PIB Backgrounder
नक्सल-मुक्त भारत
एकीकृत रणनीतियों से वामपंथी उग्रवाद पर निर्णायक विजय
प्रविष्टि तिथि:
01 AUG 2026 11:28AM by PIB Delhi
| भारत ने वामपंथी उग्रवाद से लगभग पूरी तरह मुक्त होने की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। अब देश का कोई भी जिला वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित नहीं है। यह परिवर्तन एक बहुआयामी और समन्वित रणनीति का परिणाम है, जिसमें सुरक्षा अभियान, बुनियादी ढांचे का विस्तार, आत्मसमर्पण करने वाले उग्रवादियों का पुनर्वास, आदिवासी कल्याण और सुशासन को समान |
शांति व सुरक्षा के नए युग का शुभारंभ
लगभग छह दशकों तक भारत वामपंथी उग्रवाद की चुनौती से जूझता रहा। यह केवल एक सुरक्षा समस्या नहीं थी, बल्कि लाखों आदिवासी परिवारों और उन गांवों के लिए रोज़मर्रा की कठोर वास्तविकता थी, जो लंबे समय तक सड़कों, स्कूलों व समावेशी विकास के अवसरों से वंचित रहे। लगातार होने वाली हिंसा ने इन क्षेत्रों में जीवन को अनिश्चितता और भय से घेर रखा था।
31 मार्च 2026 को इस स्थिति में एक ऐतिहासिक बदलाव आया और भारत की आंतरिक सुरक्षा की यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव हासिल हुआ। देश ने नक्सलवाद के विरुद्ध निर्णायक सफलता प्राप्त की। मई 2014 में केंद्र सरकार के सत्ता में आने के समय 'रेड कॉरिडोर' देश की आंतरिक सुरक्षा के सामने मौजूद सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक था। पहले अपनाए गए उपाय काफी हद तक बिखरे हुए और घटनाओं पर आधारित थे। इनमें अक्सर समस्या की मूल वजहों को दूर करने के बजाय उसके तत्काल प्रभावों से निपटने पर अधिक जोर दिया जाता था। इसके बाद वामपंथी उग्रवाद की चुनौती से निपटने के लिए सुरक्षा, विकास, बुनियादी ढांचे, सुशासन और जनकल्याण को एक साथ जोड़ने वाली व्यापक एवं एकीकृत रणनीति अपनाई गई। इसी समन्वित दृष्टिकोण ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी बदलाव की नींव रखी।

पिछले बारह वर्षों में यह बदलाव तीन परस्पर जुड़े और एक-दूसरे को मजबूत करने वाले प्रयासों के माध्यम से आया। लोगों का विश्वास और भरोसा बहाल करने के लिए सुरक्षा अभियानों को सुदृढ़ किया गया, विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया गया, आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास के लिए व्यवस्थित तंत्र विकसित किए गए तथा प्रभावित क्षेत्रों के लोगों तक लगातार पहुंच बनाई गई।
बुनियादी ढांचे के विस्तार के तहत भौतिक व डिजिटल कनेक्टिविटी को मजबूत किया गया, दूर-दराज के क्षेत्रों तक प्रशासन की पहुंच बढ़ाई गई और दीर्घकालिक आर्थिक अवसरों का सृजन किया गया। वहीं, कल्याणकारी गतिविधियों में सम्मान, समावेशी सेवाओं की पहुंच, सांस्कृतिक समावेशन और प्रभावित समुदायों को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया। इनमें से प्रत्येक प्रयास ने दूसरे प्रयासों को और मजबूत किया। सुरक्षा ने विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया, विकास ने लोगों का विश्वास गहरा किया और विश्वास ने कल्याणकारी पहलों को गति प्रदान की। यह कोई क्रमिक प्रक्रिया नहीं थी, जिसमें एक कदम के बाद दूसरा कदम उठाया गया हो; बल्कि यह शांति, विकास एवं विश्वास को लगातार मजबूत करने वाली एक सशक्त और अविच्छिन्न कड़ी थी।
इस प्रयास का उद्देश्य संवेदनशील और दूर-दराज़ के क्षेत्रों में सरकार की निरंतर उपस्थिति के माध्यम से लोगों का विश्वास और भरोसा बहाल करना था। प्रभावी व समन्वित कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा एजेंसियों तथा सरकारी संस्थाओं के बीच तालमेल को और मजबूत किया गया। इस समग्र दृष्टिकोण ने स्थानीय समुदायों और सरकारी तंत्र के बीच लंबे समय से बनी दूरी को कम करने तथा आपसी विश्वास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वर्ष 2014 से पहले हिंसा का चरम दौर
वामपंथी उग्रवाद की शुरुआत वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी विद्रोह से हुई। यह आंदोलन माओवादी विचारधारा और सशस्त्र क्रांति के सिद्धांत से प्रेरित था। इसका मूल विचार हिंसक क्रांति के माध्यम से सत्ता हासिल करना था। समय के साथ वामपंथी उग्रवाद का विस्तार कई क्षेत्रों में हुआ। उग्रवादी संगठनों ने हथियारों और संसाधनों के लिए सरकारी प्रतिष्ठानों तथा पुलिस शस्त्रागारों को भी निशाना बनाया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, नक्सलियों के लगभग 92 प्रतिशत हथियार पुलिस शस्त्रागारों से लूटे गए थे। वर्ष 2004 में कई उग्रवादी संगठनों के भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) में विलय के बाद यह संगठन और अधिक संगठित एवं प्रभावशाली हुआ। इसके परिणामस्वरूप वामपंथी उग्रवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बन गया।

