Infrastructure
बदलाव के साथ नई उड़ान
प्रविष्टि तिथि:
20 OCT 2026 10:07 AM
उड़ान के जरिए क्षेत्रीय हवाई संपर्क को नए सिरे से परिभाषित करने के 10 साल
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2026 में उड़ान (UDAN) को दस साल पूरे हो जाएंगे। पिछले एक दशक में, इसने भारत के क्षेत्रीय विमानन नेटवर्क का विस्तार करने के साथ, ऐसे क्षेत्रों को जोड़ा है जहां हवाई सेवाएं नहीं थीं या बहुत कम थीं और हवाई यात्रा तक पहुंच को बेहतर बनाया गया है। क्षेत्रीय संपर्क (कनेक्टिविटी) ने पर्यटन, चिकित्सा सुविधाओं, कृषि व्यापार और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा दिया है; तेजू, देवघर और किशनगढ़ जैसे हवाई अड्डे इसके प्रभाव को दर्शाते हैं। 'संशोधित उड़ान' की शुरुआत इस योजना के अगले चरण को दर्शाती है। इसका मुख्य ध्यान विमानन बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, परिचालन की निरंतरता सुनिश्चित करने और क्षेत्रीय हवाई संपर्क का विस्तार करने पर है।
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क्षेत्रीय विकास में हवाई संपर्क एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह बाजारों तक पहुंच आसान बनाता है, पर्यटन को बढ़ावा देता है और आर्थिक अवसरों का विस्तार करता है। हालांकि, हवाई यात्रा तक व्यापक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए दूर-दराज और कम सेवाओं वाले क्षेत्रों को जोड़ना बहुत जरूरी है। इस जरूरत को समझते हुए, 'राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति 2016' ने वित्तीय सहायता और बुनियादी ढांचे के विकास के जरिए किफायती क्षेत्रीय संपर्क को प्राथमिकता दी।

इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, 21 अक्टूबर 2016 को 'क्षेत्रीय संपर्क योजना' (आरसीएस) शुरू की गई, जिसे 'उड़ान' (उड़े देश का आम नागरिक) के नाम से भी जाना जाता है। इस योजना का मुख्य लक्ष्य एक सरल लेकिन क्रांतिकारी सोच पर आधारित है: क्षेत्रीय मार्गों पर ऐसी हवाई यात्रा उपलब्ध कराना जो किफायती होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से व्यावहारिक और लाभदायक भी हो।
'उड़ान' के दस साल पूरे होने पर, हम देख सकते हैं कि इसने क्षेत्रीय हवाई संपर्क का विस्तार किया है और उन हवाई अड्डों को जोड़कर नागरिकों के लिए हवाई यात्रा को सुलभ बनाया है, जहां पहले कोई सेवा नहीं थी या बहुत कम सेवा थी। पिछले एक दशक पर नजर डालें तो भारत के नागरिक उड्डयन क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ है। भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाजार बन गया है, जहां चालू हवाई अड्डों की संख्या 2014 में 74 थी, जो आज बढ़कर 166 हो गई है। इस बड़े बदलाव के केंद्र में 'उड़ान' योजना ही है।
इस प्रगति को आगे बढ़ाते हुए, 4 जुलाई 2026 को 'उड़ान' का अगला चरण शुरू किया गया। अब यह योजना केंद्र और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की साझेदारी पर अधिक जोर देती है। इसके साथ ही, हवाई पट्टियों और हेलीपैड की पहचान करने के लिए 'एयरोड्रोम विकास के लिए चैलेंज मोड पोर्टल' (Challenge Mode Portal for Aerodrome Development) भी शुरू किया जाएगा। इन सभी कदमों से क्षेत्रीय विमानन बुनियादी ढांचे का और अधिक विस्तार होगा।
अप्रैल 2017 में शिमला से दिल्ली के बीच पहली आरसीएस-उड़ान विमान सेवा के उद्घाटन के साथ, 'उड़ान' योजना अपने परिचालन चरण में प्रवेश कर गई। तब से, इस योजना ने क्षेत्रीय हवाई संपर्क का विस्तार किया है।

- परिचालन में लाए गए रूट: इस योजना के तहत पूरे भारत में 687 क्षेत्रीय रूटों पर परिचालन शुरू किया गया है।
