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विभाग संबंधित विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 408 वीं रिपोर्ट पर प्रेस विज्ञप्ति

प्रविष्टि तिथि: 25 MAR 2026 6:51PM by PIB Delhi

श्री भुबनेश्वर कालिता, संसद सदस्य, राज्य सभा की अध्यक्षता में विभाग संबंधित विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान विभाग की अनुदान मांगों (2026-27) के संबंध में अपना 408वां प्रतिवेदन 25 मार्च, 2026 को संसद की दोनों सभाओं में प्रस्तुत किया/सभा पटल पर रखा। समिति ने 24 मार्च, 2026 को आयोजित अपनी बैठक में प्रारूप प्रतिवेदन पर विचार किया और उसे स्वीकार किया। समिति द्वारा इस प्रतिवेदन में की गई सिफारिशें समुक्तियां संलग्न हैं।

2.         संपूर्ण प्रतिवेदन https://sansad.in/rs पर भी उपलब्ध है।

सिफारिशें/समुक्तियां - एक नज़र में

बजट विश्लेषण

     समिति समुक्ति करती है कि बजट शीर्षक "पीएसई को सहायता" के तहत व्यय अत्यंत कम है (जनवरी, 2026 तक आरई का 38.7%), जो गंभीर कार्यान्वयन चुनौतियों या मांग की कमी को दर्शाता है। समिति सिफारिश करती है कि बाधाओं की पहचान करने के लिए एक व्यापक समीक्षा आवश्यक है, और यदि योजना व्यावहारिक नहीं है, तो विभाग को निधि को अधिक प्रभावी कार्यक्रमों में पुन: आवंटित करने या बजट को कम करने पर विचार करना चाहिए।

(पैरा 2.2)

     समिति नोट करती है कि बजट शीर्ष "औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास" के तहत व्यय भी अपेक्षित गति से कम है (71.11%)। जबकि वित्तीय वर्ष 2026-27 का बीई वित्तीय वर्ष 2025-26 के आरई की तुलना में कम है, यह अनुमानित वास्तविक व्यय से ऊपर है। समिति सिफारिश करती है कि विभाग को निगरानी को सुदृढ़ करना चाहिए और परियोजना अनुमोदनों में तेजललानी चाहिए ताकि उपयोग में सुधार हो सके।

(पैरा 2.3)

     समिति यह भी नोट करती है कि वर्तमान वर्ष के वास्तविक आंकड़ों को देखते हुए 2026-27 के लिए कई योजनाओं का बजट अनुमान आशावादी प्रतीत होता है। उदाहरण के लिए, स्थापना व्यय (16.79 करोड़) ~14.66 करोड़ के अनुमानित वास्तविक से अधिक है। समिति सिफारिश करती है कि भविष्य के बजटीय आवंटन पहले 10 महीनों के डेटा पर विचार करते हुए व्यय पैटर्न के वास्तविक आकलनों के आधार पर किया जाना चाहिए,ताकि लगातार कम व्यय होने से बचा जा सके। विभाग को अधिक सटीक लक्ष्य निर्धारित करने के लिए वर्तमान वर्ष के वास्तविक आंकड़ों का उपयोग करना चाहिए, विशेष रूप से उन योजनाओं के लिए जिनमें लगातार कम व्यय होता है।

(पैरा 2.4)

     समिति समुक्ति करती है कि अनुसंधान के लिए धन के अत्यंत कम हिस्से का उपयोग किया गया है, जो वेतन, पेंशन और अन्य खर्चों की तुलना में है। यह विश्व स्तर पर प्रसिद्ध अनुसंधान एवं विकास संगठनों की तुलना में काफी कम है। समिति सिफारिश करती है कि विभाग को विशिष्ट मूर्त परिणामों के साथ इस स्थिति में सुधार करने के लिए एक व्यापक पांच वर्षीय रोडमैप तैयार करना चाहिए।

(पैरा 2.10)

सेन्ट्रल इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड (सीईएल)

     समिति समुक्ति करती है कि नुकसान में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र के इस उपक्रम का पुनरुत्थान एक उल्लेखनीय सफलता की कहानी है, जिससे इसकी दिशा बदलकर इसे रणनीतिक क्षेत्रों में कार्यरत एक विकासोन्मुख इकाई के रूप में उभरने में मदद मिली। इस सराहनीय बदलाव को स्वीकार करते हुए, समिति चिंता के साथ नोट करती है कि एक पीएसयू के लिए 3.03 करोड़ की मामूली राशि का आवंटन, जिसे हाल ही में पुनर्जीवित किया गया है, जो वर्तमान में अपने विकास के महत्वपूर्ण चरण में है, और जो राष्ट्रीय महत्व के क्षेत्रों में कार्य करता है, अपर्याप्त प्रतीत होता है और इसके लिए सरकार से अधिक सक्रिय समर्थन की आवश्यकता है। इसलिए समिति पुरजोर सिफारिश करती है कि सीईएल को अपनी रणनीतिक दिशा को रेखांकित करने के साथ-साथ अपनी संबंधित वित्तीय आवश्यकताओं को दर्शाते हुए एक व्यापक भावी रोडमैप तैयार करना चाहिए, और इसके बाद अपनी वृद्धि की गतिशीलता बनाए रखने के लिए बजट आवंटन में उल्लेखनीय वृद्धि सुनिश्चित करने हेतु सरकार से संपर्क करना चाहिए। इस संदर्भ में, समिति यह भी महसूस करती है कि पूंजी बाजार में सूचीबद्ध करने का निर्णय सही दिशा में एक कदम है, क्योंकि इससे सीईएल को अत्यधिक आवश्यक दृश्यता मिलेगी, परिचालन पारदर्शिता बढ़ेगी, और कंपनी को अपनी भविष्य की विकास योजनाओं के वित्तपोषण के लिए बाजार पूंजी तक पहुंच मिलेगी। समिति शीघ्र सूचीबद्ध किए जाने और साथ ही सीईएल को सही मायने में एक फ्लैगशिप इलेक्ट्रॉनिक्स पीएसयू बनाने के लिए अन्य व्यवसायिक अवसरों पर ध्यान केंद्रित करने की सिफारिश करती है।

