विधि एवं न्‍याय मंत्रालय
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लोक अदालत आम लोगों के लिए उपलब्ध एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र है, जहां न्यायालय में लंबित या मुकदमे से पहले की अवस्था में मौजूद विवादों/मामलों का सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटारा/समझौता किया जाता है


न्याय प्रदान करने वाली व्यवस्था में सुधार

प्रविष्टि तिथि: 12 MAR 2026 12:52PM by PIB Delhi

सरकार ने लंबित मामलों की संख्या कम करने के उद्देश्य से परक्राम्य लिखत (संशोधन) अधिनियम, 2018, वाणिज्यिक न्यायालय (संशोधन) अधिनियम, 2018, विशिष्ट राहत (संशोधन) अधिनियम, 2018, मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2019 और आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 2018 में संशोधन किया है।

लोक अदालत आम जनता के लिए उपलब्ध एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र है, जहां न्यायालय में लंबित या मुकदमे से पहले की अवस्था में मौजूद विवादों/मामलों का सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटारा/समझौता किया जाता है। विधि सेवा प्राधिकरण (एलएसए) अधिनियम, 1987 के तहत, लोक अदालत द्वारा दिया गया निर्णय दीवानी न्यायालय के निर्णय के समान माना जाता है और यह सभी पक्षों पर अंतिम एवं बाध्यकारी होता है तथा इसके विरुद्ध किसी भी न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती। राष्ट्रीय लोक अदालतों का आयोजन सभी तालुकों, जिलों और उच्च न्यायालयों में पूर्व निर्धारित तिथि पर एक साथ किया जाता है। वर्ष 2016 से दिसंबर 2025 तक लोक अदालतों में निपटाए गए मामलों का विवरण निम्नलिखित है:

 

लोक अदालत

मुकदमे से पहले के मामलों का निपटारा

लंबित मामलों का निपटारा

 राष्ट्रीय लोक अदालत

33,80,76,089

8,45,59,866

राज्य लोक अदालतें

39,33,548

67,03,159

स्थायी लोक अदालतें

 (सार्वजनिक सुविधा सेवा से संबंधित मामले)

14,58,389

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न्याय प्रदान करने वाली प्रणाली में व्याप्त प्रणालीगत देरी को समाप्त करने हेतु एक सुनियोजित दृष्टिकोण आवश्यक है और केन्द्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अनिवार्य रूप से मामलों के शीघ्र निपटारे और लंबित मामलों की संख्या कम करने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार ने न्यायपालिका द्वारा मामलों के त्वरित निपटान के लिए एक अनुकूल इकोसिस्टम प्रदान करने हेतु कई पहलें की हैं। इन पहलों में ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना के तहत न्याय तक पहुंच बढ़ाने और पारदर्शिता को बढ़ावा देने हेतु नवीनतम तकनीकों का एकीकरण और न्यायपालिका के लिए बुनियादी ढांचे से जुड़ी सुविधाओं के विकास हेतु केन्द्रीय प्रायोजित योजना के तहत जिला एवं अधीनस्थ न्यायपालिका के लिए बुनियादी ढांचे से जुड़ी उपयुक्त सुविधाएं प्रदान करने हेतु राज्य सरकारों/केन्द्र-शासित प्रदेशों के संसाधनों में सहायता प्रदान करना शामिल है।

यह जानकारी विधि एवं न्याय राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और संसदीय कार्य राज्यमंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल ने आज राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।

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पीके/केसी/आर /डीए

 


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