जल शक्ति मंत्रालय
नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत हुई प्रगति
प्रविष्टि तिथि:
02 APR 2026 4:18PM by PIB Delhi
भारत सरकार गंगा बेसिन में नदियों/सहायक नदियों में प्रदूषण को कम करने के लिए नमामि गंगे कार्यक्रम (एनजीपी) की केंद्रीय क्षेत्र योजना और अन्य नदियों के लिए राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) की केंद्र प्रायोजित योजना के माध्यम से राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के प्रयासों को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करके समर्थन कर रही है।
भारत सरकार ने गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के पुनरूद्धार के लिए वर्ष 2014-15 में नमामि गंगे कार्यक्रम (एनजीपी) शुरू किया था, जो मार्च 2021 तक पांच वर्षों के लिए था और जिसका मार्च 2026 तक और विस्तार कर दिया गया है। नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत, गंगा नदी को स्वच्छ और इसका पुनरूद्धार करने के लिए विविध और समग्र उपाय किए गए हैं, जिनमें अपशिष्ट जल उपचार, नदी तट प्रबंधन, ई-प्रवाह सुनिश्चित करना, ग्रामीण स्वच्छता, वृक्षारोपण, जैव विविधता संरक्षण और जन भागीदारी शामिल हैं। फरवरी 2026 तक, कुल 524 परियोजनाओं को 43,030 करोड़ रूपए की लागत से स्वीकृत किया गया है, जिनमें से 355 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं।
एनआरसीपी देश की गंगा बेसिन में शामिल नदियों को छोड़कर अन्य नदियों के लिए कच्चे सीवेज के इटंरसेप्शन और डायवर्जन, सीवरेज प्रणालियों के निर्माण, सीवेज उपचार संयंत्रों की स्थापना, कम लागत वाली स्वच्छता, नदी तट/स्नान घाट विकास आदि से संबंधित विभिन्न प्रदूषण नियंत्रण कार्य कर रहा है। अब तक, एनआरसीपी ने देश के 17 राज्यों में फैले 100 शहरों की 58 नदियों को 8,970.51 करोड़ रुपये की कुल स्वीकृत लागत से कवर किया है और 3,019 मिलियन लीटर (एमएलडी) प्रतिदिन की सीवेज उपचार क्षमता का सृजन किया है।
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के अंतर्गत किए गए विभिन्न उपाय निम्नलिखित हैं:
- प्रदूषित नदी क्षेत्रों के उपचार हेतु 35,794 करोड़ रूपए की लागत से कुल 218 सीवरेज अवसंरचना परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जिनकी उपचार क्षमता 6,610 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) है। 4,050 एमएलडी क्षमता वाली 138 एसटीपी परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं और चालू कर दी गई हैं।
- एनएमसीजी में, गंगा और यमुना नदियों पर नदी जल की गुणवत्ता, सीवेज उपचार संयंत्रों (एसटीपी) के कार्य-निष्पादन आदि की निरंतर निगरानी के लिए एक ऑनलाइन डैशबोर्ड "प्रयाग" को चालू किया गया है।
- एनएमसीजी ने अक्टूबर 2018 में अधिसूचित न्यूनतम ई-फ्लो मानदंडों को सफलतापूर्वक कार्यान्वित किया है, जिससे गंगा नदी में निरंतर पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित हुआ है। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) द्वारा नियमित अनुपालन की प्रभावी ढंग से निगरानी की जा रही है।