(पैरा 3.10)

     समिति आगे सिफारिश करती है कि चूंकि दोनों संस्थाएँ एक ही प्रशासनिक विभाग के अंतर्गत काम करती हैं, इसलिए सीईएल को सीरी, पिलानी के साथ एक अधिक संरचित और गहन सहयोगात्मक ढांचा स्थापित करना चाहिए। इस संदर्भ में, समिति सुझाव देती है कि सीईएल को यह जांच करनी चाहिए कि सीरी, पिलानी से उत्पन्न होने वाली सभी तकनीकों, नवाचारों और विकासों के लिए अग्रक्रय का विशेष, अग्रिम अधिकार प्रदान करने वाले औपचारिक समझौते में प्रवेश करना कितना व्यावहार्य और रणनीतिक रूप से संवहनीय है। ऐसा प्रबंध यह सुनिश्चित करेगा कि महत्वपूर्ण सार्वजनिक व्यय पर विकसित मूल तकनीकों को सबसे पहले विभागीय पीएसयू को व्यावसायीकरण के लिए पेश किया जाए, जिससे प्रयोगशाला अनुसंधान से बाजार-तैयार उत्पादों तक एक सुव्यवस्थित पाइपलाइन बने। यह विशेष पहुंच न केवल सीईएल को अत्याधुनिक तकनीकों तक पहुँच में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्रदान करेगी बल्कि सीरी के नवाचारों के व्यावसायिक उपयोग को भी तेज करेगी, विभागीय पारिस्थितिकी तंत्र में बड़ी तालमेल और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देगी।

(पैरा 3.11)

     समिति यह भी समुक्ति करती है कि सीईएल पहले ही अन्य सटीक विमानन उपकरणों सहित रनवे विजुअल रेंज (आरवीआर) ट्रांसमिसोमीटर की आपूर्ति करके और स्वचालित मौसम अवलोकन प्रणाली (आवोस) के उत्पादन और आपूर्ति के लिए सीएसआईआर-एनएएलके साथ साझेदारी करके विमानन क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति कर रहा है। समिति सीईएल के एवियोनिक्स के क्षेत्र में प्रवेश करने के रणनीतिक निर्णय की सराहना करती है, इसे तकनीकी आत्मनिर्भरता के राष्ट्रीय उद्देश्य के साथ मेल खाने वाली दूरदर्शी पहल के रूप में मान्यता देती है। इस संदर्भ में, समिति सिफारिश करती है कि सीईएल को सक्रिय रूप से एवियोनिक्स-संबंधित उन उत्पादों और प्रणालियों की एक व्यापक सूची की पहचान करनी और संकलित करनी चाहिए, जिनके लिए देश अभी भी विदेशी स्रोतों पर निर्भर है। इसके बाद, कंपनी को अपनी अनुसंधान, विकास और उत्पादन क्षमताओं को इन पहचाने गए उत्पादों में पूर्ण आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की दिशा में समर्पित करना चाहिए, जिससे आयात पर निर्भरता कम हो, देशीय रक्षा और विमानन अवसंरचना मजबूत हो, और घरेलू एवियोनिक्स निर्माण परिदृश्य में खुद को एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया जा सके।

(पैरा 3.12)

