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Rural Prosperity

जब स्वच्छता एक जन-आंदोलन बनी

सामूहिक प्रयास और व्यवहार में बदलाव से ग्रामीण स्वच्छता में सुधार

Posted On: 20 SEP 2026 11:58AM

कई दशकों तक, ग्रामीण स्वच्छता देश भर में विकास से जुड़ी एक लगातार बनी रहने वाली चिंता का विषय रही। 2014 में जब स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) शुरू हुआ, तब स्वच्छता कवरेज 39 प्रतिशत था। 2019 तक, ग्रामीण भारत ने 100 प्रतिशत स्वच्छता कवरेज हासिल कर लिया। 2014 और 2019 के बीच 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 10.28 करोड़ से ज्यादा शौचालय बनाए गए। इसके बाद 2019 में ग्रामीण भारत को 'खुले में शौच से मुक्त' (ओडीएफ) घोषित किया गया। इस उपलब्धि ने भारत में स्वच्छता के परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। अब ध्यान सिर्फ घरों में शौचालय की सुविधा देने से हटकर, स्वच्छता के तौर-तरीकों को लंबे समय तक बनाए रखने और गांव के स्तर पर कचरा प्रबंधन जैसे व्यापक मुद्दों पर केंद्रित हो गया। स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण के दूसरे चरण में इसी पर मुख्य जोर दिया गया। यह चरण ओडीएफ का दर्जा बनाए रखने और ठोस व तरल कचरा प्रबंधन प्रणालियों को मजबूत करने पर जोर देता है।

इसका असर अब भारत के गांवों में दिखाई दे रहा है। एक ओडीएफ प्लस गांव न केवल ओडीएफ का दर्जा बनाए रखता है, बल्कि ठोस और तरल कचरे का भी सही ढंग से प्रबंधन करता है और साथ ही साफ-सफाई भी बनाए रखता है। ओडीएफ प्लस गांव का दर्जा बनाए रखने के साथ-साथ, इन गांवों को तीन चरणों में बांटा गया है: एस्पायरिंग (Aspiring), राइजिंग (Rising) और मॉडल (Model)। एस्पायरिंग गांव या तो ठोस कचरे का प्रबंधन करते हैं या तरल कचरे का। राइजिंग गांव ठोस और तरल दोनों तरह के कचरे का प्रबंधन करते हैं। मॉडल गांव, दोनों तरह के कचरे का प्रबंधन करने के अलावा, साफ-सफाई भी बनाए रखते हैं और ओडीएफ प्लस से जुड़े संदेश भी प्रदर्शित करते हैं।

17 सितंबर 2026 तक, भारत में 5.69 लाख ओडीएफ प्लस गांव बन चुके हैं, जिनमें से 5.25 लाख गांवों ने ओडीएफ प्लस मॉडल का दर्जा हासिल कर लिया है। इसके अलावा, 5.38 लाख गांवों में ठोस कचरा प्रबंधन की व्यवस्था की गई है और 5.65 लाख गांवों में तरल कचरा प्रबंधन प्रणालियां स्थापित की गई हैं। वर्तमान में 582 जिलों में 1,314 गोबरधन (GOBARdhan) बायोगैस प्लांट काम कर रहे हैं। घरों के स्तर पर, 12.22 करोड़ व्यक्तिगत शौचालय और 98,273 बायोगैस प्लांट बनाए गए हैं।

 

 

गोबरधन (गैल्वनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज धन)

एसबीएम-जी (स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण) के दूसरे चरण के तहत एक प्रमुख पहल, जो मवेशियों के गोबर, खेती से बचे अवशेषों और जैविक कचरे को बायोगैस, कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) और जैविक खाद/बायो-स्लरी में बदलती है।

 

शौचालय बनाने से लेकर आदतें बनाने तक

 

