अणु ऊर्जा विभाग
संसद में प्रश्न: राष्ट्रीय परमाणु चिकित्सा विस्तार कार्यक्रम
प्रविष्टि तिथि:
29 JUL 2026 4:06PM by PIB Delhi
परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) की अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी) इकाई, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी), मुंबई में विकिरण चिकित्सा केंद्र (आरएमसी) और कोलकाता में विकिरण चिकित्सा अनुसंधान केंद्र (आरएमआरसी) में स्थित अपनी नैदानिक रोगी सेवा इकाइयों के माध्यम से कैंसर उपचार के लिए नैदानिक और चिकित्सीय सेवाएं प्रदान करके परमाणु चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान कर रहा है।
डीएई की अनुसंधान एवं विकास इकाई, वैरिएबल एनर्जी साइक्लोट्रॉन सेंटर (वीईसीसी) में, कैंसर निदान के लिए रेडियोआइसोटोप/रेडियोफार्मास्यूटिकल्स के व्यावसायिक उत्पादन हेतु 30 मेगाहर्टिलाइजर मेडिकल साइक्लोट्रॉन को संचालन किया जा रहा है। वीईसीसी की मेडिकल साइक्लोट्रॉन सुविधा में उत्पादित रेडियोआइसोटोप/रेडियोफार्मास्यूटिकल्स को नियमित रूप में विभिन्न अस्पतालों/परमाणु चिकित्सा केंद्रों को भेजा जा रहा है।
डीएई के प्रशासनिक नियंत्रण के अंतर्गत सहायता प्राप्त संस्थान टाटा मेमोरियल सेंटर (टीएमसी) ने कैंसर से लड़ाई में परमाणु प्रौद्योगिकी के प्रयोग से निम्नलिखित नैदानिक और चिकित्सीय सेवाएं स्थापित की हैं:
गामा कैमरा और उससे जुड़ी रेडियोफार्मेसी प्रयोगशाला:
यह इकाई अनेक प्रकार की कार्यात्मक इमेजिंग करने में सक्षम है, जिससे 99एमटीसी पीएसएमए (प्रोस्टेट-विशिष्ट झिल्ली एंटीजन) जैसे स्कैन के माध्यम से कैंसर के प्रभाव अर्थात स्टेज के निर्धारण में सहायता मिलती है। अन्य इमेजिंग सेवाएं, जैसे— हृदय की कार्यप्रणाली के आंकलन के लिए मल्टीगेटेड एक्विजिशन (एमलनरपए) इमेजिंग उसके मूल्यांकन में सहायक है।
पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी-कंप्यूटेड टोमोग्राफी (पीईटीसीटी) और इसकी रेडियोफार्मेसी प्रयोगशाला:
यह इकाई मुख्यत: कैंसर के प्रभाव अर्थात स्टेज के निर्धारण में उपयोगी है। सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली रेडियोधर्मी दवा 18एफ एफडीजी (फ्लोरोडीऑक्सीग्लूकोस) है, जिसका प्रयोग अधिकांश प्रकार के कैंसर के प्रभाव अर्थात स्टेज निर्धारित करने के लिए किया जाता है, जैसे— फेफड़ों के कैंसर, ग्रासनली के कैंसर, स्तन कैंसर, लिंफोमा आदि के प्रभाव का मूल्यांकन।
जीए68 डीओटीएएनओसी, जीए68 एफएपीआई - फाइब्रोब्लास्ट एक्टिवेशन प्रोटीन इनहिबिटर जैसी रेडियोधर्मी दवाइयों (सभी का निर्माण और गुणवत्ता की जांच स्थानीय स्तर पर ही की जाती है) का प्रयोग विभिन्न प्रकार के कैंसर [जैसे प्रोस्ट्रेट कैंसर, न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर, म्यूसिनस और सिग्नेट गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल (जीआई) कैंसर आदि] के प्रभाव के आंकलन के लिए किया जाता है।
उच्च खुराक वाले रेडियोन्यूक्लाइड थेरेपी वार्ड और इसकी रेडियोफार्मेसी प्रयोगशाला:
परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (एईआरबी) के दिशा निर्देशों के अनुसार 6 बिस्तरों वाले उच्च खुराक चिकित्सा वार्ड को उचित लेआउट के साथ डिजाइन किया गया है। प्रदूषक रोगी मल के उचित निपटान के लिए रेडियोधर्मी मल को अलग रखने के वास्ते विलंब/डिले टैंक का प्रावधान किया गया है।
आयोडीन-131 (आई-131) का प्रयोग थायरॉयड कैंसर के उपचार के लिए किया जाता है, जबकि ल्यूटेटियम-177 (एलयू-177) पीएसएमए और एलयू -177 डीओटीएएनओसी/DOTANOC का प्रयोग प्रोस्ट्रेट कैंसर, न्यूरोएंडोक्राइन कैंसर और अन्य सोमैटोस्टैटिन रिसेप्टर (एसएसटीआर) व्यक्त करने वाली घातक बीमारियों के इलाज में किया जा रहा है।