     समिति यह भी समुक्ति करती है कि देश में रेलवे के महत्वपूर्ण पूंजीगत व्यय वृद्धि मार्ग पर बढ़ने के साथ, सीईएलके लिए क्षेत्र की उभरती आवश्यकताओं के साथ अपनी क्षमताओं को संरेखित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर मौजूद है। इस संदर्भ में, समिति सिफारिश करती है कि सीईएल को अनुसंधान डिज़ाइन और मानक संगठन (आरडीएसओ) और रेलवे बोर्ड के साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि भारतीय रेलवे की वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने वाली नई तकनीकों का सामूहिक रूप से विकास किया जा सके। समिति नोट करती है कि रेलवे मंत्रालय ने हाल ही में एक नई रेल टेक नीति की घोषणा की है, जो विशेष रूप से नवप्रवर्तकों और स्टार्ट-अप्स को इस क्षेत्र में तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने के लिए लक्षित है, और सीईएल को चाहिए कि वह सक्रिय रूप से इस नीतिगत ढांचे का लाभ उठाने का प्रयास करे। कंपनी उभरते नवाचार क्षेत्रों में विकास के अवसर तलाश सकती है, जिनमें हाथी प्रवेश का पता लगाने वाले एआई-संचालित सिस्टम (ईआईडीएस) शामिल हैं ताकि ट्रैक पर वन्य जीवों के टकराव को कम किया जा सके, यात्री कोचों के लिए आग लगने का पता लगाने के लिए एआई आधारित सिस्टम, टूटी हुई रेल का पता लगाने के लिए ड्रोन आधारित तंत्र, उन्नत रेल तनाव निगरानी प्रणाली, पार्सल वैन (वीपीयू) के लिए सेंसर आधारित लोड गणना उपकरण, ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के लिए रेलवे कोचों पर सौर पैनलों का एकीकरण, बेहतर रखरखाव के लिए एआई संचालित कोच सफाई निगरानी सिस्टम, कम दृश्यता और धुंध वाले हालात में सुरक्षित संचालन के लिए बाधा का पता लगाने की तकनीकें, कर्मचारी कल्याण के लिए एआई-संचालित पेंशन प्रबंधन और विवाद समाधान सिस्टम, कवच 4.0 ट्रेन टकराव टालने वाली प्रणाली के नए और उन्नत संस्करण, और स्वचालित ट्रैक और कोच निगरानी के लिए मशीन विज़न निरीक्षण प्रणाली शामिल हैं। रेल टेक नीति का लाभ उठाकर और आरडीएसओ के साथ सहयोग करके, सीईएल खुद को रेलवे के एक प्रमुख प्रौद्योगिकी साझेदार के रूप में स्थापित कर सकता है, नवाचार को प्रोत्साहित करते हुए इस उच्च-विकास वाले क्षेत्र में अपने उत्पाद पोर्टफोलियो और राजस्व स्‍ट्रीम का विस्तार कर सकता है।

(पैरा 3.13)

     समिति यह भी समुक्ति करती है कि हाल के तेज़ी से बढ़ती कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उससे संबंधित तकनीकों के साथ, उपभोक्ता मेमोरी और स्टोरेज चिप्स विशेष रूप से आरएएम और एसएसडी की कीमतें उल्‍लेखनीय रूप से बढ़ गई हैं, क्योंकि इस महत्वपूर्ण खंड पर कुछ वैश्विक कंपनियों का एकाधिकार नियंत्रण है। इसके अलावा, समिति नोट करती है कि जबकि भारत मोबाइल उपकरणों के प्रमुख वैश्विक असेम्बलर के रूप में उभरा है, इलेक्ट्रॉनिक कम्पोनेंट और पुर्जों का एक खासा हिस्‍सा अभी भी आयात किया जाता है। इस संदर्भ में, समिति सिफारिश करती है कि सीईएल को इसे एक रणनीतिक अवसर के रूप में देखना चाहिए और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में सक्रिय रूप से क्षमताओं का विकास करना चाहिए। अपनी मौजूदा तकनीकी विशेषज्ञता और संस्थागत अनुभव का लाभ उठाकर, सीईएल इलेक्ट्रॉनिक कम्पोनेंट के देशी निर्माण के माध्यम से आयात प्रतिस्थापन प्रयासों में योगदान कर सकता है, इस प्रकार विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता को कम कर सकता है, घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत कर सकता है और बढ़ते उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार में हिस्सेदारी हासिल करने के लिए खुद को तैयार कर सकता है।

(पैरा 3.14)

वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर)

     समिति भारत के स्वदेशी आरएंडडी इकोसिस्टम को संचालित करने में सीएसआईआर की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करती है और वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की योजना के तहत 600 करोड़ रुपये के बढ़ाए गए बजटीय आवंटन के लिए व्यापक औचित्य को नोट करती है। प्रस्तुतियों की समीक्षा के बाद, समिति समुक्ति करती है कि अनुरोधित निधियाँ केवल सामान्य विस्तार के लिए नहीं हैं बल्कि उच्च प्राथमिकता वाले राष्ट्रीय मिशनों, रणनीतिक रक्षा क्षमताओं और लैब-से-बाजार अंतर को पाटने वाले ट्रांसनेशनल अनुसंधान की ओर निर्देशित हैं। इसलिए समिति निम्नलिखित की सिफारिश करती है:

1. चूंकि सीएसआईआरकी परियोजनाएँ राष्ट्रीय सुरक्षा (जैसे, लॉयटरिंग म्यूनिशंस, एयूवी), ऊर्जा स्वतंत्रता (ग्रीन हाइड्रोजन, महत्वपूर्ण खनिज) और स्वास्थ्य देखभाल समुत्थान(देशी एपीआई विकास) से सीधे जुड़ी हैं, विभाग को इस वित्तपोषण की मांग को पूरा करने को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। आवंटन में किसी भी प्रकार की देरी या कमी भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता और रणनीतिक तैयारी में बाधा डाल सकती है।

2. समिति विकासित भारत दृष्टि और सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के अनुरूप पहलों का समर्थन करती है, विशेष रूप से उन पहलों का जो ग्रामीण आजीविका संवर्धन (अरोमा, पुष्प-उद्यान, सीवीड मिशन), जलवायु कार्रवाई और अपशिष्ट-से-धन सृजन पर केंद्रित हैं। समिति सिफारिश करती है कि इन सामाजिक मिशनों को पर्याप्त वित्तपोषण के साथ जारी रखा जाए ताकि समावेशी विकास और आधार स्तरीय प्रभाव सुनिश्चित किया जा सके।

