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गरिमा के साथ कला का संचार: नवाचार ने भारत के सार्वजनिक शौचलयों को दिया नया स्वरूप
Posted On: 02 OCT 2026 12:28PM
बीते कुछ वर्ष में, भारत के शहरों ने सार्वजनिक स्वच्छता सुविधाओं तक पहुंच बढ़ाने में महत्वपूर्ण प्रगति की है। उपलब्धता में सुधार के साथ-साथ स्वच्छता और सुरक्षा व पहुंच बेहतर करते हुए, शहर सार्वजनिक शौचालयों को अधिक समावेशी और उपयोगकर्ता के अनुकूल बनाने के लिए कई नवाचारी तरीके अपना रहे हैं।
इन्हीं प्रयासों के आधार पर, स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) का शुभारंभ 2 अक्टूबर 2014 को किया गया था, जिसने पूरे भारत में स्वच्छता में नवाचार को एडवांस किया है। शहरों ने शौचलय बनाए हैं, जागरूकता फैलाई है और खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) बनाने के लिए काम किया है। इनमें से कई ओडीएफ+ और ओडीएफ++ का दर्जा पाने के लिए इसके आगे भी गए हैं। 2022 में, स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (एसबीएम-यू) में शौचालय 2.0 पहल ने एक नया स्तर छुआ है। इसका उद्देश्य सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालय (सीटी/ पीटी) को सुरक्षित, स्वच्छ और सभी के लिए इस्तेमाल करने योग्य बनाना है। नागरिक अब स्वच्छता ऐप में ‘एसबीएम टॉयलेट लोकेटर’ के माध्यम से अपनी नजदीकी जगह पर इस सुविधा का पता लगा सकते हैं।
आज, यह बदलाव अप्रत्याशित स्थानों पर भी नजर आता है। एक पुरानी बस महिलाओं के लिए शौचालय बन गई है। प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल निर्माण सामग्री के तौर पर किया जा रहा है। एक व्यस्त बाजार में अब एक स्मार्ट लाउंज खुल गया है। एक छोटे शहर ने स्वच्छता संबंधी कचरे के सुरक्षित निपटान का तरीका खोज लिया है। तीर्थ स्थलों में सभी के लिए सुलभ सुविधाएं उपलब्ध हैं। ये सभी कहानियां मूलभूत सुविधाओं से लेकर सम्मान, सुरक्षा और नवाचार तक की यात्रा को दर्शाती हैं।
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आधुनिक शौचालय: एक कबाड़ हो चुकी बस महिलाओं के लिए सुरक्षित स्थान बन गई
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भीड़भाड़ वाले बस टर्मिनलों से गुजरने वाली महिलाओं को आमतौर पर साफ-सुथरा और निजी शौचालय ढूंढने में परेशानी होती है। कर्नाटक के बेंगलुरु में, एक पुरानी बस को इस जरूरत को पूरा करने के लिए नया रूप दिया गया। कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (केएसआरटीसी) के मैजेस्टिक बस टर्मिनल पर स्त्री शौचालय स्थापित किया गया है। कबाड़ में मिले वाहन से निर्मित यह शौचालय विशेष रूप से महिलाओं के लिए है।

इस शौचालय में तीन भारतीय-शैली के और दो पश्चिमी-शैली के कमोड हैं। सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन और एक भस्मक मासिक धर्म स्वच्छता में सहायक हैं। माताओं को अपने शिशुओं को दूध पिलाने और डायपर बदलने के लिए एक अलग स्थान दिया गया है। सेंसर लाइटें अपने से उत्पादित सौर ऊर्जा से चलती हैं। अपशिष्ट पदार्थ बस स्टेशन पर स्थित निकटतम सीवेज चैंबर में जाता है। यह शौचालय छोटे बच्चों के साथ यात्रा करने वाली माताओं के लिए विशेष तौर पर उपयोगी साबित हुआ है।
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नवी मुंबई के संपोषित शौचालय: पर्यावरण के प्रति जागरूक शहरी डिजाइन का एक आदर्श
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क्या शहर के फेंके गए कचरे से सार्वजनिक शौचालय बनाया जा सकता है? नवी मुंबई ने यह साबित कर दिया है। नवी मुंबई नगर निगम (एनएमएमसी) ने सेक्टर 14, कोपरखैरणे में आकांक्षी शौचालय विकसित किए हैं। यह स्थान व्यस्त सार्वजनिक स्थल निसर्ग उद्यान के नजदीक स्थित है। रोजाना लगभग 8,000 से 9,000 लोग इस सुविधा का इस्तेमाल करते हैं।