साल 2004 से 2014 का दशक वामपंथी उग्रवाद के इतिहास में सबसे हिंसक दशकों में से एक था। हिंसा 2010 में अपने चरम पर थी, जब एक ही साल में 1,936 घटनाएं हुईं और 720 नागरिकों की मौत हुई। पूरे दशक में हिंसा की 17,542 घटनाएं हुईं, जिनमें सुरक्षा बलों के 1,913 जवान और 5,019 नागरिक मारे गए।
कोई एक जैसी राष्ट्रीय नीति नहीं थी। राज्य सरकारें अलग-अलग काम करती थीं। फिर भी, 2009 में सरकार ने सार्वजनिक रूप से माना कि नक्सलवाद भारत के सामने सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती है, जिसका दायरा कश्मीर और पूर्वोत्तर से भी कहीं ज़्यादा बड़ा था।
नीति में बदलाव: बिखरी प्रतिक्रिया से एकीकृत रणनीति की ओर
वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना को मंजूरी मिलने के साथ वर्ष 2015 में एक निर्णायक कदम उठाया गया। इसके तहत पहले अपनाए जाने वाले कामचलाऊ और बिखरे हुए दृष्टिकोण की जगह एक व्यवस्थित, समन्वित और संपूर्ण सरकारी तंत्र को शामिल करने वाली रणनीति अपनाई गई। इस रणनीति के तहत केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) की तैनाती, विशेष प्रशिक्षण और सुरक्षा अभियानों को मजबूत करने के साथ-साथ वामपंथी उग्रवाद के सामाजिक-आर्थिक कारणों पर भी ध्यान दिया गया। इसके लिए सुरक्षा संबंधी व्यय, विशेष बुनियादी ढांचा योजना और विशेष केंद्रीय सहायता (एससीए) जैसी योजनाओं के माध्यम से आवश्यक वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए गए। 2017 में विशेष केंद्रीय सहायता योजना की शुरुआत के बाद से अब तक लगभग 4,289.20 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। इन गतिविधियों ने सुरक्षा उपायों के साथ-साथ विकास और जनकल्याण को गति देकर वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी बदलाव की नींव मजबूत की।
विशेष बुनियादी ढांचा योजना (एसआईएस) के तहत वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों में विशेष बलों, विशेष खुफिया शाखाओं और जिला पुलिस ढांचे को मजबूत करने तथा सुदृढ़ पुलिस थानों के निर्माण के लिए 1,761 करोड़ रुपये की परियोजनाएं मंजूर की गई हैं।
वर्ष 2014–15 से अब तक सुरक्षा संबंधी व्यय (एसआरई) योजना के तहत 3,805.04 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। इसका उद्देश्य सुरक्षा बलों की परिचालन आवश्यकताओं को पूरा करना, उनकी क्षमताओं व प्रशिक्षण व्यवस्था को मजबूत करना, आत्मसमर्पण करने वाले वामपंथी उग्रवादी कैडरों के पुनर्वास में सहायता करना तथा शहीद सुरक्षा कर्मियों और हिंसा में मारे गए नागरिकों के परिवारों को मुआवजा प्रदान करना है।
पहली बार, भारत ने वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए बातचीत, सुरक्षा और समन्वय पर आधारित एक व्यवस्थित और व्यापक दृष्टिकोण अपनाया। गृह मंत्रालय के तहत अधिक केंद्रीकृत एवं समन्वित ढांचे के माध्यम से सरकारी प्रयासों को आगे बढ़ाया गया, जिससे नीति के प्रभावी क्रियान्वयन, विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल और प्रभावित क्षेत्रों में कार्रवाई की गति को मजबूत किया जा सका।

भारत को नक्सलवाद के भय और हिंसा से मुक्त करने का लक्ष्य केंद्रित योजना, प्रभावी रणनीति और मजबूत आपसी समन्वय के माध्यम से हासिल किया गया। 24 अगस्त 2024 को भारत सरकार ने 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया था। सुरक्षा अभियानों में तेजी लाने, विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने, बुनियादी ढांचे का विस्तार करने और विकास कार्यों को गति देने के लिए किए गए समन्वित प्रयासों के परिणामस्वरूप यह लक्ष्य निर्धारित समय-सीमा के भीतर हासिल कर लिया गया। यह उपलब्धि सुरक्षा और विकास को साथ लेकर चलने वाली एकीकृत रणनीति की प्रभावशीलता को दर्शाती है।
सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना
सरकार ने बुनियादी ढांचे के विस्तार, विशेष बलों और बेहतर ऑपरेशनल तालमेल के ज़रिए नक्सल-प्रभावित इलाकों में सुरक्षा की कमी को व्यवस्थित रूप से दूर किया। इस एकीकृत दृष्टिकोण ने 'रेड कॉरिडोर' में राज्य की मौजूदगी, आवाजाही, खुफिया जानकारी साझा करने और उग्रवाद-विरोधी क्षमताओं को बढ़ाया।

वर्ष 2014 से पहले देश में केवल 66 सुदृढ़ पुलिस थाने थे, जबकि अब ऐसे 663 पुलिस थाने स्थापित किए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त, पिछले सात वर्षों में सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने, क्षेत्रों पर बेहतर नियंत्रण स्थापित करने और दूर-दराज़ के वन क्षेत्रों में लगातार अभियान चलाने के लिए 408 नए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) सुरक्षा शिविर बनाए गए हैं। दुर्गम क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की तेज़ी से तैनाती व आवाजाही को सुगम बनाने के लिए 68 रात्रि-अवतरण हेलीपैड भी विकसित किए गए हैं। इनसे सैनिकों की आवाजाही, घायलों को सुरक्षित निकालने और निगरानी अभियानों में महत्वपूर्ण सहायता मिली है। सुरक्षा बलों की सुरक्षा और परिचालन क्षमता बढ़ाने के लिए 400 बुलेटप्रूफ एवं विस्फोटरोधी वाहन उपलब्ध कराए गए हैं। साथ ही, जवानों के कल्याण और बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के लिए 5 अस्पताल भी स्थापित किए गए हैं। इन उपायों ने वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा तंत्र को अधिक मजबूत, सक्षम और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
