Economy
आत्मनिर्भरता और निर्यात अनुकूलनीयता का संवर्धन: भारत की बढ़ती वैश्विक पहचान
Posted On:
02 MAR 2026 12:17PM
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मुख्य बिंदु
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- अप्रैल-जनवरी 2025-26 के दौरान कुल निर्यात 720.76 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया (सालाना आधार पर 6.15 प्रतिशत की वृद्धि)।
- अप्रैल-जनवरी 2025-26 के दौरान, सेवाओं का निर्यात 354.13 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया (सालाना आधार पर 10.57 प्रतिशत की वृद्धि)।
- लक्षित नीतिगत सहायता के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स और रक्षा विनिर्माण जैसे क्षेत्र विस्तार कर रहे हैं।
- निर्यात संवर्धन मिशन जैसे संस्थागत सुधार व्यापार वित्त पोषण, लॉजिस्टिक्स, अनुपालन और बाजार तक पहुंच को बढ़ाते हैं।
- केंद्रीय बजट 2026-27 रणनीतिक विनिर्माण को बड़े पैमाने पर ले जाने पर केंद्रित है, जिससे निर्यात प्रतिस्पर्धिता मजबूत होगी।
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परिचय
महामारी के बाद की अवधि में, भारत तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा है, देश वैश्विक अनिश्चितताओं से निपटने के लिए अपनी आंतरिक शक्तियों का इस्तेमाल कर रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में उल्लेख किया गया है कि भारत की विकास दर "दुनिया के लिए ईर्ष्या का विषय"1 है, जिसे एक स्वस्थ बैंकिंग प्रणाली, ऋण मध्यस्थता, पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार और पर्याप्त चालू खाता बचत का समर्थन प्राप्त है।2
वैश्विक व्यापार परिदृश्य में निरंतर बदलाव हो रहे हैं, जैसा कि अप्रैल 2025 में व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन व्यापार नीति अनिश्चितता (टीपीयु) सूचकांक और वैश्विक आर्थिक नीति अनिश्चितता (जीपीइयु) सूचकांक में परिलक्षित हुआ है। साथ ही, इन घटनाक्रमों ने अनुकूलनीय आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने और दुनिया भर में विविध व्यापार एवं निवेश साझेदारी का विस्तार करने के भारत के प्रयासों को तेज़ किया गया है।3
इस पृष्ठभूमि में, भारत को महत्वपूर्ण क्षेत्रों में लक्षित आयात विकल्प को खोजने में सक्षम रहना होगा और इसे लंबी अवधि में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए निर्यात-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाना होगा। 4
विनिर्माण पुनर्जागरण: घरेलू क्षमताओं का निर्माण
भारत के आयात के विकल्प की खोज 'स्वदेशी' और 'आत्मनिर्भरता' 5 के आदर्शों से प्रेरित है, जिसे विभिन्न उद्योगों में लक्षित नीतियों के रूप में लागू किया गया है। सरकार ने घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाने के लिए क्षेत्र-विशिष्ट प्रोत्साहनों, निवेशों और सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया है। 6 पिछले एक दशक में, 'मेक इन इंडिया' पहल और 'उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन' (पीएलआई) जैसे साहसिक सुधारों और दूरदर्शी नीतियों ने देश को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में बदल दिया है।7
केंद्रीय बजट 2026-27 की मुख्य विशेषताएं 8
केंद्रीय बजट 2026-27 में रणनीतिक और श्रम-प्रधान क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को बड़े पैमाने पर ले जाने पर विशेष जोर दिया गया है, जिससे निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत होगी और आयात निर्भरता में कमी आएगी। सरकार ने सेवा क्षेत्र, विनिर्माण, विशेष आर्थिक क्षेत्र, बुनियादी ढांचे, व्यापार करने में सुगमता और क्षेत्र-विशिष्ट सुधारों से जुड़े व्यापक उपायों की घोषणा की है।
प्रमुख पहलों में बायोफार्मा 'शक्ति', भारतीय सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 का शुभारंभ, इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना का विस्तार, 'दुर्लभ मृदा गलियारों' (रेयर अर्थ कॉरिडोर) का विकास, केमिकल पार्कों की स्थापना, और पूंजीगत वस्तुओं एवं कंटेनर विनिर्माण के लिए लक्षित सहायता शामिल है।
इसमें विमान पुर्जों, लिथियम सेल विनिर्माण, और रक्षा एवं नागरिक उड्डयन के पुर्जों पर सीमा शुल्क में कटौती को सक्षम करने के लिए सुविधाजनक उपायों का का प्रस्ताव है। इससे एयरोस्पेस घटकों, इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग और ऊर्जा भंडारण हार्डवेयर जैसे इंजीनियरिंग उप-क्षेत्रों के लिए विनिर्माण लागत को कम करने में मदद मिलेगी।
इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र की सफलता की कहानी
