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Social Welfare

खुशियों भरी घर वापसी

भारत के पवित्र बौद्ध अवशेष 127 वर्षों के बाद वापस लौटे

Posted On: 05 AUG 2025 4:20PM

हमारी सांस्कृतिक विरासत के लिए एक खुशी का दिन
~ प्रधानमंत्री  नरेन्द्र  मोदी

दुनिया भर के बौद्ध समुदाय के लोगों के हृदय को भाव-विभोर कर देने वाले एक कार्यक्रम में, भारत ने पवित्र पिपरहवा अवशेषों की घर वापसी का स्वागत किया। ये अवशेष अब तक खोजे गए आध्यात्मिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण खजानों में से एक हैं। 127 वर्षों के बाद स्वदेश लाए गए ये अवशेष न सिर्फ अतीत के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, बल्कि भारत की स्थायी सांस्कृतिक विरासत और सॉफ्ट पावर पर आधारित कूटनीति के एक सशक्त प्रतीक भी हैं।

औपनिवेशिक शासन के दौरान देश से बाहर ले जाए गए इन अवशेषों की यात्रा जुलाई 2025 में उस समय पूरी हुई, जब संस्कृति मंत्रालय ने गोदरेज इंडस्ट्रीज समूह के साथ मिलकर उनकी वापसी की व्यवस्था की। ये अवशेष एक अंतरराष्ट्रीय नीलामी में सामने आए थे — एक निर्णायक हस्तक्षेप के जरिए उनकी बिक्री रूकवाई गई और उन्हें वापस उनके असली घर पहुंचाया गया।

 

 

 

 पवित्र वस्तु की खोज: पिपराहवा अवशेष

पिपरहवा अवशेष, पवित्र कलाकृतियों का एक संग्रह है। ये कलाकृतियां 1898 में भारत के उत्तर प्रदेश स्थित पिपरहवा स्तूप के पास मिली थीं। ऐसा माना जाता है कि यह स्थल गौतम बुद्ध की जन्मभूमि, प्राचीन कपिलवस्तु से जुड़ा है।

ब्रिटिश औपनिवेशिक इंजीनियर विलियम क्लैक्सटन पेप्पे द्वारा 1898 में खोजे गए, इन अवशेषों में अस्थियों के टुकड़े शामिल हैं। इन अस्थियों के बारे में यह माना जाता है कि वे भगवान बुद्ध के हैं। इनके साथ-साथ ही क्रिस्टल की पेटियां, सोने के आभूषण, रत्न और बलुआ पत्थर का एक संदूक भी मिला है।

एक पेटी पर ब्राह्मी लिपि में उकेरा गया एक शिलालेख इन अवशेषों को सीधे उस शाक्य वंश से जोड़ता है, जिससे बुद्ध संबंधित थे। यह दर्शाता है कि ये अवशेष उनके अनुयायियों द्वारा तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास संजोए गए थे। वर्ष 1971 से लेकर 1977 के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की गई आगे की खुदाई में 22 पवित्र अस्थि अवशेषों से युक्त अतिरिक्त शैलखटी (स्टीटाइट) की पेटियां मिलीं, जो अब नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में संरक्षित हैं।

127 वर्षों के बाद घर वापसी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 127 वर्षों के बाद भगवान बुद्ध के पवित्र पिपरहवा अवशेषों को भारत वापस लाए जाने पर खुशी व्यक्त  की और इसे देश की सांस्कृतिक विरासत के लिए एक गौरवशाली क्षण बताया।

‘विकास भी, विरासत भी’ की भावना को मूर्त रूप देने वाले अपने एक वक्तव्य में, उन्होंने बुद्ध की शिक्षाओं के प्रति भारत की गहरी श्रद्धा तथा अपनी आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने की प्रतिबद्धता पर जोर दिया।

