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Economy

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के माध्यम से विकास का एक दशक

जमीनी स्तर पर उद्यमशीलता को बढ़ावा और वित्तीय समावेशन का विस्तार

Posted On: 07 APR 2025 4:21PM

 परिचय

8 अप्रैल, 2025 को भारत में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (प्रधानमंत्री मुद्रा योजना) के 10 साल पूरे हो रहे हैं। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (प्रधानमंत्री मुद्रा योजना), प्रधानमंत्री का प्रमुख कार्यक्रम हैइसका उद्देश्य वित्तपोषण से वंचित सूक्ष्म उद्यमों और छोटे व्यवसायों को वित्तपोषित करना है। कोलेटरल के बोझ को हटाकर और पहुंच को सरल बनाकर, मुद्रा योजना ने जमीनी स्तर पर उद्यमिता के एक नए युग की नींव रखी।

पूरे देश में लोगों की जिंदगी बदल गई है। दिल्ली में घर पर रहकर दर्जी का काम करने वाली कमलेश ने अपना काम का विस्तार किया, तीन अन्य महिलाओं को रोजगार दिया और अपने बच्चों का दाखिला अच्छे स्कूल में कराया। बिंदु ने रोजाना 50 झाड़ू से शुरुआत की थी वे अब 500 झाड़ू बनाने वाली इकाई का नेतृत्व करती हैं। ये अब अपवाद नहीं हैं। ये एक बड़े बदलाव को दर्शाते हैं।

सिलाई इकाइयों और चाय की दुकानों से लेकर सैलून, मैकेनिक की दुकानों और मोबाइल मरम्मत व्यवसायों तक, करोड़ों सूक्ष्म-उद्यमियों ने आत्मविश्वास के साथ आगे कदम बढ़ाया है यह एक ऐसी प्रणाली द्वारा सक्षम है, जो उनकी क्षमता पर विश्वास करती है। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना ने गैर-कॉर्पोरेट, गैर-कृषि सूक्ष्म और लघु उद्यमों को संस्थागत ऋण प्रदान करके इन यात्राओं का समर्थन किया है, जो भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।

मूल रूप से, मुद्रा योजना भरोसे की कहानी है। यह भरोसा लोगों की आकांक्षाओं और निर्माण करने की उनकी क्षमता पर केन्द्रित है। यह भरोसा उस विश्वास पर है कि छोटे-छोटे सपनों को भी बढ़ने के लिए एक मंच मिलना चाहिए।

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत उपलब्धियां

अप्रैल 2015 में अपनी शुरुआत के बाद से, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (प्रधानमंत्री मुद्रा योजना) ने 32.61 लाख करोड़ रुपये के 52 करोड़ से ज्यादा लोन स्वीकृत किए हैं इससे देश भर में उद्यमिता की क्रांति को बढ़ावा मिला है। व्यापार वृद्धि अब सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रह गई है यह छोटे शहरों और गांवों तक फैल रही है, जहां पहली बार उद्यमी अपनी नियति को साकार कर रहे हैं। मानसिकता में बदलाव स्पष्ट है: लोग अब रोजगार चाहने वाले नहीं रह गए हैं, बल्कि वे रोजगार देने वाले बन रहे हैं।

एमएसएमई ऋण की धूम: कारोबार का एक सशक्त इको-सिस्टम


एसबीआई की रिपोर्ट में मुद्रा योजना के प्रभाव से एमएसएमई को ऋण प्रवाह में उल्लेखनीय वृद्धि पर प्रकाश डाला गया है। ऋण वित्त वर्ष 2014 में एमएसएमई के लिए 8.51 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2024 में 27.25 लाख करोड़ रुपये हो गया , और वित्त वर्ष 2025 में 30 लाख करोड़ रुपये को पार करने का अनुमान है। बैंक के कुल ऋण में एमएसएमई ऋण की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2014 में 15.8 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2024 में लगभग 20 प्रतिशत हो गई, जो भारतीय अर्थव्यवस्था में इसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। इस विस्तार ने छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में व्यवसायों को वित्तीय सहायता तक पहुंचने में सक्षम बनाया है जो पहले उपलब्ध नहीं थी, जिससे भारत की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है और जमीनी स्तर पर रोजगार सृजन को बढ़ावा मिला है।

 

वित्तीय समावेशन: महिलाओं का सशक्तिकरण

मुद्रा योजना के कुल लाभार्थियों में 68 प्रतिशत महिलाएं हैं , जो देश भर में महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यमों को आगे बढ़ाने में इस योजना की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है। वित्त वर्ष 2016 और वित्त वर्ष 2025 के बीच , प्रति महिला प्रधानमंत्री मुद्रा योजना की वितरण राशि वर्ष दर वर्ष 13 प्रतिशत से बढ़कर 62,679 रुपये तक पहुंच गई, जबकि प्रति महिला वृद्धिशील जमा राशि वर्ष दर वर्ष 14 प्रतिशत बढ़कर 95,269 रुपये हो गई ऋण वितरण में महिलाओं की अत्यधिक हिस्सेदारी वाले राज्यों ने महिलाओं के नेतृत्व वाले एमएसएमई के माध्यम से काफी अधिक रोजगार सृजन किया है, जो महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण और श्रम बल भागीदारी को बढ़ाने में लक्षित वित्तीय समावेशन की प्रभावशीलता को मजबूत करता है।

