Rural Prosperity
जब स्वच्छता साझा विश्वास बन जाये
प्राचीन परंपराओं से लेकर आधुनिक तीर्थयात्राओं तक, स्वच्छता कैसे एक सामूहिक स्वभाव बन रहा है।
Posted On:
29 SEP 2026 5:37PM
प्राचीन भारत में स्वच्छता : रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थी

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तस्वीर 1: लोथल में घरों से निकलने वाले गंदे पानी को लाने वाली नालियाँ।
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भारत का स्वच्छता से नाता आधुनिक सफ़ाई अभियान से भी पुराना है। सिंधु घाटी के पुरातात्विक सबूतों से पता चलता है कि वहां सफ़ाई की बेहतरीन व्यवस्था थी। आज के गुजरात में स्थित लोथल जैसे शहरों में सुनियोजित नक्शे और बड़ी नालियों के नेटवर्क की व्यवस्था थी । कई घरों में निजी शौचालय थे जो नालियों से जुड़े हुए थे। इस व्यवस्था में ठोस कचरे का प्रबंधन करने के लिए निगरानी बिंदु और इससे संबंधित ढांचे भी शामिल थे। वैदिक परंपरा में शरीर और आस-पास की सफ़ाई को बहुत महत्व दिया जाता था। साफ़ पानी, ताज़ी हवा और स्वस्थ माहौल को आध्यात्मिक साधना से जोड़ा जाता था। प्राचीन निर्देशों में लोगों को नदियों और अन्य जल स्रोतों के पास शौच न करने की सलाह भी दी गई थी। यही बात बौद्ध परंपराओं में भी दिखाई देती है। बौद्ध भिक्षुओं को पानी में शौच या पेशाब न करने का निर्देश दिया गया था। उनसे यह भी अपेक्षा की जाती थी कि वे अगले व्यक्ति के लिए शौचालय की जगह को साफ़ रखें। पुरातात्विक प्रमाण भी व्यवस्थित सफ़ाई की इस परंपरा की गवाही देते हैं। बिहार में गुप्त काल के एक मठ में शौचालय के लिए एक अलग कमरा था। ये उदाहरण एक अहम बात बताते हैं। भारत में स्वच्छता हमेशा से आचरण, अनुशासन और सामुदायिक जीवन से जुड़ी रही है।
साफ़-सफ़ाई के बुनियादी ढांचे से लेकर सामाजिक व्यवहार में बदलाव तक
हालांकि, सदियों बाद भी, आज के भारत में साफ़-सफ़ाई (सैनिटेशन) एक चुनौती बनी हुई है। यह चुनौती सिर्फ़ पर्याप्त साफ़-सफ़ाई प्रणाली बनाने की नहीं है, बल्कि ऐसी आदतें विकसित करने की भी है जिनसे उनका इस्तेमाल और लगातार रखरखाव सुनिश्चित हो सके। इस चुनौती से निपटने के लिए 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) शुरू किया गया था। यह भारत के सबसे बड़े सरकार-समर्थित साफ़-सफ़ाई अभियानों में से एक बन गया। इस मिशन के दो हिस्से हैं: स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण (एसबीएम-जी) और स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (एसबीएम-यू)। एसबीएम-जी ग्रामीण साफ़-सफ़ाई, शौचालय की सुविधा और उनके इस्तेमाल, तथा ठोस और तरल कचरा प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करता है। एसबीएम-यू शहरी साफ़-सफ़ाई, कचरा प्रबंधन, सार्वजनिक जगहों और स्वच्छता से जुड़े बुनियादी ढांचे पर ध्यान देता है।
एक तरफ़, 2014 के बाद के दशक में पूरे देश में साफ़-सफ़ाई का बड़ा बुनियादी ढांचा तैयार किया गया है - शौचालयों से लेकर कचरा निपटारा और प्रबंधन प्रणालियों तक। दूसरी तरफ़, इस सफ़र में लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने और उसे बनाए रखने का कहीं ज़्यादा मुश्किल काम भी किया गया है, ताकि साफ़-सफ़ाई रोज़मर्रा की आदत का हिस्सा बन सके। एसबीएम के तहत यही बड़ा बदलाव हो रहा है।
हालांकि गांवों और शहरों में अब कचरा प्रबंधन को एक व्यवस्थित प्रक्रिया का रूप दे दिया गया है, लेकिन व्यवहार में आए इस बदलाव की असली परीक्षा बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान होती है, जहां बहुत कम समय के लिए लाखों लोग इकट्ठा होते हैं।