आयात के विकल्प खोजने के प्रयासों का सीधा परिणाम भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के शानदार प्रदर्शन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 2030-31 तक 500 अरब डॉलर का घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम बनाने के लक्ष्य के साथ, भारत अब इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन, विनिर्माण और निर्यात में विश्व में अग्रणी बनने की राह पर मजबूती से अग्रसर है।9
- भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन 2014-15 के 1.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 11.3 लाख करोड़ रुपये हो गया है, यह लगभग छह गुना वृद्धि है।10
- भारत में 2020-21 से इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में 4 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया, जो बढ़ते वैश्विक निवेशक के विश्वास को दर्शाता है।11
- इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र ने पिछले दस वर्षों में भारत में लगभग 25 लाख रोजगार के अवसर पैदा किए हैं। 12 13

आज, भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माताओं में से एक है, विशेष रूप से मोबाइल फोन के क्षेत्र में। भारत ने अब मोबाइल उत्पादन में लगभग पूर्ण आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है। एक दशक पहले जहां भारत अपनी अधिकांश आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर था, वहीं अब लगभग सभी उपकरणों का उत्पादन घरेलू स्तर पर कर रहा है।14
- मोबाइल विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन 2014-15 के 18,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 5.45 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जो कि 28 गुना की भारी वृद्धि है।15
- भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है। जहाँ 2014 में केवल दो निर्माण इकाइयाँ थीं, वहीं आज देश में 300 से अधिक इकाइयाँ संचालित हैं।16

इसी तरह की वृद्धि अन्य उच्च-मूल्य वाले क्षेत्रों में भी दिखाई देती है। सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स घटक ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं जहाँ आयात का विकल्प खोजना रणनीतिक रूप से अत्यंत आवश्यक है, जैसा कि वैश्विक चिप संकट के दौरान देखा गया था। इसे स्वीकार करते हुए, बजट 2026-27 में 'भारतीय सेमीकंडक्टर मिशन 2.0' के शुभारंभ की घोषणा की गई, जिसका उद्देश्य उपकरणों और सामग्रियों का उत्पादन करना, पूर्ण स्वदेशी भारतीय आईपी डिजाइन करना और आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करना है। साथ ही, 40,000 करोड़ रुपये के बढ़े हुए परिव्यय के साथ 'इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना' का विस्तार भी किया गया है।
अगस्त 2025 में, भारत ने साणंद, गुजरात में अपनी पहली एंड-टू-एंड ओसैट (आउटसोर्स सेमीकंडक्टर असेंबली और टेस्ट) सुविधाओं में से एक का उद्घाटन किया, जिससे सेमीकंडक्टर क्षेत्र में 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को मजबूती मिली।19 इससे पहले, मई 2025 में, उन्नत 3-नैनोमीटर चिप डिजाइन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए दो अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर डिजाइन केंद्रों का उद्घाटन किया गया था, जो देश की सेमीकंडक्टर नवाचार यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुए।20
भारत ने छह राज्यों में 10 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को भी मंजूरी दी है, जिसमें ओडिशा में स्थापित होने वाली अपनी तरह की पहली वाणिज्यिक सिलिकॉन कार्बाइड फैब और एक उन्नत पैकेजिंग इकाई शामिल है। लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपये के कुल निवेश के साथ, ये परियोजनाएं वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला में देश की स्थिति को और मजबूत करती हैं।21
इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को मजबूत करने के लिए प्रमुख पहलें
इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए भारी पूंजी निवेश, बड़े पैमाने पर उत्पादन गतिविधियां, परिपक्वता की लंबी अवधि, उन्नत तकनीकों तक पहुंच और अत्यधिक कुशल कार्यबल की आवश्यकता होती है, इसको देखते हुए सरकार ने घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने और घरेलू कंपनियों को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ने के लिए रणनीतिक हस्तक्षेपों की एक श्रृंखला शुरू की है।22 इस उद्देश्य को समर्थन देने के लिए, घरेलू विनिर्माण को सुदृढ़ करने और निवेश आकर्षित करने हेतु कई लक्षित योजनाएं शुरू की गई हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना: 22,919 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ 2025 में अधिसूचित इस योजना का उद्देश्य टर्नओवर-लिंक्ड, पूंजीगत व्यय और हाइब्रिड प्रोत्साहनों के माध्यम से घटक विनिर्माण को मजबूत करना और भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ एकीकृत करना है।23 निवेश की प्रतिबद्धताएं पहले से ही प्रारंभिक लक्ष्य से लगभग दोगुनी होने के कारण, केंद्रीय बजट 2026-27 में इस गति का लाभ उठाने के लिए परिव्यय को बढ़ाकर 40,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है।24
भारतीय सेमीकंडक्टर मिशन: 76,000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ 2021 में स्वीकृत, भारतीय सेमीकंडक्टर मिशन (आईएसएम) 1.0 सेमीकंडक्टर निर्माण, असेंबली, टेस्टिंग और चिप डिजाइन के लिए 50 प्रतिशत तक की वित्तीय सहायता प्रदान करता है।25 इसी आधार पर आगे बढ़ते हुए, केंद्रीय बजट वित्त वर्ष 2026-27 में आईएसएम 2.0 के लिए 1,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो उद्योग-आधारित अनुसंधान, तकनीकी विकास और कुशल कार्यबल के निर्माण पर केंद्रित है।26 27
अन्य प्रमुख पहलों में 'बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण' के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना, 'आईटी हार्डवेयर' के लिए पीएलआई योजना 2.0, 'इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर' (ईएमसी और ईएमसी 2.0) योजना, 'इलेक्ट्रॉनिक घटकों और सेमीकंडक्टर के विनिर्माण को बढ़ावा देने की योजना' (एसपीईसीएस), और 'सेमीकंडक्टर एवं डिस्प्ले विनिर्माण तंत्र के विकास' के लिए संशोधित कार्यक्रम शामिल हैं।28
ऑटोमोटिव उद्योग: विकास की राह पर
ऑटोमोटिव उद्योग, जिसमें वाहन और ऑटो घटक दोनों शामिल हैं, आर्थिक विकास में अपने महत्वपूर्ण योगदान, रोजगार सृजन और कई अन्य क्षेत्रों के साथ मजबूत जुड़ाव के कारण अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ बना हुआ है।29

भारत दोपहिया और तिपहिया वाहनों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा बाजार और यात्री तथा वाणिज्यिक वाहनों के लिए वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा बाजार बनकर उभरा है। एक विशाल विनिर्माण और ऑटो घटक पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा समर्थित, यह क्षेत्र 3 करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है।30
प्रदर्शन के रुझान निरंतर वृद्धि को दर्शाते हैं: वित्त वर्ष 2021 में कुल उत्पादन 22,652 हजार यूनिट से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 31,028 हजार यूनिट हो गया है, जबकि इसी अवधि के दौरान घरेलू बिक्री 18,620 हजार यूनिट से बढ़कर 25,607 हजार यूनिट हो गई है, जो मजबूत विकास और बढ़ती घरेलू मांग को दर्शाता है।31 कुल मिलाकर, उद्योग ने पिछले दशक (वित्त वर्ष 2015-वित्त वर्ष 2025) 32 में उत्पादन में लगभग 33 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है, जिसके साथ नवाचार और प्रौद्योगिकी अपनाने में तेजी आई है, साथ ही स्थानीयकरण और मूल्यवर्धन में भी वृद्धि हुई है।33
ऑटोमोबाइल उद्योग को मजबूत करने के लिए प्रमुख पहलें
पिछले एक दशक में, नीतिगत सुधारों, लक्षित राजकोषीय प्रोत्साहनों और बुनियादी ढांचे के विकास ने वैश्विक ऑटोमोटिव हब के रूप में भारत की स्थिति को और मजबूत किया है।34
ऑटोमोबाइल और ऑटो घटक उद्योग के लिए पीएलआई योजना: 25,938 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ सितंबर 2021 में स्वीकृत, पीएलआई-ऑटो योजना उच्च-मूल्य वाले 'उन्नत ऑटोमोटिव प्रौद्योगिकी' वाहनों और उत्पादों को बढ़ावा देती है। सितंबर 2025 तक, इस योजना के जरिये 35,657 करोड़ रुपये का संचयी निवेश हुआ है।35
पीएम ई-ड्राइव योजना: सितंबर 2024 में 10,900 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ शुरू की गई यह योजना इलेक्ट्रिक दोपहिया और ई तिपहिया वाहनों के लिए मांग प्रोत्साहन प्रदान करती है। साथ ही, यह ई-ट्रक और ई-एम्बुलेंस जैसी नई श्रेणियों को सहायता प्रदान करने के साथ-साथ चार्जिंग स्टेशनों और परीक्षण सुविधाओं के उन्नयन के लिए वित्त पोषण भी प्रदान करती है।36
इस परिवर्तन का समर्थन करने वाली अन्य प्रमुख नीतिगत पहलों में 'उन्नत कैमिस्ट्री सेल (एसीसी) बैटरी भंडारण' के लिए पीएलआई योजना, 'पीएम ई-बस सेवा-भुगतान सुरक्षा तंत्र (पीएसएम) योजना और 'भारत में इलेक्ट्रिक यात्री कारों के विनिर्माण को बढ़ावा देने की योजना' (एसएमइसी) शामिल हैं।37
“विश्व की फार्मेसी” के रूप में भारत की शक्ति का लाभ उठाना 38

भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग किफायती दवाओं के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए विशेष रूप से पहचाना जाता है।39 अक्सर "विश्व की फार्मेसी" 40 के रूप में, भारत घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करने के साथ-साथ लागत प्रभावी जेनेरिक दवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आज, भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा फार्मास्युटिकल उत्पादक देश है और मूल्य के मामले में ग्यारहवां सबसे बड़ा फार्मास्युटिकल उत्पादक है41, वित्त वर्ष 2025 में इस क्षेत्र में 4.72 लाख करोड़ रुपये का वार्षिक व्यापार दर्ज किया गया है।42
इस संदर्भ में, अपनी अत्यधिक संवेदनशीलता और उच्च रणनीतिक महत्व को देखते हुए, एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (एपीआई) के घरेलू विनिर्माण को मजबूत करना एक प्राथमिकता बन गया है।43 भारत पहले से ही दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा एपीआई उत्पादक है और घरेलू उत्पादन ने अब तेजी से आयात का स्थान लेना शुरू कर दिया है।44
फार्मास्युटिकल उद्योग को मजबूत करने के लिए प्रमुख पहलें
इस गति को आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने और घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के के लिए उठाई गई पहलों के माध्यम से और अधिक तेज किया जा रहा है।
बल्क ड्रग्स के लिए पीएलआई योजना: आयातित एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (एपीआई), प्रमुख शुरुआती सामग्रियों (केएसएम) और ड्रग इंटरमीडिएट्स पर निर्भरता को कम करने के लिए, बल्क ड्रग्स हेतु पीएलआई योजना ने सितंबर 2025 तक 4,763 करोड़ रुपये का निवेश जुटाया है। इस योजना के तहत 26 महत्वपूर्ण उत्पादों के लिए 55,000 मीट्रिक टन की वार्षिक विनिर्माण क्षमता विकसित की गई है, जिसमें पेनिसिलिन जी पोटेशियम जैसे केएसएम के लिए 'फर्मेंटेशन-आधारित संश्लेषण' पर विशेष ध्यान दिया गया है।45
चिकित्सा उपकरणों के लिए पीएलआई योजना: सरकार ने चिकित्सा उपकरणों के स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए 2020 में 'चिकित्सा उपकरणों के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने की पीएलआई योजना' शुरू की थी।46 सितंबर 2025 तक, इस योजना के माध्यम से 1,093.69 करोड़ रुपये का वास्तविक निवेश हुआ है और देश में 57 उच्च-स्तरीय चिकित्सा उपकरणों का निर्माण शुरू हो चुका है।47
आयुष का वैश्विक एकीकरण: भारत की आयुष प्रणालियों को वैश्विक स्वास्थ्य हस्तक्षेप फ्रेमवर्क में एकीकृत करने के प्रयास जारी हैं। जामनगर में स्थापित 'विश्व स्वास्थ्य संगठन वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र' पारंपरिक चिकित्सा पर अनुसंधान, नवाचार और नीतिगत संवाद के लिए एक अंतरराष्ट्रीय केंद्र के रूप में कार्य करता है। मई 2025 में, स्वास्थ्य हस्तक्षेपों के अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण मॉड्यूल को विकसित करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ एक समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किए गए, जिसका उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा की वैश्विक स्वीकार्यता में सुधार करना और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में इसके क्रमिक एकीकरण को सुगम बनाना है।48
अन्य प्रमुख पहलों में 'फार्मास्युटिकल उद्योग को मजबूत करने की योजना' (एसपीआई), 'बल्क ड्रग पार्कों को बढ़ावा देने की योजना', 'चिकित्सा उपकरण पार्कों को बढ़ावा देने की योजना', और 'चिकित्सा उपकरण उद्योग को मजबूत करने की योजना' ((एसएमडीआई) शामिल हैं।49 जैसे-जैसे ये योजनाएं आगे बढ़ेंगी और उत्पादन इकाइयाँ चालू होंगी, भारत द्वारा बल्क ड्रग्स की आपूर्ति में अधिक आत्मनिर्भरता और अधिक मजबूत बनाने की उम्मीद होगी। 50
रक्षा और रणनीतिक विनिर्माण: आत्मनिर्भरता क्रियान्वयन में
भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में एक बड़ा बदलाव आया है, जो यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक खरीद राष्ट्रीय उद्योग को मजबूत करे, आयात निर्भरता को कम करे और परिचालन संबंधी तैयारी को बढ़ाए।51 भारत के कम से कम 65% रक्षा उपकरण अब देश में ही निर्मित होते हैं, जो पहले की लगभग 65-70% आयात निर्भरता में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है।
स्वदेशी रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2014-15 के 46,429 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2023-24 में 1,27,434 करोड़ रुपये हो गया, और वित्त वर्ष 2024-25 में यह 1.54 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया।52