विशेष बलों का एकीकरण: कोबरा, डीआरजी, एसटीएफ और ग्रेहाउंड्स
एक बहुस्तरीय और समन्वित सुरक्षा तंत्र विकसित किया गया, जिसमें कोबरा (कमांडो बटालियन फॉर रिज़ॉल्यूट एक्शन), केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) तथा राज्यों की विशेषीकृत इकाइयों, जैसे झारखंड जगुआर, छत्तीसगढ़ पुलिस की विशेष इकाइयों और आंध्र प्रदेश के ग्रेहाउंड्स, को एक साथ जोड़ा गया। डीआरजी, एसटीएफ, सीआरपीएफ और कोबरा के बीच संयुक्त प्रशिक्षण और परिचालन समन्वय को बढ़ावा दिया गया। इससे एक ऐसी एकीकृत और तालमेल के साथ काम करने वाली सुरक्षा शक्ति विकसित हुई, जिसमें जिम्मेदारियों और कमान की स्पष्ट व्यवस्था थी। इस समन्वित मॉडल ने वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा अभियानों की प्रभावशीलता और परिचालन क्षमता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रौद्योगिकी: निर्णायक बदलाव की ताकत
वर्ष 2014 के बाद, केंद्र सरकार ने आधुनिक प्रौद्योगिकी के व्यापक उपयोग के माध्यम से नक्सल-विरोधी अभियानों की प्रभावशीलता को नई दिशा दी। मानवरहित हवाई वाहन (यूएवी), ड्रोन, उपग्रह चित्रों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डेटा विश्लेषण की मदद से वास्तविक समय में निगरानी व अधिक सटीक क्षेत्रीय निगरानी संभव हुई। इसके साथ ही उन्नत लोकेशन-ट्रैकिंग प्रणाली, वैज्ञानिक कॉल-लॉग विश्लेषण, मोबाइल डेटा विश्लेषण और सोशल मीडिया निगरानी जैसी तकनीकी प्रणालियों को भी अपनाया गया। गृह मंत्रालय ने इन तकनीकी साधनों से प्राप्त सूचनाओं का उपयोग गतिविधियों पर नजर रखने, संचार के पैटर्न का विश्लेषण करने और सुरक्षा अभियानों की परिचालन क्षमता को बेहतर बनाने के लिए किया। प्रौद्योगिकी के इस एकीकृत उपयोग ने सुरक्षा बलों को बेहतर सूचना, तेज़ निर्णय लेने की क्षमता और अधिक सटीक अभियान संचालन में सहायता दी, जिससे नक्सल-विरोधी अभियानों की प्रभावशीलता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
पता लगाने, निशाना साधने और समाप्त करने के लिए महत्वपूर्ण अभियान
सरकार की "पता लगाओ, निशाना साधो और निष्प्रभावी करो" नीति के प्रभावी परिणाम सामने आए। लगातार चलाए गए सुरक्षा अभियानों और खुफिया जानकारी पर आधारित लक्षित रणनीतियों के माध्यम से सुरक्षा बलों ने उन क्षेत्रों में दोबारा प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया, जो तीन दशकों से अधिक समय तक वामपंथी उग्रवाद के प्रभाव में रहे थे।

ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट, ऑपरेशन ऑक्टोपस, ऑपरेशन डबल बुल, ऑपरेशन थंडरस्टॉर्म, ऑपरेशन भीमबर्ग और ऑपरेशन चक्रबंधा जैसे कई समन्वित सुरक्षा अभियानों ने वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में माओवादी नेटवर्क को काफी कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट एक बड़ी सफलता के रूप में सामने आया। इस अभियान ने माओवादियों के एक महत्वपूर्ण गढ़ को ध्वस्त किया, 30 से अधिक माओवादियों को मार गिराया तथा गिरफ्तारियों और आत्मसमर्पण के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। ऑपरेशन डबल बुल के परिणामस्वरूप गुमला, लोहरदगा एवं लातेहार जिलों में नक्सली गतिविधियों पर प्रभावी रूप से अंकुश लगा और इन क्षेत्रों को नक्सलवाद से मुक्त बनाने में महत्वपूर्ण सफलता मिली। इन सभी अभियानों ने मिलकर लंबे समय से प्रभावित क्षेत्रों में सरकारी उपस्थिति व प्रशासनिक पहुंच बहाल करने, उग्रवादी प्रभाव को कम करने तथा सुरक्षा, सुशासन और विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

सहायता तंत्र पर प्रभावी प्रहार
केंद्र सरकार ने सभी संबंधित एजेंसियों को एक साथ जोड़कर समग्र और समन्वित दृष्टिकोण अपनाया। इसके तहत केवल सशस्त्र उग्रवादियों को निशाना बनाने के बजाय, उन्हें सहायता और संसाधन उपलब्ध कराने वाले पूरे तंत्र को कमजोर करने पर भी ध्यान दिया गया। विकास के क्षेत्र में इसका अर्थ था संपूर्ण सरकारी तंत्र का समन्वित प्रयास, जबकि सुरक्षा अभियानों में विभिन्न एजेंसियों के बीच साझा रणनीति और बेहतर तालमेल पर जोर दिया गया।