- जैव विविधता संरक्षण: उत्तर प्रदेश के सात जिलों (मिर्जापुर, बुलंदशहर, हापुड़, बदायूं, अयोध्या, बिजनौर और प्रतापगढ़) में सात जैव विविधता पार्क और उत्तर प्रदेश (3), बिहार (1) और झारखंड (1) में 5 प्राथमिकता वाले आर्द्रभूमि क्षेत्रों को स्वीकृत किया गया है।
- एनएमसीजी ने राज्य वन विभाग के माध्यम से गंगा नदी के मुख्य धारा पर एक वनरोपण कार्यकलाप परियोजना कार्यान्वित की है। लगभग 414 करोड़ रूपए के व्यय से 33,024 हेक्टेयर क्षेत्र में वृक्षारोपण का कार्य किया गया है।
- केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई) द्वारा कार्यान्वित विशेष परियोजना के तहत गंगा बेसिन में मछली जैव विविधता और नदी डॉल्फ़िन के लिए शिकार आधार के संरक्षण और मछुआरों की आजीविका सुनिश्चित करने के लिए गंगा में कुल 203 लाख भारतीय मेजर कार्प (आईएमसी) फिंगरलिंग को रैंच किया गया है।
- भारत की पहली डॉल्फिन बचाव एम्बुलेंस का विकास और उद्घाटन 13 जनवरी, 2026 को माननीय मंत्री द्वारा भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून में किया गया, जिससे सुरक्षित बचाव और स्थान परिवर्तन संभव हो सका; 8 गंगा डॉल्फिन को बचाया गया और उन्हें मुक्त किया गया।
- नागरिकों द्वारा संचालित सून्स-साथी नेटवर्क (250 किमी में फैले 100 स्वयंसेवक), 160 प्रशिक्षित कर्मी, 2,000 संवेदनशील समुदाय के सदस्य और 15 डॉल्फिन क्लबों ने प्रारंभिक रिपोर्टिंग और संरक्षण जागरूकता अभियान को मजबूत किया।
- घड़ियाल संरक्षण: 22 नदियों में किए गए घड़ियाल आकलन में 3,037 घड़ियाल रिकार्ड किए गए, जिनमें से केवल 5.6% ही अत्यधिक उपयुक्त आवास वाले पाए गए हैं, जो प्रवाह विनियमन और आवास संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- संकटग्रस्त कछुआ प्रजातियों, जिनमें 15 (10 रेडियो टैग वाली) कैप्टिव हैच्ड चित्रा इंडिका, 60 हार्डेलथुरजी (10 रेडियो टैग वाली) और 20 बाटागुर कचुगा (सभी रेडियो टैग वाली) शामिल हैं, को यमुना, सरजू और गंगा नदियों में सुदृढ़ निगरानी प्रोटोकॉल के साथ पुनः वन्य जीवन में छोड़ा गया। फैलाव और उत्तरजीविता मानचित्र तैयार हैं।
- चंबल नदी में दो नदीतटीय हैचरी के माध्यम से लुप्तप्राय बाटागुर कछुआ प्रजाति के कुल 387 संवेदनशील घोंसलों (8257 अंडे) को संरक्षित किया गया। इससे 7979 नवजात कछुओं की नदी में सुरक्षित वापसी सुनिश्चित हुई, जिससे कुल हैचिंग सफलता दर 96.7% रही।
- उत्तर प्रदेश में चंबल नदी के 210 किमी क्षेत्र में स्मार्ट-आधारित नदी गश्त को संस्थागत रूप देकर प्रौद्योगिकी-संचालित संरक्षण को बढ़ावा दिया गया।