इस संरचना में 426 वर्ग मीटर पुनर्चक्रित प्लास्टिक शीट का इस्तेमाल किया गया है। इसमें 5.3 मीट्रिक टन एक बार इस्तेमाल हुई प्लास्टिक, 11,700 प्लास्टिक की बोतलें और 35,200 बोतल के ढक्कन शामिल हैं। निर्माणकर्ताओं ने 85 पुराने कंप्यूटर कीबोर्ड और 284 किलोग्राम स्क्रैप धातु का भी दोबारा इस्तेमाल किया है। यह परियोजना रिड्यूस, रीयूज व रिसाइकिल के सिद्धांत को दैनिक जीवन में लागू करती है।
सुरक्षा और आराम को डिजाइन में समाहित किया गया है। पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग अनुभाग गोपनीयता सुनिश्चित करते हैं। बच्चों और दिव्यांगजनों के लिए इकाइयां, शिशु देखभाल केंद्र और सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीनें सभी उपयोगकर्ताओं की जरूरतों को पूरा करती हैं। उपचारित सीवेज जल से चलने वाला फव्वारा इसके पर्यावरण-अनुकूल डिजाइन को पूरा करता है। यह परिसर अब पर्यावरण नवाचार और नागरिक गौरव का प्रतीक बन गया है।
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स्वच्छ स्मार्ट शौचालय: भोपाल को सुलभ बना रहे हैं फ्रेशरूम
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भोपाल के 10 नंबर मार्केट में रोजाना खरीदारों, विक्रेताओं और यात्रियों की भीड़ लगी रहती है। भोपाल नगर निगम ने यहां स्मार्ट और लग्जरी सार्वजनिक शौचालय स्थापित किए हैं, जिन्हें 'फ्रेशरूम' कहा जाता है। ये पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के अंतर्गत डिजाइन-बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (डीबीओटी) मॉडल पर आधारित हैं। मार्केट में स्थित स्मार्ट लाउंज 800 से 1000 वर्ग फुट में फैला हुआ है और रोजाना 500 से 1000 आगंतुकों को सेवा प्रदान करता है।

इस सुविधा केंद्र में प्रौद्योगिकी का विशेष महत्व है। यहां सेंसर-आधारित शौचालय और टच-फ्री मूत्रालय उपलब्ध हैं। आगंतुक गर्म और ठंडे पानी के शॉवर, लॉकर और वाई-फाई का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। एक कैफे, वेंडिंग मशीन और शिशु-संसाधन कक्ष सुविधा को और बढ़ाते हैं। एक डिजिटल सूचना पट्टी इस्तेमाल करने वालों को जानकारी से अवगत कराती है। पुरुषों, महिलाओं और दिव्यांगजनों के लिए अलग-अलग सुलभ सुविधाएं उपलब्ध हैं। प्रौद्योगिकी, सुविधा और स्थिरता को एकीकृत करके, फ्रेशरूम यह प्रदर्शित करते हैं कि कैसे नवाचारी मॉडल विश्व स्तरीय स्वच्छता प्रदान करते हुए वित्तीय आत्मनिर्भरता सुनिश्चित कर सकते हैं।
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कराड में स्मार्ट स्वच्छता समाधान: सुरक्षित निपटान, सुरक्षित शहर
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साफ शौचालय स्वच्छता का एक हिस्सा हैं। सैनिटरी कचरे का सुरक्षित निपटान दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है। इस्तेमाल किए गए नैपकिन और डायपर अगर खुले में फेंके जाएं तो लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। कलंक के डर से अक्सर यह मुद्दा छिपा रहता है। महाराष्ट्र के सातारा जिले का एक छोटा सा शहर कराड इस चुनौती का डटकर सामना कर रहा है। यह सैनिटरी और बायोमेडिकल कचरे के 100% पृथक्करण, संग्रहण और प्रसंस्करण को सुनिश्चित करता है। अस्पतालों, क्लीनिकों, घरों और अन्य संस्थानों से प्रतिदिन लगभग 300 से 350 किलोग्राम सैनिटरी कचरा एकत्र किया जाता है।

इसका पहला कदम सैनिटरी कचरे से जुड़े सामाजिक कलंक को तोड़ना था। कार्यशालाओं, सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रमों और सार्वजनिक घोषणाओं के माध्यम से लापरवाही से निपटान के जोखिमों के बारे में बताया गया। कराड नगर परिषद् (केएमसी) ने महिला निवासियों के साथ मिलकर जागरूकता समूह बनाए। इन समूहों ने आवासीय क्षेत्रों में संदेश फैलाया। महिलाओं के लिए सुरक्षित निपटान को आसान बनाने के लिए सार्वजनिक शौचालयों में अलग से लाल रंग के डिब्बे रखे गए।

स्कूलों को सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीन और निपटान प्रणाली स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। शहर की सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) टीम ने लोगों से इस्तेमाल किए गए पैड को कागज में लपेटने का आग्रह किया। कई स्कूलों ने बाद में भस्मक (इंसिनरेटर) स्थापित कर लिए। इनका बचा हुआ हिस्सा जैव चिकित्सा अपशिष्ट उपचार संयंत्र में भेजा जाता है।
कचरा संग्रहण वाहनों में स्वच्छता संबंधी कचरे के लिए एक अलग डिब्बा होता है। कर्मचारी इस कचरे को छांटते हैं, जिससे केवल उपयुक्त सामग्री ही भस्मक तक पहुंचे।