3. समिति सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं में पुरानी हो रही अवसंरचना को लेकर चिंता व्यक्त करती है। यह पुरजोर सिफारिश करती है कि अतिरिक्त धनराशि का एक हिस्सा विशेष रूप से उच्च-स्तरीय अनुसंधान एवं विकास सुविधाओं, पायलट प्लांट और परीक्षण केन्द्रों के आधुनिकीकरण के लिए अलग रखा जाए। यह एआई, क्वांटम सामग्री और उन्नत बैटरियों जैसे उभरते क्षेत्रों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

4. प्रयोगशाला-से-बाज़ार तक के अंतर को पाटने के महत्व को पहचानते हुए, समिति 'फर्स्ट', एनसीपी/एफबीआर, और एफटीटी/एफटीसी श्रेणियों के तहत टीआरएल-संबंधित परियोजनाओं के लिए वित्तपोषण का समर्थन करती है। अनुशंसित परिव्यय से पायलट प्लांट और स्केल-अप सुविधाओं की स्थापना में सुविधा प्रदान करनी चाहिए ताकि औद्योगिक साझेदारी को बढ़ावा मिले, स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन हो, और निर्यातोन्मुख नवाचार को बढ़ावा मिले।

(पैरा 4.12)

     समिति राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की योजना के केंद्रीय क्षेत्र की योजना के रूप में पुनर्वर्गीकरण को भी नोट करती है, जिसमें आगामी 16वें वित्त आयोग चक्र में स्थापना व्यय को शामिल नहीं किया गया है। जबकि इस पुनर्गठन से मुख्य अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों के लिए अधिक केंद्रित और संरचित वित्तपोषण सक्षम होने की उम्मीद है, समिति सिफारिश करती है कि सीएसआईआर को नई योजना के तहत किन्‍हीं भी अतिरिक्त आवश्यकताओं को उचित रूप से तैयार करके जल्द से जल्द वित्त मंत्रालय को प्रस्‍तुत करना चाहिए ताकि उन पर अनुकूल विचार हो सके। समिति व्यय विभाग से यह सुनिश्चित करने का भी आग्रह करती है कि इसपारगमन से चल रही अनुसंधान कार्यक्रमों में बाधा उत्‍पन्‍न न हो और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मिशनों के लिए वित्तपोषण की निरंतरता बनाए रखने के लिए पर्याप्त सुरक्षोपाय लागू किए जाएं।

(पैरा 4.13)

     समिति पुरजोर सिफारिश करती है कि डीएसआईआरऔर व्यय विभाग को सीएसआईआरके लिए अतिरिक्त 600 करोड़ आवंटन के अनुरोध पर सकारात्मक रूप से विचार करना चाहिए। समिति का मानना है कि यह संवर्धित बजट वित्तीय रूप से समझदारी भरा निवेश है जो बहु-प्रयोगशाला सहयोग को उत्प्रेरित करेगा, उद्योग की भागीदारी का लाभ उठाएगा, और राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक लाभ प्रदान करेगा। समिति उम्मीद करती है कि सरकार की ओर से यह सुनिश्चित करने के लिए दृढ़ प्रतिबद्धता होगी कि ये मिशन-आधारित परियोजनाएँ बिना व्यवधान के जारी रहें और सीएसआईआर को स्वतंत्र और तकनीकी रूप से उन्नत भारत के निर्माण के अपने कर्तव्‍य को निभाने में सक्षम हो।

(पैरा 4.14)

सीएसआईआर की प्रमुख प्रयोगशालाओं की भूमिका पर एक नज़र

     समिति सिफारिश करती है कि सीएसआईआर और डीबीटी को अपने सहयोगी तंत्रों को समझौता ज्ञापन, संयुक्त संचालन समितियाँ और समन्वित शोध कॉल जैसे संरचित ढाँचों के माध्यम से औपचारिक रूप देना चाहिए ताकि दोनों विभागों की संयुक्त विशेषज्ञता से राष्ट्र को अधिकतम लाभ सुनिश्चित हो सके।

(पैरा 5.4)

     समिति सीएसआईआर-नीरी और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के बीच संस्थागत सहयोग तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देती है। समिति सिफारिश करती है कि दोनों संगठन संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रम, नियमित परामर्श बैठकें, और राष्ट्रीय पर्यावरणीय चुनौतियों को हल करने के लिए समन्वित दृष्टिकोण जैसे अपने सहयोगी ढांचे को औपचारिक रूप में स्थापित करें। समिति सिफारिश करती है कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को पर्यावरणीय आंकलन और नीति समर्थन के लिए सीएसआईआर-नीरी की वैज्ञानिक विशेषज्ञता का मुख्य तकनीकी उपकरण के रूप में उपयोग करना चाहिए, जबकि सीएसआईआर यह सुनिश्चित करे कि सीएसआईआर-नीरी अपने अंतर्विषयी अनुसंधान क्षमताओं को बनाए और बढ़ाए और सभी हितधारकों को स्वतंत्र, विश्वसनीय और वस्तुनिष्ठ वैज्ञानिक योगदान प्रदान करना जारी रखे।

(पैरा 5.6)