एक्स पर एक पोस्ट में, प्रधानमंत्री नरेन्द्र  मोदी ने लिखा कि 1898 में पिपरहवा में खोजे गए और औपनिवेशिक काल के दौरान विदेश ले जाए गए इन अवशेषों को, इस वर्ष की शुरुआत में एक अंतरराष्ट्रीय नीलामी में सामने आने के बाद, संयुक्त प्रयासों की बदौलत सफलतापूर्वक वापस लाया गया। उन्होंने इस कवायद में जुटे सभी लोगों का आभार व्यक्त किया और बुद्ध के साथ भारत के जुड़ाव और अपनी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के प्रति समर्पण को दर्शाने में इन अवशेषों के महत्व पर प्रकाश डाला।

मई 2025 में, संस्कृति मंत्रालय ने हांगकांग में सोथबी द्वारा पिपराहवा अवशेषों के एक हिस्से की नीलामी रोकने के लिए हस्तक्षेप किया। भारत सरकार और गोदरेज इंडस्ट्रीज समूह की एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी के जरिए, 30 जुलाई, 2025 को इन अवशेषों को सफलतापूर्वक भारत वापस लाया गया।

 गोदरेज इंडस्ट्रीज समूह की कार्यकारी उपाध्यक्ष, पिरोजशा गोदरेज ने इस उपलब्धि में योगदान देने पर गर्व व्यक्त किया और पिपरहवा अवशेषों को शांति, करुणा एवं मानवता की साझी विरासत का शाश्वत प्रतीक बताया। भारत सरकार के साथ सार्वजनिक-निजी भागीदारी के जरिए सुगम बनाई गई यह सफल वापसी, सांस्कृतिक कूटनीति और सहयोग का एक मानक स्थापित करती है।

इन अवशेषों का शीघ्र ही एक सार्वजनिक समारोह में अनावरण किया जाएगा, जिससे नागरिक और दुनिया भर से आने वाले आगंतुक इन पवित्र कलाकृतियों से जुड़ सकेंगे। यह पहल बौद्ध मूल्यों एवं  सांस्कृतिक विरासत के वैश्विक संरक्षक के रूप में भारत की भूमिका को मजबूती प्रदान करती है और भारत की प्राचीन विरासत का उत्सव मनाने एवं उसे फिर से हासिल करने के प्रधानमंत्री मोदी के मिशन के अनुरूप है।

भारत की बौद्ध विरासत और सांस्कृतिक कूटनीति

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में सिद्धार्थ गौतम को ज्ञान प्राप्त हुआ, वे बुद्ध बन गए और उन्होंने अपनी शिक्षाओं का प्रसार करना शुरू किया, जिसे बुद्ध धम्म के नाम से जाना जाता है।

उनके महापरिनिर्वाण के बाद, उनके अनुयायियों ने इन शिक्षाओं को संरक्षित किया और उनका प्रचार किया, जिससे तीन प्रमुख बौद्ध परंपराओं का विकास हुआ: थेरवाद, महायान और वज्रयान। सम्राट अशोक (268-232 ईसा पूर्व) ने बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का अपने शासन में समावेश करके, शांति एवं सद्भाव को बढ़ावा देकर और अपने शिलालेखों व स्तंभलेखों के जरिए पूरे एशिया में बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का प्रसार करके इसे उल्लेखनीय तरीके से आगे बढ़ाया।

जैसे-जैसे बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ, यह महायान और निकाय सम्प्रदायों के रूप में विकसित होता गया। इनमें से एकमात्र थेरवाद निकाय ही जीवित बचा और यह धर्म स्थानीय संस्कृतियों के अनुकूल होता गया, जिससे मध्य एवं पूर्वी एशिया में उत्तरी शाखा और दक्षिण-पूर्व एशिया में दक्षिणी शाखा का निर्माण हुआ। इन शाखाओं के ज़रिए  इतिहास में विविध आध्यात्मिक जरूरतों की पूर्ति हुई।

 बुद्ध और उनके अनुयायियों की शिक्षाओं से उपजी भारत की गहरी बौद्ध विरासत ने इसकी सांस्कृतिक पहचान को उल्लेखनीय रूप से आकार दिया है और जीवन, दिव्यता एवं सामाजिक सद्भाव के साझा मूल्यों को बढ़ावा देकर पूरे एशिया में एकता को बढ़ावा दिया है। यह विरासत भारत की विदेश नीति एवं राजनयिक संबंधों को मजबूत करती है और विभिन्न राष्ट्रों के बीच पारस्परिक सम्मान एवं सहयोग को प्रोत्साहित करती है।