- परिचालन में लाए गए हवाई अड्डे (एयरोड्रोम): कुल 95 हवाई अड्डों को परिचालन में लाया गया है, जिनमें 17 हेलीपोर्ट और 02 वाटर एयरोड्रोम शामिल हैं।
- संचालित उड़ानें: इस योजना के तहत 3.68 लाख से अधिक उड़ानें संचालित की गई हैं।
- यात्रियों की यात्रा: इस योजना ने 1.72 करोड़ यात्रियों के लिए हवाई यात्रा को सुलभ बनाया है।
यह योजना विमानन कंपनियों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए बाजार-आधारित चयन, हवाई किराए की सीमा (एयरफेयर कैप), रियायतें और 'वायबिलिटी गैप फंडिंग' (वीजीएफ) का उपयोग करती है। 15 अक्टूबर 2026 तक, वीजीएफ के तहत 5091.23 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं।
नागरिक उड्डयन के विस्तार के साथ-साथ, इस क्षेत्र में नौकरियों की संख्या 2014 में लगभग 30 लाख (3 मिलियन) से बढ़कर 2026 में लगभग 77 लाख (7.7 मिलियन) हो गई है। इसके अलावा, 2040 तक यह आंकड़ा 2.5 करोड़ (25 मिलियन) तक पहुंचने की संभावना है।
उड़ान योजना के अंतर्गत पूर्वोत्तर क्षेत्र
दुर्गम पहाड़ी इलाकों के कारण, पूर्वोत्तर राज्यों में संपर्क सीमित है। इसलिए, हवाई संपर्क को मजबूत करना विकास की एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता है।
- उड़ान योजना के तहत, पूर्वोत्तर राज्यों में 90 प्राथमिकता वाले आरसीएस रूट चालू किए गए हैं।
- इस क्षेत्र में हेलीपोर्ट और वाटर एयरोड्रोम सहित 52 हवाई अड्डों की पहचान की गई है, जिनमें से 12 को चालू कर दिया गया है।
उड़ान के अगले चरण की शुरुआत
अपनी शुरुआत के बाद से, आरसीएस-उड़ान योजना के कई संस्करण जारी किए जा चुके हैं। अब तक की उपलब्धियों को आगे बढ़ाते हुए, 4 जुलाई 2026 को उड़ान योजना का अगला चरण औपचारिक रूप से लॉन्च किया गया। यह योजना दस वर्षों (वित्त वर्ष 2026-27 से वित्त वर्ष 2035-36 तक) के लिए लागू की जाएगी, जिसका कुल बजट 28,840 करोड़ रुपये है। अब मुख्य जोर एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार करने पर है, जो 'मेड इन इंडिया' (भारत में निर्मित) नागरिक विमानों को बढ़ावा दे सके।
यह योजना किफायती हवाई यात्रा, टिकाऊ क्षेत्रीय विमानन संचालन, 'चैलेंज मोड' ढांचे के माध्यम से हवाई अड्डों के विकास और स्वदेशी विमान निर्माण पर जोर देती है।
संशोधित उड़ान योजना में क्षेत्रीय विमानन के टिकाऊ विकास और दीर्घकालिक व्यवहार्यता को समर्थन देने के लिए विशेष उपाय शामिल किए गए हैं।
- एयरड्रोम का विकास (कैपेक्स): मौजूदा ऐसी हवाई पट्टियों से 100 हवाई अड्डे विकसित किए जाएंगे, जहां अभी तक कोई सेवा उपलब्ध नहीं है। इसके लिए आठ वर्षों में 12,159 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। इसका मतलब है कि प्रति हवाई अड्डे के लिए 100 करोड़ रुपये आवंटित करने का प्रस्ताव है।
- एयरड्रोम का संचालन और रखरखाव (ओएंडएम): लगभग 441 एयरड्रोम के लिए तीन वर्षों तक संचालन और रखरखाव (ओएंडएम) सहायता दी जाएगी, जिस पर अनुमानित 2,577 करोड़ रुपये खर्च होंगे। यह वित्तीय सहायता प्रति हवाई अड्डा प्रति वर्ष अधिकतम 3.06 करोड़ रुपये और प्रति हेलीपोर्ट या वाटर एयरड्रोम प्रति वर्ष 0.90 करोड़ रुपये तक सीमित होगी।
- आधुनिक हेलीपैड का विकास: 200 आधुनिक हेलीपैड विकसित किए जाएंगे, जिनमें से प्रत्येक की अनुमानित लागत 15 करोड़ रुपये होगी। आठ वर्षों में इसके लिए कुल 3,661 करोड़ रुपये का बजट प्रस्तावित है।
- विमानन कंपनियों के लिए 'वायबिलिटी गैप फंडिंग': क्षेत्रीय मार्गों (regional routes) पर उड़ान भरने वाली एयरलाइनों की मदद के लिए दस वर्षों में 10,043 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। यह फंडिंग अधिकतम पांच वर्षों तक मिलेगी, जिसमें तीसरे वर्ष से सहायता राशि धीरे-धीरे कम होती जाएगी और रूट की विशिष्टता केवल तीन वर्षों तक सीमित रहेगी।
- आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी विमानन क्षमता: पवन हंस के लिए दो एचएएल ध्रुव हेलीकॉप्टर और अलायंस एयर के लिए दो एचएएल डॉर्नियर विमान खरीदने हेतु 400 करोड़ रुपये आवंटित करने का प्रस्ताव है। यह पहल 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत स्वदेशी विमानन को बढ़ावा देती है और इसका उद्देश्य दूर-दराज के इलाकों तथा कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को मजबूत करना है।
अगले चरण की रूपरेखा
उड़ान योजना के अगले चरण में तीन मुख्य पहलुओं पर ध्यान दिया जाएगा: केंद्र और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के बीच साझेदारी को मजबूत करना, विमानन बुनियादी ढांचे का निर्माण करना और क्षेत्रीय हवाई संपर्क का विस्तार करना।
- केंद्र-राज्य/केंद्र शासित प्रदेश समन्वय: सरकार, इसमें शामिल राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) के बीच कुल 21 समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। ये विमानन परिसंपत्तियों की पहचान, विकास और उन्हें चालू करने के लिए एक समन्वित ढांचा तैयार करते हैं। यह ढांचा क्षेत्रीय संपर्क की जरूरतों और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की प्राथमिकताओं के अनुरूप होगा।
- हवाई अड्डों के विकास के लिए 'चैलेंज मोड' पोर्टल: एक समर्पित पोर्टल के जरिए राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन, उड़ान योजना के अगले चरण में विकास के लिए हवाई पट्टियों और हेलीपैड को नामांकित कर सकते हैं। इससे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ऐसी जगहों की पहचान करने में मदद मिलेगी, जहां हवाई संपर्क की संभावनाएं हैं। इससे स्थानीय जरूरतों के आधार पर विमानन बुनियादी ढांचे के निर्माण और उसे अपग्रेड करने में आसानी होगी।
उड़ान के अंतर्गत क्षेत्रीय बदलाव
उड़ान के तहत क्षेत्रीय हवाई अड्डों के चालू होने से क्षेत्रीय केंद्रों में सामाजिक-आर्थिक बदलाव आया है, जिससे स्थानीय व्यापार, चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच, पर्यटन और रोजगार को बढ़ावा मिला है।
बिहार में पूर्णिया हवाई अड्डा

2025 से पहले, पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, कटिहार और भागलपुर सहित सीमांचल और कोसी क्षेत्रों के निवासियों को हवाई यात्रा के लिए 200 किलोमीटर से अधिक दूर बागडोगरा हवाई अड्डे तक जाना पड़ता था। कोलकाता और पटना जैसे बड़े शहरों तक पहुंचने के लिए अक्सर सड़क मार्ग से क्रमशः 10 घंटे और 8 घंटे की थकाऊ यात्रा करनी पड़ती थी। मखाना, लीची और सब्जियों जैसी उपज के लिए मशहूर यह क्षेत्र एक प्रमुख कृषि केंद्र होने के बावजूद, सीधे हवाई संपर्क और एयर कार्गो सुविधाओं के अभाव में अपनी आर्थिक संभावनाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहा था। 2025 में पूर्णिया हवाई अड्डे के चालू होने से क्षेत्रीय संपर्क में बड़ा बदलाव आया है, जिससे बिहार के 10 से अधिक जिलों के लोगों को हवाई यात्रा की सुविधा मिल गई है। अब कोलकाता तक का सफर लगभग 2 घंटे और पटना तक का सफर लगभग 1 घंटे में पूरा हो जाता है, जिससे यहाँ के निवासियों, व्यवसायों और संस्थानों के लिए आवागमन काफी आसान हो गया है। लगभग 2.8 किलोमीटर लंबे रनवे (जो बिहार में सबसे लंबा है) वाला यह हवाई अड्डा ए320 और बी737 जैसे विमानों को संभालने में सक्षम है। इसने इस क्षेत्र को प्रमुख आर्थिक केंद्रों से और बेहतर तरीके से जोड़ दिया है। इसके अलावा, बेहतर संपर्क ने स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया है।
अरुणाचल प्रदेश में तेजू हवाई अड्डा