     समिति सिफारिश करती है कि विभाग को सीएसआईआर-नीरी के मानव संसाधनों को बढ़ाने की तात्कालिक आवश्यकता पर विचार करना चाहिए ताकि यह अपनी विस्तारित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों को पूरा कर सके। समिति प्रस्तावित 642 की इष्टतम पद संख्या को स्वीकार करती है और सिफारिश करती है कि मौजूदा रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया में प्राथमिकता से तेजी लाई जाए। समिति आगे सिफारिश करती है कि नए स्वीकृत पदों, विशेष रूप से वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण श्रेणियों में, के सृजन का मामला संबंधित अधिकारियों के साथ जल्द से जल्द उठाया जाए। समिति इस बात पर जोर देती है कि पर्याप्त और उचित रूप से संरचित मानव संसाधन सीएसआईआर-नीरीकी क्षमता के लिए महत्‍वपूर्ण है ताकि वह एक मिशन-तैयार राष्ट्रीय संस्था के रूप में कार्य कर सके, देश के लिए उच्च-प्रभाव परिणाम प्रदान कर सके और पर्यावरणीय संवहनीयता में भारत की नेतृत्व क्षमता को मजबूत कर सके।

(पैरा 5.8)

     समिति इस बात पर जोर देते हुए राष्ट्रीय पर्यावरण मिशनों के लिए समर्पित बजट लाइनों के निर्माण का पुरजोर समर्थन करती है कि उच्च गुणवत्ता, निरंतर डेटा सेट बनाए रखने के लिए स्थिर और पूर्वानुमेय वित्तपोषण आवश्यक है जो साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग का आधार हैं। समिति सिफारिश करती है कि वित्त मंत्रालय को संवहनीय पर्यावरण निगरानी और मिशन-मोड़ कार्यक्रमों के लिए समर्पित बजटीय प्रावधान स्थापित करने चाहिए, जिससे अल्पकालिक परियोजना-आधारित वित्तपोषण से दीर्घकालिक राष्ट्रीय मिशनों में पारगमन सक्षम हो सके।

(पैरा 5.10)

     समिति सिफारिश करती है कि डीएसआईआर, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और नीति आयोग के परामर्श से, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं जैसे कि नेट जीरो, स्वच्छ हवा, जल सुरक्षा और चक्रीय अर्थव्यवस्था के अनुरूप कार्यक्रमों के लिए बहु-वर्षीय क्षितिज और परिणाम-आधारित मूल्यांकन के साथ मिशन-मोड शासन रूपरेखा विकसित करे। इससे समग्र योजना और मापनीय राष्ट्रीय प्रभाव को सक्षम हो पाएगा।

(पैरा 5.11)

     समिति राष्ट्रीय पर्यावरणीय ढांचों और प्रमुख अभियानों के भीतर तकनीकी कार्यान्वयन साझेदार के रूप में सीएसआईआर-नीरी को औपचारिक रूप से शामिल करने का समर्थन करती है। यह सिफारिश करती है कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और अन्य संबंधित मंत्रालयों को सीएसआईआर-नीरी को राष्ट्रीय पर्यावरणीय अभियानों के डिजाइन और कार्यान्वयन में औपचारिक रूप से शामिल करना चाहिए, ताकि इसकी वैज्ञानिक विशेषज्ञता का लाभ उठाया जा सके।

(पैरा 5.12)

     समिति को लगता है कि अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय मंचों पर भारतीय आधिकारिक शिष्‍टमंडलों में सीएसआईआर-नीरी के विशेषज्ञों को शामिल करने में लाभ है। यह सिफारिश करती है कि विदेश मंत्रालय को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और डीएसआईआर के समन्वय में सम्मिलित करने की प्रक्रिया विकसित करनी चाहिए ताकि पर्यावरण शासन में भारत की तकनीकी विश्वसनीयता और वैश्विक नेतृत्व को मजबूत किया जा सके।

(पैरा 5.13)

     समिति वायु, जल, अपशिष्ट और उत्सर्जन डेटा सेट का एकीकरण करते हुए राष्ट्रीय पर्यावरण डेटा भंडार को सीएसआईआर-नीरी में स्थापित करने का पुरजोर समर्थन करती है। यह सिफारिश करती है कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, डीएसआईआरऔर सीएसआईआर-नीरीके सहयोग से, पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता के साथइस भंडार की स्थापना के लिए त्वरित कदम उठाए।

(पैरा 5.14)

     समिति पर्यावरणीय स्थिरता में ग्लोबल साउथ सहयोग के लिए सीएसआईआर-नीरी को भारत के वैज्ञानिक इंटरफेस के रूप में स्थापित करने के दृष्टिकोण की सराहना करती है। यह सिफारिश करती है कि एमईएऔर डीएसआईआरसंस्थान की विशेषज्ञता का उपयोग अंतरराष्ट्रीय विकास साझेदारियों और ग्लोबल साउथ सहयोग में करने के लिए एक व्यापक ढांचा विकसित करें।

(पैरा 5.15)