राष्ट्रीय स्तर के ये आंकड़े व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर बड़े बदलावों को दिखाते हैं, क्योंकि स्थायी बदलाव रोजमर्रा के व्यवहार से ही शुरू होता है। शौचालय तभी सार्थक होता है जब परिवार उसका इस्तेमाल करें, उसकी देखभाल करें और उसे बनाए रखें। इसी तरह, कचरे का सही प्रबंधन भी हर परिवार के फैसलों और आदतों से शुरू होता है। इसे समझते हुए, एसबीएम-जी ने ओडीएफ (खुले में शौच से मुक्त) नतीजों को बनाए रखने के लिए 'बिहैवियर चेंज कम्युनिकेशन/व्यवहार परिवर्तन संचार' (BCC) को मुख्य आधार बनाया है। परिवारों को शौचालय के सुरक्षित इस्तेमाल और कचरे के सही निपटान के तरीकों को अपनाने, साफ-सफाई की सही तकनीकों को समझने और गीले कचरे का कंपोस्ट पिट या बायोगैस प्लांट के माध्यम से प्रबंधन करने के तलिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसमें हाथ धोना, पानी को सुरक्षित रखना, साफ-सफाई की सुविधाओं को बनाए रखना और सार्वजनिक जगहों पर कचरा न फेंकना या थूकना जैसी रोजमर्रा की साफ-सफाई की आदतों पर भी ध्यान दिया जाता है। इस तरह, साफ-सफाई केवल बुनियादी ढांचा बनाने तक सीमित नहीं रहती। यह परिवारों में अपनाई जाने वाली रोजमर्रा की आदतों का एक समूह बन जाती है, जिसे समुदायों से बढ़ावा मिलता है और सामूहिक व्यवहार से इसे बनाए रखा जाता है।

 

जब महिलाएं परिवर्तन की एजेंट बनीं

 

महिलाएं इस परिवर्तन के केंद्र में रही हैं। स्वच्छता सीधे तौर पर महिलाओं की गोपनीयता, सुरक्षा, गरिमा और स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। वे केवल हस्तक्षेपों के लाभार्थी नहीं हैं बल्कि विकास में सक्रिय भागीदार और सामाजिक परिवर्तन के एजेंट हैं। एसबीएम-जी दिशानिर्देश स्वच्छाग्रही के रूप में महिलाओं को विशेष प्राथमिकता देते हैं। वे डीएवाई-एनआरएलएम स्व-सहायता समूहों (एसएचजी) को व्यवहार परिवर्तन संचार के लिए महत्वपूर्ण मंच के रूप में भी पहचानते हैं। घरों और समुदायों के साथ मिलकर काम करते हुए, स्वच्छाग्रही घर-घर पहुंच, जागरूकता गतिविधियों और स्वच्छता सत्यापन का कार्य करते हुए शौचालय के उपयोग को अपनाने और बनाए रखने में परिवारों का समर्थन करते हैं। इस समुदाय-आधारित सहभागिता के माध्यम से, वे स्वच्छता संबंधी हस्तक्षेपों को निरंतर रोजमर्रा की प्रथाओं में बदलने में मदद करते हैं।

 

चित्र 2: प्लास्टिक कचरा इकट्ठा करतीं SHG की महिलाएं

     

चित्र 1: स्वच्छाग्रही सार्वजनिक स्वच्छता को दिया जा रहा बढ़ावा

महिलाओं के समूहों ने साफ-सफाई के बारे में जागरूकता को समुदाय के लगातार चलने वाले कामों में बदलने में मदद की है। पश्चिम बंगाल के हावड़ा में, एसएचजी समूहों ने गंगा के किनारे बसी 18 ग्राम पंचायतों में प्लास्टिक हटाने के कार्यक्रम में मदद की और 18 दिनों में 9.32 टन प्लास्टिक कचरा इकट्ठा किया। इस पहल ने एसएचजी फेडरेशन के ज़रिए प्लास्टिक इकट्ठा करने का एक नियमित नेटवर्क भी बनाया। इसने कचरा प्रबंधन पर सामूहिक काम को मजबूत करने के लिए चुने हुए प्रतिनिधियों, पंचायत अधिकारियों, समुदाय के लोगों और बाज़ार के विक्रेताओं को एक साथ लाया।