नक्सली वित्तपोषण के नेटवर्क को तोड़ने के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के भीतर एक विशेष प्रकोष्ठ स्थापित किया गया। दिसंबर 2025 तक एनआईए ने 40 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्तियां जब्त की थीं। वहीं, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने लगभग 12 करोड़ रुपये की संपत्तियां कुर्क कीं, जबकि राज्य एजेंसियों ने अतिरिक्त 40 करोड़ रुपये की संपत्तियां जब्त कीं। दिसंबर 2025 तक वामपंथी उग्रवाद से जुड़े 111 मामलों की जांच की गई और 98 मामलों में आरोप-पत्र दाखिल किए गए। जून 2026 तक एनआईए के मामलों की कुल संख्या बढ़कर 112 हो गई और 100 मामलों में आरोप-पत्र दाखिल किए जा चुके थे। इन कार्रवाईयों ने नक्सली वित्तीय नेटवर्क और सहायता तंत्र पर प्रभावी दबाव बनाया तथा उग्रवादी गतिविधियों के लिए उपलब्ध संसाधनों को सीमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आत्मसमर्पण के लिए सम्मानजनक पुनर्वास का मार्ग
सरकार ने कड़ी सुरक्षा कार्रवाई के साथ-साथ पुनर्वास और मुख्यधारा में वापसी पर भी विशेष ध्यान दिया है। इसका स्पष्ट संदेश है—जो लोग हिंसा का रास्ता छोड़कर हथियार डालते हैं, उनका सम्मान के साथ स्वागत किया जाएगा और उन्हें नई शुरुआत का अवसर दिया जाएगा। आत्मसमर्पण करने वाले वरिष्ठ स्तर के कैडरों को तत्काल 5 लाख रुपये और अन्य कैडरों को 2.5 लाख रुपये की सहायता राशि दी जाती है। इसके अतिरिक्त, उन्हें 36 महीनों तक हर महीने 10,000 रुपये का वजीफा भी प्रदान किया जाता है। आत्मसमर्पण करने पर 50,000 रुपये की अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि दी जाती है। यदि पूरा समूह सामूहिक रूप से आत्मसमर्पण करता है, तो यह राशि दोगुनी हो जाती है। इसके अलावा, हथियार और गोला-बारूद जमा करने पर अलग से निर्धारित मुआवजा भी दिया जाता है। इन प्रोत्साहनों का उद्देश्य हिंसा छोड़ने वाले लोगों को सुरक्षित और सम्मानजनक पुनर्वास का अवसर प्रदान करना तथा उन्हें शांति, विकास और समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है।

पुनर्वास नीति के प्रभाव से आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। अकेले 2025 में 2,337 नक्सलियों ने हथियार डाले, जबकि 2024 से मार्च 2026 के बीच कुल 3,927 कैडरों ने आत्मसमर्पण किया। इन प्रयासों को नागरिक समाज के सदस्यों, पत्रकारों, सामुदायिक नेताओं और जनप्रतिनिधियों के सहयोग से और मजबूती मिली। उन्होंने पुनर्वास उपायों के प्रति विश्वास पैदा करने, आत्मसमर्पण करने वालों को सुरक्षित भविष्य का भरोसा देने और प्रभावित लोगों को हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हाल की घटनाओं ने लगातार सुरक्षा अभियानों और पुनर्वास के समन्वित दृष्टिकोण की प्रभावशीलता को एक बार फिर साबित किया है। 28 जुलाई 2026 को 'नई दिशा, नई पहल' नक्सल-विरोधी अभियान के तहत कोल्हान और लातेहार क्षेत्रों के 16 सक्रिय माओवादियों ने रांची में आत्मसमर्पण किया। आत्मसमर्पण करने वालों में एक क्षेत्रीय कमांडर, तीन जोनल कमांडर, तीन उप-जोनल कमांडर, छह एरिया कमांडर और तीन कैडर स्तर के सदस्य शामिल थे। उन्होंने 11 अत्याधुनिक हथियारों, 38 मैगजीन और 1,562 राउंड गोला-बारूद के साथ आत्मसमर्पण किया। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि सुरक्षा अभियानों, आत्मसमर्पण नीति और पुनर्वास के समन्वित प्रयास नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा को कम करने के साथ-साथ उग्रवादियों को मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रोत्साहित करने में प्रभावी साबित हो रहे हैं।
इसके अलावा, 29 जुलाई 2026 को कुल 49 लाख रुपये के इनामी आठ और माओवादियों ने बीजापुर पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया, जो वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान में एक और महत्वपूर्ण सफलता रही। इसी दिन, सुरक्षा बलों ने धनबाद-गिरिडीह सीमा क्षेत्र से एक प्रमुख माओवादी नेता और पोलित ब्यूरो सदस्य को गिरफ्तार किया, जिस पर 1 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। खुफिया जानकारी के आधार पर चलाए गए इस संयुक्त अभियान में 15 लाख रुपये के इनामी एक क्षेत्रीय समिति सदस्य, एक माओवादी कैडर और दो ग्रामीणों को भी गिरफ्तार किया गया।
सुरक्षा से जुड़े ये प्रयास केवल शांति और स्थिरता बहाल करने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने दीर्घकालिक विकास की मजबूत नींव भी तैयार की। प्रत्येक सुदृढ़ पुलिस थाना, प्रत्येक केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) शिविर और आत्मसमर्पण करने वाले प्रत्येक कैडर के पुनर्वास ने उन क्षेत्रों तक प्रशासन की पहुंच बढ़ाने में मदद की, जहां पहले पहुंचना कठिन था। बेहतर सुरक्षा व्यवस्था ने आदिवासी समुदायों तक सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं, बैंकिंग सुविधाएं और डिजिटल कनेक्टिविटी पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त किया। इस प्रकार, सुरक्षा और स्थिरता के साथ लोगों का विश्वास बहाल हुआ, जिसने आगे चलकर बुनियादी ढांचे के विस्तार और विकास की गति तेज करने के लिए मजबूत आधार तैयार किया।
