Infrastructure
शहरी बदलाव: ज्यादा हरे-भरे और टिकाऊ शहर बनाना
Posted On: 02 OCT 2026 12:04PM
किसी शहर का विकास न सिर्फ उसकी इमारतों और सड़कों से दिखता है, बल्कि इस बात से भी पता चलता है कि वह रोजमर्रा की चुनौतियों का सामना कैसे करता है। कचरे का निपटान, समुदायों की भागीदारी और सेवाओं की आपूर्ति का तरीका शहरी जीवन की गुणवत्ता को तय कर सकता है। स्वच्छ भारत मिशन ने पूरे देश में इस रोजमर्रा के बदलाव को एक मजबूत आधार दिया है। समय के साथ, ध्यान सिर्फ कचरा इकट्ठा करने और उसे ठिकाने लगाने से आगे बढ़ा है। शहर बेकार चीजों से मूल्यवान चीजें बनाने, जिम्मेदारी पूर्ण आदतें अपनाने और नगर निगम की सेवाओं को ज्यादा कुशल बनाने के तरीके खोज रहे हैं। कचरे को अलग-अलग करना, रीसाइक्लिंग, दोबारा इस्तेमाल और रिकवरी जैसे ग्रीन तरीके स्थानीय सिस्टम का अहम हिस्सा बन रहे हैं, जिससे उन्हें बढ़ावा मिल रहा है। डिजिटल मॉनिटरिंग, डेटा-आधारित सिस्टम और बेहतर सर्विस डिलीवरी से स्थानीय निकायों को ज्यादा सटीकता से काम करने में मदद मिल रही है। ये कोशिशें धीरे-धीरे ऐसे शहरी इलाके बना रही हैं जो पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी और रोजमर्रा की जिंददगी की जरूरतों के बीच संतुलन बनाते हैं।
टिकाऊ शहरी बदलाव में आगे रहने वाले शहर
अलग-अलग इलाकों में शहर यह दिखा रहे हैं कि कैसे स्थानीय समाधानों से पर्यावरण के लिए अच्छे नतीजे मिल सकते हैं। उनके अनुभव बताते हैं कि टिकाऊ शहरी बदलाव कई तरह से हो सकता है। इनमें डंपिंग ग्राउंड को एकीकृत कचरा प्रबंधन सुविधाओं में बदलना और जीरो-वेस्ट तरीकों को बढ़ावा देना शामिल है। तकनीक भी रोजमर्रा की साफ-सफाई सेवाओं को बेहतर बना रही है और शहरी सिस्टम को मजबूत कर रही है। नीचे दी गई कहानियां इन अलग-अलग तरीकों पर रोशनी डालती हैं।
एक हरा-भरा गोवा: कचरे से ऊर्जा बनाना
गोवा के सालिगाओ की वादियों में स्थित, 'इंटीग्रेटेड वेस्ट मैनेजमेंट फैसिलिटी सेंटर' पर्यावरण की स्थिरता को बढ़ावा देता है। 1,13,000 वर्ग मीटर में फैला यह केंद्र 'गोवा वेस्ट मैनेजमेंट कॉर्पोरेशन' (जीडब्ल्यूएमसी) द्वारा चलाया जाता है। पहले इस जगह का इस्तेमाल कचरा डंप करने के लिए किया जाता था। अब इसे गोवा के लिए एक एकीकृत और पर्यावरण के अनुकूल कचरा प्रबंधन केंद्र में बदल दिया गया है। यह केंद्र हर दिन 250 मीट्रिक टन गीले और सूखे कचरे का प्रबंधन करता है। इस प्लांट में कचरे से जैविक पदार्थ को अलग करके बायोगैस में बदला जाता है, जिससे बिजली बनाने में मदद मिलती है। यह ऊर्जा इलाके में बिजली की कमी को दूर करके स्थानीय समुदाय की जरूरतों को पूरा करती है।

एकीकृत वेस्ट मैनेजमेंट फैसिलिटी सेंटर
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रेस्तरां से निकलने वाले गीले कचरे को मीथेन युक्त बायोगैस सहित मूल्यवान जैव उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है। सुविधा में संसाधित 100 मीट्रिक टन सूखे कचरे से पुनर्चक्रण योग्य सामग्री प्राप्त की जाती है। बचे हुए सूखे कचरे को सह-प्रसंस्करण के लिए सीमेंट कारखानों में भेजा जाता है। इसके अतिरिक्त, सुविधा में गीले कचरे से 1.32 किलोवाट बिजली उत्पन्न होती है। यह बिजली 35 इकाइयों को बिजली देती है, जिसमें से आधी बिजली गोवा बिजली विभाग को आपूर्ति की जाती है। यह संयंत्र प्रतिदिन 7-8 टन खाद भी उत्पन्न करता है। स्थानीय पंचायतें इस खाद का उपयोग बागवानी और पुनर्वनीकरण परियोजनाओं के लिए करती हैं।
