गृह मंत्रालय
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त्वरित न्याय प्रक्रिया

प्रविष्टि तिथि: 21 JUL 2026 4:04PM by PIB Delhi

विधि आयोग ने अपनी विभिन्न रिपोर्ट के माध्‍यम से आपराधिक कानूनों में धारा-विशिष्ट संशोधनों की सिफारिश की थी। इसके अलावा, बेजबरुआ समिति, विश्वनाथन समिति, मालिमाथ समिति, माधव मेनन समिति आदि समितियों ने भी आपराधिक कानूनों में धारा-विशिष्ट संशोधनों और आपराधिक न्याय प्रणाली में सामान्य सुधारों के लिए सिफारिशें की थीं।

गृह मामलों से संबंधित संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 111वीं (2005), 128वीं (2006) और 146वीं (2010) रिपोर्टों में सम्‍बंधित अधिनियमों में कई चरणों में संशोधन करने के बजाय संसद में एक व्यापक कानून पेश करके देश की आपराधिक न्याय प्रणाली की व्यापक समीक्षा करने की सिफारिश की थी।

इसके बाद, गृह मंत्रालय ने सभी को सुलभ और किफायती न्याय उपलब्ध कराने तथा नागरिक-केंद्रित कानूनी ढांचा तैयार करने के उद्देश्य से आपराधिक कानूनों, अर्थात् भारतीय दंड संहिता, 1860, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की व्यापक समीक्षा की थी। उपरोक्त तीनों अधिनियमों को निरस्त कर तीन नए कानूनों, भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 और भारतीय सुरक्षा अधिनियम (बीएसए), 2023 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है।

त्वरित न्याय प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए), 2023 में प्रावधानों का विवरण इस प्रकार है:

  1. त्वरित और निष्पक्ष समाधान: नए कानून मामलों के त्वरित और निष्पक्ष समाधान का वादा करते हैं, इससे कानूनी व्यवस्था में विश्वास बढ़ता है। जांच और मुकदमे के महत्वपूर्ण चरण जैसे - प्रारंभिक पूछताछ (14 दिनों में पूरी की जानी है), आगे की जांच (90 दिनों में पूरी की जानी है), पीड़ित और आरोपी को दस्तावेज़ उपलब्ध कराना (14 दिनों के भीतर), मुकदमे के लिए मामला सौंपना (90 दिनों के भीतर), और डिस्चार्ज दाखिल करना - इन सभी चरणों में तेजी से और निष्पक्षता से कार्रवाई की जाएगी।

आवेदन (60 दिनों के भीतर), आरोप तय करना (60 दिनों के भीतर), निर्णय सुनाना (45 दिनों के भीतर) और दया याचिकाएं दाखिल करना (राज्यपाल के समक्ष 30 दिन और राष्ट्रपति के समक्ष 60 दिन) - इन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित किया गया है और इन्हें निर्धारित समय अवधि के भीतर पूरा किया जाना है।

  1. त्वरित जांच: नए कानून महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों की जांच को प्राथमिकता देते हैं। इसका उद्देश्‍य सूचना दर्ज होने के दो महीने के भीतर समय पर जांच पूरी करना है।
  2. स्थगन: मामलों की सुनवाई में अनावश्यक देरी से बचने और समय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए अधिकतम दो बार स्थगन का प्रावधान।
  3. न्यायिक प्रक्रिया की गति, दक्षता और पारदर्शिता में उल्लेखनीय सुधार लाने के लिए ई-साक्ष्य, ई-समन और न्याय-श्रुति (वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग) जैसे अनुप्रयोग विकसित किए गए हैं। ई-साक्ष्य डिजिटल साक्ष्यों के वैध, वैज्ञानिक और छेड़छाड़-रहित संग्रह, संरक्षण और इलेक्ट्रॉनिक प्रस्तुति को सक्षम बनाता है। इससे प्रामाणिकता सुनिश्चित होती है और विलंब कम होता है। वहीं, ई-समन इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से समन भेजने की सुविधा प्रदान करता है। इससे प्रक्रिया तेज, समयबद्ध और आसानी से ट्रैक करने योग्य हो जाती है। न्याय-श्रुति (वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग) वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अभियुक्तों, गवाहों, पुलिस अधिकारियों, अभियोजकों, वैज्ञानिक विशेषज्ञों, कैदियों आदि की आभासी उपस्थिति को सुगम बनाती है।

गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री श्री बंदी संजय कुमार ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।

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पीके/केसी/वीके/एसएस


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