केएमसी ने इस अपशिष्ट के उपचार के लिए कराड अस्पताल संगठन के साथ साझेदारी की है। केएमसी ने बायोमेडिकल अपशिष्ट उपचार संयंत्र के निर्माण के लिए भूमि आवंटित की, जबकि एसोसिएशन इसका संचालन और रखरखाव करता है। यह 600 किलोग्राम/ दिन क्षमता वाली कॉमन बायोमेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी (सीबीडब्ल्यूटीएफ) है। यह परिषद् की ओर से निःशुल्क एकत्र किए गए स्वच्छता कचरे का प्रसंस्करण करता है। इसके केंद्रीय भस्मक का तापमान 1,200 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। हानिकारक पदार्थों को हटाने के लिए गैसों को साफ किया जाता है। उत्सर्जन की त्वरित समय पर निगरानी की जाती है और इसे राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) प्रणाली से जोड़ा गया है।

इस पीपीपी साझेदारी से परिषद् का वित्तीय बोझ घटा है, क्योंकि उसे केवल संग्रहण और परिवहन लागत ही वहन करनी पड़ती है। स्वच्छता अपशिष्ट के उच्च तापमान पर भस्मीकरण से स्वास्थ्य जोखिम कम हुए हैं और अपशिष्ट प्रबंधन करने वाले स्वच्छता कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित हुई है। खुले में कचरा फेंकना बंद हो गया है, जिससे पर्यावरण प्रदूषण रुका है और बीमारियों का प्रसार कम हुआ है। इससे निवासियों के जीवन स्तर में सुधार हुआ है, विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए जो स्वच्छता अपशिष्ट निपटान की चुनौतियों से प्रभावित थीं।
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तिरुपति के तीर्थयात्रियों के लिए सुलभता, स्वच्छता और देखभाल
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धार्मिक स्थलों पर लाखों श्रद्धालु आते हैं, इसलिए स्वच्छ शौचालय एक दैनिक जरूरत बन जाते हैं। तिरुपति भारत के सबसे व्यस्त तीर्थ स्थलों में से एक है। तिरुपति नगर निगम ने श्रद्धालुओं, पर्यटकों और निवासियों के लिए आधुनिक शौचालय परिसर बनवाए हैं।

बस स्टेशन के पास महिलाओं के लिए एक विशेष गुलाबी शौचालय परिसर बना हुआ है। यह श्रीनिवासम, विष्णुवासम, रेलवे स्टेशन और बस टर्मिनल जैसी प्रमुख जगहों को जोड़ता है। महिलाएं भारतीय और पश्चिमी शैली के शौचालयों, रेस्ट रूम, मातृत्व देखभाल कक्षों और चेंजिंग रूम का इस्तेमाल कर सकती हैं। मासिक धर्म स्वच्छता को प्रोत्साहन देने के लिए यहां भस्मक और सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनें भी उपलब्ध हैं। इस परिसर में रोजाना 12,000 से 15,000 लोग आते हैं। सुविधा की सफाई के लिए तीन शिफ्टों में व्यवस्थित सफाई प्रणाली चलाई जाती है।
रेलवे स्टेशन के पास स्थित सार्वजनिक शौचालय परिसर गोविंदराजस्वामी मंदिर क्षेत्र में प्रतिदिन आने वाले 20,000-25,000 श्रद्धालुओं की जरूरतों को पूरा करता है। सार्वभौमिक उपयोग को ध्यान में रखते हुए तैयार किए गए इस परिसर में पुरुषों, महिलाओं, ट्रांसजेंडर लोगों, दिव्यांगों और बच्चों के लिए अलग-अलग सुविधाएं उपलब्ध हैं। रैंप, रेलिंग, बच्चों के अनुकूल उपकरण और स्नानघर तीर्थयात्रियों के लिए अधिक आराम, स्वच्छता और सुगमता सुनिश्चित करते हैं।
एसबीएम-यू 2.0 के अंतर्गत, शौचालय निर्माण से परे जाकर अब लक्ष्य स्वच्छ, सुरक्षित, समावेशी और संपोषित बनाए रखना है। ये कहानियां बताती हैं कि शहर अपने-अपने तरीके से इस लक्ष्य को कैसे प्राप्त कर रहे हैं। एक पुरानी बस, पुनर्चक्रित प्लास्टिक, सेंसर-आधारित उपकरण और एक उच्च तापमान भस्मक, सभी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। निजी संचालकों, अस्पतालों और समुदायों के साथ साझेदारी इन सुविधाओं को सुचारू रूप से चलाने में सहायक है। समर्पित कर्मचारी और देखभालकर्ता प्रतिदिन इन्हें जीवंत बनाए रखते हैं। जिस प्रकार स्वच्छ भारत मिशन अपने बारह वर्ष पूरे कर रहा है, इसकी दिशा स्पष्ट है। प्रत्येक नागरिक, चाहे वह किसी भी लिंग, क्षमता या स्थान का हो, स्वच्छ और सम्मानजनक शौचालय का हकदार है। बाजारों से लेकर स्मारकों तक, भारतीय शहर इस वादे को हकीकत में बदल रहे हैं।
आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय
गरिमा के साथ कला का संचार: नवाचार ने भारत के सार्वजनिक शौचलयों को दिया नया स्वरूप
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