     समिति समुक्ति करती है कि सीएसआईआर-नीरी के पांच क्षेत्रीय केंद्र अत्‍यधिक सीमित मानव संसाधन और अवसंरचना परिस्थितियों में विशाल भौगोलिक क्षेत्रों की सेवा करते हैं, जो राज्य सरकारों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और शहरी स्थानीय निकायों का समर्थन करने में उनकी प्रभावशीलता को सीमित करता है। समिति इस बात पर जोर देते हुए संस्थान की क्षेत्रीय उपस्थिति के संतुलित, आवश्यकता-आधारित विस्तार के प्रस्ताव को समर्थन देती है कि विस्तार चरणबद्ध, रणनीतिक रूप से लक्षित और पर्याप्त संसाधनों के साथ होना चाहिए। प्राथमिकता पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों, उच्च औद्योगिक समेकन वाले क्षेत्रों, तेजी से शहरीकरण वाले क्षेत्रों और जलवायु-आसक्त क्षेत्रों को दी जानी चाहिए। समिति सिफारिश करती है कि विस्तार हब-एंड-स्पोक मॉडल के अनुसार होना चाहिए, जिसमें नागपुर मुख्यालय राष्ट्रीय समन्वय और उन्नत अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित करे, जबकि क्षेत्रीय केंद्र अनुप्रयुक्त अनुसंधान, निगरानी और हितधारक सहभागिता को संभालें। एक मॉड्यूलर, मिशन-आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, जिसमें संसाधनों के अनुकूलन के लिए केंद्रों को जहां भी संभव हो राज्य संस्थाओं या शैक्षणिक भागीदारों के साथ सह-स्थित किया जाए। समिति इस बात पर जोर देती है कि ऐसे विस्तार के लिए सहायक समर्थन की आवश्यकता होती है, जिसमें बढ़ी हुई मानव शक्ति, समर्पित वित्तपोषण, क्षेत्रीय स्तर पर वित्तीय शक्तियों का हस्तांतरण, और राष्ट्रीय मिशनों के साथ संरेखण शामिल है। उचित नीतिगत समर्थन और संसाधनों के साथ, सीएसआईआर-नीरी के क्षेत्रीय केंद्र पर्यावरणीय शासन और सतत विकास का समर्थन करने वाले एक मजबूत राष्ट्रीय नेटवर्क में विकसित हो सकते हैं।

(पैरा 5.17)

     समिति पुरजोर सिफारिश करती है कि सरकार को आवश्यक नीति समर्थन, वित्तीय संसाधन और संस्थागत सहायता सीएसआईआर-सीरी को प्रदान करनी चाहिए ताकि यह भारत की सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षमताओं को उन्नत करने का अपने कार्य पूरा कर सके। समिति यह भी सिफारिश करती है कि फैब सुविधा का उन्नयन, कौशल विकास कार्यक्रमों का विस्तार, और समीर तथा अन्य हितधारकों के साथ सहयोग शीघ्रता से आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

(पैरा 5.20)

     समिति सिफारिश करती है कि सीएसआईआर-सीएफटीआरआई को अपनी वैज्ञानिक विशेषज्ञता का उपयोग ऐसे व्यापक, कम लागत वाले, किफायती और उपयोग में आसान फ़ील्ड परीक्षण किट विकसित करने के लिए करना चाहिए जो उपभोक्ताओं और स्थानीय खाद्य निरीक्षकों को सामान्य मिलावट की तेजी से पहचान करने में सक्षम बनाएं। समिति यह भी सिफारिश करती है कि तेल की मिलावट, सिंथेटिक रंग और दूध तथा पानी में मिलावट के लिए मौजूदा परीक्षण सामग्री को इसके अलावा भारत में आमतौर पर पाए जाने वाले मिलावटी तत्वों की एक विस्तृत श्रृंखला को कवर करने के लिए बढ़ाया जाए, और इन किटों को आम जनता के लिए आसानी से उपलब्ध कराया जाए।

(पैरा 5.25)

     समिति सिफारिश करती है कि सीएसआईआर-सीएफटीआरआई द्वारा शुरू की गई जागरूकता और क्षमता निर्माण पहलों को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया जाए और उन्हें खाद्य मिलावट पर एक राष्ट्रीय जन जागरूकता अभियान में व्यवस्थित रूप से एकीकृत किया जाए। सोशल मीडिया, पारंपरिक मीडिया और सामुदायिक सहभागिता कार्यक्रमों सहित सभी उपलब्ध मीडिया प्लेटफार्मों का उपयोग करके नागरिकों को मिलावटी खाद्य पदार्थों की पहचान करने के लिए जानकारी और उपकरणों से सशक्त बनाने के लिए एक व्यापक प्रसार रणनीति विकसित की जानी चाहिए। समिति यह भी सिफारिश करती है कि संस्थान के प्रकाशनों, जिसमें खाद्य सुरक्षा और मिलावट पर पुस्तिकाएं शामिल हैं, का विस्तार किया जाए और व्यापक पहुंच के लिए इन्हें क्षेत्रीय भाषाओं में अनूदित किया जाए।

(पैरा 5.26)

     समिति सिफारिश करती है कि सीएसआईआर-सीएफटीआरआई को अपनी वैज्ञानिक विशेषज्ञता का उपयोग करके सामान्य खाद्य उत्पादों के लिए स्वतंत्र, उच्च-गुणवत्ता वाले संदर्भ मानक प्रकाशित करने चाहिए। इन वैकल्पिक मानकों का दोहरा उद्देश्य होना चाहिए: पहला, बाजार में अपने उत्पादों को अलग दिखाने के इच्छुक प्रीमियम, स्वास्थ्य-चेतन उत्पादकों के लिए स्वैच्छिक स्वर्ण मानक के रूप में, और दूसरा, राष्ट्रीय नियमों में धीरे-धीरे सुधार के पक्ष में पैरवी करने के लिए एक वैज्ञानिक उपकरण के रूप में। समिति यह भी सिफारिश करती है कि संस्थान की दृष्टि-2030 के तहत प्रमाणित संदर्भ सामग्री के विकास को उच्चतम प्राथमिकता दी जाए और संस्थान को एफएसएसएआई के साथ सक्रिय रूप से जुड़कर इन संदर्भ सामग्रियों को प्रदर्शित और वितरित करना चाहिए।

