विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय
azadi ka amrit mahotsav

आरडीआई कोष के तहत सरकार ने हितों के टकराव से बचने के मज़बूत उपायों को फिर से दोहराया; योग्यता-आधारित मूल्यांकन ही वित्त पोषण के निर्णयों का आधार

वित्त पोषण के किसी भी निर्णय में निवेश समिति का कोई भी सदस्य हितों के टकराव की स्थिति में नहीं होता

स्वतंत्र विशेषज्ञ मूल्यांकन, पूर्ण-बहुमत की मंजूरी और हितों के टकराव से जुड़े नियम आरडीआई कोष की निष्पक्षता और ईमानदारी सुनिश्चित करते हैं

सरकार ने आरडीआई कोष के तहत निष्पक्ष, पारदर्शी और योग्यता-आधारित वितरण सुनिश्चित करने वाले बहु-स्तरीय रक्षा-उपायों का विवरण दिया

प्रविष्टि तिथि: 07 AUG 2026 3:21PM by PIB Delhi

सरकार ने आज इस बात की पुष्टि की कि अनुसंधान, विकास और नवाचार (आरडीआई) कोष को एक मज़बूत संस्थागत ढांचे के ज़रिए लागू किया जा रहा है, जो पारदर्शिता, योग्यता-आधारित मूल्यांकन और हितों के टकराव से जुड़े कड़े सुरक्षा उपायों पर आधारित है। "अनुसंधान, विकास और नवाचार (आरडीआई) कोष के तहत हितों के टकराव से जुड़े सुरक्षा उपाय और धन का वितरण" विषय पर एक पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड और अनुसंधान राष्ट्रीय रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ) के वरिष्ठ अधिकारियों ने कोष का संचालन करने वाली शासन संरचना, मूल्यांकन के तरीकों और संस्थागत सुरक्षा उपायों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि धन से जुड़ा हर फ़ैसला मंज़ूर किए गए कार्यान्वयन दिशानिर्देशों और स्थापित उचित प्रक्रिया के अनुसार ही लिया जाता है।

पत्रकार वार्ता को प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (टीडीबी) के सचिव श्री राजेश कुमार पाठक और अनुसंधान राष्ट्रीय रिसर्च फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. शिवकुमार कल्याणरमन ने संबोधित किया।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव तथा प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड के अध्यक्ष प्रो. उमेश वी. वाघमारे ने डिजिटल रूप से जुड़कर अपना संदेश दिया। उन्होंने आरडीआई कोष के कार्यान्वयन में पारदर्शिता, निष्पक्षता और नैतिक शासन के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया। अपने संदेश में, सचिव ने कहा कि सरकार ने हितों के टकराव  से जुड़े दिशा-निर्देशों और नियमों का सख्ती से पालन किया है और उन्हें पूरा भरोसा है कि इनका कोई उल्लंघन नहीं हुआ है। उन्होंने विशेषज्ञ समिति के सदस्यों की निष्ठा और नैतिक आचरण पर पूर्ण विश्वास व्यक्त किया और जोर दिया कि डीएसटी, टीडीबी और एएनआरएफ प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड आरडीआई कोष के संचालन में पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

कोष  को संचालित करने वाले संस्थागत ढांचे को स्पष्ट करते हुए, अधिकारियों ने बताया कि अनुसंधान, विकास और नवाचार (आरडीआई) कार्यान्वयन दिशानिर्देश स्पष्ट रूप से यह स्वीकार करते हैं कि अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों का मूल्यांकन करने में सक्षम विशेषज्ञों के पास अक्सर नवाचार तंत्र का पूर्व अनुभव होता है, जिसमें पेशेवर या निवेश संघ शामिल हैं। तदनुसार, यह ढांचा विशेषज्ञता को बाहर करने के बजाय, स्पष्ट रूप से परिभाषित हितों के टकराव संबंधी प्रावधानों के माध्यम से इसे विनियमित करने के लिए बनाया गया है। दिशानिर्देशों में हितों का खुलासा, व्यवस्थित निर्णय लेने की प्रक्रिया और संभावित टकराव की स्थिति में स्वयं को अलग रखने का प्रावधान है, जिससे वित्तपोषण निर्णयों की अखंडता की रक्षा करते हुए तकनीकी विशेषज्ञता को बनाए रखा जा सके। ये प्रावधान परियोजना मूल्यांकन शुरू होने से पहले ही अनुमोदित कार्यान्वयन ढांचे का हिस्सा थे।

अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि किसी नवाचार इकोसिस्टम की संस्था  के साथ पेशेवर या निवेश का संबंध होने से 'हितों के टकराव' के नियमों का उल्लंघन नहीं होता।  फ़्रेमवर्क के तहत ज़रूरी है कि ऐसे हितों की पूरी जानकारी दी जाए और संबंधित प्रस्ताव के मूल्यांकन और फ़ैसला लेने की प्रक्रिया से पूरी तरह अलग रहा जाए। प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड ने इससे भी अधिक सख्त सीओआई नीति लागू की है, जिसके तहत यदि निवेश समिति (आईसी) का कोई सदस्य किसी ईटीई (उद्यमी/प्रौद्योगिकी इकाई) का स्वामी (सीईओ, संस्थापक या शेयरधारक) है, तो यह सुनिश्चित करना उस सदस्य की जिम्मेदारी है कि जब तक वह आईसी सदस्य रहता है, तब तक उस ईटीई द्वारा टीडीबी को कोई परियोजना प्रस्ताव न भेजा जाए। परियोजना चयन के पहले दौर के दौरान इन सुरक्षा उपायों को कड़ाई से लागू किया गया था और निवेश समिति के प्रत्येक सदस्य ने जहाँ भी ज़रूरी था, जानकारी देने और प्रक्रिया से अलग रहने के नियमों का पालन किया।

सरकार ने आगे स्पष्ट किया कि प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड ने स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास में मदद करते हुए, लगभग तीन दशकों से 'हितों के टकराव' से जुड़े सुरक्षा उपायों का लगातार पालन किया है। वर्ष 1996 में संसद के एक अधिनियम के तहत अपनी स्थापना के बाद से, टीडीबी ने प्रौद्योगिकी प्रस्तावों के मूल्यांकन के लिए अलग-अलग अधिकारियों के बजाय स्वतंत्र विशेषज्ञ समितियों पर भरोसा किया है। आरडीआई फंड के तहत प्रोजेक्ट चुनने में भी इन्हीं संस्थागत सिद्धांतों का पालन किया जाता है, जिससे फ़ैसला लेने की प्रक्रिया में निरंतरता, विश्वसनीयता और जनता का भरोसा बना रहता है।