इस विरासत को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के उद्देश्य से, भारत ने स्वदेश दर्शन योजना के अंतर्गत बौद्ध पर्यटन सर्किट जैसी पहल शुरू की है, जो कपिलवस्तु जैसे प्रमुख बौद्ध स्थलों को विकसित करती है, सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देती है और बौद्ध धर्म के साथ भारत के ऐतिहासिक जुड़ाव को मजबूत करती है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बौद्ध अवशेषों के जरिए सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा

हाल ही में, भारत ने थाईलैंड और वियतनाम में सार्वजनिक श्रद्धा के लिए बौद्ध अवशेषों का प्रदर्शन करके महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आदान-प्रदान को सुगम बनाया है। इससे इन देशों के बीच आध्यात्मिक संबंध मजबूत हुए हैं। थाईलैंड में, भगवान बुद्ध और उनके शिष्यों, अरहंत सारिपुत्र और अरहंत मौद्गल्यायन के अवशेषों को बैंकॉक, चियांग माई, उबोन रत्चथानी और क्रबी में 26 दिनों तक प्रदर्शित किया गया। कुल चार मिलियन से अधिक श्रद्धालुओं ने इस अवशेषों के दर्शन किए। भारत के संस्कृति मंत्रालय और अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ द्वारा आयोजित इस प्रदर्शनी ने गहरे सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित किया।

इसी तरह संयुक्त राष्ट्र वेसाक दिवस के उपलक्ष्य में, वियतनाम के हो ची मिन्ह सिटी, ताई निन्ह, हनोई और हा नाम में बुद्ध के अवशेषों, जिनमें उनकी खोपड़ी की हड्डी का एक अंश भी शामिल था, की एक महीने तक चलने वाली प्रदर्शनी आयोजित की गई। इस प्रदर्शनी में 1.78 करोड़ श्रद्धालु शामिल हुए। ये आयोजन साझा बौद्ध विरासत के जरिए भारत, थाईलैंड और वियतनाम को जोड़ने वाले स्थायी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित करते हैं।

इसके अलावा, 2022 में भारत और मंगोलिया के बीच सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संबंधों को फिर से बहाल करने की दिशा में उठाए गए एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में भगवान बुद्ध के चार पवित्र अवशेषों को मंगोलिया में एक 11-दिवसीय सार्वजनिक प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया था। यह कार्यक्रम 14 जून को मनाई जाने वाली मंगोलियाई बुद्ध पूर्णिमा के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था।

बौद्ध धर्म का उद्गम स्थल माने जाने वाले भारत ने सरकार द्वारा आयोजित विभिन्न शिखर सम्मेलनों व स्मृति कार्यक्रमों जैसे आयोजनों के जरिए बद्ध धम्म के संरक्षण एवं प्रसार के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता प्रदर्शित की है ताकि शांति, करुणा एवं जागरूकता से संबंधित बुद्ध की शिक्षाओं का वैश्विक प्रसार सुनिश्चित हो सके। भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय, गौतम बुद्ध के जीवन और उनकी शिक्षाओं का स्मरण करने वाले विभिन्न महत्वपूर्ण समारोहों का आयोजन करके इन पहलों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ये प्रयास बौद्ध धर्म की प्रासंगिकता को बनाये रखने, उसकी आध्यात्मिक विरासत को सुदृढ़ करने और दुनिया भर की भावी पीढ़ियों को प्रेरित करने के प्रति भारत के समर्पण को दर्शाते हैं।