- "गंगा नॉलेज पोर्टल" राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन द्वारा विकसित एक अग्रणी पहल है, जो जल संसाधन प्रबंधन पर व्यापक संसाधनों के लिए एक केंद्रीकृत भंडार के रूप में कार्य करता है। यह प्लेटफार्म छात्रों, शोधकर्ताओं, हितधारकों और आम जनता को पत्रिकाओं, प्रकाशनों, पुस्तकों, तकनीकी लेखों, शोध रिपोर्टों; डेटा सेट (जिला नदी मानचित्र, एसटीपी प्रदर्शन और नदी एटलस) और कॉफी टेबल पुस्तकों सहित सामग्रियों (1346 दस्तावेज़) की एक विशाल श्रृंखला की उपलब्धता को सुगम बनाने के लिए बनाया गया है। जल संसाधन चुनौतियों की जटिलताओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए, गंगा नॉलेज पोर्टल का उद्देश्य इस गंभीर क्षेत्र में जागरूकता और विवेकपूर्ण निर्णय लेने को बढ़ावा देना है।
- कुल 139 जिला गंगा समितियाँ (डीजीसी) गठित की गई हैं, जो नियमित रूप से 4एम (मंथली, मैंडेटेड, मिनट्ड, और मॉनीटर्ड) बैठकें आयोजित करती हैं। जनवरी 2026 तक 5,118 से अधिक बैठकें आयोजित की जा चुकी हैं;
- उत्तर प्रदेश राज्य में गंगा टास्क फोर्स (जीटीएफ) का गठन एनएमसीजी को उसके अधिदेशित कार्यों को पूरा करने में सहायता करने के लिए किया गया था, जैसे कि (क) मृदा कटाव को रोकने के लिए वृक्षारोपण; (ख) जन जागरूकता/भागीदारी अभियानों का प्रबंधन; (ग) जैव विविधता संरक्षण के लिए संकटग्रस्त नदी क्षेत्रों में गश्त; (घ) घाटों आदि में गश्त।
- गंगा नदी की स्वच्छता और संरक्षण के प्रयासों में जनता के बीच दायित्व और सहभागिता की भावना लाने करने के लिए व्यापक जन जागरूकता अभियान चलाए गए हैं। इनमें गंगा उत्सव, नदी उत्सव, नियमित सफाई अभियान और वृक्षारोपण अभियान, घाट पर योग, गंगा आरती आदि शामिल हैं। इन प्रयासों को गंगा प्रहरी, गंगा विचार मंच आदि जैसे गंगा संरक्षण कार्यकर्ताओं के समर्पित समूहों का भी समर्थन प्राप्त है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), गंगा नदी के पांच मुख्य धारा वाले राज्यों - उत्तराखंड-19; उत्तर प्रदेश-41; बिहार-33; झारखंड-04; और पश्चिम बंगाल-15 में 112 स्थानों पर गंगा नदी की जल गुणवत्ता की मैन्युअल निगरानी करता है।
प्रदूषित नदी खंड (पीआरएस) 2025 के संबंध में सीपीसीबी की रिपोर्ट के अनुसार, गंगा के मुख्य धारा में प्रदूषण के संबंध में निम्नलिखित जानकारी उपलब्ध है:
गंगा का मुख्य धारा – राज्य-वार तुलना (वर्ष 2018 बनाम वर्ष 2025)
|
राज्य
|
वर्ष 2018 में प्रदूषित खंड
|
प्राथमिकता
(वर्ष 2018)
|
वर्ष 2025 में प्रदूषित खंड
|
प्राथमिकता
(वर्ष 2025)
|
प्रचलन/अवलोकन
|
|
उत्तराखंड
|
हरिद्वार→
सुल्तानपुर
|
IV
|
कोई पीआरएस नहीं
|
—
|
सुधार किया गया और पीआरएस खंड को हटा दिया गया
|
|
उत्तर प्रदेश
|
कन्नौज→ वाराणसी
|
IV
|
बिजनौर→ तारीघाट
|
IV / V
|
आंशिक रूप से सुधार किया गया
|
|
बिहार
|
बक्सर से भागलपुर
|
V
|
भागलपुर डी/एस → खलगांव डी/एस
|
V
|
आंशिक प्रदूषण शेष है
|
|
झारखंड
|
कोई पीआरएस नहीं
|
—
|
कोई पीआरएस नहीं
|
—
|
—
|
|
पश्चिम बंगाल
|
त्रिवेणी→ डायमंड बंदरगाह
|
III
|
बहरामपुर→डायमंड बंदरगाह
|
V
|
सुधार किया गया