एक नए भविष्य की नींव: बुनियादी ढांचा और कनेक्टिविटी
नक्सलवाद को समाप्त करने का संकल्प केवल उग्रवादियों को हटाने तक सीमित नहीं था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना भी था कि बड़े शहरों में उपलब्ध सुविधाएं दूर-दराज़ के गरीब और आदिवासी समुदायों तक भी पहुंचें, ताकि उनके बच्चों के लिए बेहतर और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण हो सके। इस दिशा में दूरस्थ क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, कनेक्टिविटी और प्रशासनिक पहुंच को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया। इसके परिणामस्वरूप आवश्यक सेवाओं, सड़कों और डिजिटल नेटवर्क तक लोगों की पहुंच बेहतर हुई। इन प्रयासों ने उन क्षेत्रों को, जो लंबे समय तक विकास की मुख्यधारा से दूर रहे थे, मुख्यधारा के विकास, बेहतर प्रशासन व आवश्यक सेवाओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार, सुरक्षा के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं और अवसरों का विस्तार भी नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी बदलाव का आधार बना।
सड़क कनेक्टिविटी: वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सड़क संपर्क को मजबूत करने के लिए दो प्रमुख योजनाओं—'रोड रिक्वायरमेंट प्लान' (आरआरपी) और 'वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों के लिए सड़क कनेक्टिविटी परियोजना' (आरसीपीएलडब्ल्यूईए)—के तहत अब तक कुल 15,189 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया जा चुका है।
डिजिटल और मोबाइल कनेक्टिविटी: आधुनिक समाज में दूरसंचार कनेक्टिविटी विकास और प्रगति की एक महत्वपूर्ण आधारशिला बन गई है। ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के लिए इसका महत्व और भी अधिक है, क्योंकि यह सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देने, डिजिटल विभाजन को कम करने, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने तथा आर्थिक अवसरों का विस्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी उद्देश्य से 9,497 मोबाइल टावर स्थापित किए गए हैं। वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में अब 96 प्रतिशत गांवों (46,592 में से 44,728 गांवों) तक मोबाइल कनेक्टिविटी पहुंच चुकी है। बेहतर मोबाइल नेटवर्क ने इन क्षेत्रों में शिक्षा, ऑनलाइन सरकारी सेवाओं की उपलब्धता, डिजिटल संचार और आर्थिक गतिविधियों के नए अवसर खोले हैं। इससे दूर-दराज़ के समुदायों को देश की डिजिटल और आर्थिक मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण मदद मिली है।
वित्तीय समावेशन: केंद्र सरकार ने पिछले बारह वर्षों में वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में वित्तीय समावेशन को व्यापक रूप से बढ़ावा दिया है। अप्रैल 2015 से मार्च 2026 के बीच इन क्षेत्रों में 1,804 नई बैंक शाखाएं खोली गईं, 1,321 एटीएम स्थापित किए गए, 74,720 बैंकिंग प्रतिनिधि नियुक्त किए गए और 6,025 डाकघर खोले गए।
शिक्षा और कौशल विकास: पिछले बारह वर्षों में भारत सरकार ने वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में 259 एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों (ईएमआरएस) को मंजूरी दी है, जिनमें से 179 विद्यालय अब संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा, इन क्षेत्रों में 47 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) और 49 कौशल विकास केंद्र (एसडीसी) स्थापित किए गए हैं। इन पहलों पर लगभग 800 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। इन प्रयासों से आदिवासी युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और रोजगार के अवसरों का विस्तार हुआ है। इससे दूर-दराज के समुदायों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिली है। अब तक 90,000 से अधिक युवाओं और महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण प्रदान किया जा चुका है।
जनजातीय युवा आदान-प्रदान कार्यक्रम (टीवाईईपी) के तहत वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों के आदिवासी युवाओं को देश के विभिन्न हिस्सों की परिचयात्मक यात्राओं पर ले जाया जाता है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक जागरूकता और विकास के प्रति समझ को बढ़ावा देना है। 2014 से अब तक कुल 37,655 आदिवासी युवा इस कार्यक्रम में भाग ले चुके हैं। इन यात्राओं के माध्यम से युवाओं को देश की विविधता, विकास एवं विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्ध अवसरों को करीब से जानने का अवसर मिलता है, जिससे उनका राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ाव और आत्मविश्वास मजबूत होता है।