एकीकृत सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट फैसिलिटी गोवा के वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम को मज़बूत कर रही है और राज्य के कुल कचरे का लगभग एक-तिहाई हिस्सा प्रोसेस करती है। जो लोग पहले सिर्फ कचरा इकट्ठा करते थे, वे अब इस प्लांट के प्रशिक्षित कार्यबल का हिस्सा हैं। इससे इलाके के कई परिवारों को रोजगार के मौके मिलते हैं और पर्यावरण को भी फायदा होता है। यह प्लांट पूरे साल लगातार काम करता है और इसका मकसद शहर को "जीरो वेस्ट" बनाना है।

प्रति दिन 1.02 मेगावाट बिजली का उत्पादन
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गांधीनगर का जीरो-वेस्ट सफर: बदलाव लाते नागरिक
गुजरात का गांधीनगर शहर स्वच्छता और सस्टेनेबिलिटी (टिकाऊपन) का एक बेहतरीन उदाहरण है। स्वच्छ भारत मिशन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और स्वच्छ सर्वेक्षण में भागीदारी के जरिए, यह शहर स्वच्छता की संस्कृति को बढ़ावा देता है। ग्लोबल 'जीरो वेस्ट वीक' अभियान से प्रेरित होकर, गांधीनगर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने 2 से 7 सितंबर, 2026 तक कई असरदार गतिविधियां आयोजित कीं। इन पहलों का उद्देश्य लोगों के व्यवहार में बदलाव लाना और 3 आर सिद्धांतों - रिड्यूस (कम करना), रियूज (दोबारा इस्तेमाल करना) और रीसाइकिल (पुनर्चक्रण) - को बढ़ावा देना था। शहर भर में 25 जगहों पर गतिविधियां आयोजित की गईं, जिनमें 600 से ज्यादा नागरिक सीधे तौर पर शामिल हुए। लक्षित सोशल मीडिया अभियान के जरिए इस हफ्ते के दौरान 40,000 से ज्यादा लोगों तक पहुंच बनाई गई और उन्हें जागरूक किया गया। 'माई थैली' स्टॉल गांधीनगर में सामुदायिक भागीदारी और सस्टेनेबल कामों के लिए जीवंत केंद्र बन गए। नागरिकों को इस्तेमाल किए गए कपड़े दान करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। स्थानीय स्वयं-सहायता समूहों की कुशल महिलाओं ने इन दान किए गए कपड़ों को दोबारा इस्तेमाल होने वाले कैरी बैग में बदल दिया।
स्कूली छात्रों में जिम्मेदारी पूर्ण आदतें विकसित करने के लिए "स्वच्छता से शुरुआत" कैंपेन शुरू किया गया। पर्यावरण से जुड़े मुद्दों और जिम्मेदार आदतों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए क्विज प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। दिलचस्प और इंटरैक्टिव गेम डिजाइन किए गए, जिनके जरिए छात्रों को सस्टेनेबिलिटी के बारे में व्यावहारिक जानकारी मिली। 'रिड्यूस, रियूज़, रीसायकल' वैन पुराने कपड़े, प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरा इकट्ठा करने के लिए लोगों के घरों तक पहुंची। दान करने वालों को इनाम दिए गए, जिससे समुदाय की भागीदारी और बढ़ी। नागरिकों को ऑनलाइन टेस्टिमोनियल के जरिए अपने निजी प्रयासों और रोजमर्रा की आदतों को साझा करने के लिए भी आमंत्रित किया गया। इन पहलों के जरिए गांधीनगर अपने जीरो-वेस्ट विजन को आगे बढ़ा रहा है। शहर 'कचरा-मुक्त शहर' के लक्ष्य की दिशा में काम करते हुए संसाधनों के प्रति जागरूक आदतों को मजबूत करना जारी रखे हुए है।