महाकुंभ: एक विशाल आयोजन स्वच्छता अभियान बन गया

हाकुंभ 2025 जैसा शायद ही कोई और आयोजन इस बदलाव को इतनी साफ़ तौर पर दिखाता हो। बड़े पैमाने पर आयोजन की वजह से साफ़-सफ़ाई बनाए रखना एक बड़ी चुनौती थी। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में लाखों श्रद्धालु जुटे थे। इस चुनौती से निपटने के लिए साफ़-सफ़ाई का ज़रूरी बुनियादी ढांचा बनाने के साथ-साथ लोगों में जागरूकता फैलाने और उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने का तरीका अपनाया गया। मेले के पूरे इलाक़े में 28,000 से ज़्यादा शौचालय और 20,000 सामुदायिक पेशाबघर बनाए गए। कचरा प्रबंधन के लिए कचरे को अलग-अलग करने की सुविधा वाले 20,000 डस्टबिन लगाए गए। लेकिन बुनियादी ढांचा सिर्फ़ एक पहलू था। मेले के पूरे इलाक़े को प्लास्टिक-मुक्त क्षेत्र घोषित किया गया था। श्रद्धालुओं को प्लास्टिक कचरे से बचने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए जागरूकता अभियान चलाए गए। स्वच्छता बनाए रखने में लोगों की भागीदारी को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया गया। प्रयागराज में एक 'स्वच्छता रथ यात्रा' निकाली गई। यह एक सार्वजनिक जुलूस था जिसने स्वच्छता को बढ़ावा दिया और लोगों को कचरा न फैलाने, डस्टबिन का इस्तेमाल करने और सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का इस्तेमाल न करने के बारे में जागरूक किया। नुक्कड़ नाटकों और संगीत कार्यक्रमों के ज़रिए कचरे को अलग-अलग करने और उसके निपटारे के बारे में जानकारी दी गई। सार्वजनिक संबोधन प्रणाली के ज़रिए घाटों पर स्वच्छता के संदेश पहुंचाए गए।
इस तरीके से समुदाय के नेतृत्व में काम करने का मौका भी मिला। उत्तर प्रदेश के 28 ज़िलों की महिलाओं और कई पड़ोसी राज्यों के कारीगरों ने टिकाऊ उत्पाद बनाए। इन उत्पादों में पत्तों की प्लेट, कुल्हड़, जूट के बैग और कपड़े के बैग शामिल थे। लगभग 60 करोड़ पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद बनाए गए और 300 जगहों पर बेचे गए। इसका मकसद सिर्फ़ कचरा हटाना नहीं था, बल्कि लोगों को कचरा रोकने के काम में शामिल करना भी था। यही व्यवहार में बदलाव का मूल मंत्र है।
महाकुंभ 2025 ने यह भी दिखाया कि कैसे साफ़-सफ़ाई का मज़बूत सिस्टम लोगों के व्यवहार को बेहतर बना सकता है। स्नान की मुख्य तारीखों के बाद, तेज़ी से काम करने वाली सफ़ाई टीमों ने मेले के मैदान को फिर से ठीक-ठाक किया। उन्होंने शौचालय साफ़ किए और तीर्थयात्रियों द्वारा छोड़े गए कचरे को हटाया। कीटाणुनाशक का छिड़काव और फॉगिंग भी की गई।
कांवड़ यात्रा: जब रास्ता ही स्वच्छता का स्थान बन जाये
अगर प्रयागराज के नदी के किनारों पर बड़ी संख्या में लोगों के जमावड़े को संभालने की चुनौती थी, तो कांवड़ यात्रा के लंबे रास्तों पर व्यवस्था संभालने की एक अलग ही चुनौती थी। इस यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु एक ही रास्ते से गुज़रते हैं। इससे सड़कों, घाटों, आराम करने की जगहों और सार्वजनिक सुविधाओं पर दबाव पड़ता है। दिल्ली में यात्रा के दौरान सफाई का एक खास अभियान चलाया गया। मुख्य रास्तों और आराम करने की जगहों पर अतिरिक्त सफाई कर्मचारियों को तैनात किया गया। चौबीसों घंटे सफाई और कचरा उठाने की व्यवस्था की गई। अस्थायी शौचालय भी उपलब्ध कराए