महिलाएं साफ-सफाई कर्मचारी, उद्यमी और स्थानीय सेवा प्रदाता के तौर पर भी सामने आई हैं। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में, लगभग एक दर्जन एसएचजी महिलाएं एक 'रिसोर्स रिकवरी सेंटर' चलाती हैं, जहां वे घरों से कचरा इकट्ठा करती हैं और उसे गीले और सूखे कचरे में अलग-अलग करती हैं। गीले कचरे को वर्मीकम्पोस्ट (केंचुए की खाद) में बदला जाता है, जबकि सूखे कचरे को बेचने के लिए भेजा जाता है, जिससे महिलाओं को मजदूरी और अतिरिक्त कमाई होती है। मध्य प्रदेश के भोपाल में, एक 'क्लस्टर लेवल फेडरेशन' एक 'मटीरियल रिकवरी फैसिलिटी' चलाता है। इसे 'स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण' के साथ हुए एक एमओयू (समझौता ज्ञापन) का समर्थन प्राप्त है, जिसके तहत वहां इकट्ठा किए गए प्लास्टिक कचरे की खरीद-बिक्री की जाती है। साफ़-सफाई के कामों में महिलाओं की भागीदारी जागरूकता और लोगों को जोड़ने से आगे बढ़कर अब काम को लागू करने, कचरा प्रबंधन, रोजगार पैदा करने और स्थानीय स्तर पर फैसले लेने तक फैल गई है।

स्कूल से घर तक बदलाव की शुरुआत

 

महिला संगठनों के अलावा, स्कूल स्वच्छता जागरूकता को दैनिक जीवन में उतारने के लिए एक महत्वपूर्ण संस्थान हैं। ये एक ऐसा व्यवस्थित वातावरण प्रदान करते हैं जहां बच्चे स्वच्छता, सफाई और अपशिष्ट प्रबंधन से संबंधित आदतें विकसित कर सकते हैं, साथ ही अपने परिवारों और समुदायों में भी इन आदतों को बढ़ावा दे सकते हैं। एसबीएम-जी चरण II स्वच्छता परिणामों को बनाए रखने के लिए स्कूलों को महत्वपूर्ण संस्थानों के रूप में स्पष्ट रूप से मान्यता देता है। इसमें कार्यात्मक स्वच्छता सुविधाओं और जैव अपघटनीय और तरल अपशिष्ट प्रबंधन की व्यवस्था का प्रावधान है। झारखंड के चंदिल में, एक स्कूल ने एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा दिया और रसोई और स्नानघरों से निकलने वाले अपशिष्ट जल (ग्रेवाटर) के प्रबंधन के लिए एक सोख गड्ढा बनाया। शिक्षक नियमित रूप से छात्रों को व्यक्तिगत स्वच्छता और किशोरावस्था से संबंधित चिंताओं के बारे में भी जागरूक करते हैं। ऐसे प्रयास व्यवहार परिवर्तन का दोतरफा प्रवाह बनाते हैं। बच्चे स्कूल में स्वच्छता सीखते और उसका अभ्यास करते हैं और इन आदतों को अपने घरों में ले जाते हैं, जबकि परिवार, बदले में, स्वच्छता और जिम्मेदार अपशिष्ट प्रबंधन की व्यापक संस्कृति का हिस्सा बन जाते हैं।

 

बच्चों की भूमिका अब सफाई के लिए युवाओं के नेतृत्व वाले एक बड़े आंदोलन के रूप में भी बढ़ रही है। 'स्वच्छता ही सेवा 2026' टिकाऊ व्यवहार परिवर्तन के केंद्र में छात्रों और युवाओं को रखती है। स्कूलों और शिक्षण संस्थानों को स्वच्छता को एक संस्कार के रूप में विकसित करने वाली जगहों के तौर पर तैयार किया जा रहा है। इन गतिविधियों में स्वच्छता ज्ञान यात्राएं, स्कूल संवाद और कचरे को स्रोत पर ही अलग-अलग करने (source segregation) के प्रदर्शन शामिल हैं। छात्र 'स्वच्छता एवं जल संवाद' में भी हिस्सा लेंगे और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट (एसडब्ल्यूएम) नियम, 2026 के बारे में जानेंगे। यह तरीका स्कूल-से-घर के चक्र को स्कूल-से-समुदाय के एक बड़े आंदोलन में बदल देता है।

 

पारंपरिक स्वच्छता के दायरे से आगे बढ़ना

 

दिलचस्प बात यह है कि बच्चे एसबीएम-जी को पारंपरिक स्वच्छता से आगे ले जा रहे हैं। झारखंड में, चाइल्ड कैबिनेट के सदस्यों ने मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (एमएचएम) गतिविधियों की जिम्मेदारी ली है। एक स्कूल में, लड़कियां सैनिटरी पैड का स्टॉक रजिस्टर संभालती हैं, जबकि चाइल्ड कैबिनेट के सदस्य उनकी नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद करते हैं। झिकपानी के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में, चाइल्ड कैबिनेट के मंत्रियों ने स्कूल प्रशासन के सामने एमएचएम प्रयोगशाला बनाने का प्रस्ताव रखा। बाद में, स्कूल के फंड और बाहरी संसाधनों की मदद से यह प्रयोगशाला बनाई गई।