सिविक एक्शन प्रोग्राम: सिविक एक्शन प्रोग्राम के तहत भारत सरकार केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) को उनके परिचालन क्षेत्रों में जनकल्याणकारी गतिविधियां संचालित करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है। इन गतिविधियों में चिकित्सा शिविर आयोजित करना, खेल प्रतियोगिताएं कराना और स्थानीय समुदायों के बीच आवश्यक वस्तुओं का वितरण शामिल है।
2014 से अब तक इस कार्यक्रम के तहत 221.88 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। इस वित्तीय सहायता ने सुरक्षा बलों और स्थानीय समुदायों के बीच विश्वास मजबूत करने, संवाद बढ़ाने और आपसी दूरी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

गांवों को जोड़ने वाली सड़कें, संचार एवं संपर्क को बेहतर बनाने वाले मोबाइल टावर, आर्थिक भागीदारी को बढ़ावा देने वाली बैंकिंग सुविधाएं व आदिवासी युवाओं के लिए नए अवसर खोलने वाले विद्यालय—इन सभी बुनियादी ढांचा पहलों का सीधा और सकारात्मक प्रभाव जमीनी स्तर पर लोगों के जीवन पर दिखाई दिया है। इन प्रयासों ने एक ऐसा भौतिक एवं संस्थागत आधार तैयार किया, जिस पर वास्तविक कल्याण, सम्मान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण को प्रभावी रूप से आगे बढ़ाया जा सका। वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में लगातार बुनियादी ढांचे के विकास ने क्षेत्रीय एकीकरण और सामाजिक जुड़ाव को मजबूत किया है। बेहतर कनेक्टिविटी से लोगों की आवाजाही आसान हुई और आर्थिक गतिविधियों तथा रोजगार के अवसरों का विस्तार हुआ। वहीं, दीर्घकालिक निवेश ने ऐसे विकास की नींव रखी है, जो टिकाऊ, समावेशी व समाज के हर वर्ग तक पहुंचने वाला हो।
क्या आप जानते हैं?
वर्तमान में भारत के 37 जिलों को लिगेसी और थ्रस्ट जिलों के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जहां सुरक्षा एवं विकास से जुड़ी सहायता लगातार जारी है। इसके अलावा, एक जिले को चिंता वाले जिले श्रेणी में रखा गया है, ताकि वहां निरंतर निगरानी बनाए रखी जा सके और अब तक हासिल की गई सफलताओं को और मजबूत किया जा सके।
लोगों का कल्याण और सम्मान
इस रणनीति का अंतिम एवं महत्वपूर्ण पहलू सम्मान, समावेशिता और समानता के साथ कल्याणकारी सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करना है। इसके तहत हाशिए पर रह रहे समुदायों तक सरकारी सेवाओं और योजनाओं की प्रभावी पहुंच को मजबूत किया गया है। इस समावेशी दृष्टिकोण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर नागरिक को आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं एवं कल्याणकारी योजनाओं तक समान और सम्मानजनक पहुंच मिले।
आदिवासी आजीविका का सशक्तिकरण
आदिवासी कल्याण पर निरंतर ध्यान ने वामपंथी उग्रवाद के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे विकास का दायरा बढ़ा, अवसरों तक पहुंच बेहतर हुई और आदिवासी समुदायों तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच संबंध मजबूत हुए। सुरक्षा उपायों के साथ-साथ सरकार ने यह सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया कि बेहतर शिक्षा, बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य सेवाओं, आवास और आजीविका के अवसरों के माध्यम से दूर-दराज के आदिवासी क्षेत्रों तक विकास का लाभ पहुंचे।
आत्मसमर्पण करने वाले कैडरों के पुनर्वास ढांचे ने उन्हें समाज की मुख्यधारा में लौटने और सम्मानजनक जीवन शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया है। इसके तहत कौशल विकास, आजीविका सहायता, प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से आवास सहायता और स्वरोजगार के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई। जिन गांवों ने नक्सली प्रभाव से मुक्त होकर लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित पंचायतों की स्थापना की, उन्हें विकास कार्यों के लिए विशेष अनुदान भी प्रदान किए गए। इसके अलावा, आत्मसमर्पण करने वाले कैडरों के बच्चों को कक्षा 12वीं तक मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराई गई। इन पहलों ने न केवल प्रभावित परिवारों को सुरक्षित व बेहतर भविष्य का अवसर दिया, बल्कि आत्मनिर्भरता, सामाजिक पुनर्स्थापन और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास को भी मजबूत किया।