उदाहरण के लिए, हाल के वर्षों में, भारत ने अपनी बौद्ध विरासत को रेखांकित करने हेतु वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन (2023) और एशियाई बौद्ध शिखर सम्मेलन (2024) समेत विभिन्न महत्वपूर्ण आयोजनों की मेजबानी की है। अप्रैल 2023 में, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस वैश्विक शिखर सम्मेलन का उद्घाटन किया था। इसमें सार्वभौमिक मूल्यों, शांति और विभिन्न वैश्विक चुनौतियों के लिए स्थायी मॉडल पर ध्यान केन्द्रित किया गया था। इसी प्रकार, नवंबर 2024 में, संस्कृति मंत्रालय और अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ के संयुक्त प्रयास से नई दिल्ली में प्रथम एशियाई बौद्ध शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इस आयोजन का विषय ‘एशिया को मजबूत बनाने में बुद्ध धम्म की भूमिका’ था और इसमें दुनिया भर के 32 देशों के 160 से अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागियों ने भाग लिया था।

इसके अलावा, 2015 से, भारत में संस्कृति मंत्रालय (एमओसी) भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े तीन महत्वपूर्ण दिनों: वेसाक दिवस, आषाढ़ पूर्णिमा और अभिधम्म दिवस के उपलक्ष्य में बड़े पैमाने पर कार्यक्रम आयोजित करता आ रहा है।

वेसाक दिवस, जिसे बुद्ध पूर्णिमा या बुद्ध जयंती के नाम से भी जाना जाता है, सबसे पवित्र बौद्ध त्योहार है। यह वैसाख माह (आमतौर पर अप्रैल या मई) की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह गौतम बुद्ध के जीवन की तीन महत्वपूर्ण घटनाओं का प्रतीक है: लुम्बिनी में उनका जन्म (लगभग 623 ईसा पूर्व), बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति, और 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में उनका महापरिनिर्वाण (निधन)। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने मई 2017 में अंतरराष्ट्रीय वेसाक दिवस समारोह में भाग लेने के लिए श्रीलंका के कोलंबो का दौरा किया था और इस बात पर प्रकाश डाला था कि यह दिन भगवान बुद्ध, “तथागत” के जन्म, ज्ञान और परिनिर्वाण का सम्मान करने का दिन है। इसी प्रकार 2021 में, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बुद्ध पूर्णिमा के दिन आयोजित वैश्विक वेसाक समारोह में वर्चुअल माध्यम से मुख्य भाषण दिया था। इस समारोह में आदरणीय महासंघ के सदस्य, नेपाल एवं श्रीलंका के प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री श्री प्रहलाद सिंह एवं श्री किरेन रिजिजू, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ के महासचिव तथा आदरणीय डॉक्टर धम्मपिय ने भाग लिया था और गौतम बुद्ध के जीवन के उत्सव पर चर्चा की थी, जो शांति, सद्भाव और सह-अस्तित्व से संबंधित था।

आषाढ़ पूर्णिमा, जिसे धर्म दिवस के रूप में भी जाना जाता है, आठवें चंद्र मास (आमतौर पर जुलाई) की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। यह बुद्ध के प्रथम उपदेश, “धर्म चक्र प्रवर्तन”, की स्मृति में मनाया जाता है। ज्ञान प्राप्ति के बाद, बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में अपने पांच तपस्वी शिष्यों को दिया था। इस उपदेश ने चार आर्य सत्यों और अष्टांगिक मार्ग से परिचय कराया, जिससे बौद्ध शिक्षाओं की नींव पड़ी और मठवासी समुदाय (संघ) की स्थापना हुई। जुलाई 2025 में, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ ने भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया के सहयोग से सारनाथ के मूलगंध कुटी विहार में आषाढ़ पूर्णिमा मनाई, जो धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस — जब भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश दिया था - का प्रतीक है। इस कार्यक्रम में दुनिया भर के मठवासी, विद्वान और श्रद्धालु शामिल हुए। इसकी शुरुआत धमेक स्तूप के चारों ओर परिक्रमा के साथ हुई और इसने वर्षा वास के आरंभ का संकेत दिया, जो वर्ष ऋतु के दौरान मठ में वास करने और आत्मनिरीक्षण तथा आध्यात्मिक विकास का प्रतीक है। स्तूप बुद्ध की शिक्षाओं के शाश्वत सार को प्रसारित करता है।