गए। गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग करने पर खास ध्यान दिया गया। सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल को भी हतोत्साहित किया गया। इस अभियान में महिला श्रद्धालुओं का भी ध्यान रखा गया। दिल्ली में महिलाओं के लिए दो खास 'पिंक कांवड़ कैंप' शुरू किए गए, जिन्हें महिला वॉलंटियर्स ने चलाया। इन कैंपों में साफ-सुथरे शौचालय और नहाने की सुविधाएँ थीं। इससे सफाई को सम्मान और सुविधा से जोड़ा गया। प्लास्टिक के सामान के इको-फ्रेंडली विकल्प के तौर पर 5 लाख से ज़्यादा श्रद्धालुओं को स्टील के गंगा-जल के बर्तन और जूट के बैग भी दिए गए।
अमरनाथ यात्रा: आस्था से लेकर उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य तक
धूल भरे हाईवे से कश्मीर हिमालय के नाज़ुक पारिस्थितिकी प्रणाली तक जाने वाली अमरनाथ यात्रा इस ज़िम्मेदारी को और बढ़ा देती है। 2025 में चार लाख से ज़्यादा तीर्थयात्रियों ने यह यात्रा की थी। इस यात्रा को एसबीएम-यू 2.0 के साथ जोड़ा गया है। इसमें वैज्ञानिक तरीके से कचरा प्रबंधन और प्लास्टिक-मुक्त तौर-तरीकों पर ध्यान दिया गया है। इसका मकसद ज़ीरो-लैंडफ़िल और पर्यावरण के अनुकूल यात्रा आयोजित करना है। राज्य सरकार द्वारा नियुक्त स्वच्छता अधिकारियों और अन्य स्वयंसेवकों ने इस कोशिश में मदद की। उन्होंने ठहरने की जगहों, लंगर स्थलों और यात्रा कैंपों में काम किया। उन्होंने कचरे को अलग-अलग करने को बढ़ावा दिया और सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल को हतोत्साहित किया। उन्होंने साफ़-सफ़ाई और स्वच्छता के बारे में भी संदेश फैलाए। काम का दायरा बहुत बड़ा था। रोज़ाना लगभग 11.67 मीट्रिक टन कचरा निकलता था। फिर भी, इस कचरे को 100 प्रतिशत संसाधित किया गया। यात्रा के रास्ते पर गीले और सूखे कचरे के लिए 1,016 ट्विन-बिन स्टेशन बनाए गए थे। महिलाओं के टॉयलेट के पास सैनिटरी कचरे के लिए अलग-अलग बिन रखे गए थे। लगभग 1,300 सफ़ाई मित्रों ने अहम जगहों पर काम किया। उन्होंने पूरे रास्ते पर चौबीसों घंटे साफ़-सफ़ाई बनाए रखने में मदद की।

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तस्वीर 3: J&K में सफ़ाई कर्मचारी रंग-कोड वाले बैग का इस्तेमाल करके कचरे को अलग-अलग कर रहे हैं।
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जागरूकता बढ़ाने के प्रयासों को इंटरैक्टिव बनाया गया। इनमें ‘प्लास्टिक लाओ, थैला ले जाओ’ और ‘बिन इट, विन इट’ जैसी गतिविधियां शामिल थीं। इन गतिविधियों ने बातचीत और लोगों की भागीदारी को एक साथ जोड़ा। आईईसी कैंपेन में साइनबोर्ड और नुक्कड़ नाटकों का भी इस्तेमाल किया गया। ‘ग्रीन प्लेज’ कैंपेन में 70,000 से ज़्यादा श्रद्धालु शामिल हुए। लोगों ने स्वच्छता और टिकाऊ तौर-तरीकों को अपनाने का संकल्प लिया। सोशल मीडिया ने इस संदेश को और मज़बूत किया, क्योंकि तीर्थयात्रियों ने अपनी सेल्फ़ी और स्वच्छता से जुड़ी सफल कहानियाँ शेयर कीं। यहाँ बदलाव साफ़ तौर पर दिखाई देता है। यहाँ, तीर्थयात्री केवल साफ़-सफ़ाई की सुविधाओं का इस्तेमाल करने वाला नहीं रह जाता, बल्कि उनके रखरखाव में भी भागीदार बन जाता है। आस्था ज़िम्मेदारी से जुड़ जाती है
जब धार्मिक रीति-रिवाज ही कचरा प्रबंधन का हिस्सा बन जाये

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तस्वीर 4: प्रोजेक्ट उद्वासना के तहत इकट्ठा किया गया धार्मिक कचरा