 

जब कोई गांव जिम्मेदारी लेता है

 

जैसे-जैसे घरों और स्कूलों में साफ-सफाई की आदतें अपनाई जाने लगती हैं, उन्हें समुदाय के स्तर पर बनाए रखने के लिए सामूहिक व्यवस्था (सिस्टम) और संस्थाओं की जरूरत पड़ती है। घर से निकलने वाले कचरे को इकट्ठा करने, अलग-अलग करने और उसका निपटान करने की जरूरत होती है; गंदे पानी (ग्रे-वॉटर) के लिए सही निकासी और निपटान की व्यवस्था जरूरी है; और सार्वजनिक जगहों की नियमित देखभाल की जरूरत होती है। यहीं पर ग्राम पंचायत की भूमिका अहम हो जाती है। एसबीएमि-जी के तहत, ग्राम पंचायतें गांव के स्तर पर साफ-सफाई से जुड़ी गतिविधियों की योजना बनाने और उन्हें लागू करने के लिए जिम्मेदार होती हैं। उनकी भूमिका सिर्फ बुनियादी ढांचा बनाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें समुदाय को एकजुट करना, मांग पैदा करना, साफ-सफाई को बढ़ावा देना, जानकारी, शिक्षा और संचार (आईईसी) और क्षमता निर्माण जैसे काम भी शामिल हैं। इस तरह, ग्राम पंचायत एक ऐसा संस्थागत ढांचा देती है जो व्यक्तिगत आदतों को सामूहिक साफ-सफाई के नतीजों से जोड़ता है।

 

गांव की जल और स्वच्छता समितियां (वीडब्ल्यूएससी) गांव की प्लानिंग, लोगों को जोड़ने, काम को लागू करने, देखरेख और व्यवहार में बदलाव लाने में मदद करके, समुदाय-स्तर के इस संस्थागत ढांचे को और मजबूत करती हैं। ऐसी सामूहिक भागीदारी का असर हरियाणा की गाडली ग्राम पंचायत में साफ दिखता है, जिसने एक प्रक्रिया-आधारित सामुदायिक तरीके से ओडीएफ प्लस मॉडल का दर्जा हासिल किया। सरपंच कांता कंवर ने सफ़ाई समिति के साथ मिलकर सामुदायिक और अलग-अलग शौचालय, पूरे गांव में जल निकासी व्यवस्था और पांच तालाबों के जरिए ग्रे-वॉटर के ट्रीटमेंट की व्यवस्था की। गांव ने गोवर्धन (GOBARdhan) बायोगैस प्लांट भी अपनाए, जिनसे गोबर को खाद और बायोगैस में बदला गया और उससे बनी स्लरी का इस्तेमाल खेती में किया गया। जन-रैलियों, बैठकों और घोषणाओं ने इन तौर-तरीकों को और बढ़ावा दिया। गाडली का उदाहरण दिखाता है कि कैसे व्यक्तिगत स्वच्छता की आदतें, जब स्थानीय संस्थाओं और सामूहिक प्रयासों का साथ पाती हैं, तो पूरे गांव के लिए एक स्वच्छता व्यवस्था का रूप ले सकती हैं।

 

 

लोग पहल करते हैं, संस्थाएं इसे बनाए रखती हैं

लोगों के नेतृत्व वाले स्वच्छता अभियान को सरकारी संस्थाओं से फ़ंडिंग, तालमेल और क्षमता निर्माण के जरिए मदद मिलती है। एसबीएम-जी सरकारी आवंटन, वित्त आयोग के अनुदान, 'विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)' फंड और आय जुटाने के अन्य तरीकों से संसाधन हासिल करता है। दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) के साथ तालमेल से एसएचजी और सीएलएफ जुड़ते हैं, जबकि कौशल विकास की पहल जमीनी स्तर की क्षमताओं को मजबूत करती है और जल जीवन मिशन ग्रे-वॉटर प्रबंधन में मदद करता है। यह कई स्तरों वाला संस्थागत ढांचा सामुदायिक कार्यों को सरकारी मदद से जोड़ता है: ग्राम पंचायतें लागू करने का काम करती हैं, ब्लॉक मदद और मार्गदर्शन देते हैं, ज़िले तकनीकी सहायता देते हैं और राज्य व केंद्र सरकार फंडिंग, तालमेल और बड़े पैमाने पर काम करने की सुविधाएं देती हैं।