(पैरा 5.27)

     समिति सिफारिश करती है कि वित्त मंत्रालय और वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग को उपभोक्ताओं को निम्न गुणवत्ता वाले खाद्य उत्पादों की पहचान करने में सक्षम बनाने के लिए मोबाइल एप्लिकेशन के विकास के लिए आवश्यक वित्तीय सहायता प्रदान करनी चाहिए। प्रस्तावित ऐप को इस प्रकार काम करना चाहिए कि उपयोगकर्ता उत्पाद के बारकोड को स्कैन करके स्वतंत्र रूप से सत्यापित गुणवत्ता रेटिंग तक पहुँच सकें, चिंताजनक सामग्री को चिन्हित कर सकें और पोषण प्रोफाइल की तुलना वैज्ञानिक रूप से स्थापित मानकों के खिलाफ कर सकें।

(पैरा 5.28)

प्रयोगशाला से बाजार तक: सीएसआईआर की प्रौद्योगिकी हस्तांतरण प्रणाली को मजबूत करना

     समिति समुक्ति करती है कि एनआरडीसी द्वारा वाणिज्यीकृत प्रौद्योगिकी से औसत राजस्व काफी अलग-अलग है और सामान्य रूप से मात्रा की दृष्टि से कम है। इसका समाधान करने के लिए, समिति सिफारिश करती है कि विभाग प्रौद्योगिकियों को अपने औद्योगिक साझेदारों को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने के लिए एक व्यापक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करे। समिति यह सिफारिश करती है कि एक अधिक परिष्कृत और लचीला लाइसेंसिंग ढांचा विकसित किया जाए जो मानक अग्रिम शुल्क और रॉयल्टी से परे हो, जिसमें उपलब्धि-आधारित भुगतान शामिल हों जो सफल पायलट उत्पादन, पहली वाणिज्यिक बिक्री, या बिक्री लक्ष्य तक पहुंचने जैसे विशिष्ट वाणिज्यिक उपलब्धि प्राप्त करने वाले लाइसेंसी के साथ जुड़े भुगतानों से डील करे। इसके अलावा, ढांचा रणनीतिक निर्णय लेने में शामिल होना चाहिए जैसे विशेष और गैर-विशेष लाइसेंसिंग के बारे में निर्णय लेना, यह तय करना कि कब उच्च शुल्क पर प्रमुख उद्योगों को आकर्षित करने के लिए विशेष लाइसेंस देना है और कब सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण तकनीकों के व्यापक प्रसार को सुनिश्चित करने के लिए गैर-विशेष लाइसेंस का उपयोग करना है।

(पैरा 6.11)

     समिति यह भी सिफारिश करती है कि विभाग को विभिन्न क्षेत्रों जैसे स्वास्थ्य देखभाल, एयरोस्पेस, ऊर्जा, पारिस्थितिकी आदि में सीईएल के अंतर्गत और अधिक संख्या में र्वटिकल्स स्थापित करने के विचार को एक्सप्लोर करना चाहिए। ये पीएसयू सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं के साथ निकट सहयोग में काम करते हुए, न केवल देशी तकनीकों का व्यावसायीकरण करेंगे बल्कि उनके आगे के विकास में भी योगदान देंगे। इन उद्यमों द्वारा उत्पन्न लाभ सरकारी लाभांश के रूप में सरकार को वापस जाएगा। इसके अतिरिक्त, लोक उद्यम विभाग द्वारा दिए अधिदेश के अनुसार सीईएल द्वारा अन्य कारोबार के विकास के अतिरिक्त प्रतिस्पर्धात्मक मूल्य निर्धारण सुनिश्चित करके, ये पीएसयू अंततः राष्ट्रीय हित में काम करेंगे और व्यापक जनता को लाभान्वित करेंगे।

(पैरा 6.12)

     समिति आगे सिफारिश करती है कि विभाग को एक समर्पित और केंद्रीकृत "प्रौद्योगिकी विपणन और व्यवसायीकरण विंग" स्थापित करना चाहिए, जिसमें उसके लिए अलग बजट हो ताकि यह उद्योग के लिए एकल-खिड़की इंटरफ़ेस के रूप में कार्य कर सके, और उद्योग की आवश्यकताओं की पहचान करने और उन्हें मौजूदा सीएसआईआर प्रौद्योगिकियों से जोड़ने के लिए बाजार जानकारी प्रदान करके सक्रिय रूप से काम कर सके। यह विंग केवल निष्क्रिय ऑनलाइन पोर्टलों पर निर्भर ना रहते हुए रणनीतिक ब्रांडिंग और आउटरीच के लिए भी जिम्मेदार हो सकता है, और लक्षित वैश्विक विपणन अभियानों, प्रौद्योगिकी प्रदर्शनों और उद्योग-विशिष्ट रोडशो के माध्यम से एक मजबूत सीएसआईआर ब्रांड विकसित कर सकता है। इसके अतिरिक्त, इसमें समर्पित डील सुविधा भी हो सकती है, जिसमें व्यवसाय विकास और वार्ता विशेषज्ञता वाले पेशेवर शामिल हों ताकि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौतों को अधिक प्रभावी ढंग से संरचित और पूरा किया जा सके।

(पैरा 6.13)

