीसीडीए) की स्थापना करके उनके प्राकृतिक पर्यावासों में औषधीय पौधों के संरक्षण के लिए चलाई जा रही है।  इस योजना का परिव्यय 2021-22 से 2025-26 की अवधि के लिए 322.41 करोड़ रुपये है। संरक्षण की पहल को अवक्रमित और ग्रामीण भूमि पर वृक्षारोपण में सहयोग करके भी बढ़ावा दिया जाता है। इसमें अनुसंधान और गुणवत्ता के आश्वासन पर प्रमुख रूप से ध्यान दिया जाता है जिन्हें देश भर में जीएसीपी और अपरिष्कृत दवा भंडार के माध्यम से सहयोग मिलता है।

-चरक और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी)

ई-चरक पोर्टल किसानों को बाजारों से जोड़ता है और पूरे भारत में 25 जड़ी-बूटी बाजारों से अद्यतन मूल्य की जानकारी प्रदान करता है। एमएसपी तंत्र यह सुनिश्चित करता है कि किसानों को उनके औषधीय पौधों की उपज के लिए उचित मूल्य मिले, टिकाऊ खेती को प्रोत्साहित किया जाए और वन्य स्रोतों पर दबाव कम किया जाए।

हर्बल गार्डन और जागरूकता कार्यक्रम

छात्रों और आम जनता के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए स्कूलों, संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों पर जड़ी-बूटियों के हर्बल गार्डन को बढ़ावा दिया जाता है। दैनिक जीवन में औषधीय पौधों के महत्व को उजागर करने के लिए रेडियो, टीवी और प्रिंट मीडिया पर विशिष्ट प्रजातियों से जुड़े मल्टीमीडिया अभियान भी चलाए जाते हैं।

पर्यावास पुनर्वास के लिए इको टास्क फोर्स

पूर्व सैनिकों और प्रादेशिक सेना के कर्मियों को शामिल करते हुए इको टास्क फोर्स तंत्र महत्वपूर्ण औषधीय पौधों की उत्पत्ति के प्राकृतिक स्थानों को पुनर्जीवित करने और उनका पुनर्वास करने में लगा हुआ है। प्रत्येक इको टास्क फोर्स प्रति वर्ष कम से कम 400 हेक्टेयर क्षेत्र में कार्य करता है जिसमें देशी औषधीय पौधों की प्रजातियों का न्यूनतम 60% रोपण होता है।

स्थानीय समुदायों को आजीविका सहायता

यह योजना संयुक्त वन प्रबंधन समितियों, स्वयं सहायता समूहों, वन पंचायतों और जैव विविधता प्रबंधन समितियों को वित्तीय और ढांचागत सहायता प्रदान करती है। यह स्थानीय समुदायों को औषधीय पौधों के मूल्य संवर्धन, जैव पदार्थों को सुखाने, उनके भंडारण और विपणन में मदद करता है जिससे उनकी आजीविका में सीधे सुधार होता है।

द्विपक्षीय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग

एनएमपीबी खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ), संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ सक्रिय रूप से सहयोग के माध्यम से वैश्विक स्तर पर औषधीय पादप संरक्षण को मुख्यधारा में लाने के लिए कार्य करता है। यह अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भी भाग लेता है और भारत के पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण के लिए काम करता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि वैश्विक समझौतों के अंतर्गत उचित तरीके से लाभ साझा किया जाए।

 

जीआई टैग के माध्यम से भारत की औषधीय पौधों की धरोहर की रक्षा

  • नवारा चावल (ओरिज़ा सैटिवा एल.) मुख्य रूप से पलक्कड़ और केरल के आस-पास के जिलों में उगाया जाता है। आयुर्वेद में इसे षष्ठीकशाली कहा गया है । यह पंचकर्म उपचार का एक महत्वपूर्ण भाग है जिसे नवराकिज़ी के नाम से जाना जाता है। यह वात रोग से जुड़े दर्द के उपचार में सहायता करता है। यह पोलियो से संबंधित अक्षमता के उपचार के लिए उपयोगी है। यह रक्त परिसंचरण की समस्याओं में सुधार करता है। यह सांस के रोगों में भी मदद करता है।
  1. हरी इलायची (एलेटेरिया इलायची (एल.) मेटन) की दो जीआई किस्में हैं - केरल से एलेप्पी और कर्नाटक से कूर्ग। आयुर्वेद में इसे सुक्षमा-एला या इलायची के नाम से जाना जाता है। इसका उपयोग अस्थमा के इलाज, खांसी से राहत और पेशाब संबंधी विकारों के लिए किया जाता है।
  1. गंजम केवड़ा फूल (पांडनस ओडोरिफर (फोर्स्क. कुंत्ज़े) ओडिशा के लिए मुख्य रूप से गंजम जिले से इसे जीआई टैग दिया गया है। आयुर्वेद में इसे केतकीपुष्प के नाम से जाना जाता है। इसका उपयोग आंखों की समस्याओं और श्वसन संबंधी विकारों के उपचार में किया जाता है।
  • केसर (क्रोकस सैटिवस एल.) जम्मू और कश्मीर के लिए जीआई टैग दिया गया है। आयुर्वेद में इसे कुंकुमा के नाम से जाना जाता है । इसका उपयोग माइग्रेन के इलाज के लिए किया जाता है, घावों को ठीक करने, उल्टी और त्वचा के मलिन होने और दाग-धब्बों के उपचार के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

 

निष्कर्ष

औषधीय और सुगंधित पौधों की अपनी विरासत को बचाने में भारत की यात्रा की जड़ें गहरी और दूरदर्शितापूर्ण हैं। पश्चिमी घाट के जंगलों से लेकर विदर्भ के खेतों तक, प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान से लेकर ई-चरक जैसे आधुनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म तक, देश संरक्षण, आजीविका और स्वास्थ्य सेवाओं को एक मजबूत सूत्र में पिरो रहा है। प्रतिबद्ध संस्थानों, सशक्त समुदायों और समावेशी नीतियों के साथ, भारत न केवल अपनी हरित संपदा को संरक्षित कर रहा है, बल्कि इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए अच्छे स्वास्थ्य, गौरव और समृद्धि के स्रोत में बदल रहा है।

 

संदर्भ

 

United Nations

https://www.un.org/en/observances/world-wildlife-day

https://www.unesco.org/en/mab

 

CITES

https://cites.org/sites/default/files/eng/events/wwd/2026/WWD2026_ConceptNote_EN.pdf

 

Press Information Bureau

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2209245&reg=3&lang=2

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2232271&v=4&reg=3&lang=2&v=1

 

Ministry of AYUSH

https://namayush.gov.in/content/operational-guidelines-medicinal-plants

https://ngo.ayush.gov.in/Default/assets/front/documents/RevisedCentralSectorSchemeforNMPB_July2023.pdf

https://namayush.gov.in/sites/default/files/FAQ.pdf

https://namayush.gov.in/content/operational-guidelines-medicinal-plants

 

National Medicinal Plants Board

https://nmpb.nic.in/about-us

 

Others

mission/pdf/OperationalGuideline/Operational%20Guidelines-%20Medicinal%20Plants.pdf

https://www.wipo.int/en/web/geographical-indications

विश्व वन्यजीव दिवस 2026

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