भारत की पूर्वी सीमा पर, चीन बॉर्डर के पास स्थित अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में पहले हवाई संपर्क की सुविधा नहीं थी। इस वजह से यहां के लोगों को उड़ानों या मेडिकल इमरजेंसी के लिए 164 किमी दूर डिब्रूगढ़ या 610 किमी दूर गुवाहाटी तक जाने के लिए 10 घंटे से ज़्यादा का सफर करना पड़ता था। 2021 में चालू हुआ तेजू हवाई अड्डा अब इस दूर-दराज इलाके के 2 लाख से ज्यादा लोगों को हवाई संपर्क की सुविधा देता है। इस एयरपोर्ट की वजह से गुवाहाटी तक का सफर अब घटकर सिर्फ 1 घंटे का रह गया है। इस सुविधा से अदरक, इलायची और चावल जैसे कृषि उत्पादों को हवाई मार्ग से भेजने (एयर कार्गो एक्सपोर्ट) में भी मदद मिली है।
झारखंड में देवघर हवाई अड्डा

जुलाई 2022 से पहले, दिल्ली से देवघर पहुंचने के लिए सड़क या रेल मार्ग से 15 घंटे से अधिक, और कोलकाता से 7.5 घंटे से अधिक का लंबा और थका देने वाला सफर करना पड़ता था। बाबा बैद्यनाथ धाम जाने वाले तीर्थयात्रियों को सबसे नजदीकी चालू हवाई अड्डों—रांची या पटना—तक पहुंचने के लिए 150 से 200 किलोमीटर से अधिक की यात्रा करनी पड़ती थी। देवघर हवाई अड्डे के खुलने से दिल्ली से देवघर की यात्रा का समय घटकर मात्र 2 घंटे रह गया है। जुलाई 2022 के बाद से, हर साल 10 लाख से अधिक तीर्थयात्री सीधे देवघर के लिए उड़ान भरते हैं। कांवड़ यात्रा के मुख्य महीने के दौरान, यह हवाई अड्डा 50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं को सीधी पहुंच प्रदान करता है। इसके अलावा, इस हवाई अड्डे ने पूर्वी भारत से मरीजों को एम्स देवघर तक पहुंचने में मदद करके 'मेडिकल टूरिज्म' को बढ़ावा दिया है। साथ ही, इसने स्थानीय हॉस्पिटैलिटी (आतिथ्य) क्षेत्र को भी गति दी है, जिससे यहां 30 से अधिक नए होटल खुले हैं।
राजस्थान में किशनगढ़ हवाई अड्डा

2017 में सीधी हवाई सेवा शुरू होने से पहले, किशनगढ़, अजमेर और पुष्कर के यात्रियों को उड़ानों के लिए 100 किलोमीटर से ज्यादा दूर जयपुर जाना पड़ता था। इस समस्या का असर इस क्षेत्र के मार्बल कारोबार पर पड़ा। साथ ही, अजमेर शरीफ दरगाह और पुष्कर मंदिर आने वाले सालाना 2 करोड़ से ज़्यादा तीर्थयात्रियों पर भी इसका असर हुआ। 2017 के बाद, सीधी एयर कार्गो कनेक्टिविटी की मदद से इटली, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और अमेरिका को मार्बल का निर्यात संभव हो पाया है। 2022 में, इस हवाई अड्डे पर 'अव्यान एविएशन एकेडमी' की शुरुआत हुई, जो इस क्षेत्र का एकमात्र 'कैटेगरी ए' फ्लाइंग ट्रेनिंग ऑर्गनाइजेशन (एफटीओ) है। इस हवाई अड्डे ने 200 से ज्यादा प्रत्यक्ष रोजगार पैदा किए हैं। इसके अलावा, यहां स्थानीय रियल एस्टेट की कीमतों में भी 40–50% की बढ़ोतरी हुई है।
आगे का सफर
उड़ान ने पिछले दशक में मार्गों और हवाई अड्डों को संचालित करके और करोड़ों यात्रियों को ले जाकर भारत की क्षेत्रीय संपर्क को फिर से परिभाषित किया है। क्षेत्रीय विमानन का अगला चरण बुनियादी ढांचे के विकास पर निर्भर करेगा जो विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में विश्वसनीय और निरंतर संचालन का समर्थन करता है। संशोधित उड़ान योजना के माध्यम से, हवाई क्षेत्र के विकास, परिचालन समर्थन और स्वदेशी विमानन क्षमता पर जोर दिया जा रहा है। ये उपाय क्षेत्रीय हवाई यात्रा की बुनियादी ढांचे और व्यवहार्यता चुनौतियों का समाधान करना चाहते हैं। उनका लक्ष्य पूरे भारत में कनेक्टिविटी के लिए एक मजबूत आधार तैयार करना है।
संदर्भ
मंत्रिमंडल
नागरिक उड्डयन मंत्रालय
पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी)
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पीके/केसी/आरटी/एमपी
(तथ्य सामग्री आईडी: 151128)
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