सफाई एक सामूहिक गतिविधि बन जाती है

 

'जन भागीदारी' सफाई को समुदाय की साझा जिम्मेदारी के तौर पर और मजबूत बनाती है। सफाई अभियान पंचायत प्रतिनिधियों, स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी), युवाओं, स्कूलों और स्थानीय समुदायों को एक साथ लाते हैं ताकि सामूहिक ज़िम्मेदारी को नियमित काम में बदला जा सके। कर्नाटक का 'स्वच्छ शनिवार' इसका एक उदाहरण है। हर अभियान से पहले, पंचायत प्रतिनिधि गांव के समुदायों, युवा समूहों, सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों के साथ बातचीत करते हैं। हर महीने के पहले शनिवार को, समुदाय स्कूलों, आँगनवाड़ियों, अस्पतालों, दफ्तरों, पानी के स्रोतों, मंदिरों और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर सफाई का काम करते हैं। इन गतिविधियों में श्रमदान, कचरे को अलग-अलग करना, नालियों की सफाई, खाद के गड्ढों के लिए जगह की पहचान करना और दीवारों पर लिखकर सफाई के संदेशों को बढ़ावा देना शामिल है।

 

स्वच्छता ही सेवा: भागीदारी को जन-आंदोलन में बदलना

2017 में शुरू किया गया 'स्वच्छता ही सेवा' (एसएचएस) अभियान, स्वच्छता में नागरिकों की भागीदारी को बढ़ावा देने वाला एक सालाना अभियान है। यह सरकारी संस्थानों, स्थानीय निकायों, संगठनों और नागरिकों को स्वच्छता की साझा जिम्मेदारी के लिए एक साथ लाता है। यह अभियान स्वच्छता को रोजमर्रा की आदत बनाने के लिए प्रोत्साहित करके 'जन भागीदारी' के नजरिए को मजबूत करता है। 'स्वच्छता ही सेवा 2025' में 18.06 करोड़ से ज्यादा नागरिकों ने हिस्सा लिया। 'स्वच्छता ही सेवा 2026' की शुरुआत 17 सितंबर को होगी। इसका विषय है "स्वच्छता में सहभाग; स्वच्छ भारत, विकसित भारत।" 1 अक्टूबर को नागरिक "एक दिन, एक घंटा, एक साथ" के तहत सामूहिक श्रमदान करेंगे। 2 अक्टूबर को गांवों में विशेष ग्राम सभाएं और स्वच्छता जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। यह अभियान साफ-सुथरी सार्वजनिक जगहों और लगातार स्वच्छता बनाए रखने के लिए सामुदायिक प्रयासों को भी बढ़ावा देगा।

 

साफ-सफाई से जुड़ी नई अर्थव्यवस्था

 

जब सामूहिक साफ-सफाई सिस्टम बनते हैं, तो उनसे रोजगार के नए मौके भी पैदा हो सकते हैं। मध्य प्रदेश के बैतूल में, बबीता धुर्वे को घर-घर से कचरा इकट्ठा करने का काम मिला। 2021 में अपने माता-पिता दोनों को खोने के बाद, उन्होंने कचरा उठाने के लिए ई-रिक्शा चलाने के लिए अपनी ग्राम पंचायत से संपर्क किया। शुरुआत में लोगों के विरोध के बावजूद, उन्होंने गाड़ी चलाना सीखा और ज़िले की पहली महिला ई-रिक्शा कचरा उठाने वाली बनीं, जिससे उन्हें अपने गाँव में रहते हुए ही रोजगार मिल गया। बैतूल में अब लगभग 100 ग्राम पंचायतें कचरा उठाने वाली गाड़ियों का इस्तेमाल कर रही हैं; यह पहल दिखाती है कि साफ-सफाई सिस्टम कैसे एक ही समय में गांव की सफाई को बेहतर बना सकते हैं और स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा कर सकते हैं।

 