मूल्यांकन प्रक्रिया के बारे में बताते हुए अधिकारियों ने उल्लेख किया कि परियोजनाओं की स्वीकृति सामूहिक रूप से एक निवेश समिति द्वारा ली जाती है, जिसमें प्रौद्योगिकी, उद्योग और निवेश क्षेत्रों से चुने गए स्वतंत्र बाहरी विशेषज्ञ शामिल होते हैं। सरकारी अधिकारी प्रस्तावों की तकनीकी योग्यता तय नहीं करते हैं और टीडीबी के सदस्य सचिव के पास निवेश समिति में वोट देने का कोई अधिकार नहीं होता है। इसके अलावा, साधारण बहुमत के बजाय केवल पात्र सदस्यों के पूर्ण-बहुमत के माध्यम से ही स्वीकृतियां दी जाती हैं, जो किसी भी मनमाने या व्यक्तिगत निर्णय के खिलाफ एक अतिरिक्त संस्थागत सुरक्षा कवच प्रदान करता है। जो सदस्य हितों के टकराव  की बात करते हैं, वे न तो चर्चाओं में भाग लेते हैं और न ही संबंधित प्रस्ताव पर मतदान करते हैं। निवेश समिति टीडीबी बोर्ड द्वारा अंतिम विचार और स्वीकृति के लिए पूर्ण-बहुमत के माध्यम से ही परियोजना प्रस्तावों की सिफारिश करती है।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि टीडीबी के माध्यम से आरडीआई कोष के तहत सहायता विशिष्ट अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास परियोजनाओं के लिए प्रदान की जाती है, न कि कंपनियों को एक इकाई के तौर पर आर्थिक मदद के रूप में। टीडीबी स्पष्ट रूप से पहचाने गए प्रौद्योगिकी परियोजनाओं से जुड़े रियायती ऋण प्रदान करता है, जबकि प्रस्ताव जमा करने से पहले हुए खर्च को इसमें शामिल नहीं किया जाता। इसके अलावा, सरकारी सहायता केवल पात्र गैर-सरकारी स्रोतों से परियोजना स्वीकृति के बाद जुटाए गए समकक्ष निवेश के एवज में ही जारी की जाती है। यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि सरकारी वित्तपोषण परियोजना कार्यान्वयन के दौरान वित्तीय अनुशासन और जवाबदेही बनाए रखते हुए अतिरिक्त निजी निवेश को बढ़ावा दे।

उद्यम पूंजी कोष या एंजेल इन्वेस्टर नेटवर्क द्वारा किए गए पूर्व निवेशों के संबंध में प्रश्नों का उत्तर देते हुए अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यदि ऐसे निवेश प्रस्ताव जमा करने से पहले किए गए हैं, तो उनका सरकार के फंडिंग निर्णय पर कोई असर नहीं पड़ता है। इसी तरह, यदि कोई निजी निवेशक किसी परियोजना के तकनीकी मूल्यांकन और स्वीकृति से सफलतापूर्वक गुजरने के बाद उसमें निवेश करने का विकल्प चुनता है, तो ऐसा निवेश एक स्वतंत्र व्यावसायिक निर्णय का प्रतिनिधित्व करता है और सरकार द्वारा की जाने वाली मूल्यांकन प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करता है। इसलिए, मूल्यांकन ढांचा केवल विचाराधीन परियोजना की वैज्ञानिक योग्यता, तकनीकी नवाचार और नवाचार क्षमता पर ध्यान केंद्रित करता है। सभी 22 कंपनियां गहन-प्रौद्योगिकी पर आधारित कंपनियां हैं, जो स्वदेशी तकनीकों का निर्माण कर रही हैं और जटिल समस्याओं का समाधान निकाल रही हैं।

अधिकारियों ने आगे इस बात पर प्रकाश डाला कि वर्तमान फंडिंग दौर के तहत स्वीकृत कई परियोजनाओं का आरडीआई  कोष के तहत विचार किए जाने से पहले ही राष्ट्रीय नवाचार मंचों और विशेषज्ञ मूल्यांकन तंत्रों के माध्यम से स्वतंत्र मूल्यांकन हो चुका था।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कई लाभार्थी कंपनियों को उद्यम पूंजी या एंजेल निवेशकों से निवेश प्राप्त करने से कई वर्ष पहले ही टीडीबी से परियोजना-आधारित सहायता प्राप्त हो चुकी थी। यह विकास के शुरुआती चरण में स्वदेशी तकनीकों की पहचान करने और उन्हें समर्थन देने में टीडीबी की दीर्घकालिक भूमिका को दर्शाता है और इसे वर्तमान फंडिंग कार्यक्रम के तहत किसी खास तरह की प्राथमिकता या पक्षपात के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। विकसित की जा रही कई प्रौद्योगिकियां भारत में पहली बार बनाई जा रही हैं और दुनिया में बहुत कम उपलब्ध विकल्पों में से एक हैं। चूंकि भारत में ये डीप-टेक साइंस आधारित कंपनियां अपने शुरुआती चरण के दौरान बाजार से कर्ज नहीं जुटा सकती हैं और आरडीआई कोष केवल टीआरएल 4 से ही उपलब्ध होता है, इसलिए उन्हें एंजेल निवेशकों और फंडों से इक्विटी मिली, जो इस अर्थ में अच्छा है कि यह इन कंपनियों की सफलता की संभावना को बढ़ाता है। इन 22 ईटीई में से कई को सह-निवेशकों के साथ-साथ वीसी फंडों/फैमिली ऑफिस से फंड मिला है, जहां निवेश समिति के कोई भी सदस्य के हितों का टकराव नहीं है। यह आरडीआई कोष निवेश को और अधिक मजबूती तथा विश्वास प्रदान करता है।