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यह मुहिम बड़े तीर्थस्थलों के अलावा दूसरी धार्मिक जगहों तक भी पहुँच रही है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैदराबाद से मिलता है। ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ने 'प्रोजेक्ट उद्वासन' शुरू किया। यह प्रोजेक्ट धार्मिक और पवित्र कचरे पर केंद्रित है। इस तरह के कचरे में फूल, मालाएं, धार्मिक किताबें और खंडित मूर्तियां शामिल हो सकती हैं। यह प्रोजेक्ट इसके लिए खास तौर पर कचरा इकट्ठा करने और वैज्ञानिक तरीके से उसे संसाधित करने की सुविधा देता है। इसकी शुरुआत जुबली हिल्स स्थित इस्कॉन मंदिर में एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर हुई थी। शुरुआत में सात लोगों ने 66 किलोग्राम धार्मिक सामग्री जमा की। दूसरे चरण में 443 किलोग्राम सामग्री जमा हुई। तीसरे चरण का विस्तार छह बड़े मंदिरों तक किया गया। इसमें 124 श्रद्धालु शामिल हुए। इस चरण के दौरान कुल 753.59 किलोग्राम सामग्री जमा हुई।
सामान को अलग-अलग किया गया, उसका रिकॉर्ड रखा गया और उसे रीसायकल किया गया। इसे और संसाधित करने के लिए एक अधिकृत एजेंसी को भेजा गया। यह पहल शुरुआती स्तर पर कचरा अलग करने और सतत कचरा प्रबंधन को बढ़ावा देती है। यह स्वच्छता यात्रा का एक अहम विस्तार है। अब ध्यान सिर्फ़ सार्वजनिक जगहों की सफ़ाई पर ही नहीं है, बल्कि धार्मिक कचरे के निपटारे के तरीके को बदलने पर भी है।
जब स्वच्छता सफ़र का हिस्सा बन जाती है
भारत की स्वच्छता यात्रा ने एक लंबा सफ़र तय किया है। प्राचीन बस्तियों में पानी और स्वच्छता के लिए बेहतरीन प्रणाली विकसित की गयी थी। धार्मिक परंपराओं ने स्वच्छता को व्यक्तिगत और आध्यात्मिक अनुशासन से जोड़ा। इसके बाद आधुनिक भारत के सामने सबके लिए स्वच्छता की सुविधा उपलब्ध कराने की चुनौती थी। स्वच्छ भारत मिशन ने स्वच्छता के लिए बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा तैयार किया। लेकिन सिर्फ़ बुनियादी ढांचे से ही यह सफ़र पूरा नहीं हो सकता था। अगला कदम स्वच्छता को आदत बनाना था। इसके लिए बातचीत, भागीदारी और बार-बार सामूहिक प्रयासों की ज़रूरत थी। आज, यह कोशिश सिर्फ़ अभियान के दिनों तक ही सीमित नहीं दिखती। यह तीर्थ यात्रा के रास्तों और धार्मिक आयोजनों में भी दिखाई देती है। यह सार्वजनिक जगहों, मंदिरों और त्योहारों वाली जगहों पर भी दिखती है। यही वह समय है जब स्वच्छता एक अभियान से आगे बढ़ जाती है। यह एक आदत बन जाती है, और जब कोई आदत सामूहिक बन जाती है, तो वह संस्कृति का रूप ले लेती है।
संदर्भ
जल शक्ति मंत्रालय
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2091806®=48&lang=2
https://swachhbharatmission.ddws.gov.in/sites/default/files/Studies-and-surveys/Swachhata-Sanskriti-Draft-G2-Small-Review-Copy.pdf
शिक्षा मंत्रालय
http://ncert.nic.in/textbook/pdf/fees106.pdf
उत्तर प्रदेश सरकार
https://x.com/MahaKumbh_2025?lang=en
जम्मू कश्मीर सरकार
https://swachh.jk.gov.in/clean-beginnings-strengthening-sanitation-for-shri-amarnath-ji-yatra-2025-at-yatri-niwas-jammu/
तेलंगाना सरकार
https://x.com/GHMCOnline/media
पीआईबी बैकग्राउंडर्स
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2090918®=48&lang=2
https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?NoteId=160036&ModuleId=3®=3&lang=1
https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?NoteId=153694&ModuleId=3®=48&lang=2
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