स्वच्छता अभियान में भाग लेते स्कूली छात्र
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काकीनाडा का कचरा प्रबंधन का स्मार्ट तरीका
आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जले में, काकीनाडा तकनीक-आधारित कचरा प्रबंधन के एक बेहतरीन उदाहरण के तौर पर उभरा है। काकीनाडा में रोजाना लगभग 144 टन कचरा निकलता है, जिसमें गीला, सूखा और खतरनाक कचरा शामिल होता है। काकीनाडा नगर निगम 50 वार्डों में इस काम को संभालता है, जिन्हें आगे 382 माइक्रो पॉकेट्स में बांटा गया है। हर माइक्रो पॉकेट में 250 से 350 घर आते हैं और इसे दो सफाई कर्मचारी संभालते हैं।

सफाई मित्रों द्वारा आरएफआईडी टैग की स्कैनिंग
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लगभग 112,993 घरों से कचरा उठाने के लिए 973 से ज़्यादा सफाई कर्मचारियों को काम पर रखा गया है। इन घरों को शहर भर में 40,661 तय कचरा कलेक्शन पॉइंट्स में व्यवस्थित किया गया है। कचरा उठाने और उसे ले जाने के काम को बेहतर बनाने के लिए डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल किया जाता है। ऑनलाइन वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम (ओडब्ल्यूएमएस) इस प्रक्रिया को रियल-टाइम में ट्रैक करता है। रेडियो फ़्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (आरएफआईडी), फेशियल रिकग्निशन, जीपीएस और ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट सिस्टम (एचआरएमएस) कर्मचारियों और ट्रांसपोर्टेशन मैनेजमेंट में मदद करते हैं। कचरा पैदा करने वाले हर घर या जगह के गेट पर आरएफआईडी चिप वाले टैग लगाए गए हैं। कचरा उठाने वाले कर्मचारी कचरा उठाते समय इन टैग्स को स्कैन करते हैं। स्कैन की गई जानकारी ओडब्ल्यूएमएस में दर्ज हो जाती है, जिससे अधिकारी कलेक्शन की प्रगति पर नजर रख पाते हैं। लगातार निगरानी और समर्पित सफाई कर्मचारियों की वजह से यह सिस्टम 100% डोर-टू-डोर कलेक्शन हासिल कर पाया है।
नगर निगम ने जीपीएस ट्रैकिंग डिवाइस वाले 108 हॉपर वाहन तैनात किए हैं। ये वाहन कचरा उठाने और उसे प्रोसेसिंग प्लांट तक ले जाने के दौरान आवाजाही पर नजर रखते हैं और रास्ते से हटने या किसी गड़बड़ी की सूचना देते हैं। निगम ने सभी सफाई मित्रों के लिए फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (एफआरएस) भी शुरू किया है। अब कर्मचारी फेशियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल करके अपनी हाजिरी दर्ज कर सकते हैं। इससे मैन्युअल हाजिरी रजिस्टर या फिंगरप्रिंट स्कैनर की जरूरत खत्म हो गई है। बारीकी से निगरानी के लिए इन सभी तकनीकों को एक सेंट्रल कमांड सेंटर से जोड़ा गया है। अब लगभग 60% निवासी कचरे को उसके स्रोत पर ही अलग-अलग करते हैं। सफाई कर्मचारियों और निवासियों की मिली-जुली कोशिशों से काकीनाडा की कचरा प्रबंधन की क्षमता बेहतर हो रही है।

काकीनाडा में कचरा ट्रांसफर स्टेशन
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गाजियाबाद: कचरे से कार्बन वैल्यू बनाना