वित्तीय समावेशन: सामाजिक रूप से हाशिए पर पड़े समूहों तक पहुंच

पीएमएमवाई ने पारंपरिक ऋण बाधाओं को तोड़ने में महत्वपूर्ण प्रगति की है। एसबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, 50 प्रतिशत मुद्रा खाते अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उद्यमियों के पास हैं, जिससे औपचारिक वित्त तक व्यापक पहुंच सुनिश्चित होती है। इसके अलावा, मुद्रा ऋण धारकों में से 11 प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदायों से हैं, जो हाशिए पर पड़े समुदायों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में सक्रिय भागीदार बनने में सक्षम बनाकर समावेशी विकास में योजना के योगदान को दर्शाता है।

प्रगतिशील ऋण: शिशु से तरुण तक

पिछले दस वर्षों में, मुद्रा योजना ने 52 करोड़ से ज्यादा लोन खाते खोलने में मदद की है, जो उद्यमशीलता की गतिविधियों में लगातार वृद्धि को दर्शाता है। किशोर लोन (50,000 रुपए से 5 लाख रुपए) की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2016 के 5.9 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 44.7 प्रतिशत हो गई है, जो सूक्ष्म से छोटे उद्यमों की ओर बदलाव को दर्शाता है। तरुण श्रेणी (5  लाख रुपए से 10 लाख रुपए) भी तेजी से बढ़ रही है, जो साबित करती है कि मुद्रा योजना सिर्फ व्यवसाय शुरू करने के बारे में नहीं है, बल्कि उन्हें आगे बढ़ाने में मदद भी करती है।

 

अधिक ऋण, सशक्त कारोबार

पीएमएमवाई के अंतर्गत स्वीकृत और वितरित कुल ऋणों पर नजर डालने से पता चलता है कि इस योजना के विशिष्ट विक्रय प्रस्ताव को विभिन्न प्रकार के इच्छित लाभार्थियों द्वारा अच्छी तरह से स्वीकार किया गया है , जिससे समाज के निचले तबके के आर्थिक विकास को मजबूती मिली है।

ऋणों का औसत आकार लगभग तीन गुना बढ़ गया है - वित्त वर्ष 2016 के 38,000 रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2023 में 72,000 रुपये और वित्त वर्ष 2025 में 1.02 लाख रुपये हो गया है, जो बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में इसके योगदान और बाजार पर प्रभाव दोनों को दर्शाता है।

इसके अलावा, वित्त वर्ष 23 में ऋण वितरण में 36 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो पूरे देश में उद्यमशीलता के प्रति विश्वास के जोरदार पुनरुद्धार का संकेत है।

 

पीएम मुद्रा योजना के ऋण वितरण में अग्रणी राज्य/केंद्र शासित प्रदेश

2015 में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के शुभारंभ के बाद से 28 फरवरी, 2025 तक, तमिलनाडु ने 3,23,647.76 करोड़ रुपये के साथ राज्यों में सबसे अधिक वितरण दर्ज किया है। उत्तर प्रदेश 3,14,360.86 करोड़ रुपये के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि कर्नाटक 3,02,146.41 करोड़ रुपये के साथ तीसरे स्थान पर है। पश्चिम बंगाल और बिहार में भी क्रमशः 2,82,322.94 करोड़ रुपये और 2,81,943.31 करोड़ रुपये का वितरण हुआ है। महाराष्ट्र 2,74,402.02 करोड़ रुपये के साथ छठे स्थान पर है, जो पिछले एक दशक में प्रमुख राज्यों में योजना की व्यापक पहुंच और प्रभाव को दर्शाता है।

केंद्र शासित प्रदेशों में जम्मू-कश्मीर सबसे आगे है, जहां 21,33,342 ऋण खातों में 45,815.92 करोड़ रुपये का कुल वितरण किया गया है। ये आंकड़े न केवल राज्यों में बल्कि केंद्र शासित प्रदेशों में भी ऋण तक पहुंच बढ़ाने और स्वरोजगार को बढ़ावा देने में योजना की भूमिका को दर्शाते हैं।

 

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वित्तपोषण से वंचित को वित्तपोषण

सूक्ष्म उद्यम हमारे देश में एक प्रमुख आर्थिक खंड हैं और कृषि के बाद बड़े पैमाने पर रोजगार प्रदान करते हैं। इस खंड में विनिर्माण, प्रसंस्करण, व्यापार और सेवा क्षेत्र में लगी सूक्ष्म इकाइयां शामिल हैं। यह लगभग 10 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करता है। इनमें से कई इकाइयां मालिकाना/एकल स्वामित्व या स्वयं के खाते वाले उद्यम हैं और कई बार इन्हें गैर-कॉर्पोरेट लघु व्यवसाय क्षेत्र के रूप में संदर्भित किया जाता है।