अक्टूबर 2025 तक, यह 9,145 करोड़ रुपये से अधिक के 289 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए हैं और 66,423 करोड़ रुपये मूल्य के संभावित निवेश अवसर प्राप्त हुए हैं।
- डीआरडीओ के नेतृत्व वाली पहलों के माध्यम से रक्षा नवाचार को सुदृढ़ करना, जिसमें डीप-टेक और अत्याधुनिक परियोजनाओं के लिए प्रौद्योगिकी विकास कोष (टीडीएफ) के तहत अनुमोदित 500 करोड़ रुपये का कोष शामिल है। इसके साथ ही, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम और शैक्षणिक संस्थानों, स्टार्ट-अप और उद्योग को जोड़ने वाले 15 'रक्षा उद्योग-अकादमिक उत्कृष्टता केंद्र' भी कार्यरत हैं।
- निजी क्षेत्र और एमएसएमई की भागीदारी का विस्तार किया जा रहा है, जिसमें अब लगभग 16,000 एमएसएमई ड्रोन और एवियोनिक्स से क्षेत्रों में अपना योगदान दे रहे हैं, जो रक्षा मैनुफैक्टरिंग इकोसिस्टम को सुदृढ़ कर रहे हैं।
- उदार एफडीआई मानदंडों, पीएलआई योजनाओं और रक्षा औद्योगिक गलियारों के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को सहायता देने से घरेलू निर्माताओं और वैश्विक निवेशकों दोनों के लिए अवसर बढ़ रहे हैं।
- रक्षा खरीद की गति को तेज़ करना, जिसके तहत रक्षा मंत्रालय ने वित्त वर्ष 2024-25 में 2,09,050 करोड़ रुपये मूल्य के रिकॉर्ड 193 अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए हैं, जो एक ही वित्तीय वर्ष में अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है।
कुल मिलाकर, ये काम भारत को एक प्रमुख रक्षा आयातक से रक्षा विनिर्माण और नवाचार के लिए एक उभरते हुए वैश्विक केंद्र के रूप में निरंतर परिवर्तित होने का संकेत देते हैं।
निर्यात अनुकूलनीयता और विविधीकरण
घरेलू उत्पादन को मजबूत करने के साथ-साथ, भारत ने अपना निर्यात मजबूत करने और विविधता लाने पर भी काम किया है।56 हाल के आंकड़े इसको रेखांकित करते हैं: अप्रैल-जनवरी 2025-26 के दौरान कुल निर्यात (वस्तु एवं सेवाएं) 720.76 बिलियन अमेरिकी डॉलर होने का अनुमान है, जो अप्रैल-जनवरी 2024-25 के 679.02 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक है, जो 6.15% की अनुमानित वृद्धि दर्शाता है।57 वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में, यह वृद्धि भारत की मजबूती को दर्शाती है, जहाँ उच्च-मूल्य वाली वस्तुएं, व्यापक वैश्विक भागीदारी और नीतिगत सुधार एक अधिक संतुलित और विश्व स्तर पर एकीकृत व्यापार की दिशा में बढ़ने की ओर सहायता कर रहे हैं।58
मजबूती का एक प्रमुख पहलू निर्यात विविविधीकरण है। इससे अनिश्चित वैश्विक व्यापार वातावरण, मांग में अस्थिरता और आपूर्ति श्रृंखला की बाधाओं से निपटने में मदद मिलती है। विभिन्न उत्पादों और बाजारों में विस्तार करके, देश सीमित साझेदारों पर अपनी अत्यधिक निर्भरता को कम करते हैं और बाहरी झटकों के खिलाफ अपने को मजबूत बनाते हैं।59 विकासशील देशों के लिए 'अंकटाड' के व्यापार विविधता सूचकांकों के अनुसार, भारत अपने व्यापारिक उत्पादों की विविधता के मामले में शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है 60 और अपने व्यापारिक साझेदारों की विविधता के मामले में शीर्ष तीन में शामिल है 61। यह एक व्यापक निर्यात बास्केट और व्यापारिक संबंधों के लगातार बढ़ते दायरे को दर्शाता है।
उत्पाद के स्तर पर, भारत का निर्यात बास्केट (निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की सूची) विस्तृत हो रहा है। जनवरी 2026 (वर्ष-दर-वर्ष) में, कई प्रमुख श्रेणियों में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई:62
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उच्चतम वृद्धि
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अन्य अनाज*(+88.49%), कॉफ़ी (+36.03%), आयरन ओर (+31.54%), मीट, डेयरी और पोल्ट्री (+17.92%), मरीन प्रोडक्ट्स (+13.29%), इंजीनियरिंग गुड्स (+10.37%)
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मजबूत वृद्धि
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पेट्रोलियम उत्पाद (+8.55%), अभ्रक, कोयला, अन्य अयस्क और खनिज जिनमें प्रसंस्कृत खनिज शामिल हैं (+6.35%)
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स्थिर वृद्धि
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मैन-मेड यार्न/फैब्रिक्स/मेड-अप्स वगैरह (+1.01%), ड्रग्स और फार्मास्यूटिकल्स (+0.96%), इलेक्ट्रॉनिक गुड्स (+0.32%), अनाज से बनी चीज़ें और अलग-अलग प्रोसेस्ड आइटम्स (+1.12%), फल और सब्ज़ियां (+1.77%)
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*दूसरे अनाज में राई, जौ, ओट्स, फोनियो, क्विनोआ वगैरह शामिल हैं, और इसमें गेहूं, चावल, मक्का और बाजरा शामिल नहीं हैं63