टीएमसी द्वारा प्रचलित चिकित्सा और स्वास्थ्य देखभाल प्रयोगों के लिए उत्पादों की खोज और उन्हें विकसित के लिए भी कार्य किया जा रहा है। प्रयोगशाला में विकसित किए जाने के बाद उसके प्रथम संस्करण के निर्माण तक इसमें परीक्षण करके गलतियों तथा कमियों का पता लगाने और फिर उनका समाधान करने पर भी काम होता है। इसके बाद इसे रोगियों पर प्रयोग करने के लिए भेजा जाता है और लगातार परीक्षण समीक्षा की जाती है और वांछित सुधार के बाद अगले संस्करण तैयार किए जाते हैं।
उदाहरण:
ट्रांस आर्टेरियल रेडियो एम्बोलाइज़ेशन के लिए 90वाई भाभस्फीयर जैसे चिकित्सा उपकरणों का विकास: भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र/विकिरण और आइसोटोप प्रौद्योगिकी बोर्ड (बीएआरसी/बीआरआईटी) और टीएमसी द्वारा परिकल्पित, विकसित, परीक्षित एवं उन्नत किया गया।
- ब्लड इर्रेडिएटर का विकास
- भाभाट्रॉन का विकास
रेडियो प्रोटेक्टर्स को बीएआरसी द्वारा विकसित किया गया है। इनका परीक्षण और ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीजीसीआई) से अनुमोदन टीएमसी द्वारा प्राप्त किया गया है।
रेडियो आइसोटोप का उत्पादन फिलहाल अनुसंधान रिएक्टरों और साइक्लोट्रॉनों के माध्यम से किया जा रहा है। रुथेनियम-106, सीज़ियम-137 और स्ट्रोंटियम-90 जैसे रेडियोआइसोटोप, जिन्हें यट्ट्रियम-90 में परिवर्तित किया जाता है और ये उच्च-स्तरीय तरल अपशिष्ट (एकएलएलडब्लू) के पुनर्संस्करण द्वारा प्राप्त किए जाते हैं। चिकित्सा आइसोटोप के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के लिए समर्पित आइसोटोप उत्पादन रिएक्टर (आईपीआर) का निर्माण किया जा रहा है। इस रिएक्टर को विशाखापत्तनम स्थित बीएआरसी में स्थापित करने का प्रस्ताव है। आईपीआर के संचालन से भारत रेडियो आइसोटोप के उत्पादन में आत्मनिर्भर बन सकता है। बीएआरसी द्वारा रेडियो आइसोटोप और रेडियो फार्मास्यूटिकल्स का नियमित उत्पादन किया जाता है और इनकी आपूर्ति बीआरआईटी के माध्यम से पूरे भारत के परमाणु चिकित्सा केंद्रों को की जाती है, जिससे नैदानिक और चिकित्सीय अनुप्रयोगों के लिए ये इलाज के लिए सही समय पर उपलब्ध हो पाते हैं।
डीएई द्वारा विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से परमाणु चिकित्सा के लिए क्षमता निर्माण का प्रसार करके उसे मजबूत किया जा रहा है। बीएआरसी परमाणु चिकित्सा में डॉक्टर ऑफ मेडिसिन, परमाणु चिकित्सा और आणविक इमेजिंग प्रौद्योगिकी में मास्टर ऑफ साइंस (एनएम एंड एमआईटी), परमाणु चिकित्सा प्रौद्योगिकी और अस्पताल रेडियो-फार्मेसी में मास्टर ऑफ साइंस (एनएमटी एंड एचआरपी), और रेडियोलॉजिकल फिजिक्स में डिप्लोमा (डिपआरपी) जैसे कार्यक्रम संचालित कर रहा है। इन पाठ्यक्रमों के माध्यम से प्रशिक्षित डॉक्टर और प्रौद्योगिकीविद् भारत भर में परमाणु चिकित्सा केंद्रों में कार्यरत हैं। यह पहल परमाणु चिकित्सा और कैंसर के इलाज में रेडियोआइसोटोप और रेडियोफार्मास्यूटिकल्स के बढ़ते प्रयोग के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन की उपलब्धता सुनिश्चित करने में सहायक सिद्ध हो रही हैं।
टीएमसी द्वारा परमाणु चिकित्सा के क्षेत्र में प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण को पुष्ट करने के लिए निम्नलिखित पाठ्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं:—
डॉक्टर ऑफ मेडिसिन (एमडी) न्यूक्लियर मेडिसिन – 3 वर्षीय पाठ्यक्रम न्यूक्लियर थेरानोटिक्स – 2 वर्षीय फेलोशिप
विज्ञान में स्नातकोत्तर (एम.एस.सी) – परमाणु चिकित्सा और आणविक इमेजिंग प्रौद्योगिकी (एनएमएमआईटी) – 2 वर्ष
फिलहाल परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) को ऐसा कोई प्रस्ताव प्राप्त नहीं हुआ है।
यह जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय से संबद्ध और कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज लोकसभा में लिखित उत्तर में दी।
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पीके/केसी/आईएम
(रिलीज़ आईडी: 2291733)
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