पीएमएमवाई का मिशन, विजन और उद्देश्य

योजना की मुख्य विशेषताएं

सूक्ष्म उद्यम इकाइयों से संबंधित विकास और पुनर्वित्तपोषण गतिविधियों के लिए भारत सरकार द्वारा सूक्ष्म इकाई विकास और पुनर्वित्तपोषण एजेंसी (मुद्रा) के अंतर्गत प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (प्रधानमंत्री मुद्रा योजना) की स्थापना की गई थी। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना यह सुनिश्चित करती है कि सदस्य ऋणदाता संस्थाओं (एमएलआई) यानी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी), क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी), गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) और सूक्ष्म वित्त संस्थानों (एमएफआई) द्वारा 20 लाख रुपये तक का कोलेटरल-फ्री संस्थागत ऋण प्रदान किया जाए।

 

इस योजना के अंतर्गत क्रियाकलाप की तीन श्रेणियां तैयार की गई हैं, जिनमें शामिल हैं:

तरुण प्लस: 10 लाख रुपये से अधिक और 20 लाख रुपये तक के ऋण (विशेष रूप से तरुण श्रेणी के लिए डिजाइन किए गए, जिन्होंने पहले ऋण लिया है और सफलतापूर्वक चुकाया है)

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भारत में वित्तीय पहुंच बढ़ाने और समावेशी उद्यमशीलता को बढ़ावा देने में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई) के प्रभाव को लगातार स्वीकार किया है।

2017 में , अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने उल्लेख किया कि यह योजना महिलाओं के नेतृत्व वाले व्यवसायों को वित्त तक पहुंच प्रदान करने में सहायक रही है। इसने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे प्रधानमंत्री मुद्रा योजना सूक्ष्म, लघु और मध्यम आकार के व्यवसायों को कोलेटरल-फ्री ऋणे प्रदान करके बैंकिंग सुविधा से वंचित परिवारों पर पीएमजेडीवाई के फोकस को पूरा करता है।

2019 में, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पीएमएमवाई की सराहना करते हुए कहा कि माइक्रो यूनिट डेवलपमेंट एंड रिफाइनेंस एजेंसी के तहत यह योजना विनिर्माण, व्यापार और सेवाओं में लगे व्यवसायों को ऋण देने वाले वित्तीय संस्थानों का समर्थन करके सूक्ष्म उद्यमों को विकसित करने और पुनर्वित्त प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इस बात पर प्रकाश डाला कि 2023 तक पीएमएमवाई की कोलेटरल- फ्री ऋण संरचना, महिला उद्यमिता पर केन्द्रित करने के साथ, महिलाओं के स्वामित्व वाले एमएसएमई की वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देगी, जो अब 2.8 मिलियन से अधिक है।

अपनी 2024 की रिपोर्ट में, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पुनः पुष्टि की कि पीएमएमवाई जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से उद्यमिता के लिए भारत का सक्षम नीतिगत वातावरण, ऋण तक पहुंच के माध्यम से स्वरोजगार और औपचारिकता बढ़ाने में सक्रिय रूप से योगदान दे रहा है।

निष्कर्ष

दस वर्षों में, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना ने लगातार वित्तीय समावेशन की शक्ति और जमीनी स्तर पर नवाचार की ताकत का प्रदर्शन किया है। 2014 से पहले, ऋण तक पहुंच अक्सर अच्छी तरह से जुड़े लोगों के पक्ष में थी, जबकि छोटे उद्यमियों को जटिल कागजी कार्रवाई जैसी बाधाओं का सामना करना पड़ता था या उन्हें अनौपचारिक वित्त पर निर्भर रहने के लिए मजबूर होना पड़ता था। बैंकों ने बड़ी कंपनियों को लापरवाही से ऋण दिया, जबकि वास्तविक ऋण प्राप्तकर्ताओं को ऋण तक पहुंच नहीं मिल पाई। मुद्रा ने इस शून्य को भरते हुए एक स्वच्छ, समावेशी विकल्प पेश किया, जिसने सभी को समान अवसर दिया।

52 करोड़ से ज्यादा लोन स्वीकृत होने के साथ, इस योजना ने औपचारिक ऋण तक पहुंच बढ़ाकर महिलाओं, अजा/अजजा/अपिब समुदायों और ग्रामीण उद्यमियों को सशक्त बनाया है। ऋण के औसत आकार में वृद्धि, एमएसएमई ऋण की बढ़ती हिस्सेदारी और सूक्ष्म से लघु उद्यमों की ओर बदलाव इसके बढ़ते प्रभाव को दर्शाते हैं। पीएमएमवाई न केवल स्वरोजगार और रोजगार सृजन को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि भारत की जमीनी अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर रहा है और समान विकास को आगे बढ़ा रहा है।

संदर्भ

पीडीएफ देखने के लिए यहां क्लिक करें।

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एमजी/केसी/एसकेएस/एसवी 

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