उत्तर प्रदेश का गाजियाबाद शहर साफ-सफाई और शहरी विकास को आगे बढ़ा रहा है, साथ ही कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए भी कदम उठा रहा है। गाजियाबाद नगर निगम (जीएमसी) ने एक अंतरराष्ट्रीय कार्बन क्रेडिट प्रोजेक्ट के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है। इस पहल को संयुक्त राष्ट्र से मान्यता मिली है और इसमें पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ संभावित आर्थिक फ़ायदे भी शामिल हैं। स्वच्छ भारत मिशन के तहत ठोस कचरे के बेहतर प्रबंधन से डंपिंग साइटों से निकलने वाली मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों को कम किया जा सकता है। साफ़ ईंधन और ऊर्जा स्रोतों के ज्यादा इस्तेमाल से भी जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम हो सकती है और कार्बन उत्सर्जन में कमी आ सकती है। इन प्रयासों के तहत, गाजियाबाद नगर निगम ने सतत विकास के लक्ष्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। इसे 'वेरिफाइड कार्बन स्टैंडर्ड' (वीसीएस) के तहत मान्यता मिली है, जिसे 'जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन' (यूएनएफसीसीसी) का समर्थन प्राप्त है।
जीएमसी ने पूरे शहर में पुरानी स्ट्रीटलाइट्स की जगह एनर्जी-एफिशिएंट एलईडी लाइट्स लगाई हैं। इस कदम से कार्बन उत्सर्जन कम होता है और बिजली की खपत भी घटती है। साथ ही, गीले कचरे से खाद बनाने के लिए "वेट वेस्ट कम्पोस्टिंग" को भी अपनाया जा रहा है। यह प्रक्रिया कचरा प्रबंधन को तेज बनाती है और ग्रीनहाउस गैसों को कम करने में मदद करती है। मध्य प्रदेश के इंदौर के बाद, गाज़ियाबाद उत्तर प्रदेश का पहला और देश का दूसरा शहरी स्थानीय निकाय (यूएलबी) बनने जा रहा है जो कचरे को मूल्य के नए स्रोत में बदल रहा है।


कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए एलईडी स्ट्रीट लाइट्स
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इन उपायों से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 2.7 लाख टन की कमी आने की उम्मीद है। यह कमी 2.7 लाख कार्बन क्रेडिट के बराबर है, क्योंकि एक टन कार्बन डाइऑक्साइड एक क्रेडिट के बराबर होता है। सर्टिफाइड क्रेडिट को अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाजार में बेचकर राजस्व में बदला जा सकता है। यह पहल गाजियाबाद में स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक अवसरों को बढ़ावा देती है।
हर संसाधन को महत्व देने वाले शहर बनाना
शहरों में हो रहा बदलाव, शहरी संसाधनों के प्रबंधन के तरीके में आए बड़े बदलाव को दिखाता है। तकनीक रोजमर्रा की साफ-सफाई सेवाओं को बेहतर बना रही है, जबकि नागरिक टिकाऊ तौर-तरीकों में सक्रिय रूप से शामिल हो रहे हैं। स्थानीय समाधान शहरी जीवन में साफ तौर पर सुधार ला रहे हैं। ये समाधान कचरे के असरदार प्रबंधन के लिए नवाचार और लोगों की कोशिशों को मिलाने का महत्व भी बताते हैं। ये सभी तरीके मिलकर ऐसे शहरी सिस्टम की ओर इशारा करते हैं जो न सिर्फ साफ-सुथरे हैं, बल्कि ज्यादा सर्कुलर और संसाधनों का सही इस्तेमाल करने वाले भी हैं।
संदर्भ
आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय
शहरी बदलाव: ज्यादा हरे-भरे और टिकाऊ शहर बनाना
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