बौद्ध धर्म की जन्मस्थली भारत में भगवान बुद्ध की गहन दार्शनिक शिक्षाओं, विशेष रूप से मानसिक अनुशासन एवं आत्म-जागरूकता पर बल देने वाले अभिधम्म, के सम्मान में अंतरराष्ट्रीय अभिधम्म दिवस मनाया जाता है। यह वैश्विक अनुष्ठान बुद्ध के तवतींस-देवलोक से संकिसा (वर्तमान संकिसा बसंतपुर, उत्तर प्रदेश) में अवतरण, जिसे अशोक के हाथी स्तंभ द्वारा चिह्नित किया गया है, की याद दिलाता है। इस अवतरण में उन्होंने वर्षावास (वस्सा) के दौरान अपनी मां सहित देवताओं को अभिधम्म की शिक्षा दी थी। वर्ष 2024 में संस्कृति मंत्रालय के समर्थन से नई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय अभिधम्म दिवस में प्रतिष्ठित गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया था, जिसमें 14 देशों के राजदूत, भिक्षु, विद्वान और युवा विशेषज्ञ समेत 1000 प्रतिभागी शामिल थे। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दिए गए मुख्य भाषण में अभिधम्म शिक्षाओं की निरंतर प्रासंगिकता और पाली को शास्त्रीय भाषा के रूप में संरक्षित करने के प्रयासों पर जोर दिया गया था।

बौद्ध विरासत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को और मजबूत करते हुए, भारत ने 4 अक्टूबर, 2024 को पाली भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्रदान किया और बुद्ध के उपदेशों के माध्यम के रूप में इसकी ऐतिहासिक भूमिका को मान्यता दी। 17 अक्टूबर, 2024 को नई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय अभिधम्म दिवस में अभिधम्म शिक्षाओं की प्रासंगिकता और बुद्ध धम्म के संरक्षण में पाली भाषा की भूमिका पर जोर दिया गया। इस आयोजन में राजदूतों और विद्वानों सहित लगभग 1,000 प्रतिभागियों ने भाग लिया। ये पहल सामूहिक रूप से अपनी बौद्ध संस्कृति का उत्सव मनाने एवं उसे संरक्षित करने, वैश्विक संवाद को बढ़ावा देने और साझा विरासत के जरिए शांति व सद्भाव को बढ़ावा देने के प्रति भारत के समर्पण को दर्शाती हैं।

निष्कर्ष

इस घर वापसी को देशभर में भारत की सांस्कृतिक विरासत की जीत के रूप में मनाया जाता है और यह कदम इन पवित्र कलाकृतियों के संरक्षण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। मूल रूप से औपनिवेशिक काल के दौरान विदेश ले जाए गए, ये अवशेष अब भारत वापस आ चुके हैं और यह वापसी बुद्ध की शिक्षाओं के साथ राष्ट्र के स्थायी जुड़ाव का प्रतीक है।

संदर्भ:

प्रेस सूचना कार्यालय:

https://www.pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=2127159

 

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2150352

 

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2150093

 

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2143880

 

https://static.pib.gov.in/WriteReadData/specificdocs/documents/2024/feb/doc2024220313101.pdf

 

https://www.pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=2072224

 

https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?NoteId=153285

 

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय:

https://www.newsonair.gov.in/sacred-piprahwa-relics-of-lord-buddha-return-home-after-127-years/

 

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय:

https://tourism.gov.in/sites/default/files/2021-10/Buddhist%20Tourism%20Circuit%20in%20India_ani_English_Low%20res.pdf

विदेश मंत्रालय:

https://www.mea.gov.in/Speeches-Statements.htm?dtl/28459/Address+by+Prime+Minister+at+International+Vesak+Day+celebrations+in+Colombo+May+12+2017

पीएम  इंडिया:



https://www.pmindia.gov.in/en/news_updates/pm-delivers-keynote-address-on-the-occasion-of-vesak-global-celebrations/

दूरदर्शन न्यूज:



https://ddnews.gov.in/en/pm-modi-extends-greetings-on-buddha-purnima-hails-lord-buddhas-message-of-peace/

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पीके/ केसी / आरके / डीए

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