इस प्रकार की व्यापक वृद्धि यह दर्शाती है कि केवल एक या दो नहीं, बल्कि कई उद्योग मिलकर अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में कुछ विशिष्ट क्षेत्रों ने उल्लेखनीय वृद्धि प्रदर्शित की है:
- पेट्रोलियम उत्पाद: पिछले एक दशक में भारत ने पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में उल्लेखनीय उछाल देखा है। अपने मजबूत बुनियादी ढांचे और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति के कारण, भारत परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों का सातवां सबसे बड़ा निर्यातक है और वैश्विक स्तर पर शीर्ष पांच रिफाइनिंग (शोधन) देशों में शामिल है।64
- इलेक्ट्रॉनिक सामान: इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में तीव्र वृद्धि हुई है, जो वित्त वर्ष 2022 में सातवीं सबसे बड़ी निर्यात श्रेणी से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में तीसरी सबसे बड़ी और सबसे तेजी से बढ़ने वाली श्रेणी में आ गई है। यह उछाल वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में भी जारी रहा, जिसमें 22.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निर्यात हुआ, जिससे यह क्षेत्र भारत का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक बनने की राह पर है।65 इसके अलावा, 2025-26 के पहले पांच महीनों में, स्मार्टफोन निर्यात 1 लाख करोड़ रुपये के स्तर को छू गया, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 55 प्रतिशत अधिक है।66
- फार्मास्युटिकल्स और रसायन: मूल्य के आधार पर फार्मास्युटिकल निर्यात में भारत वर्तमान में वैश्विक स्तर पर 11वें स्थान पर है, जिसकी हिस्सेदारी 3 प्रतिशत है। साथ ही, चिकित्सा उपकरणों का निर्यात वित्त वर्ष 2021 के 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 4.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है, जो एक महत्वपूर्ण वृद्धि दर्शाता है।67
- कपड़ा: भारत कपड़ा और परिधान का छठा सबसे बड़ा वैश्विक निर्यातक है, जिसकी इस क्षेत्र के विश्व निर्यात में लगभग 4% की हिस्सेदारी है। भारत का कपड़ा और परिधान (हस्तशिल्प सहित) का निर्यात वित्त वर्ष 2024 के 35.87 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 37.75 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है।68
- ऑटोमोबाइल: ऑटोमोबाइल उद्योग में भी निर्यात में मजबूत वृद्धि देखी जा रही है। कुल ऑटोमोबाइल निर्यात वित्त वर्ष 2021 के 4,131 हजार से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 5,357 हजार हो गया है।69 भारत ने यात्री वाहनों, वाणिज्यिक वाहनों, दुपहिया और तिपहिया वाहनों का निर्यात किया है। वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में निर्यात में दो अंकों की वृद्धि दर्ज की गई, जो भारत निर्मित वाहनों की बढ़ती वैश्विक मांग को दर्शाती है।70
- रक्षा : भारत का रक्षा निर्यात वित्त वर्ष 2024-25 में 23,622 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, जबकि 2014 में यह 1,000 करोड़ रुपये से भी कम था।71 इस वृद्धि के साथ-साथ भारत की वैश्विक उपस्थिति का भी विस्तार हुआ है और अब भारतीय रक्षा उत्पाद संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस और आर्मेनिया सहित 100 से अधिक देशों को निर्यात किए जा रहे हैं। भविष्य की ओर देखते हुए, सरकार ने 2029 तक 50,000 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात का लक्ष्य रखा है।72
व्यापारिक साझेदारों में वृद्धि
व्यापार समझौतों के लिए भारत के निरंतर प्रयासों ने बाहरी चुनौतियों के बीच व्यापारिक साझेदारी को विविध बनाने और अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में मदद की है। पिछले तीन वर्षों में, भारत ने 38 देशों को कवर करने वाले नौ मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए)को अंतिम रूप दिया है, जिससे वैश्विक जीडीपी के अनुमानित 70 प्रतिशत हिस्से तक भारत की बाजार पहुंच का विस्तार हुआ है और वह भी अधिकतर शून्य शुल्क पर।73
ये समझौते भारतीय वस्तुओं और सेवाओं के लिए अवसरों का विस्तार कर रहे हैं, और वर्तमान में कई अन्य समझौतों पर बातचीत चल रही है। इसका उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में व्यापारिक संबंधों का प्रसार करना और किसी एक बाजार पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना है।
संस्थागत समर्थन के माध्यम से भारत के निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना
निर्यात प्रोत्साहन मिशन
निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को और अधिक मजबूत करने के लिए, विशेष रूप से एमएसएमई पहली बार निर्यात करने वाले उद्यमियों और श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए, सरकार ने निर्यात प्रोत्साहन मिशन (इपीएम) को मंजूरी दी है।74 वित्त वर्ष 2025-26 से 2030-31 के लिए 25,060 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय के साथ, इपीएम का लक्ष्य भारत के निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करना, सस्ती व्यापार पूँजी तक पहुंच में सुधार करना और विभिन्न क्षेत्रों एवं क्षेत्रों में वैश्विक बाजार की तैयारी और प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना है।75 यह दो एकीकृत उप-योजनाओं 'निर्यात प्रोत्साहन' और 'निर्यात दिशा' के माध्यम से संचालित होगा।
ईपीएम के तहत नए हस्तक्षेप76
- वैकल्पिक व्यापार उपकरणों के लिए सहायता (निर्यात फैक्टरिंग): यह उपाय एमएसएमई के लिए लागत प्रभावी कार्यशील पूंजी समाधान के रूप में निर्यात फैक्टरिंग को बढ़ावा देता है। यह भारतीय रिजर्व बैंक या अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (आईएफएससीए) द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थाओं के माध्यम से फैक्टरिंग लागत पर 2.75% ब्याज सहायता प्रदान करता है। इसकी सीमा प्रति एमएसएमई वार्षिक 50 लाख रुपये निर्धारित की गई है, जिसमें समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल माध्यम से दावा करने की व्यवस्था है।
- ई-कॉमर्स निर्यातकों के लिए ऋण सहायता: इस पहल के माध्यम से ब्याज सहायता और आंशिक गारंटी के साथ संरचित ऋण की व्यवस्था की गई है, जिसके अंतर्गत 'प्रत्यक्ष ई-कॉमर्स क्रेडिट सुविधा' 90 प्रतिशत गारंटी कवरेज के साथ 50 लाख रुपये तक का ऋण प्रदान करती है, जबकि 'ओवरसीज इन्वेंटरी क्रेडिट सुविधा' 75 प्रतिशत गारंटी कवरेज के साथ 5 करोड़ रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराती है; इसके अतिरिक्त, प्रति आवेदक वार्षिक 15 लाख रुपये की अधिकतम सीमा के साथ 2.75 प्रतिशत की ब्याज सहायता भी प्रदान की जा रही है।

- उभरते निर्यात अवसरों के लिए सहायता: यह पहल साझा-जोखिम और ऋण उपकरणों के माध्यम से नए एवं उच्च-जोखिम वाले बाजारों में प्रवेश को सुगम बनाती है, जिससे निर्यातकों के आत्मविश्वास और नकदी प्रवाह में सुधार होता है।
- व्यापार विनियम, प्रत्यायन और अनुपालन सक्षमीकरण (ट्रेस): इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय परीक्षण, निरीक्षण और प्रमाणन आवश्यकताओं को पूरा करने में निर्यातकों की सहायता करना है, जिसके तहत 'पॉजिटिव लिस्ट' के अंतर्गत पात्र लागत का 60 प्रतिशत और 'प्रायोरिटी पॉजिटिव लिस्ट' के अंतर्गत 75 प्रतिशत प्रतिपूर्ति प्रदान की जाती है, जिसकी अधिकतम सीमा प्रति आईईसी वार्षिक 25 लाख रूपये निर्धारित है।
- लॉजिस्टिक्स, विदेशी भंडारण और पूर्ति सुविधा (फ्लो): यह पहल विदेशी भंडारण और अवसंरचना तक पहुंच सुगम बनाती है, जिसमें ई-कॉमर्स निर्यात हब भी शामिल हैं; इसके अंतर्गत निर्धारित सीमाओं और एमएसएमई मानदंडों के अधीन, अधिकतम तीन वर्षों के लिए स्वीकृत परियोजना लागत का 30 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
- माल ढुलाई और परिवहन के लिए लॉजिस्टिक्स हस्तक्षेप (लिफ्ट): यह पहल कम निर्यात वाले जिलों में माल ढुलाई की कमियों की भरपाई करती है, जिसके तहत माल ढुलाई लागत का 30 प्रतिशत तक प्रतिपूर्ति के रूप में प्रदान किया जाता है, जिसकी अधिकतम सीमा प्रति वित्तीय वर्ष प्रति आईईसी 20 लाख रुपये निर्धारित की गई है।
- व्यापार सूचना और सुगमीकरण के लिए एकीकृत सहायता (इनसाइट): यह कदम निर्यातकों की क्षमता निर्माण, 'निर्यात हब के रूप में जिले' पहल के तहत जिला-स्तरीय सुगमीकरण और व्यापार सूचना प्रणालियों को मजबूत करता है। इसके अंतर्गत परियोजना लागत का 50 प्रतिशत तक और केंद्र/राज्य सरकार के संस्थानों तथा विदेशों में स्थित भारतीय मिशनों के लिए अधिसूचित सीमा के अधीन 100 प्रतिशत तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
सेवा निर्यात