     समिति समुक्ति करती है कि विभाग सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं के लिए इक्विटी हिस्सेदारी की अनुमति देने हेतु धारा 8 स्टार्टअप मॉडल के विकल्प का पता लगा रहा है। समिति की राय है कि विभाग सही दिशा में विचार कर रहा है। समिति प्रस्तावित धारा 8 कंपनी की शीघ्र स्थापना करने की सिफारिश करती है तरकि सीएसआईआर की प्रौद्योगिकियों का उच्च मूल्य पर मौद्रिकरण हो सके। समिति यह भी सिफारिश करती है कि इसके अन्वेषण से इक्विटी-आधारित इस मॉडल के संरचित, समयबद्ध कार्यान्वयन की ओर बढ़ा जाए। उच्च वाणिज्यिक संभावना वाली नवीन तकनीकों के लिए, सीएसआईआर को स्पिन-ऑफ उद्यमों या लाइसेंसिंग साझेदारों में शुरूआती लाइसेंस फीस और रॉयल्टी के बजाय, या इसके अतिरिक्त, रणनीतिक इक्विटी हिस्सेदारी लेने पर विचार करना चाहिए। यह सीएसआईआर के दीर्घकालिक हितों को कंपनी की सफलता के साथ संरेखित करेगा, और संभावित रूप से उच्च लाभ प्राप्त कर भविष्य के अनुसंधान में पुनर्निवेश किया जा सकेगा। इक्विटी प्रतिशत, निकास रणनीतियों और हितों के टकराव पर दिशानिर्देशों के साथ एक स्पष्ट नीति ढांचा विकसित करना आवश्यक है।

(पैरा 6.14)

मानव संसाधन प्रबंधन

      समिति चिंता के साथ समुक्ति करती है कि विभाग और सीएसआईआर में वर्तमान में इतने पद खाली पड़े हैं। विभिन्न सीएसआईआर प्रयोगशालाओं में, कुल संस्वीकृत संख्या 6050 में से 3408 वैज्ञानिक पद भरे गए हैं। समिति यह भी नोट करती कि उत्कृष्ट वैज्ञानिकों के ग्रेड पर्याप्त संख्या नहीं है और कुल संस्वीकृत 23 पदों में केवल 8 पद भरे हुए हैं। समान स्थिति प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों के ग्रेड में भी देखी गई है। इस चिंताजनक स्थिति के प्रकाश में, समिति दृढ़ता से सिफारिश करती है कि विभाग और सीएसआईआर वैज्ञानिक और तकनीकी ग्रेडों के साथ-साथ नेतृत्व भूमिकाओं पर विशेष जोर देते हुए सभी खाली पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरने के लिए एक त्वरित, समयबद्ध भर्ती अभियान शुरू करें, ताकि शोध गतिविधियाँ बाधित हों, संस्थागत प्रबंधन प्रभावी हो और राष्ट्र के प्रमुख अनुसंधान और विकास संगठन के रूप में सीएसआईआर के उद्देश्य की पूर्ति सुनिश्चित हो सके।

(पैरा 7.3)

     समिति इस बात की सराहना करती है कि विभाग ने नई भर्ती नियमावली को अधिसूचित किया है, और इसे सीएसआईआर में रिक्त पदों के अनवरत संकट को हल करने की एक समयोचित और महत्वपूर्ण कदम के रूप में स्वीकार करती है। समिति इसे एक सकारात्मक विकास के रूप में देखती है, जो यदि प्रभावी तरीके से लागू किया जाए, तो वैज्ञानिक और तकनीकी ग्रेडों में बड़ी संख्या में रिक्तियों को भरने, अनुसंधान क्षमता को मजबूत करने और आने वाले वर्षों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की बदलती चुनौतियों का सामना करने के लिए सीएसआईआर को सशक्त बनाने में काफी मदद करेगा। समिति सिफारिश करती है कि सीएसआईआर को सीएसआरएपी नियमावली, 2025 के तहत पहले राउंड की भर्ती पूरी करने के लिए एक निश्चित समयसीमा तय करनी चाहिए। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं में बड़ी संख्या में वैज्ञानिक और तकनीकी पद खाली हैं, एक त्वरित और समयबद्ध भर्ती अभियान अनिवार्य है, विशेष रूप से सीबीआरआई रुड़की, सीआईएमएफआर धनबाद, 4पीआई बेंगलुरु, आईजीआईबी नई दिल्ली, आईआईआईएम जम्मू, आईआईटीआर लखनऊ, एनबीआरआई लखनऊ, एनसीएल पुणे और एनआईएससीपीआर नई दिल्ली को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। भर्ती और आंकलन बोर्ड (आरएबी) को इन संस्थानों के लिए एक विशेष फास्ट-ट्रैक तंत्र तैयार करना चाहिए।

(पैरा 7.7)

     समिति यह भी सिफारिश करती है कि सीएसआईआर/आरएबी को निर्धारित और पूर्व-घोषित अंतराल पर समेकित भर्ती विज्ञापन जारी करने चाहिए आदर्श रूप से वर्ष में दो बार ताकि इच्छुक शोधकर्ता बिना किसी अनिश्चितता के योजना बना सकें और आवेदन कर सकें। इससे लंबे भर्ती अंतराल की पुनरावृत्ति रोकने में भी मदद मिलेगी, जो वर्तमान रिक्ती संकट का कारण बना है।

        (पैरा 7.8)

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आरकेके


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