कई महत्वपूर्ण पहलों ने इस बदलाव को गति देने में अहम भूमिका निभाई। राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना ने सुरक्षा, विकास और समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा को एकीकृत दृष्टिकोण के तहत जोड़ा। 'विशेष केंद्रीय सहायता' के माध्यम से वामपंथी उग्रवाद से सबसे अधिक प्रभावित जिलों में आवश्यक सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के विकास को बढ़ावा दिया गया। वहीं, 'आकांक्षी जिला कार्यक्रम' ने स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्तीय समावेशन और कनेक्टिविटी जैसे प्रमुख क्षेत्रों में बेहतर परिणाम हासिल करने के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं और विकास पहलों को एक साथ जोड़ा। इन समन्वित प्रयासों ने दूर-दराज़ और वंचित क्षेत्रों में सेवाओं की पहुंच बढ़ाने, विकास की गति तेज करने और लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने में योगदान दिया।
शिक्षा बदलाव के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभरी है। एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों (ईएमआरएस) को बढ़ावा और अतिरिक्त सहायता मिलने से अनुसूचित जनजाति के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा तक पहुंच का विस्तार हुआ है, जिनमें वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) प्रभावित क्षेत्रों के बच्चे भी शामिल हैं। वहीं, प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान (पीएम-जनमन) ने विशेष रूप से विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) के विकास पर ध्यान केंद्रित किया। इसके तहत आवास, सुरक्षित पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और आवश्यक कनेक्टिविटी जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच बेहतर बनाने के प्रयास किए गए हैं। इन पहलों ने लंबे समय से विकास की मुख्यधारा से दूर रहे समुदायों तक बुनियादी सेवाएं और अवसर पहुंचाने, उनके जीवन स्तर में सुधार करने तथा उन्हें समावेशी और सतत विकास की मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
'धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान' की शुरुआत ने आदिवासी गांवों में बुनियादी सुविधाओं की कमी को दूर करने और विकास की गति तेज करने के प्रयासों को और मजबूती दी है। कई मंत्रालयों के समन्वित प्रयासों से संचालित यह अभियान आदिवासी समुदायों के जीवन स्तर में सुधार, आर्थिक अवसरों का विस्तार और बुनियादी सेवाओं तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करने पर केंद्रित है। इसका व्यापक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आदिवासी समुदाय भारत की विकास यात्रा में समान भागीदार बनें और उन्हें विकास के अवसरों का पूरा लाभ मिले।
केस स्टडी: छत्तीसगढ़ का नक्सलवाद से विकास की ओर परिवर्तन
छत्तीसगढ़ का बस्तर कई दशकों तक देश के सबसे अधिक नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों में शामिल रहा। खराब कनेक्टिविटी, सीमित प्रशासनिक पहुंच और चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों ने उग्रवादी समूहों को यहां अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर दिया। पिछले 12 वर्षों में सुरक्षा, विकास और आदिवासी समुदायों की भागीदारी को साथ लेकर अपनाई गई समन्वित रणनीति ने क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव लाने में मदद की है। 2017 में बस्तरिया बटालियन का गठन इस बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। इस बटालियन में 1,143 जवानों की भर्ती की गई, जिनमें बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा के लगभग 400 स्थानीय युवा शामिल थे। स्थानीय युवाओं की भागीदारी से खुफिया तंत्र मजबूत हुआ, सुरक्षा बलों और आदिवासी समुदायों के बीच विश्वास बढ़ा तथा सरकारी संस्थाओं के प्रति लोगों का भरोसा बहाल करने में मदद मिली। इस पहल ने स्थानीय युवाओं को रोजगार और सेवा का अवसर देने के साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था में समुदाय की भागीदारी को भी मजबूत किया।

सुरक्षा स्थिति में सुधार के साथ ही बस्तर क्षेत्र में विकास कार्यों ने भी गति पकड़ी। बस्तर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा, नारायणपुर, कांकेर और कोंडागांव जिलों को मिलाकर क्षेत्र में 3,240 किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण किया गया। इसके अलावा, डिजिटल कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए 889 मोबाइल टावर स्थापित किए गए। बेहतर सड़क और मोबाइल कनेक्टिविटी से पहले अलग-थलग रहे गांव अब बाजारों, स्कूलों, स्वास्थ्य सुविधाओं, बैंकिंग सेवाओं और सरकारी योजनाओं से बेहतर तरीके से जुड़ सके हैं। इससे स्थानीय लोगों की आवाजाही आसान हुई और शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार तथा आर्थिक गतिविधियों तक उनकी पहुंच बढ़ी।