सेवा निर्यात: भारत की मुख्य ताकत, सेवा निर्यात, वैश्विक अनिश्चितता के बीच भी निरंतर विकास का माध्यम बना हुआ है। वित्त वर्ष 2025 में, सेवा निर्यात 387.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया, जिसने 13.6% (वर्ष दर वर्ष) की वृद्धि दर्ज की और प्रौद्योगिकी, व्यवसाय एवं पेशेवर सेवाओं के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में भारत की स्थिति को और मजबूत किया। इसी अवधि के दौरान, सेवा व्यापार अधिशेष भी बढ़कर 188.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।77 यह मजबूती वित्त वर्ष 2026 में भी जारी रही है। अप्रैल-जनवरी 2025-26 के दौरान, सेवा निर्यात का अनुमान 354.13 बिलियन अमेरिकी डॉलर लगाया गया है,78 जो पिछले वर्ष की इसी अवधि के 320.28 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक (10.57%) है।79 बाजार विविधीकरण में भी सुधार हो रहा है: जहाँ अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात किये जाने वाला देश बना हुआ है, वहीं वित्त वर्ष 2024 और 2025 के बीच यूरोप की हिस्सेदारी 30.8 प्रतिशत से बढ़कर 32.8 प्रतिशत हो गई है।80
भारत के सेवा निर्यात के प्रेरक कारक:
भारत के सेवा निर्यात की वृद्धि को ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) के तीव्र विस्तार से शक्ति मिल रही है, जिन्होंने वित्त वर्ष 2020 से वित्त वर्ष 2025 तक लगभग 7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) दर्ज की है। इसके साथ ही सॉफ्टवेयर, बीपीएम, कंसल्टेंसी और फिनटेक सेवाओं के लिए निरंतर वैश्विक मांग ने भी इस वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।81
एक अन्य प्रमुख प्रवर्तक भारत का गहरा और विविध टैलेंट बेस है। स्टैनफोर्ड की एआई इंडेक्स रिपोर्ट 2025 भारत को 'एआई कौशल पैठ' में वैश्विक स्तर पर दूसरे स्थान पर रखती है।82 इस लाभ को मजबूत भौतिक और डिजिटल बुनियादी ढांचे के साथ-साथ श्रम आर्बिट्राज, कर अवकाश का लाभ उठाने वाले विशेष आर्थिक क्षेत्र आधारित जीसीसी और एक जीवंत स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा और अधिक सुदृढ़ किया गया है, जो भारत की लागत प्रतिस्पर्धात्मकता और दक्षता को बढ़ावा देता है।83
निष्कर्ष
भारत का अनुभव यह दर्शाता है कि जब रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाया जाता है, तो आयात के विकल्प और निर्यात शक्ति एक साथ आगे बढ़ सकते हैं। मोबाइल फोन और दवाओं से लेकर ऑटोमोबाइल और रक्षा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में, भारत का प्रयास न केवल घरेलू जरूरतों के लिए बल्कि वैश्विक बाजारों के लिए भी भारत में निर्माण करना है। जैसे-जैसे स्थानीय क्षमता का विस्तार होता है और आयात पर निर्भरता कम होती है, कई उद्योगों के अधिक निर्यात करने का अवसर भी प्राप्त होता है, जिससे बाहरी क्षेत्र मजबूत होता है।
विकसित भारत 2047 की ओर देखते हुए, भारत की आत्मनिर्भरता और गहरा वैश्विक एकीकरण एक साथ चलेंगे। इससे 'मेड इन इंडिया' उत्पादों का विस्तार करने, रोजगार पैदा करने, विकास को गति देने और वैश्विक विनिर्माण एवं निर्यात केंद्र के रूप में भारत की स्थिति को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
संदर्भ
वित्त मंत्रालय
https://www.indiabudget.gov.in/economicsurvey/doc/echapter.pdf
https://www.indiabudget.gov.in/doc/Budget_Speech.pdf
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय
https://static.pib.gov.in/WriteReadData/specificdocs/documents/2025/aug/doc2025818614701.pdf
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2221840®=3&lang=2
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2206194®=3&lang=2
https://www.commerce.gov.in/wp-content/uploads/2026/01/PIB-Release-15.1.2026.pdf
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2226987®=3&lang=1
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2175702®=3&lang=2
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय
https://static.pib.gov.in/WriteReadData/specificdocs/documents/2026/feb/doc202623777901.pdf
https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?NoteId=155130&ModuleId=3®=3&lang=2
https://d2p5j06zete1i7.cloudfront.net/Cms/admin/PressRelease/1770478760.pdf
रक्षा मंत्रालय
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2191937®=3&lang=2
रसायन और उर्वरक मंत्रालय
https://www.pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=2085344®=3&lang=2
नीति आयोग
https://www.niti.gov.in/sites/default/files/2026-01/Trade_Watch_Quarterly_April_June_Q1_FY26.pdf
संसद में दिए गए जवाब
https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/185/AU939_dYGgDX.pdf?source=pqals
https://sansad.in/getFile/annex/268/AU2897_xM8Uo8.pdf?source=pqars
अन्य स्रोत
https://unctad.org/system/files/official-document/tdr2025_en.pdf
https://thedocs.worldbank.org/en/doc/7ce50b5aa95bef66048680bba9926ec8-0050012026/related/GEP-Jan-2026-Analysis-SAR.pdf
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