|
वर्ष 2025 (जनवरी से अगस्त) के लिए गंगा नदी के जल गुणवत्ता आंकड़ों (माध्य मान) के आधार पर, निम्नलिखित अवलोकन किए गए हैं:
- पीएच और घुलित ऑक्सीजन (डीओ) नदी की स्थिति का सबसे महत्वपूर्ण मानदंड हैं। गंगा नदी का पीएच और डीओ, गंगा नदी के सभी स्थानों पर स्नान के मानदंडों के लिए अपेक्षित मानकों को पूरा करता है।
- उत्तराखंड, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में गंगा नदी के पूरे खण्ड में निम्नलिखित स्थानों/खण्डों को छोड़कर, गंगा नदी की जल गुणवत्ता - जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) के संबंध में स्नान के मानदंडों के अनुरूप है:
- फर्रुखाबाद से पुराना राजापुर, कानपुर।
- डलमऊ, रायबरेली।
- उत्तर प्रदेश में डी/एस मिर्ज़ापुर से तारीघाट, ग़ाज़ीपुर (दो स्थानों को छोड़कर, अर्थात् यू/एस वाराणसी, संगम के बाद गोमती और यू/एस ग़ाज़ीपुर)।
गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे 50 स्थानों और यमुना नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे 26 स्थानों पर वर्ष 2024-25 के दौरान की गई जैव निगरानी के अनुसार, जैविक जल गुणवत्ता (बीडब्ल्यूक्यू) मुख्य रूप से 'अच्छी' से 'मध्यम' श्रेणी में पाई गई। विभिन्न प्रकार की बेंथिक मैक्रो-इनवर्टेब्रेट्स प्रजातियों की उपस्थिति नदियों के जलीय जीवन को बनाए रखने की पारिस्थितिक क्षमता को दर्शाती है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), देहरादून और राज्य वन विभाग के सहयोग से डॉल्फ़िन, ऊदबिलाव, हिलसा, कछुए और घड़ियाल जैसी जलीय प्रजातियों के लिए विज्ञान आधारित प्रजाति पुनर्जीवन कार्यक्रम, बचाव और पुनर्वास कार्यक्रम ने जैव विविधता में उल्लेखनीय सुधार दर्शाया है, जिसमें डॉल्फ़िन, ऊदबिलाव, हिलसा, कछुए और अन्य नदी प्रजातियों में वृद्धि देखी गई है।
औद्योगिक प्रदूषण उपशमन हेतु एनजीपी के अंतर्गत, तीन सामान्य बहि:स्राव उपचार संयंत्रों (सीईटीपी) अर्थात् जाजमऊ सीईटीपी (20 एमएलडी), बंथर सीईटीपी (4.5 एमएलडी) और मथुरा सीईटीपी (6.25 एमएलडी) को मंजूरी दी गई है। मथुरा सीईटीपी (6.25 एमएलडी) और जाजमऊ सीईटीपी (20 एमएलडी) की दो परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त, अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों (जीपीआई) का वार्षिक निरीक्षण वर्ष 2017 में शुरू हुआ था। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप बीओडी भार वर्ष 2017 में 26 टन प्रति दिन (टीपीडी) से घटकर वर्ष 2024 में 10.75 टीपीडी हो गया है और बहि:स्राव निर्वहन में लगभग 23.9% गिरावट हुई है, जो वर्ष 2017 में 349 एमएलडी से घटकर वर्ष 2024 में 265.56 एमएलडी हो गया है।
यह सूचना जल शक्ति राज्यमंत्री श्री राज भूषण चौधरी द्वारा लोकसभा में लिखित प्रश्न के उत्तर में प्रदान की गई है।
*****
एनडी
(रिलीज़ आईडी: 2248382)
आगंतुक पटल : 108
इस विज्ञप्ति को इन भाषाओं में पढ़ें:
English