एएनआरएफ ने दोहराया कि 'हितों के टकरावका प्रबंधन, आरडीआई कोष  के शासन ढांचे  का एक मुख्य सिद्धांत है। कार्यान्वयन दिशानिर्देशों के अनुसार, द्वितीय स्तर के फंड प्रबंधकों के लिए निवेश समितियों का गठन इस प्रकार करना अनिवार्य है जिससे हितों के संभावित टकराव से बचा जा सके। साथ ही, जहाँ भी आवश्यक हो, जानकारी का खुलासा करने, निर्णय प्रक्रिया से स्वयं को अलग रखने और व्यवस्थित तरीके से फ़ैसले लेने के नियम भी तय करने होते हैं। अन्य प्रशासनिक/शासन सुरक्षा उपायों के साथ इन प्रावधानों को फंडिंग प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कार्यान्वयन ढांचे में शामिल कर लिया गया था और परियोजना मूल्यांकन एवं अनुमोदन के दौरान इनका लगातार पालन किया गया है।

सरकार ने इस बात पर जोर दिया कि डीप-टेक (गहन-प्रौद्योगिकी) नवाचार में भारत को एक वैश्विक लीडर बनने में देश की सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक, तकनीकी और निवेश विशेषज्ञता की भागीदारी आवश्यक है। इसके साथ ही, इस बात पर भी बल दिया गया कि इस तरह की भागीदारी को पारदर्शी संस्थागत सुरक्षा उपायों द्वारा संचालित किया जाना चाहिए, जो जनता के विश्वास को बनाए रखें। इसलिए, आरडीआई कोष  को जानकारी का खुलासा करने, हितों के टकराव की स्थिति में खुद को अलग करने, सामूहिक फ़ैसला लेने और स्वतंत्र मूल्यांकन जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य सिद्धांतों के आधार पर तैयार किया गया है, ताकि ईमानदारी या निष्पक्षता से समझौता किए बिना विशेषज्ञता का लाभ उठाया जा सके।

जवाबदेह शासन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए, सरकार ने कहा कि आरडीआई कोष के तहत सहायता दिए जाने वाली प्रत्येक परियोजना का चयन एक पारदर्शी, नियम-आधारित और योग्यता-आधारित प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है, जिसे भारत के अनुसंधान और नवाचार इकोसिस्टम को आगे बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। सरकार ने इस बात को पुनः रेखांकित किया कि हितों के खुलासे, ज़रूरी होने पर खुद को प्रक्रिया से अलग करने, स्वतंत्र विशेषज्ञ मूल्यांकन और पूर्ण बहुमत से स्वीकृति से जुड़े नियम एक मज़बूत संस्थागत ढांचा बनाते हैं। यह ढांचा सरकारी धन की ईमानदारी से रक्षा करता है और साथ ही भारत को वैश्विक गहन-प्रौद्योगिकी नवाचार महाशक्ति बनाने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ाता है।

****

पीके/केसी/एसके


(रिलीज़ आईडी: 2296137) आगंतुक पटल : 59
इस विज्ञप्ति को इन भाषाओं में पढ़ें: English , Urdu , Tamil