सरकार ने पुनर्वास और समाज की मुख्यधारा में वापसी पर भी विशेष ध्यान दिया। हथियार छोड़ने वाले लगभग 3,000 कैडरों के लिए एक विशेष योजना तैयार की गई, जिसके तहत कौशल विकास, शिक्षा और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए शुरुआती तौर पर 20 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। इस पहल का उद्देश्य हिंसा के चक्र को समाप्त कर आत्मसमर्पण करने वाले लोगों को सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन की ओर बढ़ने का अवसर देना तथा क्षेत्र में दीर्घकालिक शांति एवं आर्थिक सशक्तीकरण का आधार तैयार करना था।
मई 2026 में, सुरक्षा के क्षेत्र में मिली सफलताओं को स्थायी विकास में बदलने के उद्देश्य से शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा पहल शुरू की गई। इसके तहत सीएपीएफ के लगभग 70 शिविरों को सेवा केंद्रों में बदला जा रहा है, जहां लोगों को सरकारी योजनाओं, स्वास्थ्य सेवाओं, बैंकिंग सुविधाओं, कृषि सहायता, कौशल विकास और अन्य नागरिक सेवाओं का लाभ उपलब्ध कराया जाएगा। वीर गुंडाधुर की जन्मस्थली नेतानर में कॉमन सर्विस सेंटर की स्थापना उन क्षेत्रों में प्रशासनिक पहुंच और सार्वजनिक सेवाओं की वापसी का प्रतीक है, जो कभी उग्रवाद से प्रभावित रहे थे। यह पहल सुरक्षा ढांचे को जनसेवा और विकास के केंद्रों में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
बुनियादी ढांचे व कल्याणकारी पहलों के साथ-साथ 'बस्तर पांडुम' और 'बस्तर ओलंपिक्स' जैसी सांस्कृतिक और खेल पहलों ने सामुदायिक भागीदारी तथा आदिवासी पहचान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन मंचों ने लाखों आदिवासी युवाओं और कलाकारों को एक साथ लाकर सामाजिक मेलजोल बढ़ाया तथा समुदायों के बीच जुड़ाव, प्रतिभा प्रदर्शन और नेतृत्व के नए अवसर पैदा किए हैं।

बस्तर में आया बदलाव यह दर्शाता है कि स्थायी शांति केवल सुरक्षा उपायों से नहीं, बल्कि विकास, कल्याणकारी योजनाओं की प्रभावी पहुंच और समुदायों के सशक्तीकरण के साथ मिलकर हासिल की जा सकती है। छत्तीसगढ़ का अनुभव यह दिखाता है कि सरकार की निरंतर मौजूदगी, स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी और समावेशी विकास के माध्यम से लंबे समय से संघर्ष से प्रभावित क्षेत्रों को शांति, प्रगति एवं समृद्धि के मार्ग पर लाया जा सकता है। यह मॉडल सुरक्षा एवं विकास के बीच संतुलन बनाते हुए स्थायी और समावेशी बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है।
एक दशक के बदलाव के परिणाम
वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित ज़िलों की संख्या 2014 में 126 थी, जो मार्च-अप्रैल 2026 तक घटकर शून्य हो गई। इसके अलावा, सबसे अधिक प्रभावित जिलों की संख्या भी 35 से घटकर शून्य हो गई है, जिससे सुरक्षा के हालात में एक निर्णायक बदलाव आया है।

इस बदलाव का प्रभाव हिंसा के सभी प्रमुख मानकों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 2010 नक्सलवाद के इतिहास के सबसे हिंसक वर्षों में से एक था, जब नक्सलवाद से जुड़ी 1,936 घटनाएं हुईं और 1,005 लोगों की जान गई। इसके बाद चलाए गए सुरक्षा अभियानों, विकास कार्यों और बेहतर प्रशासन ने वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) के नेटवर्क को काफी कमजोर किया। नक्सलवाद से जुड़ी घटनाओं की संख्या 2014 में 870 से घटकर 2026 में (29 जुलाई 2026 तक) केवल 33 रह गई। इसी अवधि में मृतकों की संख्या 310 से घटकर 11 हो गई।

हिंसा में लगातार आई कमी नक्सली समूहों की घटती परिचालन क्षमता और प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा, कनेक्टिविटी तथा जनता के विश्वास की धीरे-धीरे बहाली को दर्शाती है।
यह रुझान सुरक्षा स्थिति में उल्लेखनीय सुधार को दर्शाता है। जिन क्षेत्रों में पहले हिंसा की घटनाएं अक्सर होती थीं, वहां अब शांति, स्थिरता और नागरिक सुरक्षा में स्पष्ट सुधार देखने को मिल रहा है।
भारत की सुरक्षा एवं विकास यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय
भारत का नक्सल-मुक्त होना देश के स्वतंत्र इतिहास में आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। यह दृढ़ नेतृत्व, निरंतर नीतिगत प्रयासों और सुरक्षा, विकास तथा पुनर्वास को एकीकृत करने वाली बहुआयामी रणनीति की प्रभावशीलता को दर्शाता है।
पिछले दशक में भारत ने वामपंथी उग्रवाद से निपटने के अपने दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण बदलाव किया है, जो केवल प्रतिक्रियात्मक रोकथाम से आगे बढ़कर उग्रवाद के सक्रिय और निर्णायक उन्मूलन की दिशा में जाता है। अब विकास और समावेश के एक नए चरण की शुरुआत हो चुकी है। नक्सल-मुक्त भारत का लक्ष्य हासिल करना केवल एक उग्रवाद के अध्याय का अंत नहीं है, बल्कि देश के सबसे वंचित व कमजोर समुदायों के लिए शांति, समावेश, सम्मान और प्रगति के एक नए अध्याय की शुरुआत है।
संदर्भ:
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पीआईबी शोध
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पीके/केसी/एनके
(रिलीज़ आईडी: 2293235)
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