साफ-सफाई से रोजगार की संभावनाएं सिर्फ कचरा प्रबंधन तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इसमें साफ-सफाई के बुनियादी ढांचे को बनाए रखने के लिए जरूरी कौशल और सेवाएं भी शामिल हैं। पश्चिम बंगाल के नदिया में, शौचालय बनाने के काम के बढ़ने से ट्रेंड राजमिस्त्रियों की मांग पैदा हुई, जिसके चलते राजमिस्त्री का काम सिखाने वाले दो संस्थान खोले गए। लगभग 2,400 पुरुषों और महिलाओं को शौचालय बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। इससे पता चलता है कि साफ-सफाई का काम रोजगार का एक बड़ा स्थानीय इकोसिस्टम बना सकता है, जिसमें निर्माण, कचरा इकट्ठा करना, ट्रांसपोर्ट, प्रोसेसिंग और रखरखाव जैसे काम शामिल हैं।

एसबीएम-जी: कचरे को संसाधन में बदलना

 

चित्र 3: वेदांचा में ग्रे-वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट

जैसे-जैसे साफ-सफाई के सिस्टम बढ़ रहे हैं, समुदाय की अगुवाई वाली कोशिशों के लिए सही इंफ़्रास्ट्रक्चर और तकनीकी मदद की जरूरत भी बढ़ रही है। गुजरात का वेदांचा गांव दिखाता है कि कैसे समुदाय की मांग से स्थानीय स्तर पर डिजाइन किया गया गंदे पानी (वेस्टवॉटर) के प्रबंधन का सिस्टम बन सकता है। इसके ग्रे-वॉटर ट्रीटमेंट सिस्टम को स्थानीय जमीन और पानी के बहाव के पैटर्न को ध्यान में रखकर बनाया गया था और इसके संचालन और रखरखाव में स्थानीय ठेकेदारों की मदद ली गई। पंचायत के सदस्यों, ऑपरेटरों और इसमें शामिल नागरिकों को भी सिस्टम को मैनेज करने का प्रशिक्षण दिया गया। यह सिस्टम रोज़ाना 200 किलो-लीटर ग्रे-वॉटर को ट्रीट करता है, और साफ किए गए पानी का इस्तेमाल सिंचाई और ग्राउंडवॉटर को रिचार्ज करने के लिए किया जाता है। पंचायत खाद और साफ़ किए गए पानी के दोबारा इस्तेमाल से सालाना लगभग 2.5 लाख कमाती है। साथ ही, इस पहल से लोगों की सेहत में भी सुधार हुआ है, जिसमें पानी से होने वाली बीमारियों और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों में कमी आई है। यह मॉडल दिखाता है कि कैसे साफ-सफाई का काम कचरा हटाने और संसाधन वापस पाने से आगे बढ़कर पर्यावरण को टिकाऊ बनाने और स्थानीय स्तर पर मूल्य बनाने की दिशा में बढ़ सकता है।

 

इसलिए, ग्रामीण स्वच्छता का मुख्य उद्देश्य व्यवहार में निरंतरता और सामूहिक जिम्मेदारी है। ओडीएफ प्लस गांव को न केवल ओडीएफ का दर्जा बनाए रखना होता है, बल्कि ठोस और तरल कचरे का प्रबंधन और साफ-सुथरा माहौल भी बनाए रखना होता है। इस तरह, भारत की स्वच्छता यात्रा सुविधाओं तक पहुंच से इस्तेमाल तक, और इस्तेमाल से निरंतरता तक पहुंची है।

स्वच्छ भारत की सफलता का असली पैमाना सिर्फ़ बनाए गए बुनियादी ढांचे में नहीं, बल्कि इस बात में है कि क्या स्वच्छता लोगों और समुदायों की रोजमर्रा की आदत बन पाती है। "साफ-सुथरे गांव समुदायों के लिए नहीं बनाए जाते; वे समुदायों द्वारा ही बनाए जाते हैं।"

 

संदर्भ

जल शक्ति मंत्रालय

https://gobardhan.sbm.gov.in/

https://sbm.gov.in/SBMGDashboard/StatesDashboard.aspx

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1820414&reg=48&lang=2

https://www.pib.gov.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=151337&reg=48&lang=2

https://swachhbharatmission.ddws.gov.in/sites/default/files/Technical-Notes/Voices-from-the-States-29-April-2023.pdf

https://swachhbharatmission.ddws.gov.in/sites/default/files/Guidelines/SBMG%20Phase-II%20Operational%20Guidelines.pdf

पीआईबी बैकग्राउंडर

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2191618&reg=3&lang=2

https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?NoteId=160036&ModuleId=3&reg=3&lang=1

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